Abhinav Imroz June 2024




 
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परिचय

नाम : डॉ. राम प्रकाश

जन्म : 15-08-1954

ग्राम         : रामपुर (खरही), पो बाजितपुर

ज़िला : उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

        पिन-229506

शिक्षा : बी.ए. बी.एड. कानपुर विश्वविद्यालय एम.ए. पी. एच. डी. नागपुर विद्यापीठ

पता         : 10B डुप्लेक्स, वर्धमान सोसाइटी राजपूतपुरा, अकोला, महाराष्ट्र 444001 

        मो. 9422861524

प्रकाशित पुस्तकें :-

1. भारतीय एवं पाशचात्य काव्य शास्त्र (समीक्षा) (1994)

2. सूपभर रोशनी ( वन वन्यजीवों, आदिवासियों पर काव्य संग्रह) (2007)

3. सच्ची पूजा (लोक कथा संग्रह) (2007)

4. लहरों के विरुद्ध (काव्य संग्रह) (2011)

5. रुकूँ क्यों पथ कर चुकाने (गीत संग्रह) (2014)

6. नई सुबह सिरहाने पर (काव्य संग्रह) (2014)

7. चील चूल्हा ले उड़ी (अवधी लोककथाएं) (2016)

8. नवग्रहों की कक्षा में (मराठी से हिंदी अनुवाद) (2016)

9. सड़क पर सांड (काव्य संग्रह) (2018) 

10. उन्हें गीत दो (गीत संग्रह) (2020)

11. अपनी मुट्ठी में अंबर भर (गीत संग्रह) (2020)

12. हम उजालें जोड़ते हैं (गीत संग्रह) (2020)

13. बिंदु से केंद्र बिंदु तक (जीवनी) (2020)

14. फटा हलफनामा (प्रतिनिधि कविताओं का संचयन) (2021)

15. पाशचात्य काव्यालोचन (समीक्षा) (2022)

16. हिंदी भाषा संरचना एवं भाषा विज्ञान (भाषा) (2022)

17. नक्षत्र मंडल (मराठी से हिंदी अनुवाद) (2022)

18. बादल राग (मेघ काव्य ) ( 2023)


संपादित पुस्तकें -

1. बृजलाल बियाणी स्मृति ग्रंथ (1995)

2. प्रतीक (विदर्भ स्तरीय काव्य संग्रह) (1998)

3. स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता (2015)

सम्मान / पुरस्कार-

1. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का संत नामदेव पुरस्कार (२००७) सूपभर रोशनी के लिए 

2. महाराष्ट्र शासन का राज्य स्तरीय आदर्श शिक्षक पुरस्कार (२०१३)

3. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का राज्य स्तरीय अनंत गोपाल शेवड़े पुरस्कार (२०१४)

4. बैसवारा शोध संस्थान रायबरेली का डॉ रामविलास शर्मा समालोचक सम्मान (२०१५)

5. उज्जैन का शब्द प्रवाह सम्मान "लहरों के विरुद्ध काव्य संग्रह के लिए (२०१२)

विशेष:

1. महाराष्ट्र की बालभारती (हिंदी प्रथम भाषा) में प्रणम्य" नामक कविता अभ्यासक्रम में समाविष्ट (2013) 

2. संत गाडगे बाबा अमरावती विद्यापीठ में बी कॉम तृतीय वर्ष के अभ्यासक्रम में गीत समाविष्ट (2021)

3. संतगाड़ में बाबा अमरावती विद्यापीठ से पी.एच.डी उपाधी हेतु काव्य संग्रहों पर शोध कार्य

4. फटा हलफनामा नामक काव्य  संग्रह पर लघुशोध-प्रबंध

कार्यक्षेत्र:

1. स्वावलम्बी विद्यालय व कनिष्ठ महाविद्यालय में प्रधानाध्यापक___

2. सीताबाई कला वाणिज्य विज्ञान महाविद्यालय अकोला मे सहायक प्राध्यापक 

        (स्नातकोत्तर हिंदी विभाग )

3. नया खून नागपुर के हिंदी दैनिक के अकोला संस्करण का संपादन

4. सदस्य महाराष्ट्र राज्य हिंदी सहित्य अकादमी मुंबई 1998

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

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अतिथि संपादकीय



साहित्य और साहित्यकार दोनों का एक सतत सामाजिक दायित्व होता है । साहित्य सृजन में दायित्व बोध विलुप्त सा हो गया है । दूर दराज के हताश-निराश आम जन साहित्य में अपनी आवाज नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं । सुविधा भोगी होकर पद, पुरस्कार और प्रशंसा के मोहपाश में फंसे साहित्यकार की कलम गोठिल हो गई है । तमाम विमर्शों का शब्दाडंबर मंचों और अकादमिक बाड़ों में तो दिखाई पड़ता है परन्तु धरातल पर सिर्फ लिहाजा अभिव्यक्ति के लिए निराला और दिनकर को खंगाल रहे हैं । भीड़ तंत्र और जुगाड़ तंत्र के बोलबाले ने रचना जगत में स्याह दाग लगाये हैं । खोज थी कबीर, निराला की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले की और डॉ रामप्रकाश के साहित्य ने ढांढ़स दिया । तमाम प्रलोभनों से दूर निरंतर रचना कर्म में रत । इसने बाध्य किया इनके विचारों को गहराई से समझूं और पाठकों के सामने रखूं । इन्हीं सब विचारों और चिंतन की अभिव्यक्ति है अभिनव इमरोज़ का यह विशेषांक । 


डॉ. श्यामबाबू शर्मा

अतिथि संपादक

लखनऊ, मो. 9863531572

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साक्षात्कार

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : काव्य विधा साहित्य की आदि विधा है । आदिकवि वाल्मीकि के ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वती समाः । यत्क्रौच मिथुनादेकमवधीः काम मोहितं' से आजतक की कविता को आप किस रूप में देखते हैं ?

डॉ. राम प्रकाश : हमारे यहाँ कलाओं का स्थान बहुत पवित्र और ऊँचा है । साहित्य को वाग्विलास नहीं माना
गया । वह हृदय और आत्मा की स्थिति है । संगीत की प्राचीनता सामवेद से है । नृत्य के आदि देव शिवजी हैं । उसी प्रकार साहित्य की प्राचीनता भी ऋग्वेद से लिखित रूप में है परन्तु काव्य तो मानव जीवन की उत्पत्ति से हो रहा है । जब किसी चीज का सम्बन्ध हृदय और आत्मा से है तो उसका लिखित स्वरुप भले ही बाद में आया हो परन्तु हृदय और आत्मा में उसकी स्थितियाँ लेखन से पहले ही रहेंगी । काव्य की अभिव्यक्ति के जिस प्रकार की बात क्रोचे करते हैं, वह कविता महाकवि की वाणी से प्रस्फुटित हुई है । विद्यमान तो पहले से ही थी । मैं क्रोचे की बात से सहमति संस्कृत की इस उक्ति से व्यक्त करना चाहूँगा । क्रोचे कहते हैं कि कविता कवि के हृदय में पहले ही अभिव्यक्त हो जाती है । जब वह काव्य लिखता है तब वह काव्य का पुन: सृजन करता है । यही बात आदि कवि वाल्मीकि के बारे में चारितार्थ होती है । क्रोचे की बात भारतीय चिन्तन में कोई नई नहीं है । इसे यों समझा जा सकता है । 

आदि कवि वाल्मीकि ने क्रौंच पक्षी के वध को देखा । जिस समय शिकारी द्वारा वध करते कवि ने देखा उसी समय उन्होंने यह श्लोक रचित तो नहीं किया होगा । उस करुण दृश्य के समय कवि के मन में करुणा, दया, आक्रोश तीनों भाव थे । यह तो तय है कि जब कोई व्यक्ति आक्रोश में होता है तो वह तमोगुण से आच्छादित होता है । क्रोध में शाप दिया जा सकता है, कविता नहीं की जा सकती । काव्य के लिए सतोगुण का होना अनिवार्य है । हमारे आदि कवि ने बहेलिया के लिए उस समय शाप दिया होगा, पर जब मन शान्त हुआ होगा तब यह श्लोक फूट पड़ा । निराला ने पुत्री के निधन पर सरोज स्मृति नामक कविता लिखी, पर उस समय नहीं जब सरोज की चिता जल रही थी । शान्त मन से कवि जिस पूर्वघटित घटना समय मन और हृदय से पहुँच जाता है तब काव्य सृजन सम्भव होता है । इस प्रकार यह तय है कि कविता अपनी व्यग्रता की आभिव्यक्ति शान्त क्षणों की विचारा वस्था में करता है । 

अब आइये उसी भाव भूमि पर चलते हैं । जिस समय शिकारी ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिया । दूसरा पक्षी अपनी भाषा में विलाप कर रहा है । कवि के मन में पक्षी के विरह प्रलाप को देखकर करुणा के भाव जाग्रत होते हैं । यहां विरह पीड़ित कवि नहीं है, पक्षी है । उसके विरह को देखकर करुणा और दया के भाव से कविता उपजती है । काव्य की उत्पति विरह से नहीं अपितु करुणा से हुई है । पक्षी के मन में विरह के साथ-साथ आक्रोश क्रोध के भाव निश्चित ही रहे होंगे । पशु-पक्षियों में भी बदले की भावना रहती है यह प्राणी की स्वाभाविक प्रवृत्ति है परन्तु क्रौंच पक्षी शिकारी से बदला लेने में असमर्थ है । उसकी विवशता उसके क्रंदन में फूट पड़ती है । पक्षी के क्रंदन में आक्रोश है, विवशता है जिसे देखकर आदि कवि के मन में दया और करुणा उत्पन्न होती है और करुणा के रूप में कविता फूट पड़ती है । इन सबके मूल में है संवदेना । हमारी संवेदना बड़ी विशाल होती है । संवेदना की विशालता और गहराई जितनी विस्तृत होगी, प्रबल होगी, आवेगमयी होगी, कविता उतनी ही श्रेष्ठ होगी । आदि कवि के मन की संवेदना यहाँ मानवेतर स्थिति तक जा पहुंचती है । यह भावना विश्व बन्धुत्व के भी ऊपर है, उससे भी श्रेष्ठ है । कवि, पक्षी के परिवार का नहीं है, मनुष्य भी नहीं है पर है तो प्राणी ही । प्रत्येक प्राणी के लिए संवेदना रखनेवाला अथवा उसके भी आगे निकलकर पेड़-पौधों के लिए संवेदना रखनेवाला व्यक्ति कवि होता है, महाकवि होता है । गाँधी जी अफ्रीका के लोगों का दुख देखकर उनके कष्टों को दूर करने के लिए वहाँ पहुँच जाते हैं यह विश्व बन्धुत्व का भाव है परन्तु जगदीशचन्द्र बोस जब पेड़ों में जीवन देखते हैं तो उनकी वैज्ञानिक दृष्टि मानवेतर से आगे बढ़कर प्राणीतर तक जा पहुँचती है । 

कविता इसी भावभूमि की देन है । क्रोचे का काव्य विवेचन इसी बिन्दु तक जा पहुँचता है । इसीलिए कहा जाता है कि कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बंधों से ऊपर उठाती है । लोकजीवन की सामान्य भूमि तक कविता पहुँचाती है । इसलिए कविता अर्थग्रहण मात्र नहीं है वह बिम्बों के माध्यम से संवेदना जाग्रत करने का कार्य करती है । कविता बन्द कमरों का अनुभव नहीं है, प्रकृति के सानिध्य से उत्पन्न कृति है । इसलिए कविता भौतिक नहीं है, वह प्रकृति (मानव के भी) के माध्यम से शाश्वत मूल्यों का पुन: पुन: प्रस्तुतीकरण है । 

 ऐसे में सुमित्रानंदन पंत जब पहले कवि में विरहानुभूति से जन्मी कविता की बात करते हैं तो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं हुआ जा सकता है । पंत जी कहते हैं- 

 वियोगी होगा पहला कवि 

 आह से निकला होगा गान 

 उमड़कर आँखों से चुपचाप

 बही होगी कविता अनजान ।

यहां पंत जी कह रहे हैं कि पहला कवि वियोगी होगा । जब जग जाहिर है कि वियोगी वाल्मीकि नहीं थे । वियोगी तो वह मादा पक्षी था । तब क्या यह कहा जा सकता है कि मादा क्रौच के वियोग को आदि कवि ने व्याख्यायित किया है । वाल्मीकि की लेखनी से जिस प्रथम श्लोक का प्रस्फुटन हुआ है वह करुणा और संवेदना की देन है । क्रौंच पक्षी का प्रलाप यद्यपि विरह प्रलाप था पर आदिकवि के मन में करुणा और दया के भाव आये जिसका उल्लेख किया गया है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आदि कवि का आदि श्लोक वियोग की देन नहीं है । वहाँ विप्रलम्ब श्रृंगारवाला रस न होकर करुण रस की प्रतीति हो रही है । वह करुणा से उद्भूत है । कवि जब विरह रस का वर्णन करता है तब उसमें नाना प्रकार के अप्रस्तुत विधानों का समायोजन करता है । वहाँ कवि का बुद्धि पक्ष भी सजग दिखाई देता है । जैसे कि पंत जी की कविता की निर्णयात्मक परिभाषा से विदित होता है परंतु आदि कवि के उक्त श्लोक में यह तथ्य, तत्व नहीं है । वहाँ हृदय पक्ष इतना प्रबल है कि भावों का सहज उच्छलन दिखाई देता है । पंत जी महाकवि हैं । इससे असहमति नहीं है परन्तु कविता की उद्भूतता की जो परिभाषा की है, उसे किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता है । विरह में कविता को बाँध देना कविता के असीमित आयाम को संकुचित कर देना है । विरह में स्वार्थ या हित भंग होने की बात आती है । जिससे विछोह होता है उस पात्र से विरह पीड़ित की व्यथा व्यक्त होती है । जो विरहानुभूति पीड़ित व्यक्ति को होगी उतनी अन्य किसी को तो नहीं हो सकती । इसलिए यहाँ विरह की पीड़ा हर एक के लिए नहीं है परन्तु करुणा और दया असीमित है । इन्हें खाँचे में नहीं बिठाया जा सकता । इसीलिए पंत जी का दृष्टिकोण संकुचित है । हमारे यहाँ काव्य का स्थान तो इतना ऊँचा है कि नाटक को भी काव्य कहा गया है ‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’ अर्थात काव्य में नाटक प्रकार रम्य होता है । प्राचीन साहित्य में काव्य शब्द के अन्तर्गत सभी विधाएँ समाहित हो जाती थीं । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : यह बात तो कविता के बारे में हो गई । आप हिन्दी कविता की यात्रा को किस रूप में देखते
हैं ? 

डॉ. राम प्रकाश : देखिए हिन्दी कविता की शैशवावस्था के विचार के समय दो बातों पर विशेष ध्यान देना होगा । पहली बात तो एक भ्रांति से सम्बन्धित है कि हिन्दी का विकास संस्कृत से हुआ है । यह एक सामान्य धारणा रही है, जो अब अवधारणा बन गई है । सच यह है कि हिन्दी का विकास बोलियों से हुआ है । चूंकि बोलियाँ लोकजीवन की होती हैं । इसी कारण हिन्दी जन्मतः लोकजीवन से जुड़ी रही है । इसमें माटी की गन्ध रही है और है । माटी से मेरा तात्पर्य हिन्दी भाषी प्रांतों की माटी से ही नहीं है । सुदूर दक्षिण के क्षेत्रों से भी है, जहाँ दक्खिनी हिन्दी विकसित हुई । जिस जिस मिट्टी में हिन्दी विकसित हुई उस-उस मिट्टी की गन्ध उसमें है, चाहे वह मिट्टी भारत की हो या विदेश की । वैसे तो किसी भी भाषा को लोकजीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता परन्तु हिन्दी के लिए यह बात विशेषरूप से लागू होती है । हिंदी की प्रकृति और प्रवृत्ति लोकजीवन की है । मेले- ठेले, हाट-बाजार, खेत-खलिहान की भाषा हिन्दी रही है । इस कारण इसका भौगोलिक विस्तार भी बहुत अधिक है । पुराना आसाम जिसमें मेघालय भी था, वहाँ आज भी ‘ब्रजबुली' बोली है, जो ब्रज भाषा का ही रूप है । आसाम से गुजरात तक इसका विस्तार रहा है । मीरा को जितना हिन्दी की कवयित्री माना जाता है, उससे अधिक वे गुजराती की कवयित्री मानी जाती हैं । कहने का तात्पर्य यह कि हिन्दी की भौगोलिक और भाषाई विशालता ही उसकी प्रवृत्तिगत विशालता और विशेषता है । हिन्दी ने प्रत्येक प्रान्त और प्रत्येक देश में अपने को उसी भौगोलिक परिस्थिति में ढाल लिया है । 

दूसरी बात हिन्दी के बारे में ध्यान देने की है कि जब से हिन्दी का जन्म हुआ तब से ही वह विदेशी आक्रमणों का दंश झेल रही है । सन 712 में पहली बार मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आक्रमण किया । यह हिंदी का जन्मकाल था । बोलियों में हिन्दी आ रही थी । हिन्दी अपने उदभव से ही संघर्ष से जूझ रही है । वीरगाथा काल आपसी संघर्ष और विदेशी आक्रांताओं के संघर्ष का काल रहा है । यहाँ हिन्दी की जुझारू प्रवृति दिखाई देती है । इस काल में राजाओं के आपसी द्वन्द और युद्ध की प्रवृति के कारण राजाओं का गुणगान रहा । इस युग में राजाओं का प्रशस्ति गायन हो रहा था पर साधु संन्यासियों ने हिन्दी को समृद्ध बनाने का महत कार्य किया है । इस सम्बन्ध में बहुत कुछ शोध होना शेष है । छोटे-छोटे गाँवों में हिन्दी के रचनाकार रहे हैं, परन्तु प्रकाशन की सुविधा न होने सेअसंख्य कवि अख्यात रह गए । जो राजाओं या जमींदारों के सम्पर्क में रहे उन्हें ही लोगों ने जाना परन्तु जो अनाम रहकर रचनाएं करते रहे वे अलक्षित रह गए । इस काल में भाषा भी गढ़ी जा रही थी और साहित्य भी रचा जा रहा था । इस दृष्टि से प्रारम्भिक काल का बड़ा महत्व है । इसी काल की नींव पर भक्ति काल का भव्य भवन खड़ा है । 

जैसे किसी व्यक्ति की, किसी प्राणी की कोई फितरत होती है, उसी तरह भाषा की भी फितरत होती है । हिन्दी की फितरत शासन करने वालों से मेल नहीं खाती । धर्म, राजनीति, समाज, अर्थ इन सब पर जिस-जिस ने आधिपत्य जमाया है, शासन किया है, बर्बरता बरती है उन सबके विरोध में हिन्दी खड़ी रही है । हिन्दी शासकों से असहमति की भाषा है । इसे सीधे-सीधे कहें ऐसा कह सकते हैं कि हिन्दी चापलूसी की या दबाने की प्रवृत्ति वालों की भाषा कभी थी ही नहीं । हिन्दी तो 'मत चूको चौहान’ वाली भाषा रही है । भक्तिकाल में भी विद्रोह के प्रबल स्वर कबीर में मिलते हैं । श्रृंगार काल में जब चारणों ने हिन्दी कविता को जीविका से जोड़ा तब कविता का दम घुटने लगा और तब हिन्दी कविता अपने श्रृंगारिक रूप वाले चोले को छोड़कर स्वाधीनता आंदोलन की भाषा
बनी । 'जहाँ कवि भूषण रायगढ़ तक देशभक्ति के गीत गाने के लिए पहुँचते हैं वहीं उन का प्रभाव शिवाजी के पुत्र संभाजी पर भी पड़ा और संभाजी मराठी भाषी होते हुए भी हिन्दी में रचनाएँ करने लगते हैं । खड़ी बोली का इतिहास भी ‘खरी बोली’ से प्रारम्भ होता है । यही कारण है कि एक स्वाभिमानी भाषा को प्रशासन की भाषा बनने में कठिनाई हो रही है । 'सर, यस सर’ की भावना हिन्दी में आज भी नहीं है । खेत-खलिहान, मजदूर, किसान, दलित, शोषित, पीड़ित लोगों की अभिव्यक्ति जितनी प्रबल और सशक्त तरीके से हिन्दी में हुई है उतनी अन्यत्र दुर्लभ है । हिन्दी कविता आम आदमी के बीच ही रमती रहती रही है । उसे वहीं सुख मिलता है । हिन्दी कविता की धुरी भक्तिकाल में भक्तों संतों के हाथ में रही हैं । ये लोग आम जनता के बीच में रमते थे, घूमते थे । भक्तों और संतों के बीच में कोई दीवार नहीं थी । नामदेव महाराष्ट्र के संत थे । पक्के सगुणोपासक थे । विट्ठल के भक्त थे पर उनकी गिनती निर्गुण में भी की जाती है । उनका काव्य महाराष्ट्र से पंजाब तक फैला है । यायावरी संतों महात्माओं ने भक्तिकाल में हिन्दी काव्य को दूर-दूर तक फैलाया । रीतिकाल राजाश्रय में सिमट जाने के कारण श्रृंगारिकता बढ़ गई । आधुनिककाल का प्रथम चरण यद्यपि स्वतन्त्रता की छटपटाहट का है परन्तु उस काल में अंग्रेजों ने जो विकास किया विशेषकर रेल और सड़कों का, इस कारण अंग्रेजों के विकास की सराहना भी की गई
है । द्विवेदी युग लोकमान्य तिलक का युग है तो छायावादी युग महात्मा गाँधी का है । बीसवीं शताब्दी की पूर्वार्ध सदी ने दो-दो महायुद्ध झेले हैं । इन सबकी झलक हिन्दी में है । अमेरिका, रूस और ब्रिटेन की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव हिन्दी में दिखाई देता है । मशीनी युग ने भाषा के तौर पर हिन्दी का विकास दूर-दराज क्षेत्रों में किया । मिलों के भोंपू की आवाज को श्रमिकों के माध्यम से हिन्दी ने वाणी प्रदान की । यहाँ तक कि पंत जैसे प्रकृति के सुकुमार कवि भी श्रमिकों की संवेदना से अछूते नहीं रहे । अज्ञेय युगके बाद हिन्दी काव्य में बौद्धिक विद्रोह और अराजकता का युग आया । साठोत्तरी कविता यही दर्शाती है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता को आप किस रूप में देखते हैं ?

डॉ. राम प्रकाश : आज की हिन्दी कविता नगरवासिनी हो गई है । लोकजीवन से असम्पृक्त हो गई है । आज का शायद ही कोई कवि या लेखक होगा जो किसी गाँव में रहकर लेखनी चला रहा होगा । एक समय था जब दिनकर जी सिमरिया का, निराला जी गढ़ाकोला का, प्रतापनारायण मिश्र बैजेगाँव का, मैथिलीशरण गुप्त चिरगाँव का, माखनमाल चतुर्वेदी बाबई का ग्रामीण परिवेश का अनुभव समेटे हुए लेखन में आये थे । प्रेमचन्द का लमही उनकी कहानियों और उपन्यासों में चित्रित बिम्बित है । आज सोशल मीडिया का युग है । सारे समाचार पत्र और नियमित अनियमित पत्रिकाएँ महानगरों से निकल रही हैं । ऐसे में हिन्दी साहित्य से उसका प्राण लोकजीवन लुप्त होता जा रहा है । गाँवों में जातिवाद की भीषणता गरीबी का यथार्थ व संवेदनात्मक चित्रण गायब है । इसका कारण यही है कि आज हिन्दी साहित्यकार नगरजीवी हो गया है । इनमें यादि किसी का सम्पर्क सम्बन्ध गाँवों से है भी तो वह नाममात्र का है । 

एक और बात कहना चाहूँगा । आज का हिन्दी साहित्यकार 'एलीट वर्ग’ का है । उसके पास कारें हैं, बंगले हैं एसी है, नौकर-चाकर हैं । इन साहित्यकारों ने विपन्नता और भूख केवल सुनी है, अनुभव नहीं की । आज का हिन्दी साहित्य प्रोफेसरों की बैसाखी पर टिका है । आज हिन्दी का प्रत्येक प्रोफेसर अपने आप को साहित्यकार विशेषकर कवि और समीक्षक समझता है । ऐसे साहित्यकारों से यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे ‘पेट पीठ मिलकर दोनों हैं एक’जैसी पंक्तियाँ लिख सकेंगे । यह वर्ग ही विदेशों तक जाकर अपनी बेहूदी रचनाएँ सुनाकर आते हैं । विश्व हिन्दी सम्मेलनों में विदेशी विद्वान तो यही समझेंगे कि हिन्दी में यही कविता लिखी जा रही है । आज हिंदी का प्रोफेसर पढ़ता तो है ही नहीं पर लिखता बहुत है । इनके कारण हिन्दी की बड़ी हानि बड़ी हुई है । यह वर्ग कोई मौलिक चीज नहीं दे पा रहा है । इसकी चरमसीमा का एक उदहारण देना चाहूंगा । एक विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आनेवाले सभी महाविद्यालयों के हिन्दी प्रमुखों के प्रमुख अर्थात हिन्दी बोर्ड के प्रमुख को यह तक पता नहीं है कि नामवर सिंह कौन थे या राजकमल प्रकाशन जैसी कोई संस्था भी है । यही कारण है कि विदेशों में साहित्य में उत्तरआधुनिकतावाद सन 2009 में समाप्त हो गया और भारत का हिन्दी का प्रोफेसर अभी तक विमर्शों में ही अटका पड़ा है । 'अहो रुपं अहो ध्वनि’ की बात आज हिन्दी के प्रोफेसर में पाई जाती है । इससे हिन्दी भाषा और साहित्य दोनों की अपार हानि हो रही है । इससे निकलने का यही उपाय है कि हिन्दी की पत्रिकाएँ लोकजीवन की ओर उन्मुख हों । पद, पैसा, पुरस्कार और प्रशंसा से हिन्दी साहित्य की बड़ी हानि होती है । सर्वहारा समाज का चित्रण शौकिया हो गया है । इस सम्बन्ध में राज्य और केंद्र की हिन्दी अकादमियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं । इससे हिन्दी साहित्य और भाषा से सम्बंधित कार्य कुछ केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में अच्छा हो रहा है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : साहित्य में कविता को अत्यन्त सहज विधा माना जाने लगा है । धूमिल के शब्दों में 'आजकल कवि लोग कूकुर की तरह हो गए हैं’ इसके बावजूद आमजन से यह संवाद करने में कामयाब क्यों नहीं है?

डॉ. राम प्रकाश : आपके इस प्रश्न में दो प्रश्न निहित हैं । पहला प्रश्न सहज विधा से सम्बन्धित है । दूसरा प्रश्न आम आदमी से कविता की संवादात्मकता में आई कमी के बारे में है । आइए पहले प्र१न पर बात करते हैं । सहज शब्द को समीक्षा की दॄष्टि देखेंगे । कवि असहज होकर सहज रूप में काव्य-सृजन करता है । कवि के अंतस और मन में जब भावों का संबलन होगा, भावों की सघनता होगी । भावों की घनीभूतता जब कवि को असहज कर देगी तब काव्य का उत्स फूट पड़ता है । इस प्रकार की अभिव्यक्ति को भावों का सहज उच्छलन कहा जाता है । वर्ड्सवर्थ ने इसे spontaneous overflow of powerful feelings कहा है । उदात्त भावों को लेकर जब विचार किसी विशेष उद्देश्य को लेकर मंथित होकर सहज रूप में अभिव्यक्त होंगे तो कविता श्रेष्ठ होगी । कविता सोच-सोचकर नहीं लिखी जाती । यह तो फिल्मों में होता है कि विषय दे दिया गया और दिए गए विषय में उनकी बनाई धुन में लिख दो । कविता भावों की कड़ाही में पकती है । बुद्धि की केवल छौंक लगाई जाती है । इस प्रकार की कविता असहजता की चट्टान को फोड़कर सहज रूप में निर्झर सृदश प्रवाहित हो जाती है । इस दृष्टि से कविता सहज रूप में निःसृत होती है और सहृदय पाठक के मन और आत्मा में सीधे उतरती है । सहज और सहजता का यह समीक्षात्मक रूप है जो काव्य-सृजन प्रक्रिया से सम्पृक्त है । आप जिस सहजता की बात कर रहे हैं वह भी सृजन प्रक्रिया से सम्बन्धित है परन्तु इस सहजता में रचना प्रक्रिया होती ही नहीं । ऐसी कविता बिना सोचे-समझे, बिना किन्हीं भावों के संबलन के लिखी जाती है । ऐसी कविता को कविता कहना कविता को लांछित करना है । गजल के बारे में एक बात अक्सर लोग कहते हैं कि गजल या तो होती है या फिर नहीं होती । गजल अच्छी या बुरी नहीं होती । यही बात कविता के बारे कही जा सकती है । कविता या तो होती है या फिर नहीं होती | कविता अच्छी या बुरी नहीं होती । उपमेय, उपमान बिम्ब, प्रतीक, विचार के बिना जो भी लिखा जायेगा उसे हम काव्य नहीं कह सकते । कविसम्मेलन में मनोरंजन के लिए जो भोंडापन परोसा जाता है वह कविता है ही नहीं । काव्य के छिछलेपन को हल्केपन को देखकर धूमिल ने ऐसे तथाकथित कवियों को कुत्ते की संज्ञा दी है । तुकबन्दी ही कविता नहीं होती । काव्य में चार्ली चैपलिन खोजना न केवल मूर्खता है बल्कि काव्य जैसी पवित्र विधा का घोर अपमान है । कोई भी जोक पहली बार सुनने में ठीक लगता है । दूसरी बार नहीं । आजकल स्वरचित रचनाओं का मंच पर अभाव है । मंचों पर भोंडे हास्य का अभिनय एक बार ही पसन्द करेंगे । इसलिए आज का मंचीय कवि एक दूसरे की रचनाएँ घड़ल्ले से सुनाते हैं । विदूषकी कविता टिकाऊ नहीं होती । इसके विपरीत संस्कृति, सभ्यता और प्रेरक कविताएँ सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते हैं । चाहे वह रचना कितनी ही पुरानी क्यों न हो । बिना सोचे समझे बिना भावों के जो अनर्गल प्रलाप किया जाता है उसमें भारतीयता का अभाव होता है । एक बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति समस्त मानव जाति अर्थात विश्व बंधुत्व को लेकर चलती है । मानवहित में जितनी भी बातें विश्व में कही गई हैं, वे सब कहीं न कहीं भारतीय सोच और संस्कृति से जुड़ी हैं । प्रत्येक कवि को चाहे वह किसी भी भारतीय भाषा का हो भारतीय उदात्त सोच से जुड़ना होगा । भारतीय ज्ञान से अछूता कवि या साहित्यकार आम आदमी को कुछ नहीं दे पायेगा । मैंने देखा है उत्तरभारत में हलवाहा भी श्री रामचरित मानस की ढाई-तीन सौ चौपाइयाँ सुना देगा । आप जिस तरह के कवियों की बात कर रहे हैं, वह भी हक्का - बक्का रह जायेगा । लोक जीवन भारतीय संस्कृति और सभ्यता का भी प्राण है । इससे कटा हुआ कवि और काव्य दो कौड़ी का है इसलिए कूकुर या कुकरमुत्ते जैसे कवि स्वयं को कवि मानकर स्वयं धन्य भले ही कर लें परन्तु ये लोग आमजन को कुछ नहीं दे सकते । वर्षा के बाढ़ के पानी की तरह समय इन्हें विलुप्त कर देगा । धूमिल ने बड़े कटु शब्दों में कबीराना अंदाज में सत्य कहा है । 

आपके प्रश्न में जो दूसरा प्रश्न आया है उसका उत्तर भी पर्याप्त रूप में पहले प्रश्न के उत्तर में आ चुका है परन्तु एक अन्य पहलू भी है । जहाँ एक ओर ढंग की कविताओं का अभाव है तो दूसरी और श्रोताओं और पाठकों को रुचि को अत्यंत विपर्यस्त कर दिया गया है । हमारी नई पीढ़ी को भाषा और साहित्य से विमुख कर दिया गया है । उन्हें यह पता ही नहीं है कि कोई भाषा और साहित्य जीवन जीने की राह दिखला सकता है । नई पीढ़ी को गलाकाट प्रतियोगिता में उतार दिया जाता है, जहाँ वह असफल होने पर आत्महत्या करने की सोचने लगता है । साहित्य जीवन बनाता है, बचाता है । मेरा यह अटल विश्वास है या इसे दावा कह लें कि कोटा में आई आई. टी. की तैयारी करनेवाले विद्यार्थी को केवल 20 प्रेरणादायी गीतों की पंक्तियाँ रटा दी जाएं । उन्हें उन मंत्र की तरह बतलाया जाये तो विद्यार्थी कभी आत्महत्या नहीं करेगा । 

विद्यार्थियों को नैराश्य और अवसाद से बचाने का कार्य साहित्य करता है । इसके लिए विश्वविद्यालयों को आगे आने होगा । एम.ए. हिन्दी के प्रश्न -पत्रों को तैयार करने के लिए मैं दो विश्वविद्यालयों में जाता रहा हूँ । वहाँ सबके सब प्रश्नों के उत्तर एक एक शब्द में लिखने थे । एम.ए. के विद्यार्थी को प्रथमश्रेणी और मेरिट में स्थान मिल जाता है पर उसे हिंदी साहित्य का एक वाक्य भी लिखना नहीं पड़ता । हमारी शिक्षा प्रणाली में साहित्य को महत्व देना होगा । आज चालीस वर्ष के युवक को साहित्यिक जिजीविषा का कुछ पता ही नहीं है । 

इस प्रकार जहाँ एक ओर तथाकथित कवि और तथाकथित कविताओं की बाढ़ है, वहीं कविता से नई पीढ़ी को काट दिया गया है । नई पीढ़ी कहती है 'कविता पढ़ के पैसा थोड़े ही कमा सकते हैं । ‘ऐसे वातावरण में कमियाँ जब दोनों ओर से हों तो कविता आमजन तक कैसे पहुँच सकती है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : तो क्या इस स्थिति परिस्थिति को बदलने के लिए कोई उपाय बचा नहीं है ?

डॉ. राम प्रकाश : नहीं, ऐसी बात नहीं है । संभावना है या यों कहें कि संभावनाएँ बहुत हैं और उनकी पहल भी हो चुकी है । सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात तो यह हुई कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई । यह नीति 2024-2025 से लागू हो जाएगी । इसमें यह प्रावधान है कि कोई भी विद्यार्थी अपनी पसन्द के विषय चुन सकेगा । अभी तक कला, वाणिज्य और विज्ञान संकाय थे । विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था कि किसी एक संकाय में ही प्रवेश लें । विज्ञान और वाणिज्य में रोजगार के अवसर अधिक रहते हैं । इसलिए विधा कला संकाय का महत्व कम हो
गया । नवयुकों ने भाषा पढ़ना ही छोड़ दिया । इसका अर्थ यह नहीं कि उनमें रूचि नहीं थी परन्तु जिन विषयों में रूचि थी वे विषय पढ़ नहीं पाते थे और जिनमें रुचि नहीं थी उन विषयों को पढ़ना पड़ता था । परिणामस्वरूप नवयुवकों की ऊर्जाशक्ति का अपव्यय होता था । अब नई शिक्षा प्रणाली में यह प्रावधान है कि कोई भी विद्यार्थी गणित और विज्ञान के साथ हिन्दी विषय लेकर भी स्नातक की उपाधि ले सकता है । मैं ऐसे बहुत से विद्यार्थियों को जानता हूँ जो हिन्दी विषय लेकर अतिरिक्त पढ़ाई करते हैं । अब ऐसे विद्यार्थियों को अलग से साहित्य के लिए अध्ययन नहीं करना होगा । 

विगत पचास सालों में भारतीयों को उनकी जड़ों से काट देने का षड्यन्त्र बड़ी होशियारी से किया गया है । अंग्रेजी की अनिवार्यता ने भारतीयों को उनकी संस्कृति और सोच से अलग करने का ही कार्य किया है । आज चालीस साल तक के विद्यार्थियों कोआषाढ़, सावन ही नहीं ज्ञात है तो वे वर्षा का आनंद साहित्य में कैसे ले सकेंगे? अपनी जड़ों से कटी हुई विकलांग पीढ़ी को न तो अपनी मातृभाषा आती है और न अंग्रेजी में निष्णात हो पाई । परिणामत: इक्कीसवीं सदी में भाषा और साहित्य की दृष्टि से विकलांग पीढी जन्मी है । यह पीढ़ी केवल पैसा कमाने का गुण सीख रही है, जीवन जीने की शैली नहीं सीख पा रही है । इसी कारण तीज त्योहारों की पवित्रता हुड़दंग में बदल गई है । 

यह सच है कि विद्यार्थी को यदि मातृभाषा में पढ़ाया जायेगा । वह अपनी संस्कृति से जुड़ा रहेगा, प्रकृति से जुड़ेगा और जब यह जुड़ाव होगा तो वह मिट्टी से प्रेम करने लगेगा । यह बात तो अकादमिक स्तर पर हुई । आइये अब दूसरी पहल की ओर चलें । आजकल के हास्य कवि सम्मेलनों से लोग ऊब चुके हैं । श्रोताओं की संख्या कम होने लगी है । कवि सम्मेलनों का प्रारम्भ बड़ी उदात्त भावना को लेकर किया गया था । हिन्दी का पहला कवि सम्मेलन सन् 1923 में कानपुर में आयोजित किया गया था । इसका आयोजन उन्नाव जिले के हड़हा गाँव के निवासी सुप्रसिद्ध साहित्यकार गयाप्रसाद शुक्ल सनेही ने किया था । इस कवि सम्मेलन में 27 कवियों ने भाग लिया था । तब से कवि सम्मेलन देशभक्ति और जन जागरण के मंच बन गए । मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह दिनकर, जयशंकरप्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, सोहन लाल द्विवेदी, हरिवंशराय बच्चन, गिरिजाकुमार माथुर, रमईकाका, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे दिग्गज साहित्यकारों ने कवि सम्मेलनों के माध्यम से हिन्दी कविता को जन-जन तक पहुंचाया । चाहे कोई साक्षर हो या निरक्षर पर कवि सम्मेलन की कविताएं सुनने के लिए रात-रात भर जगते थे । आज हम सन् 2023 में प्रथम कवि सम्मेलन की शताब्दी मना रहे हैं । इन सौ वर्षों में कवि सम्मेलनों के स्तर की गिरावट किसी से छिपी नहीं है । निम्न स्तर का मनोरंजन और अश्लीलता इन कवि सम्मेलनों की फितरत बन गई है । इस शताब्दी में कवि सम्मेलन के नाम पर भड़ैती की जाने लगी है । फलत: प्रबुद्ध नागरिक अब इन सम्मेलनों में नहीं जाता । अब एक नये दौर की शुरुआत हो चुकी है । लोग गम्भीर रचनाएँ सुनने के इच्छुक हैं । इसका ज्वलंत उदाहरण हैं सुरेन्द्र शर्मा । आजकल वे हास्य- व्यंग्य का अन्त गंभीर रचना से करते हैं । श्रोताओं को हँसाने के बाद रुला देते हैं, करुणा से भर देते हैं । लोग उन्हें खूब सुनते हैं । कुमार विश्वास जैसे पेशेवराना लोग - भी रामकथा में कूद पड़े । कुमार विश्वास का प्रवचन नुमा कवि सम्मेलन दिनकर, धूमिल, कबीर, निराला के पारायण के बिना सम्भव नहीं होता । इसका अर्थ ही यह है कि निराला, कबीर, दिनकर को लोग आज भी उसी तरह पसन्द कर रहे हैं जितना उनके समय में श्रोता उन्हें पसन्द करते थे । आजकल लगभग 30 देशों में कवि सम्मलेन सुने जाते हैं परन्तु विदेशों के कवि सम्मेलनों में फूहड़ता बर्दाश्त नहीं की जाती । यह एक अच्छा संकेत है । 

हिन्दी की काव्य- गोष्ठियों ने भी हिन्दी कविता के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सन 1870 में ‘कविता वर्धिनी’ नामक संस्था गठित करके प्रथम काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था । हिन्दी की काव्य-गोष्ठियों ने 150 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं । इन्हीं गोष्ठियों में प्रशिक्षित होकर, तपकर पढ़कर हिन्दी के कवि निखरे हैं । मुंबई में चौपाल, अकोला में राष्ट्रभाषा सेवी समाज जैसी संस्थाएँ गोष्ठियों के माध्यम से अ हिन्दी भाषी प्रांतों में भी- हिंदी कविता को लोकप्रिय बनाए हुए हैं । आजकल के भागदौड़ के जीवन में घर -परिवार से सम्बन्धित कविताएं लोकप्रिय हो रही हैं । कविता में लोग रमते रहे हैं, सुख और संतुष्टि पाते हैं । कविता जीवन का सुकून रही है, आज भी है और कल भी रहेगी । समय बदल रहा है । अच्छी काविता को दाद मिल रही है, वह भी नवयुवकों के द्वारा, यह शुभ संकेत है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : आपकी कविताओं में लोकजीवन के तमाम चित्र हैं और आप मानते भी हैं कि लोक से असम्पृक्त होकर कविता नहीं हो सकती । अब जब वातानुकूलित कक्षों में बैठकर कविता लिखी जा रही है तो इसमें लोक की समाविष्टि कैसे होगी?

डॉ. राम प्रकाश : मेरी मान्यता है कि कविता कभी सोती नहीं । वह अहर्निश जागती रहती है । जब कविता को नींद नहीं आती तो वह कवि को कैसे सोने देगी? कविता कवि को कुरेदती है, बेचैन करती है, सजग करती है । किसी एक समय नहीं, निरन्तर । यह बेचैनी प्रसव पीड़ा जैसी होती है जो सन्तान सुख की अनुभूति कराती है । यह पीड़ा, यह बेचैनी कविता के रूप में अवतरित होती है । यहाँ प्रश्न है कि यह बेचैनी, यह प्रसव पीड़ा कवि में आती कहाँ से है । इसका सीधा उत्तर है लोक जीवन से । कबीर जब कहते हैं ‘तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी’ तब इसका सीधा सम्बन्ध लोकजीवन से है । कबीर से बड़ा लोकगायक और कौन हो सकता है । जब तक हम लोक जीवन्त आँखों से देखेंगे नहीं तब तक उसके बारे में लिखेंगे कैसे? कबीर के विद्रोही विचार लोक जीवन की ही व्याख्या है । इस दृष्टि से लोक शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है । लोक शब्द संस्कृत से आया है जिसका अर्थ होता है देखना । इससे अनेक शब्द बने हैं । अवलोकन, सिंहावलोकन, विहंगावलोकन जैसे शब्दों के अर्थ भले ही भिन्न - भिन्न हों, परन्तु इन सारे शब्दों में एक समान्य तात्पर्य है दृष्टि । यह दृष्टि कैसी हो, इसके लिए अनेक व्याख्याएँ हैं । लोक शब्द के अर्थ में सभ्यता और संस्कृति दोनों समाहित हैं । एक ओर सभ्यता है, जिसमें रीति-रिवाज कर्म - कांड, व्यावहारिक बातें आ जाती हैं, जो परम्परागत रुप से चली आती हैं । ये बातें समयानुसार तेजी से बदल जाती है । स्थितियों और परिस्थतियों का इन पर प्रभाव अधिक होता है । उदाहरण के लिए स्त्रियाँ वट-वृक्ष का पूजन करती हैं । कोई स्त्री ऐसी जगह में रहने के लिए गई जहाँ बरगद का पेड़ होता ही नहीं, तब वहाँ एक रास्ता निकाला गया कि बरगद की टहनी ले जाओ और उसी के चारों ओर चक्कर लगा लो । यह सभ्यता और कर्म कांड का का पक्ष है. परन्तु जो दूसरा पक्ष संस्कृति का है उसमें परिवर्तन की गति बहुत मंद होती है । यह चिन्तन मनन का विषय है । घर-परिवार, इष्ट मित्र या अन्य रिश्ते कैसे निभाए जाते थे और कैसे निभाए जाएं, यह सांस्कृतिक लोक का विषय है । यह लोक शताब्दियों तक मन और हृदय में छाया रहता है । त्रेता युग के हजारों वर्ष बीत गए परन्तु राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जैसे भाई आज भी कहीं न कहीं मिल जायेंगे । इन सम्बन्धों के आस्था आज भी बनी हुई है । आज भी कई घर मिल जायेंगे जहाँ बुजुर्ग पीढ़ी का सम्मान वैसा ही है, जैसा शताब्दियों पहले होता था । चूँकि ये संस्कार, यह संस्कृति गाँवों में अधिक पाई जाती है इसलिए हमने मान लिया कि लोक अर्थात् गाँव । हमारा लोक चिन्तन कृषि आधरित रहा है । आज भी कुछ मात्रा में बचा है । इसी कारण लोक चिन्तन प्रकृति से जुड़ा रहा है । वैदिक काल में, क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा ही आराध्य थे । शेष देवता बाद में आए । इस कारण भारत में लोक जीवन के बिना अन्य प्रकार के जीवन की कल्पना की ही नहीं जा सकती । आज भी अनेक घरों में लोग मिल जायेंगे जो प्रातःकाल जागकर प्रथम नमन धरती को करते हैं । इसी कारण मानवीय काव्य का चिन्तन लोक ही रहा है । एक शब्द है लोकोक्ति । यह शब्द मात्र नहीं है । लोकोक्ति के बनने में सैकड़ों साल लगते हैं । शताब्दियों के अनुभव लोकोक्तियों में समाए रहते हैं । 

अब समस्या यह है कि इक्कीसवीं शताब्दी की पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ रही है । उसे हिन्दी की वर्णमाला येन केन प्रकारण रटा दी जाती है । वह लोक और लोकोक्तियों दोनों से अपरिचित है और इनको पढ़ानेवाले शिक्षक भी लोक जीवन से अनभिज्ञ हैं । ऐसा नहीं है कि लोकजीवन के प्रति उत्सुकता नई पीढ़ी में समाप्त हो गई हो । उत्सुकता तो है पर वह जिज्ञासा जाग्रत और संतुष्टि करने वाला उसे कोई माध्यम ही नहीं मिल रहा है । यह बात तो किशोरावस्था या युवावस्था से सम्बंधित है परन्तु आज का कवि स्वयं असमंजस का शिकार है । 

वह यह तय ही नहीं कर पाता कि उसे करना क्या है, लिखना क्या है । एक ओर वह सुविधा भोगी होना चाहता है । दूसरी ओर वह लोक जीवन से जुड़ना भी चाहता है । दोनों बातें एक साथ कैसे सम्भव हैं । ऐसा तो नहीं हो एकता कि एक ओर हम बाजारवाद के समर्थन में खड़े हों और दूसरी ओर अपनी जड़ों को भी सराहें । बाजारवाद को अपनाना विवशता हो सकती है परन्तु बाजारवाद में आई भौतिकता और विलासिता में मगन रहकर हम अपनी संस्कृति का उपदेश दें, ऐसा तो नहीं हो सकता | साहित्यकार मध्यम या निम्न वर्ग का होता है और यही वर्ग उचक-उचककर, भौतिकता के लुभावने आकाश में जाकर बैठना चाहता है । यह दोहरी सोच कविता की प्रभावात्मकता खत्म कर देती है । 

मेरी यह मान्यता कि आज के प्रेमचन्द को यदि दो बैलों की कथा लिखनी है तो उसे यह जानना होगा कि कितने दाँत का बछड़ा हल खींचने के योग्य होता है या फिर बैल के शरीर में कौन से चिह्न किस प्रवृत्ति के द्योतक हैं । साहित्यकार शब्दों की कारीगरी मात्र से पाठक को प्रभावित नहीं कर सकता । उसका अनुभव जब शब्दों का बाना पहनायेगा तभी साहित्य या कविता में जीवन्तता आयेगी । सुविधाओं के प्रति ललक, सुविधाओं की अहंमन्यता ने आज के कवि को लोकजीवन से अलग करके रख दिया है । कविता की प्रभावहीनता का सबसे बड़ा कारण यही है । सबाल्टर्न से एलीट बनने की प्रबल आकांक्षा, हम कुछ विशेष हैं यह व्यर्थ घमंड आजकी कविता को खोखला कर दे रहा है । 

मैं अपनी बात करूँ तो हरिवंशराय बच्चन, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, रामकुमार वर्मा, निरंकार देव सेवक, जगदीश गुप्त, गिरिजाकुमार माथुर, शिवकुमार मिश्र जैसे अनेक कवियों से साक्षात्कार कर चुका हूँ । ये सभी सहज सरल रूप से मिलते थे । इन साहित्यकारों में न तो सुविधाओं का घमंड था और न लेखन का । यही प्रवृत्ति साहित्यकार को बड़ा बनाती है । इस सम्बन्ध में भवानी भाई का यह वाक्य पर्याप्त है 'जैसा तू दिख, वैसा ही लिख’ । दोहरी मानसिकता से न तो कवि प्रभावी होगा और न उसकी कविता । 

जहाँ तक मेरी कविताओं में लोक का चित्रण है उसका मुख्य कारण है कि मेरा बाल्य काल खेती बारी में ही बीता
है । तीन वर्षों तक मैंने स्वयं खेती की है । हल चलाया है । कृषि और प्रकृति दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं । सुबह से शाम तक खेती - किसानी करना और मुँह अँधेरा होने पर पशुओं को सानी देना नित्य ही कार्य था । एक घटना मुझे आज भी भावुक कर देती है । मेरे यहाँ एक बैल ऐसा था जो खुरहा था । वह लोगों को सींग और लात भी मार देता था, पर मुझे बड़ा स्नेह करता था । मैं नौकरी के सिलसिले में दूर शहर आ गया । छः महीने बाद जब गाँव गया तब वह बैल मेरे कन्धे पर सिर रखकर खूब रोया । और मैं भी अपने को कहाँ रोक पाया । हम दोनों गले मिले खूब रोये । लोकजीवन में प्रेम सर्वोपरि है चाहे वह मानवीय रिश्तों में हो या फिर मानवेतर प्राणियों में हो । 

महाराष्ट्र में आकर मैंने पूरा मेलघाट और मध्यप्रदेश का पातालकोट घूमा । बड़े अनुभव आये । मेलघाट जो सतपुडा पर्वत का एक भाग है वहाँ पिछले 45 वर्षों से घूम रहा हूँ । अन्दर कोर एरिया तक जाकर खूब घूमा हूँ । कई-कई दिन आदिवासियों के बीच रहा हूँ । उनकी पीड़ाओं का अनुभव किया है । मेरी प्रथम काव्यकृति 'सूपभर रोशनी मेलघाट के वन और वन्य जीवन का दस्तावेज है । 

इन जंगलों में रात-रात भर घूमा हूँ । यहाँ के प्रत्येक पशु-पक्षी देखे हैं । टाइगर से साक्षात्कार किया है । यही सब इस कृति में उभरा है । ये जंगल मुझे लुभाते हैं, ये जंगल मुझे बुलाते हैं, जैसी कविताएँ मेरी फितरत बतलाती हैं । ‘असभ्यता प्रणम्य है’ नामक कविता की पंक्तियाँ यहाँ उद्घृत करना चाहूँगा । 

आदिवासी जानते हैं-

धूप का अँगरखा-

हवा की थपथपाहट

बादलों का वितान

पेड़ों का बुलाना

झरने की छमछम

नदियों की कलकल । 


आदिवासी नहीं जानते 

नदियों को गँदलाना 

झरनों को सुखाना 

हरे पेड़ों की हत्या

प्राणियों पर अत्याचार

पर्वतों को घायलकर

सड़कों का निर्माण


आदिवासी सचमुच नहीं जानते 

व्यभिचार और भ्रष्ट्राचार

बनावटी आचार-विचार

आधुनिकता की पटरी

और प्रगति की रेल 

कांक्रीट के जंगल 

महानगरों की ठेल- पेल 


आदिवासी सचमुच असभ्य हैं 

वे और उनकी असभ्यता 

दोनों ही प्रणम्य है ।

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : वैश्वीकरण की दृष्टि से हिन्दी कविता का स्वरूप कैसा है ? 

डॉ. राम प्रकाश : हिन्दी में कुछ ऐसी विशिष्टताएँ हैं जिनके कारण यह भाषा जीवन्तता लिए है । ये विशेषताएँ हैं तरलता, तन्यता और समावेशीपन । हिन्दी ने स्थिति और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाला है । इसी कारण इसका रूप बड़ा विशाल है । चार कोस में बदले यह कहावत हिन्दी में ही है । अंग्रेजी भाषा हजारों किमी दूर तक जस की तस बनी रहती है । संस्कृत को तो आर्ष भाषा माना ही जाता है । उसमें परिवर्तन की सम्भावना तो है ही नहीं परन्तु हिन्दी की प्रवृत्ति बड़ी लचीली है । इसके बाह्यान्तर रूपों में समावेशी प्रकृति दिखाई देती है । यही बात हिन्दी कविता के बारे में भी है । हिन्दी कविता ने भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अनेकानेक विदेशी भाषाओं से बहुत कुछ ग्रहण किया है । हिन्दी के कई आधुनिक कवि बंगला भाषा के ज्ञाता रहे हैं । मराठी और बंगला भाषा का प्रभाव हिन्दी कविता पर दिखाई देता है । आजकल तो अनुवाद के द्वारा और सुगम, सहज रूप में एक भाषा की बातें दूसरे में जा रही हैं । महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या एक बड़ी समस्या है । इस विषय पर हिन्दी में कई कवियों ने कविताएं लिखी हैं । 

विषय के साथ-साथ हिन्दी कविता के बहिरंग रूप में भी अन्य भाषाओं से कई बातें आईं, इसमें दो बातों का उल्लेख करना चाहूँगा । हिन्दी कविता की छन्दगत विधाएँ हैं, जो आज बहुत लोकप्रिय हैं । ये हैं गजल और
हाइकू । गजल की जितनी लोकप्रियता उर्दू में है उससे कहीं अधिक हिन्दी में पिछले 40वर्षों में हुई है । यह विधा हिन्दी में लोकोक्तियों की तरह किसी बात को सिद्ध करने के लिए भी जनमानस में प्रयुक्त की जाती है । कवि और पाठक श्रोता को निकट लाने का श्रेय गजल को है । सिनेमाई गीत और हिन्दी गजल ये दोनों ही जनप्रिय रहे हैं । दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, निदा फाजली, राहत इंदौरी की गज़लें आम आदमी भी उद्धृत करता है । दूसरी विधा है जापानी छन्द में लिखी गई कविता हाइकू । आजकल यह विधा भी काफी लोकप्रिय है । पाँच सात पाँच, के क्रम से वर्णो की संख्या में लिखी इस प्रकार की कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ पाठ्यक्रमों में भी समाहित की जा रही हैं । 

आज का हिन्दी कवि विदेशों की यात्रा करने में भी सक्षम हो गया है । वह अन्य देशों में जाकर वहाँ की सभ्यता, संस्कृति और भौगोलिकता देखता सुनता है, अनुभव करता है और फिर हिन्दी में लिखता है । यह हिन्दी भूमंडलीकारण का रूप है । हिन्दी इक्कीसवीं सदी में हिन्दी के आयाम विस्तृत हुए हैं । इसी कारण भूमंडलीकरण और बाजारवाद का प्रभाव भी हिन्दी कविता पर बहुत पड़ा है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : आपने गीत विधा में बहुत कुछ लिखा है । इस विषय पर आप क्या कहना चाहेंगे ?

डॉ. राम प्रकाश : कविता मूलतः छन्दमयी है । आदिकवि की आर्तवाणी में जो कविता निःसृत हुई, वह अनुष्टुप छन्द में थी । इसी कारण कविता में गेयता प्रमुख गुण माना जाता रहा है । यह तो प्रगतिवाद की देन थी कि छन्दों के बन्धनों को तोड़कर कविता लिखी जाने लगी लेकिन भाव प्रवणता का गुण फिर भी महत्वपूर्ण बना
रहा । प्राय: लोग कहते हैं कि अज्ञेय ने प्रयोगवादी कविता में पुराने प्रतिमानों को तोड़कर रख दिया परन्तु ऐसी बात नहीं है । उनकी कविता में बुद्धिवाद के साथ-साथ आन्तरिक लयता दिखाई देती है । ‘हम नदी के द्वीप हैं’, नामक उनकी कविता को नरेश सक्सेना ने गाकर सुनाया है । 

इस सम्बन्ध में मैं एक प्रसंग कहना चाहूँगा । सन् 2009 की बात है । मेरा काव्य-संग्रह ‘लहरों के विरुद्ध’ प्रकाशित हुआ । अलीगढ़ स्थित गोपालदास सक्सेना ’नीरज’ के निवास पर एक महफिल जमी । उनके हाथों इस पुस्तक का विमोचन हुआ । उक्त अवसर प्रमुख समीक्षक वेदप्रकाश अमिताभ और नीरज जी ने लहरों के विरुद्ध नामक पुस्तक पर अपने अपने विचार प्रकट किए । समारोह समाप्त हुआ । अनौपचारिक बातचीत हो रही थी । नीरज जी ने एक बात कही-" राम प्रकाश तुम्हारी इस पुस्तक में विरोध और विद्रोह के स्वर प्रमुख हैं । मैं जानता हूँ कि मुक्त छन्द के साथ- साथ तुमने बहुत से गीत लिखे हैं । तुम्हारी अगली पुस्तक गीतों की आनी चाहिए क्योंकि गीत ही आदमी को जिन्दा रखते हैं । जिन्दगी में भी और जिन्दगी के बाद भी । “मैंने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और कहा कि शीघ्र ही गीत-संग्रह प्रकाशित होकर आपके सामने होगा । परन्तु ऐसा अवसर नहीं आ पाया । मेरा गीत संग्रह आया । उसका विमोचन ही नहीं हो पाया । लम्बी बीमारी के बाद नीरज जी चल बसे । मेरे चारों गीत संग्रहों में से किसी का भी विमोचन समारोह नहीं हुआ ।   

आजकल नवगीत की चर्चा और लेखन दोनों खूब हैं । गीत और नवगीत में एक झीनी रेखा का अन्तर है । गीत विधा में वैयक्तिकता के प्रति विद्रोह करके नवगीत आया है । आत्माभिव्यंजन के स्थान पर सामाजिकता, प्रकृति और ग्रामीण परिवेश की मुख्य भावना को लेकर नवगीत स्पर्धा में है पर नवगीत एक आन्दोलन के रूप में है जबकि गीत आत्माभिव्यंजना को लेकर परम्परागत रूप में चल रहा है । गीतों की हजार वर्षों की हिन्दी की परम्परा है और सुदृढ़ परम्परा है । प्रयोगवाद, नई कविता, साठोतरी कविता, उत्तर आधुनिक कविता के दौर में भी गीत अपनी जीवन्तता और सार्थक सिद्ध करते रहे हैं । सच तो यह है कि मनुष्य के हृदय के सबसे निकट गीत ही रहे हैं । लोग फिल्में भूल जाते हैं गीत याद रहते हैं । कवि भले ही इस दुनिया में रहे न रहे परन्तु उसके गीत चिरंजीवी रहते हैं । मेरा यह दृढ मत है कि काव्यविधा में गीत ही हैं जो कविता को जनमानस के निकट लाते हैं । आज कविता जिस तरह मनुष्य से दूर जा रही है । इन दोनों के बीच की खाई गीत ही पूरा कर सकते हैं । कविता बुद्धि-विलास के पाँसें खेलने की कला नहीं है बल्कि भावों के मंथन का नवनीत है, जो तन और मन के लिए स्वास्थ्यवर्धक है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : तो क्या छन्दमुक्त कविता नितांत प्रभावहीन होती है? 

डॉ. राम प्रकाश : नहीं, ऐसी बात नहीं है । वस्तुत: छन्दमुक्त कविता और मुक्त छन्द कविता, ये दोनों भिन्न-भिन्न अर्थ द्योतित करते हैं । जब हम छन्द मुक्त कविता कहते हैं तो उसका अर्थ होता है कि उसमें आन्तरिक लयता का भी लोप हो जाता है और जब यह आन्तरिक लयता समाप्त हो जाती है तो कविता निष्प्रभ हो जाती है, क्योंकि आन्तरिक लयता की संगीतात्मकता ही तो कविता की आत्मा है । जब वही नहीं होगी तो कविता क्या खाक होगी? हिंदी में प्रयोगवादी कवियों ने यह प्रवृत्ति अपनी कविता में बचाकर रखी थी । बाद में इस आन्तरिक लयता अर्थात आन्तरिक विचार, आंतरिक प्रवाहमयता पर जब प्रहार हुआ तो ऊटपटांग कविताएँ लिखी जाने लगीं । पर जब हम ‘मुक्तछन्द’ वाली कविता की बात करते हैं तो यहाँ ‘मुक्त' शब्द विशेषण के रूप में आता है । इसे यों समझा जा सकता है कि छन्द तो है पर वह मुक्त है । इस प्रकार के छन्दों में वर्णों और मात्राओं की गणना की अपेक्षा नहीं की जाती परन्तु आंतरिक लयता, भावप्रवणता की अपेक्षा की जाती है । भवानीप्रसाद मिश्र, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, अज्ञेय और हरिवंशराय बच्चन की कविताओं में यह बात विशेष रूप से देखी जा सकती है । आज के कवियों की बात कहें तो नरेश सक्सेना, यश मालवीय, रामदरश मिश्र, विनोदकुमार शुक्ल की कविताओं में यह आंतरिक प्रवृत्ति बरकरार है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : समीक्षकों विशेषतः अकादमीय समीक्षकों ने कविता और कवि के विषय में यह अघोषित मान्यता बना रखी है कि वे जिसे चाहें उसे स्थापित कर सकते हैं । साहित्य में ऐसे मानकों पर आपके क्या विचार हैं? 

डॉ. राम प्रकाश : यह सच है कि आज हिन्दी, अकादमिक संस्थाओं से जुड़े लोगों के हाथ का खिलौना है । प्रत्येक विश्वविद्यालय को अपना अभ्यासक्रम बनाने का अधिकार है । विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों का एक दूसरे से सम्पर्क सम्बन्ध रहता है । वे एकदूसरे को लाभान्वित करते रहते हैं । तुम मुझे बुलाओ मैं तुम्हें बुलाऊँ वाली नीति चल रही है । इस वर्ग ने कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएं पकड़ रखी हैं । उसमें शोध-पत्र और समीक्षाएँ प्रकाशित होती रहती हैं । इसलिए बहुत कुछ इस वर्ग के हाथ में है । यह बात पहले भी थी, पर बहुत कम । साहित्यिक व्यापारी आज जगह जगह घूम रहे हैं । हिन्दी जगत से संबधित प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पिछले 50 वर्षों तक एक समीक्षक का ऐसा प्रभुत्व था कि उसके आशीर्वाद से ही भारत के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में लोग प्रोफेसर बना करते थे । उस समालोचक ने जिसे कह दिया कि ये बड़े कवि हैं, वह रातोरात महत्वपूर्ण कवि बन जाता था । वह महत्वपूर्ण बना व्यक्ति जहाँ भी जाता था उसके परिचय में कहा जाता था कि अमुक ने इन्हें वरिष्ठ कवि, वरिष्ठ आलोचक कहा है । उस सिंह ने जिसकी कविता की भूमिका लिख दी वह काव्य- कानन का लठैत बन जाता था । कश्मीर से त्रिपुरा तक उस व्यक्ति की तूती बोलती थी । छुटभैये साहित्यकार इस तिकड़म में रहने लगे कि कैसे उस व्यक्ति के हस्ताक्षर अपने संग्रह में पाएँ । यह होड़, यह प्रवृत्ति साहित्य या कविता के लिए घातक रही है । असल में बात यह है कि कविता में गीत विधा ही एक ऐसी विधा है जिसे किसी के सम्मुख प्रस्तुत करके प्रसिद्धि पाई जा सकती है । मुक्त छन्द तो पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही लोगों के सम्मुख आ सकेंगे । इन कविताओं के छपने के लिए अकादमीय वर्ग का सहारा लेना पड़ता है । क्योंकि काव्य- समीक्षाएँ आज भी प्रोफेसर ही लिख रहे हैं । हमारे यहाँ आज भी यह कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई पाठक समीक्षक हो सकता है । आज की हिन्दी कविता इतनी बड़ी मात्रा में लिखी जा रही है कि काव्य- संग्रहों की बाढ़ आ गई है । मैंने कई साहित्यकारों के घोषवाक्यों में देखा है कि वे लिखने को ही धर्म मानते हैं । भारत को, हिंदी को ऐसे कवियों की आवश्यकता है जो यह घोषवाक्य बनाएँ कि पढ़ना ही मेरा धर्म है । आज का कवि या प्रोफेसर पढ़ता तो है ही नहीं, लिखता बहुत है । विश्वविद्यालय का प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष यदि यह कहे कि उसने ‘लम्बी कविता' जैसा शब्द ही नहीं सुना हो अपना माथा पीट लेना पड़ता है । मुक्तिबोध पर प्रवचन देंगे । ‘अँधेरे में’, अभ्यासक्रम में रखकर प्रश्न पूछेंगे पर लम्बी कविता शब्द नहीं सुना । यह बड़ी विडम्बना है । ऐसे लोग हिंदी की लोक प्रवृत्ति से कटे हुए लोग हैं । जो व्यक्ति हिन्दी के लोक से अपरिचित होगा, वह हिंदी का न तो कवि बन सकता है न समीक्षक । कविता ही नहीं साहित्य की पैठ का कोई भी रास्ता लोकजीवन के ही रास्ते से होकर जाता है । अन्य कोई माध्यम नहीं है । किसी भी साहित्य का लोक जीवन, लोक चिन्तन ही उसका प्राण है, उसकी संजीवनी है । इस लोकजीवन का जब-जब क्षरण हुआ है कवि व्यथित हुए हैं और कविता निःसृत हुई है । मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि हिंदी लोकजीवन से अपरिचित व्यक्ति हिन्दी का कवि हो ही नहीं सकता । यहाँ लोक शब्द से मेरा तात्पर्य उसकी व्यापकता से है, संकीर्ण अर्थ से नहीं । जब रामविलास शर्मा कहते हैं कि हिन्दी एक जाति है, तब वह जाति शब्द का तात्पर्य उसी अर्थ में लेते हैं जिस अर्थ में कहा गया है 'जिस देश जाति में जन्म लिया’, बलिदान उसी पर हो जाएँ । ' यहाँ जाति शब्द लोक के पर्याय के अर्थ में आया है । जाति का अर्थ वह राजनीतिक नहीं है, जिसके लिए नेतागण आज सड़क से संसद तक घमासान किए हैं । सारांशत: यह कहा जा सकता है कि अकादमिक स्तर पर बैठे हुए लोगों ने हिन्दी को जकड़ रखा है । जकड़न में हिन्दी कविता कीआत्मा घुट रही है । ऐसा नहीं है कि आज अच्छे कवि नहीं है । हैं बहुत पर वे इसी जकड़न के कारण सामने नहीं आ पा रहे हैं । वास्तव में प्राध्यापकों के हांथों में पूरे देश की युवा शक्ति है । वे यदि चाहें तो एक सकारात्मक दिशा दे सकते हैं परन्तु आज का प्रोफेसर वर्ग पद, पैसा, पुरस्कार, प्रसिद्धि इन चार बातों में फँसकर इतना संकीर्ण बन गया है कि इसके आगे वह कुछ सोच ही नहीं पाता । यह वर्ग अपने परिचय में केवल यह अधिकाधिक रूप में लिखाना चाहता है कि उसके मार्गदर्शन में कितने लोगों ने शोध किया । उसके कितने शोध पत्र प्रकाशित हुए । कितनी संगोष्ठियों में भाग लिया या कितनी पुस्तकें प्रकाशित हुईं । कोई एक प्रोफेसर एक जिन्दगी में कितनी पुस्तकें लिख सकता है । कोई व्यक्ति रातोदिन लेखन में जुटा रहे तो भी 150-200 पुस्तकें कैसे लिख सकता है । तुलसी बाबा पर घर- बार की जिम्मेदारी नहीं थी, तब भी 12 ग्रन्थ ही लिख पाए । इधर मैंने कई तथाकथित लेखकों के परिचय में पढ़ा है कि उनकी दो सौ पुस्तकें छप चुकी हैं । तो यह सब कैसे होता है, बताने की आवश्यकता नहीं है । आज जो मैंने जिन चार बातों का उल्लेख किया है पद, पैसा, पुरस्कार और प्रसिद्धि, ये केवल चार बातें ही नहीं हैं, आज के साहित्यकारों विशेषकर प्रोफेसरों के चार धाम हैं, जिनकी उपलब्ध प्रत्येक तथाकथित साहित्यकार करना चाहता है । अधिकांश साहित्यकार अध्ययन, चिन्तन, मनन और सृजन छोड़कर इन्हीं धामों की यात्रा करते रहते हैं । चाहे पैदल जाएँ, किसी वाहन से पहुंचें या फिर हवाई जहाज से । यात्रा करनी है बस । तुम हमको अपनी संस्था का पुरस्कार दो, हम तुमको अपनी संस्था का पुरस्कार देते हैं । यह नया प्रचलन उस मिट्टी के लोग कर रहे हैं जो निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी और महादेवी वर्मा की कर्मस्थली, जन्मस्थली रही है । मैंने अधिकांश शब्द का प्रयोग इसलिए किया है कि इस विषय में कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है । यदि होता तो प्रतिशत 95% से कम न
होता । अजीब-सी भागम भाग, अजीब-जी धक्का- मुक्की, अजीब-सी लालसा है, इन चारों धामों की यात्रा में । मैं ऐसे कई साहित्यकारों को जानता हूँ जिन्हें यदि साल भर में दो- चार पुरस्कार न मिलें तो बेचैनी में रक्तचाप बढ़ जाता है । ऐसे लोगों के पुरस्कारी संबन्ध बड़े प्रगाढ़ होते हैं । इस प्रवृति ने हिन्दी की अपार क्षति की है । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : जैसा कि आपका कहना है कि पद, पुरस्कार, पैसे की प्रवृत्ति ने हिन्दी कविता का बहुत क्षरण किया है । इन विपरीत परिस्थितियों में आप अपने को कैसे बचा पाए ?

डॉ. राम प्रकाश : मैं इन प्रलोभनों से जो बच पाया उसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं प्रथम और सशक्त कारण है, उस क्षेत्र की मिट्टी जहाँ मैंने जन्म लिया है । उन्नाव जिले और बैसवारे की माटी में ही स्वाभिमान कूट-कूटकर भरा हुआ है । अपनी बी.ए. बी.एड तक की शिक्षा मैंने उन्नाव, उत्तरप्रदेश में पूर्ण की है । उस मिट्टी के संस्कार स्वाभिमानी हैं । वह कलम और करवाल का क्षेत्र माना जाता है । निराला का साहित्य बचपन में ही पढ़ लिया था । 9वीं कक्षा तक मैंने प्रेमचन्द का भी साहित्य पढ़ लिया था । इस कारण मैं स्वाभिमान को प्रमुख गुण मानने लगा था । दूसरे, मेरे परिवार के संस्कार थे । पिताजी जिला परिषद की प्राथमिक शालाओं में प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत थे । अपने पिता और पितामह के स्वाभिमान के स्वाभाविक गुण मुझमें आये । इस कारण परिस्थितियों से समझौता न करने की भावना बलवती होती गई । जब मैं 17 वर्ष का था । उन्नाव में पढ़ता था । तकिया स्टेशन से उन्नाव की टिकट दो रुपये के लगभग थी । एक बार उन्नाव में पढ़ाई के समय पैसे नहीं थे । गाँव कैसे जाऊँ समस्या थी । मैं चाहता तो अपने मित्रों से पैसे लेकर गाँव जा सकता था या फिर अन्य विद्यार्थियों की तरह बिना टिकट भी जा सकता था । उस समय कोई विद्यार्थी रेल की टिकट खरीदना अपमान या कायरता समझता था । पर मैंने इन रास्तों को नहीं चुना । उन्नाव से 45 कि.मी. पैदल चलकर गाँव पहुंचा । सवेरे चार बजे उठकर चल पड़ा- शाम को चार बजे घर पर । बीच में कई रिश्तेदारों के भी गाँव थे पर में सीधे अपने घर गया । इसी स्वाभिमानिता को लेकर महाराष्ट्र आया । एम.ए. पी.एच.डी. किया । अध्यापन के साथ-साथ पत्रकारिता भी 15 वर्षों तक की । योग ऐसा था कि पत्रकारिता के लिए भी नया खून ‘हिंदी दैनिक का संपादन करने का मौका मिला, जिसकी स्थापना स्वामी कृष्णानंद सोख्ता ने की थी और बाद में गजानन माधव मुक्तिबोध उससे जुड़े । इन दोनों के स्वभाव से स्वाभिमान, निस्पृहता और कर्मठता के पाठ सीखे । शोधकार्य डॉ. हरिवंशराय बच्चन के साहित्य पर किया । मुंबई के प्रतीक्षा बंगले पर रहकर उनके साथ समय बिताकर बहुत कुछ सीखा । इसलिए स्वयं को कर्म में इतना झोंका कि बाकी बातों के लिए न चिन्तन था, न समय । पैसे और पुरस्कार के लिए मैंने कई साहित्यकारों को झुकते हुए, अस्तित्वहीन होते हुए, चापलूसी करते हुए देखा है । और आजकल साहित्यिक पुरस्कारों के लिए लोग जिस तरह के हथकंडे अपनाते हैं, वे निन्दनीय हैं । मुझे जो भी पुरस्कार मिले हैं, उन्होंने मुझे चौंकाया है । 

वस्तुतः मैं अपनी इस बात पर दृढ़ हूँ कि जिस देश में सेना, शिक्षक और साहित्यकार ईमानदार रहेंगे, स्वाभिमानी रहेंगे उस देश को कोई पराजित नहीं कर सकता । वह देश निरन्तर प्रगति करता रहेगा । सेना, शिक्षक और साहित्यकार का सबसे बड़ा धर्म है देशप्रेम । शिक्षक और साहित्यकार को धर्म, जाति, पंथ, सम्प्रदाय प्रान्तवाद, भाषावाद से ऊपर उठकर सोचना चाहिए, सोचना होगा तभी हम- देश और विश्व के मानव का कल्याण कर
सकेंगे । दुर्भाग्य से शिक्षक और साहित्यकार आज गुटों, वर्गों में बंट गए हैं । इसी कारण उनके चिन्तन का दृष्टिकोण संकुचित हो गया है और वे अच्छी रचनाएँ लिखने से विमुख हो रहे हैं । श्रेष्ठ और उदात्त चिन्तन ही श्रेष्ठ और उदात्त रचनाएँ दे सकेगा । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : कविता सरोकारों से दूर होती जा रही है । इस पर आप क्या कहेंगे ?

डॉ. राम प्रकाश : जब कवि ही सरोकारों से दूर होता जा रहा है तो उस की कविता तो सरोकारों से दूर होगी ही । दिनकर जी ने कृष्ण के माध्यम से तत्कालीन सत्ता की निरंकुशता को रश्मिरथी में ललकारा है । जातिवाद की भावना रखनेवालों को कर्ण ने ललकारा है । ये ललकारें जनता के सराकारों की अभिव्यक्ति हैं । दिनकर जी जब कहते हैं, 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ तब वे जनता की ओर से बोलते हैं । रानी विक्टोरिया के आगमन पर जब बाबा नागार्जुन नेहरू जी को खरी-खोटी सुनाते हैं । प्रेमचन्द का चित्र संसद में न लगने पर निरालाजी प्रधानमंत्री नेहरूजी से भिड़ जाते हैं । ये सब जन -सरोकारों के उदाहरण हैं । दूसरी ओर आज का साहित्यकार किसी राज्य की हिन्दी अकादमी के विधा पुरस्कार से लेकर पद्मश्री तक को ललचाई नज़रों से देखता है । नेताओं की चमचागीरी करता है, तब उसका सरोकार घटजाता है । चारण, भाट मौकापरस्त, और स्वार्थी व्यक्ति श्रेष्ठ रचनाकार हो ही नहीं सकता| यह बात शत-प्रतिशत सच है कि जब कोई कवि स्वयं को विशिष्ट, अतिविशिष्ट व्यक्ति समझने लगता है तब वह सड़क के किनारे किसी चाय की टपरी में चाय पीना अपने स्तर के खिलाफ समझता है । पहले के साहित्यकार चाय और पान की दुकानों पर लोगों के अनुभव और मन्तव्य सुनते थे तब लिखते थे । कोई कवि यदि अपने ड्राइवर को होटल या घर में अपने साथ एक ही मेज पर भोजन नहीं करा सकता तो वह उस की व्यथा - कथा को कैसे सुनेगा ? महानगरों में फ़्लैट में रहनेवाला साहित्यकार ही इमारत के निवासियों से सरोकार नहीं रखता । ऐसे में उसकी कविता में सरोकार आयेगा कहाँ से? रिश्तों से सरोकार, मित्रों से सरोकार, जनमानस से सरोकार, मानवता से रखनेवाले कवि की कविता में सरोकार लबालब भरा रहता है । निराला की आर्तवाणी जब कह उठती है । कान्यकुब्ज कुल कुलांगार' तो दहेज प्रथा का वीभत्स रूप हमारे सम्मुख प्रकट हो जाता है । 

इसे संक्षेप में कहा जा सकता है कि पहले तो कवियों ने जनसामान्य से सरोकर नहीं रखा, तो जनमानस ने कविता से सरोकार समाप्त कर लिया । इस बात को कवि वर्ग समझ गया कि उनकी जनमानस से असम्पृक्त्तता कवियों को ले डूबी है । इसलिए आजकल कई कवि आम जन की पीड़ा को अभिव्यक्ति देने लगे
हैं । सुरेन्द्र शर्मा की आज की हर कविता हास्य प्रारम्भ होकर करुण रस में समाप्त होती है । परिवार की टूटन, एकाकी जीवन, वृक्षों की समस्याएँ, रिश्तों की अहमियत जैसी समस्याओं को लेकर कई कवि सरोकारों की ओर झुक रहे हैं । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : ‘सूप भर रोशनी’ से लेकर ‘फटाहलफनामा' तक की यात्रा में पाठक आपके साथ सजग होकर चलता है । आप पर किसी वाद का प्रभाव रहा है क्या ? हम आपकी काव्य दृष्टि के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे । 

डॉ. राम प्रकाश : मेरी काव्य यात्रा बीस वर्ष की आयु से प्रारम्भ होती है । मेरी पहली कविता लोकगीत थी 'मिट्टी में फूल खिले कैसे, मिट्टी में । इस गीत में फूलों का मानवीकरण किया था । इस कविता को सन् 1975 में अकोला की एक काव्य गोष्ठी में सुनाया था । यह मेरा प्रथम गीत था । कुछ अनगढ़-सा था । पूरा गीत याद नहीं है । गीत से ही मेरी काव्ययात्रा प्रारम्भ हुई । उसके बाद कुछ पद लिखे और फिर अपने पितामह पर एक गीत सन् 1978 के लगभग लिखा । इस गीत को प्रथम पंक्ति थी ‘पौत्र हूँ उनका जिन्होंने राह थी जग को दिखाई’ । मेरे पितामह जिन्हें मैं बाबा कहता था, वे बड़े कर्मठ थे । वे एक वाक्य अक्सर कहा थे ‘मेहनत से दरिद्र कै नासि है’, अर्थात कर्म से दरिद्रता नष्ट हो जाती है । वे स्वयं कठोर परिश्रमी थे । वहाँ से कविता का सिलसिला कहानी और जीवनी के साथ-साथ चलता रहा । 'नयाखून' हिन्दी दैनिक में प्रति सप्ताह किसी एक हिन्दी सेवी की जीवनी लिखता रहा
हूँ । सन् 1980 से 90 के बीच लगभग 10 कहानियाँ और कई कविताएँ विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में छपीं परन्तु कोई काव्य संग्रह नहीं छपा । इस बीच प्रति माह जंगलों में चक्कर लगाता रहा हूँ । इसी का परिणाम ‘सूप भर रोशनी’ है । काव्य-सृजन निरन्तर चलता रहा पर छपने के लिए भेज न हीं पाता था । 'लहरों के विरुद्ध' मेरा दूसरा काव्य संग्रह था । जैसा कि शीर्षक से ही पता चलता है कि इसमें प्रवाह के विरुद्ध जोर-आजमाइश है । यह संग्रह सन् 2011 में छपा । इसमें घर-परिवार, समाज से सम्बंधित कविताएँ हैं । लहरों के विरुद्ध, आदमी, चना और भाड़, पाप, फर्क, बेधड़क बेचो कलम, बेवजह भी मिलते थे लोग, फर्क, नक्सलवाद, हम सब छले गये, जैसी इस संग्रह की रचनाएँ छपीं भी और सराही भी गईं । ये रचनाएं समाज के प्रवाह के विरुद्ध चलकर अपना अस्तित्व टिकाए रखने की प्रेरणा देती हैं । साथ- ही साथ दुर्विचारों, कुरीतियों के विरुद्ध स्वयं को टिकाए रखने का साहस भी देती हैं । इस पुस्तक के समर्पण में ये पंक्तियाँ इस कृति का परिचय कराती है । 

हमारा समाज 

तेल की कुप्पी है 

किसी ने तीली जलाई 

तो भड़क उठता है 

वरना चुप्पी है । 

सन् 2014 में 'नई सुबह सिरहाने पर' नामक काव्य संग्रह आया । इसकी अधिकांश रचनाएँ सामाजिक और राजनीतिक पड़ताल करती दिखाई देती हैं । इसके प्रारम्भ की पंक्तियाँ देखिए-

किलों की मजबूतियों पर अब कहाँ विश्वास है 

शामियानों कनातों पर ही टिकी अब आस है 

गाँव भर का जल समेटे हुए ठाकुर का कुआँ 

जोखुओं के भाग्य में केवल बची अब प्यास है । 

‘नई सुबह सिरहाने पर’ मुक्त छन्दों में लिखी पुस्तक है । अब तक अनेक गीत लिख चुका था । और अब प्रथम गीत संग्रह प्रकाशित हुआ ‘रुकूँक्यों पथकर चुकाने’ यह भी 2014 में छपकर आया । इसमें आत्मभिव्यंजना अधिक है । अनुक्रम से भी पूर्व इसमें निम्नलिखित पंक्तियाँ हैं । 

धरा के विस्तृत पटल पर लिख दिया अपनी जबानी 

है गगन की पीठ पर अंकित किया अपनी कहानी 

देव तुम, मैं तो मनुज हूँ, दे रहा फिर भी चुनौती

मिटाकर भी देख लो मानव सृजित कोई निशानी । 

इसके बाद सन 2017 में “सड़क पर साँड़" नामक मुक्त छन्दों में लिखी कविताओं की पुस्तक आई । इसमें भी समाज की विकृतियों के साथ ही उनके निराकरण का तरीका भी बतलाया गया है । इस कृति का विमोचन नयाखून नागपुर के संपादक उमेश चौबे ने राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित से करवाया । पुरोहित जी मेरे काव्य से पूर्व परिचित थे । राज्य शासन की हिन्दी अकादमी में हम दोनों कई बार गए । इस पुस्तक की रचनाओं की बानगी देखिये । 

हम समय के मारे हैं 

इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं 

कि हम समय से हारे हैं । 

सन 2014 से 2019 तक बड़ी संख्या में गीत लिखे । इनमें से विषयानुसार चयन करके गीत संग्रह निकला । नाम रखा 'उन्हें गीत दो’ । यह संग्रह सर्वहारा वर्ग के गीतों की दॄष्टि से महत्वपूर्ण है । इसका एक गीत बहुत सराहा गया । यह है – ‘आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा’ प्रेरण, देश, मैं - तुम, जीवन, प्रकृति जैसे उपशीर्षकों में इसका विभाजन किया गया है । सन् 2020 में कारोना का प्रकोप हुआ । प्रारम्भ में ही मेरा परिवार चपेट में आ गया । मैं 20दिन सरकारी अस्पताल में भर्ती रहा । कई लोगों को दम तोड़ते देखा । मैंने अनुभव किया कि डर के कारण भी लोग हार मान ले रहे हैं । मैंने साहस दिलानेवाले बहुत से गीत लिखे । इतने कि उसी वर्ष 'हम उजाले जोड़ते हैं’ और ‘अपनी मुट्ठी में अम्बर भर’ नामक दो गीत संग्रह छपकर आये । बच्चन जी के साहित्य का साथ निरन्तर रहा । उसका प्रभाव इन गीतों पर स्पष्ट देखा जा सकता है । शिवमंगल सिंह सुमन, बैसवारा के
थे । मुझसे बड़ा स्नेह करते थे । बैसवारी में ही बातें होती थीं । उनका गीत 'वरदान मांगूँगा नहीं’ भी मेरे जेहन में गहरे तक उतरा था । ‘अपनी मुट्ठी अंबरभर’ में संघर्ष करके सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा है तो 'हम उजाले जोड़ते हैं, में सबको साथ लेकर चलने की बात है । अब तक गीतों के साथ-साथ जो मुक्त छन्द में रचनाएँ थी, उनकी संख्या भी पर्याप्त थी । शिलांग (मेघालय) निवासी मेरे शिष्य डॉ. श्यामबाबू शर्मा की पहल पर उन कविताओं में से चुनिन्दा रचनाओं का संकलन ‘फटा हलफनामा' के नाम पर उन्होंने ही संपादित किया । ‘फटा हलफनामा' एक कम्बी कविता है । इसमें फैंटेसी है । इसी पुस्तक में ‘खंडहर' नामक एक कविता है जो अपने प्रतीकों द्वारा वृद्धों के महत्व को रूपायित करती है । बाकी फितरत तो इसकी भी सर्वहारा वर्ग की चिन्ता ही है । 

आज मेरी एक बड़ी चिन्ता है जो साहित्य के सरोकार से सम्बन्धित है । आज तीस वर्ष तक की आयु के युवा अंग्रेजीदाँ हो गए हैं । उन्हें न तो माँ की लोरी की थपकी मिली और न अंग्रेजी विद्यालयों में हिन्दी की प्रेरणादायी कविताएँ रटाई गईं । इसी का दुष्परिणाम हुआ कि यदि किसी विद्यार्थी को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई में अच्छे अंक नहीं मिले तो वह हताश निराश हो जाता है । राजस्थान के कोटा में तो आए दिन विद्यार्थी आत्महत्या करने लगे हैं । इन्हें कैसे बचाया जाये, यह चिन्ता का विषय है । मातृभाषा के संस्कारों से रहित पीढ़ी जीवन समाप्त करने में भी नहीं हिचकती । इस पीढ़ी को न केवल बचाना है अपितु उसे संघर्ष करके आत्मविश्वास जगाने का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । उन्हें समझाना होगा कि सपने और आशाएँ टूटने से जीवन नहीं टूटता । इसी चिन्तन और विचार को लेकर मैंने बहुत से गीत लिखे । विगत तीन वर्षों में गीतों का संग्रह लगभग तैयार हो चुका है । उसका कोई गीत किसी को अवसाद से उबार सका, जीवन जीने की प्रेरणा दे सका तो पंक्तियाँ सार्थक हो जायेंगी । मेरा यह व्यक्तिगत अनुभव है कि जीवन की भागदौड़ में अतिव्यस्तता और पूँजीवादी जीवन में भी लोग अच्छी पंक्तियाँ सुनते हैं । उन्हें कंठस्थ करते हैं । 'विश्वास नहीं डगमग होगा, मैंने हार भला कब बेची, पंथी गीत, ओ नये भोर की प्रथम किरण, मानव की हार नहीं होती, उसको कौन हरा सकता है, जब कोई वरदान न होगा, मैं जहर पीकर भी अमर, चल और मानव और चल, थककर बैठ गया क्यों राही, गिर गिरकर चलना सीखा है जैसे गीत नवोत्साह नवचेतना से भर देने वाले गीत हैं । 

डॉ. श्यामबाबू शर्मा : आप क्या संदेश देना चाहते हैं ? 

डॉ. राम प्रकाश : कोई भी कवि अपनी कविता के माध्यम से संदेश देता है परन्तु यहाँ प्रश्न और उत्तर की बात है इसलिए कवियों से कहना चाहूंगा कि वे पद, पुरस्कार के लिए विवश न हों । पुरस्कार, पद, पैसा और प्रसिद्धि के लिए इतनी लाचारी और दीन-हीनता इसके पहले हमने कभी नहीं देखी । चारों ओर होड़ मची है । कविता यानी मुँह का खेल हो गई है । हर जगह राजनीति हावी हो गई है । आज के अधिकांश साहित्यकार सत्ता के सम्मुख याचक बनकर रह गए हैं । साहित्य अकादमियों से साहित्यकार गायब होते जा रहे हैं । कवि को चाहिए वे सत्ता के दरबार में भीख मांगना छोड़ दें । तिकड़म से निकलकर अपनी सृजनात्मकता और अध्ययन पर बल दें । मंचों पर भड़ैती दिखानेके बजाय साहित्य सेवा की ओर मुड़ें । विश्व हिन्दी सम्मेलन में जाने के लिए जोड़तोड़ करने के स्थान पर दो-चार साहित्यकारों को पढ़ें । हिन्दी में, वाचन संस्कृति का अभाव होता जा रहा है । उसे अपनाएँ । हिन्दी का प्रोफेसर और साहित्यकार अपने खोखले अहं को छोड़कर हकीकत के धरातल पर आए । आम आदमी की तरह खिलखिलाकर हँसे-बोलें निराला से थोड़ी फक्कड़ता लें, महादेवीजी से थोड़ी सी सहजता लें, नागार्जुन से धान की बाली सीखें, अमृतलाल नागर से चाय की दुकान पर चकल्लस करना सीखें, प्रेमचन्द से गरीबों को अध्ययन करना सीखें । पहले तो आई.ए.एस. देश चलाते थे, उनका वह अहं साहित्यकारों ने भी ले लिया है । किसी भी राजाश्रित प्राप्ति के लिए झोली न फैलाएँ । हम कबीरी परम्परा वाले लोग हैं । कबीर का नाम मिट्टी में न मिलाएँ । कालजयी साहित्य क्या होता है, इसे समझें । साहित्य के विमर्शों के रूप में न देखकर समग्र मानव जाति पर विचार करें । खेमेबाजी से दूर रहकर संकीर्णताओं की परिधि से बाहर निकलने का प्रयास करें और साहित्य तथा साहित्यकार की खोई हुई गरिमा और साख को प्राप्त करने का प्रयत्न करें । 

एक अच्छी बात यह रही है कि किसी भी समय में कुछ साहित्यकार कबीर और निराला की परम्परा के रहे हैं, हैं और रहेंगे । इन्हीं के भरोसे साहित्य जिन्दा था, है और रहेगा । साहित्य को शाश्वत रूप इन्हीं के कंधों पर टिका
है । कवि को पंथ और लेबल की पहचान से बचकर रहना होगा । 

डॉ. राम प्रकाश, अकोला, महाराष्ट्र,  मो. 9422861524

डॉ. श्यामबाबू शर्मा, लखनऊ, मो. 9863531572

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समीक्षा :


डॉ. दामोदर खड़से

बी-503-504 हाई ब्लिस, कैलाश जीवन के पास, धायरी - पुणे - 411041

मो. 9850088476

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डॉ. राम प्रकाश का मेघ काव्य : बादल राग 

आजकल मनुष्य की प्रकृति चिंतामय हो गई है । यदि उसकी चिंता, प्रकृति होती तो वह बहुत सुखी और आनंदमय होता । सारी चिंताओं की जड़ है, मनुष्य का प्रकृति से निरंतर दूर होते जाना, इसीलिए उसे अप्राकृतिक संकटों का सामना करना पड़ता है । पर्यावरण का असंतुलन ; असमय बरसात, असहनीय गर्मी और भयंकर बाढ़ तथा अकाल का कारण बनता जा रहा है । इसके लिए मनुष्य द्वारा प्रकृति का दोहन और अवहेलना ही उत्तरदायी है । सृजन की दुनिया भी प्रकृति से बिछुड़ती चली जा रही है । एक समय था, जब सुमित्रानंदन पंत जैसे सुकोमल कवि केवल प्रकृति को आलंबन बनाकर सृजन करते थे । उनकी रचनाओं में प्रकृति का जागरण हुआ करता था । वे करते - छू-छू मृदु मलयानिल रह-रह / करता प्राणों को पुलकाकुल; / जीवन की लतिका में लहलह / विकसा इच्छा के नव-नव हल !'.....कहाँ गई प्रकृति की यह अविस्मरणीय लीला और कहाँ गए वे ऐसे रचनाकार ?..... अब बिरले ही रचनाकार हैं, जो प्रकृति को केन्द्र में रखकर अपनी शब्द-साधना करते हैं । उनमें राम प्रकाश महत्वपूर्ण रचनाकार हैं । 

डॉ. राम प्रकाश मूलतः कवि हैं । उनके काव्य-संग्रहों में 'सूप भर रोशनी; ' लहरों के विरुद्ध, 'नई सुबह सिरहाने पर , 'हम उजाले जोड़ते हैं ,'अपनी मुटठी में अंबर भर' आदि चर्चित संग्रह है । उन्होंने जीवनी, लोककथा, भाषा-विषयक चिंतनपरक ग्रंथों की भी रचना की है । साथ ही, अनुवाद और सम्पादन-कार्य में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है । उनकी कृतियों को और उनके सम्पूर्ण साहित्यिक अवदान को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी सहित विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित किया गया है । 

डॉ. राम प्रकाश का नवीनतम काव्य-संग्रह ' बादल राग ' के रूप में प्रकाशित हुआ है । इसे वे प्रबंध-काव्य की संज्ञा देते हैं, क्योंकि यह खंड-काव्य से भिन्न है, पर है बादल आख्यान ! इसे वे मेघ-काव्य भी कहते हैं । हर छंद बादल से ही पूर्णता को प्राप्त होता है- 'ढोल-नगाड़े नभ में बजे / संगति में केका ध्वनि साजे; / सारे वृक्ष झूमकर गाते / पावस पीकर हैं मदमाते /.....निरख रहे उल्लास पर्व को / धरती पर नियराये बादल.... देखो नभ में छाए बादल !' एक शब्द चित्र उभरकर पाठकों की आँखों के सामने घुमड़ने लगता है । साथ ही, ' नियराये बादल' बहुत रोचक शब्द प्रयोग के रूप में उभरता है । डॉ. राम प्रकाश ने बरसात-बादल का इतना सुन्दर वर्णन किया है कि पाठक एक लय-गति-ताल-छंद में मंत्र मुग्ध हो जाता है । 'प्रकृति की झंकार इस छंद में प्रतिध्वनित होती है- झरना लेकर दौड़ी नदियाँ / शुरू हुईं सबकी गतिविधियाँ; । जलचर थलचर सब हैं भागे / किन्तु पवन है सबसे आगे । .... हिरनों ने जब भरी कुलांचें / देखो ये भरमाए बादल / देखो नभ में छाए बादल...!' 

'बादल राग' काव्य की एक लम्बी तान छेड़ी गई है । हर छंद में बादल छाए हैं । बादल के जितने रूप प्रकृति उद्घाटित करती है ,उन सबको शब्दों मैं बांधकर बहुत सहजता और स्वाभाविकता के साथ 'राग में ढाला गया है । इसमे इंद्रधनुष, पपीहा, मृगछौने, पंछी, खग, जंगल, गिरि, चेरापूंजी, नोहकलिकाई, सूरज, ज्वालामुखी, सीपी-मोती, मरुथल, क्षितिज, कोयलिया, बिजली, हरिण, चातक, दादुर, सागर, झील, बांस, पेड़, बाग-बगीचे, धुंध, मंदिर, मस्जिद सहित सारी प्रकृति बादल का रूप धरकर गीत काव्य बरसाते हैं । प्राकृतिक परिवेश में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी बहुत खूबसूरत बन पड़ी है । हवा उड़ा करके ले जाती / वन में चंदन का लेप कराती ;/ किरणों से हल्दी लगवाती / धरा मातृपूजन करवाती /…. दूल्हा सज कर ढोल बजाए /अपना ब्याह रचाये बादल. देखो नभ में छाए बादल । ’

रचनाकार अपने आसपास को शब्दों मैं बांधता है । बादल राग मैं डॉ. राम प्रकाश ने बादल को खूब रेखांकित किया है । उन्होंने प्रकृति के चित्रण के साथ हमारे वर्तमान समय को भी समेटा है । कृषि, कृषक, धान ,मक्का, अरहर, ज्वार आदि को बादल राग में शामिल कर लिया । सहज ही इंद्र को भी याद किया गया है । 

डॉ. राम प्रकाश ने इस प्रबंध- काव्य के सृजन- बीज की चर्चा भूमिका में की है । साथ ही ‘बादल’ के कई पर्यायवाची शब्दों की बृहद चर्चा की है । बादल के 49 समानार्थी शब्दों की सूची इसमें दी गई है । अकबर - बीरबल के किस्से से एक अंश प्रस्तुत करते हुए कहा है । ‘ बिना बादलों के कवि का काव्य- यज्ञ सम्पन्न ही नहीं होता’ बादल पर इतना लम्बा आख्यान रचते हुई कोई कथा नहीं बुनी गई है पर एक अंतर्लय है । शैली इतनी सुन्दरता से अभिव्यक्त हुई है कि रोचकता खूब बरसती है । रचनाकार डॉ. राम प्रकाश ने इसे ' मुक्त प्रबंध ' कहा है । डॉ . राम प्रकाश की सृजन - यात्रा में यह काव्य -प्रबंध बहुत अलग स्थान रखता है । साथ है बादल राग गाते समय हिंदी साहित्य मैं इसकी विशिष्टता अवश्य दूर तक गूंजती रहेगी ।



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समीक्षा : 'फटा हलफ़नामा'



डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ

डी 121 , रमेश विहार, अलीगढ़-20200 

मो. 09837004113


अमानवीयकरण और अवमूल्यन का प्रतिरोध करता हलफ़नामा 

लंबे समय से काव्य-सर्जना में संलग्न डॉ. राम प्रकाश की प्रतिनिधि कविताओं को डॉ. श्यामबाबू शर्मा ने सम्पादित-संकलित किया है । 'फटा हलफ़नामा' की 'बिन कहे रहा न जाय' शीर्षक सम्पादकीय में यही संकेत है कि समय के सवाल इन कविताओं में पूरी सिद्दत के साथ मौजूद हैं । कवि के सामने सर्वाधिक ध्यानाकर्षक सवाल मनुष्यता के क्षरण और हनन से संबद्ध है । 'साँप' , 'एक आदमी' , 'खंडहर' , 'कटी जिह्वाओं का लोक' आदि कविताओं में आदमी के जानवर बल्कि उससे भी बदतर होने की विडम्बना है । 'साँप' का अनुभव है कि 'जहरीलेपन में / आदमी उसका भी बाप है' और 'एक आदमी' का इतना पता है कि वह छीन सकता है 'आम आदमी की जीभ की मिठास' । क्रूर व्यवस्था भी मनुष्यता के लोप में सहयोग करती है,बल्कि बाध्य करती है और लोग अपनी अभिव्यक्ति कि आजादी को खुशी-खुशी गँवा देते हैं । 'कटी जिह्वाओं का लोक' में यही हादसा है- 

हम नहीं बोलेंगे 

हमें नहीं चाहिए कटी जीभें 

चिपका कर रखेंगे अपनी जिह्वाएँ

कवि चिंतित है कि देश में सर्वग्रासी अवमूल्यन ने अच्छी चीजों और विशेषतः मानवीय मूल्यों के लिए संकट पैदा कर दिया है । नैतिकता का कवच और ईमानदारी के कुंडल आज के संदर्भ में आर्ष-स्वरुप हैं (यक्ष-प्रश्न), बहुत सी बस्तियाँ 'विश्वास के बीज / आशाओं के बादल' की बाट जोह रही हैं (सपने), बेवजह रिश्तों की हत्या हो रही है (बेवजह भी मिलते थे लोग) । यह सब इसलिए हो रहा है कि स्वार्थ की फसलें लहलहा रही हैं और जमीर की मिट्टी से 'संवेदना की उर्वर शक्ति' नष्ट हो गयी है । मनुष्य से बेहतर तो पेड़ हैं, जिनमे परस्पर सदभाव बचा हुआ है । इस आपाधापी और अव्यवस्था के प्रतिरोध की क्षमता कवि की दृष्टि में सिर्फ कलम में है । सच्ची कलम कभी शांत नहीं बैठ सकती : 'अन्याय से लड़ेगी / अव्यवस्था से झगड़ेगी' इसलिए कि उसमें संवेदना बची हुई है । डॉ. राम प्रकाश की दृष्टि में लेखन संवेदनाविहीन होकर सार्थक नहीं हो सकता - 

 और संवेदना रहित लेखन 

 न तो शब्द होता है 

और न अर्थ होता है 

वह होती है 

अक्षरों के श्मशान की चहारदीवारी 

या फिर 

भावों की जली चिता की राख 

स्वयं डॉ. राम प्रकाश की कविताएँ संवेदना-पोषित हैं । 'हक़ रोटी पर' , 'हामिद भाई की रफू की दुकान' , 'बेरोजगार की आत्मकथा' , 'शहर जाते हुए' , 'रमुआ का कौशल विकास' और लम्बी कविता 'फटा हलफ़नामा' में वंचितों और उत्पीड़ितों के प्रति सहानुभूति और आत्मीयता व्यक्त हुई है । 'फटा हलफ़नामा' का विजन सकारात्मक परिवर्तन के प्रति आश्वस्तिकारक है-

अब कोई नहीं कर पायेगा नर-संहार 

अब कोई भूमि बंजर न होगी 

अब कोई हलफ़नामा न होगा 

होगा तो- 

 केवल अन्याय का अंत 

अपने अनुभूत...., आक्रोश और प्रतिरोध-भाव को अभिव्यक्त करने में सक्षम भाषा कवि के पास है । मैंने देखा है कि भाषा में स्मृतियों को सँजोती भाषा तरंगायित सुगंध की तरह ...., ....चकिया, कटरी, आँच, फाग जैसे आँचलिक शब्दों से भरपूर है और ' रमुआ का कौशल विकास' में नाड़ा,अलगनी, तुरपाई, ...., .... आदि शब्दों ने रमुआ की नियति के निर्धारण में योग दिया है । .... के स्थान पर फ.Vslh ,पूर्वदीप्ति, बिम्ब-प्रतीक की सहायता से बनी आकर्षक कहन प्रभावित करती है । 'औरत लड़की नहीं बन सकती' में औरत-संहिता तोड़ने को -

'माना जाता है, गंभीर अपराध 

जिसमें है प्रावधान 

प्रताड़ना से लेकर सजा-ए-मौत तक' । 

'यह लड़की संविधान नहीं जानती' में इसका प्रतिपक्ष भी है- 

'भगा सकती है हर प्रकार के कुत्तों को 

कुत्तों से अपने आपको बचाना 

वह जानती है' । 

प्रतिरोध के तेवर 'कबीर' कविता में नयापन लिए हुए हैं । यहाँ आम आदमी कबीर को नहीं जनता पर 

'मौका आने पर 

कबीराना अंदाज में 

सड़क पर उतर आता है । ' 

एक कविता 'प्याज हूँ मैं प्याज' में प्याज शास्त्र-धर्म से निंदित-बहिष्कृत वर्ग का प्रतीक बनी है । बिम्बों-अप्रस्तुतों के प्रयोग प्रायः अन्तर्वस्तु के अनुरूप हैं । 'राजनीति की चील' , 'अँगरखा भविष्य का' , 'तीसरी बार जैसे माँ बुला रही हो वापस' , 'गांधी कालीन कड़ाही' , 'सत्ता का गरम मसाला' आदि प्रयोग अर्थ-संप्रेषण में सक्षम हैं । कई कविताओं में एकदम अंत में कहानी की चरम सीमा जैसी कौंध 'विजन' को चमका जाती है । 

'वे और उनकी असभ्यता 

दोनों प्रणम्य हैं' , 'आरामगाह में अलसाये मनुष्य ने 

यह सब नहीं देखा' , 'कि एक अरब लोग मिलकर 

 एक आदमी को सुधार नहीं सकते' 

आदि समापन पंक्तियाँ उस संदर्भ में पठनीय हैं । 'सपने' में कवि ने साहित्यकारों, कलाकारों से वंचितों के लिए सपने लाने का जो आग्रह किया है, वह उसकी अपनी कविताओं में प्रायः साकार हुआ है । 

संदर्भ - 'फटा हलफ़नामा' , डॉ. राम प्रकाश, सम्पादक - डॉ. श्यामबाबू शर्मा, प्रकाशक - शिवना प्रकाशन, पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेन्ट, बस स्टैण्ड, सीहोर-466001 (म.प्र.), प्रथम संकरण 2021 

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कविताएँ

डॉ. राम प्रकाश, अकोला, महाराष्ट्र, मो. 9422861524



अब चन्दनवन का क्या होगा ?

हर विषधर फन मार रहा है

अब चन्दनवन का क्या होगा ?


अविश्वास का धुआँ उठ रहा

षड़यंत्रों की है तैयारी;

सूखे पत्ते ढूँढ रहे हैं

राख दबी कोई चिनगारी । 

चिड़िया पूछ रही है खुदसे, 

उसके जीवन का क्या होगा ?

अब चन्दन वन का क्या होगा ?


राहों में हिमपात हुआ है

हिमनद ने राहें बदली हैं, 

वज्रा घाती दिवस उगा है

लगता है सूरज नकली है । 

पथ-दर्शक पत्थर भटके हैं,

मंजिल के प्रण का क्या होगा ? 

अब चन्दन वन का क्या होगा ?


धूप जलाती है पौधों को 

पानी मे अब रहा न पानी, 

उगते अंकुर हुए कुपोषित 

मौसम की अपनी मनमानी । 

माली लिए कुल्हाड़ी घूमें 

अब इस उपवन का क्या होगा 

अब चन्दन वन का क्या होगा ?


धर्मों के मदान्ध जंगल में

जातिवाद की गहरी झीलें, 

नभ में चक्कर काट रही हैं

अवसरवादी जहरी चीलें । 

बरगद मौन तटस्थ खड़े हैं,

मलयज का वन्दन क्या होगा ? 

अब चन्दन वन का क्या होगा ?

नगरी में अंधेर मची हो

और बना हो चौपट राजा

टका सेर बिकती हो भाजी 

टकासेर चिकता हो खाजा । 

कंचन हीरा मोती चिंतित,

उनके अर्चन का क्या होगा ? 

अब चन्दन वन का क्या होगा ?




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साधना के ग्रन्थ में कब साधनों के शब्द पाए । 

शिखर जय संकल्प में कब पंथ हैं अवरुद्ध पाए । 

बिना तप के सिद्धियाँ उपलब्धियाँ किसको मिली है 

चोट खाकर भी चले जो चोटियाँ उनको मिली हैं । 

धूप के संघर्ष में तपती रहीं काली शिलाएँ

वही अनुभव कर सकी है बादलों के घने साए । '

निर्झरी उत्साह में कब 

पत्थरी प्रतिबन्ध पाए । 

साधना के ग्रन्थ में कब साधनों के शब्द पाए । 


कर्मपथ में ग्रन्थ ज्योतिष् के कभी बिकते नहीं हैं, 

स्वाभिमानी पर्वतों पर प्रभंजन टिकते नहीं है,

छाँव की लालच भला कब दूरियों का हठ बताती 

लक्ष्य के संधान को कब दूसरी बातें सुहातीं । 

मरुथलों की तपन मे कब 

गान मृदु अलिवृन्द पाए

साधना के ग्रन्थ में कब साधनों के शब्द पाए । 

सहजता साहित्य में अनिवार्यता मानी गई गई है, 

इसी से कविता गगन की शिखरता पाई गई है । 

मेघ माला के सदृश कवि निरन्तर आगे बढ़े हैं, 

विचारों की शिलाओं पर सवारी कर वे दृढे हैं । 

भावना के ज्वार में कब 

चिन्तनी तटवन्ध पाए । 

साधना के ग्रन्थ में कब साधनों के शब्द पाए । 


प्रेम की अभिव्यक्ति शब्दों में कहाँ सम्भव हुई है । 

सकुच लज्जाशील लाली हर समय अभिनव हुई है 

अनादि अनंत कवियों और संतों ने कहा है 

रह गए कुछ पृष्ठ कोरे, रह गया कुछ अनकहा है । 

प्रेम की मनुहार में कब

शर्त के अनुबन्ध पाए । 

साधना के प्रन्थ में कब साधनों के शब्द पाए । 

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बूँद विष की एक भी घुलने न पाए

है अमृत का काल फिर भी ध्यान रखना 

बूँद विष की एक भी घुलने न पाए । 


सागरों में यह महासागर हमारा 

सीप मोती मछलियाँ सुन्दर किनारा 

अहनिर्श बह रही हैं मृदुनीर नदियाँ 

इसी से सुखमय रही है लाख सदियाँ I 

अम्बु पूरित कुंभ ले सिर पर चले हो 

ध्यान रखना बीच में गलने न पाए । 

बूँद विष की एक भी घुलने न पाए । 


मानता हूँ मेघ हो तुम गगन गामी 

हवाएँ भी कह रहीं नामी-गिरामी 

किन्तु बदरी में छिपी है क्रूर कारा 

जानता फितरतें उसकी विश्व सारा । 

जो सुदृढ़ मीनार पुरखों ने बनाई

नींव इसकी जरा भी हिलने न पाए । 

बूँद विष की एक भी घुलने न पाए । 


दीप उत्सव यह अतुल आल्हादकारी 

जुगनुओं से सूर्य तक है जोश भारी, 

मंच सज्जा में निरन्तर जो लगे हैं 

पूर्णतः उत्सवी भावों से भर हैं । 

समझना सबके लिए यह है कि

उग्र लौ से झुलसने जलने न पाए । 

बूँद विष की एक भी घुलने न पाए । 


भूमि अनुपम उर्वरा सब जानते हैं

उगाई उत्कृष्ट फसलें मानते हैं 

कीट पाला पाथरों से बच गयी है 

आज दानों भरी फलियाँ सज गई हैं । 

रोज जाकर देख लेना खेत अपना । 

पौध जहरीली कोई फलने न पाए

बूँद विष की एक भी घुलने न पाए । 


दूर से तलवार भाले तीर आए

सिंहद्वारों को नहीं वे भेद पाए 

किन्तु घर के भेदियों के सौ बहाने

रच रहे षड्यन्त्र वे इसको ढहाने । 

थी सँभाले पीढ़ियाँ अब तक घरौंदा 

शक्ति कोई अब इसे छलने न पाए । 

बूँद विष की एक भी घुलने पाए । 

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असभ्यता प्रणम्य है 

आदिवासी जानते हैं-

धूप का अँगरखा 

हवा की थपथपाहट

बादलों का वितान 

पेड़ों का बुलाना 

 झरने की छमछम 

नदियों की कलकल !


आदिवासी देखते हैं-

रीछों का मेला

सिंह को अकेला 

हिरनों की कुलाचें 

साँपों की लपालपी 

पेड़ों की प्यास

घाटियों की आस । 


आदिवासी मानते हैं-

चन्दन को नेहरू 

बरगद को गाँधी 

हर डाली सोना 

हर पत्ती चाँदी

हर घाटी उपवन 

हर कोना चन्दन । 


आदिवासी नहीं जानते-

नदियों को गँदलाना 

झरनों को सुखाना 

हरे पेड़ों की हत्या 

प्राणियों पर अत्याचार

पर्वतों को घायल कर सड़कों का निर्माण । 


आदिवासी सचमुच नहीं जानते-

व्यभिचार और भ्रष्टाचार

बनावटी आचार-विचार

आधुनिकता की पटरी

और प्रगति की रेल 

कांक्रीट के जंगल

महानगरों की ठेल-पेल । 


आदिवासी सचमुच असभ्य हैं । 

वे और उनकी असभ्यता 

दोनों ही प्रणम्य हैं । 





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बेधड़क बेचो क़लम

बेचो !

बेधड़क बेचो क़लम 

झिझको मत 

कोई बुरा काम नहीं हैं । 


कोहिनूर 

सबको रास नहीं आता है 

जहाँ जाएगा 

प्रलय मचाएगा । 


सच्ची क़लम 

जिसके पास भी जाएगी 

उसके नहीं ,

जिसके पास से जाएगी 

उसके गुण गाएगी । 

वैसे भी क़लम है जिन्न 

वह शांत नहीं बैठ सकती ,

अन्याय से लड़ेगी 

अव्यवस्था से झगड़ेगी । 


इसलिए-

मसिजीवियो !

बेझिझक 

बेधड़क 

बेचो क़लम । 


क़लम है बिकाऊ 

ख़रीद लो भाई 

बड़ी है टिकाऊ 

रसूखवालों के लिए

विशेष छूट है

अख़बार के मालिक बनने पर 

पचासों क़लमें 

झोली में पड़ी मिलेंगी । 


कुछ सस्ते भाव की क़लमें

सत्ताधारियों के आगे-पीछे घूमती हैं 

उनके विचारों को चूमती हैं 

रिझाती-खिजाती हैं 

वर्ण-संकरी क़लमें । 

क़लम के सिपाहियो ! 

समाज के प्रहरियो !

बेधड़क क़लम बेचना 

पर 

कभी 

गिरवी न रखना । 

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हम सब छले गये

बापू !

ओ बापू !

आप तो चले गए 

हम सब छले गए 

पाकर प्रजातंत्र का 

जादुई चिराग़ । 

निर्वाचन आयोग ने 

जब भी इसे रगड़ा 

विस्फोट हुआ तगड़ा 

निकलते हैं एक साथ । 

हज़ार पाँच सौ जिन्न । 

इनके जिले और क्षेत्र होते हैं 

भिन्न-भिन्न

पर स्वभाव सबका अभिन्न

ये नहीं मानते किसी का हुक्म 

नहीं कोई इनका आक़ा

देश में पड़े डाका या फाका 

ये सर्वदा बेफिक्र 

कोई नहीं कर पता इनका बाल-बाँका,

मचा दिया चारों और अंधेर 

बापू आपने दे दिया 

अंधे के हाथ में बटेर । 


क्या करें ?

क्या कहें बापू ?

आप तो चले गए 

हम सब छले गए । 





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अतिथि देवो भव 

ढूँढ़ो-

उस आदमी को 

जो दो बजे रात को

बड़े उछाह के साथ 

पहुँचकर खड़ा रहता है

रेलवे प्लेटफार्म पर 

अतिथि को लाने के लिये । 

ढूँढ़ो- 

उस गृहिणी को 

जो आधी रात में उठकर 

बड़े उत्साह से 

तैयार करती है चाय-नाश्ता 

अतिथि के लिये । 


ढूँढ़ो- 

उन बच्चों को 

जो खेलना और होमवर्क छोड़कर 

बड़े उत्साह से 

खड़े रहते हैं पानी भरा लोटा लिये 

अतिथियों के हाथ पैर धुलवाने के लिये । 

ढूँढ़ो- 

उस परिवार को 

जो उदास हो जाता है अतिथियों के जाने के समय 

और जाने के बाद । 

ढूँढ़ो-

उस अतिथि को 

जिसकी आंखों से 

बह निकलता है पानी- 

उस घर से निकलते समय 

बच्चों को रुपय देते समय । 

यद्यपि 

यह बहुत कठिन है 

फिर भी 

ढूँढ़ो । 

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बेरोजगार की आत्मकथा 

लगातार पच्चीस वर्षों तक 

पढ़ाई करने के बाद 

इकतीस की उम्र तक 

रोजगार न मिलने पर 

मैं-

ठीक उसी तरह का हो गया हूँ 

जैसे किसानों द्वारा उगाया गया अन्न

सड़ता रहता है सरकारी गोदामों में 

अथवा-

उस नवल-धवल कपास की तरह 

जो आकर्षित करती थी अपने सौन्दर्य से 

जमीन से जुड़ी उचक-उचककर 

निहारती थी आकाश की ओर । 

उसमें कल्पना थी 

उसमें संकल्प था 

उसमें माद्दा था 

कि कपड़ा बनकर रखेगी लाज बरकरार

पर अकाली बरसात में भीगकर 

अपनी आब-ताब खोकर 

औंधे मुँह चिपक गई जमीन से । 



अब मैं-

अधमरा साँप हूँ 

जिसे राजनीति की चील 

अपने मुँह में दबाए हुए 

आकाश की सैर करा रही है । 

बचने की एक ही आस है 

कि किसी रोटी के लालच में 

अथवा स्वर्णहार के आकर्षण में 

छोड़ दे मुझे । 

अब मैं अधमरा साँप हूँ 

इसलिए घायल होने की चिन्ता नहीं, 

चिन्ता है तो जिन्दा रहने की । 

छूटकर गिरूँगा मैदान में 

तो भी बचा रहूँगा 

पानी में गिरूँगा 

तो भी अपने को बचा लूँगा । 

हाँ,

यदि किसी नक्सलबाड़ी में गिरूँगा 

तब मैं क्या हूँगा 

क्या करूँगा 

यह न मैं बतला सकता हूँ 

न आप । 

मैं तो केवल इतना जानता हूँ 

कि नक्सलबाड़ी की बन्दूकों से 

मर चुकी हैं कई चीलें । 


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हामिद भाई की रफू की दुकान 

हामिद भाई जैसा रफूगर 

नहीं था पूरे शहर में 

प्रसिद्धि इतनी कि पते के काम में आती थी दुकान 

मसलन-

हामिद भाई की रफू की दुकान के आगे 

दुकान के पीछे 

दुकान के पास । 


रफ़ूगीरी में इतनी सफाई और कहीं नहीं थी । 

ऐनक के पीछे बूढी आँखों में 

सूखी उँगलियों में 

नस-नस में समाई थी कारीगरी । 


स्वभाव ऐसा कि लोग रिश्तेदारों के कपड़े 

रफू कराते थे वहीं । 

बात तब की है 

जब फटने पर 

कपड़े रफू कराए जाते थे । 

न लोग ऊबते थे 

न कपडे । 


चार बाई चार की दुकान

समय सबेरे नौ से रात नौ तक

पूरा परिवार मालिक 

पूरा परिवार नौकर । 

हामिद भाई के बाद 

दुकान चलाती रही उनकी पत्नी 

उनके बेटे । 

धीरे-धीरे डूबने लगा यह धन्धा 

अब भूले-भटके ही आता था कोई बन्दा

सड़क पर आ गए रफूगर 

डूबने लगी यह कला 

घरों के संग्रहालयों में 

जमा होने लगी सुइयाँ

पीले पड़ गए धागे 

जर्जर होकर मर गई कला 

मर गया एक कौशल । 


हामिद भाई के बेटे मजदूर हैं 

दुकान का बोर्ड बदल गया 

अब वहाँ है-

'कौशल विकास केंद्र'

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उपवन के जहरीले पौधे चंदन हो गए

प्रजातन्त्र के हत्यारे अब वंदन हो गए

उपवन के जहरीले पौधे चंदन हो गए । 


सुबह सुबह की धूप लूट ली, दुपहर की तरुणाई 

और कुटिलता से हथियाई, सन्ध्या भरी ललाई,

धन-वैभव रुतबा पाया पर,शांति नहीं मिल पाती 

जैसे बिछड़ी कोई हिरनी, जंगल में भरमाती

इच्छाओं के मायावी मृग कंचन हो गए । 

उपवन के जहरीले पौधे चन्दन हो गए । 


गांधी के वारिसदारों ने उनका नाम डुबोया 

और शास्त्री को इतिहासों के पन्नों में खोया,

बड़ी, शान से खुले आम अब जो करता है चोरी

इतने पर भी बिना झिझक के करता सीनाजोरी । 

बाघों और बकरियों के गठबन्धन हो गए । 

उपवन के जहरीले पौधे चंदन हो गए । 


पुरखों ने काँटे निकालकर, रोपी थी अमराई

किन्तु बबूलों की अगणित, नस्लें देतीं दिखलाई;

खेतों की रक्षा के खातिर बाड़ गई लगवाई

किन्तु देखने में यह आया, फसल उसी ने खाई 

भंवरों के गुंजन भी अब तो क्रन्दन हो गए । 

उपवन के जहरीले पौधे चन्दन हो गए । 


जग में हुई क्रान्तियाँ जितनी कलमें करती आईं

कभी नहीं वे रुकी थकी हैं, कभी नहीं घबराईं;

अब तक कलमों के कदमों पर सिंहासन हैं देखे

किन्तु आजकल - चंवर कर रहे उनके लेखे-जोखे !

बिकने वाली कलमों के अभिनन्दन हो गए 

उपवन के जहरीले पौधे चन्दन हो गए |



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कल सुबह अंकुर बनूँगा

आँधियों ने है उखाड़ा, कल सुबह फिर से तनूँगा

आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा । 

टहनियों के शीश पर जो

ताज बन छाए रहे हैं:

रूप रंग सुगन्ध से वे

चमन चहकाए रहे हैं । 

एक पल में पुष्प सारे

दूर जा बिखरे कहीं पर ;

आँधियाँ तूफान बिजली

खार सब खाए रहे हैं । 

धूल में लथपथ सुमन हैं, मैं उन्हें फिर से चुनूँगा । 

आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा । 


पूर्वजों के अनुभवों के

रास्तों पर चल रहा हूँ;

रख गए साँचे बनाकर

उन्हीं में मैं ढल रहा हूँ । 

मानचित्रों में नहीं कूबत

कि हर पथ वे बताएँ:

आदतन राहें बताते

उन्हें ज्यादा खल रहा हूँ । 

ठीक राहों पर चला हूँ, क्यों भला उनकी सुनूँगा । 

आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा । 


घात पीठों पर करें, ये

रास्ते भाए नहीं हैं ;

कर लिया संकल्प हमने

कभी भरमाए नहीं हैं । 

धराशायी हो चुका हूँ

हार के अनुभव लिए हैं;

पराभव के भाव लेकिन

हृदय में आए नहीं हैं । 

उठ खड़ा सन्नद्ध हूँ मैं, वार पहला मैं हनूँगा । 

आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा । 


स्वर्ण हूँ इसके लिए ही

दे रहा फिर-फिर परीक्षा ;

हर समय पर यातना है

हर समय पर एक दीक्षा । 

एक ताड़ित कर रहा तो

दूसरा विष में डुबोता ;

इस तरह मुझको दिया है

हर किसी ने नई शिक्षा |

आज भट्ठी में तपा हूँ, सुबह आभूषण बनूँगा । 

आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा । 


आत्महत्या है नहीं

जल में हमारा डूब जाना ;

कब किया स्वीकार मैंने

इस जगत से ऊब जाना । 

समुन्दर की अतलता से

मैं भला विचलित रहूँ क्यों ;

लगा ही रहता वहाँ पर

रोज आना और जाना । 

आज डूबा हूँ अतल में, तैरता कल फिर मिलूँगा । 

आज मिट्टी में मिला हूँ, कल सुबह अंकुर बनूँगा । 

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मुझको है विश्वास

आओ दुर्गमता के पथ पर कदम बढ़ाएँ

मुझको है विश्वास । 

कि राहें छिपी यहीं पर । 


धरती के गुम्मड़-सी उभरी पर्वतमाला 

वृक्ष पर्ण विरहित शापित-सा गिरिवर काला; 

शुभ्र कपासी बादल कभी-कभी हैं आते 

देख पवन की वक्र दृष्टि डरकर उड़ जाते –

इन्द्र देव की दृष्टि कभी भी इधर न आई 

भूमि यहाँ बंजर थी, कभी नहीं हरियाई ;

दूर - दूर तक तरस रहा पदतल मरुथल है 

शुष्क भूमि में नहीं मात्र आँखों में जल है । 

आओ छाती छेदें उन कठोर शिखरों की 

मुझको है विश्वास 

कि झरना छिपा यहीं पर । 


व्यालि-राशियाँ इस वन में फुफकार रही हैं

बाँबी शरण दिए उनको पुचकार रही है;

विष के उड़ते स्फुलिंग जीवन हरते हैं

जाने कितने जीव - जन्तु निश-दिन मरते हैं । 

वन-प्रांतर में सूर्य रश्मियाँ पहुँच न पातीं

तुहिन बिन्दु भी वहाँ पहुँच विषाक्त हो जातीं ;

नीर कंटकाकीर्ण पथों पर घबराता है

और पवन भी वहाँ पहुँचकर छिद जाता है । 

चलो घँसें इस जहरीले वन को देखेंगे

मुझको है विश्वास 

कि अमृत छिपा यहीं पर । 


तम की तानाशाही है आतंक मचाती 

दूर-दूर तक प्रभा रेख है नजर न आती ;

चपला कहीं क्षितिज में जाकर सो जाती है

चन्दा की आभा मावस हर ले जाती है । 

तारे कंपित सूरज उनको चबा न जाए 

जाने कहाँ विलुप्त हुए जुगुनू के साए ;

आभावाले पुष्प धूसरित हुए धूल में 

सारस और कपोत छिप गए किसी कूल में । 


चलो अनावृत करके इस तम को देखेंगे 

मुझको है विश्वास 

उजाला छिपा यहाँ पर । 

आओ दुर्गमता के पथ पर कदम बढ़ाएँ

मुझको है विश्वास 

कि राहें छिपी यहीं पर । 

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पछताना क्या

जो मिला मुझे, मिल रहा मुझे, वह भी अनमोल खजाना है; 

है यत्न किया पर मिला नहीं, उसके खातिर पछताना क्या । 


हैं यत्न नहीं केवल साधन 

वे साध्य स्वयं में होते हैं; 

सौ बार नहीं, इक बार सही 

वे भाग्य स्वयं में होते हैं । 

इच्छाएँ तो छलनाएँ हैं । 

इनमें खुद को भरमाना क्या । 

है यत्न किया पर मिला नहीं ,उसके खातिर पछताना क्या । 


अभिशाप सही, वरदान सही 

अनुभव कुछ तो दे जाते हैं, 

हो हार कहीं, या जीत कहीं 

पद-चिह्न छोड़कर जाते हैं । 

इतने आराधन होने पर 

अन्यत्र कहीं फिर जाना क्या । 

है यत्न किया पर मिला नहीं, उसके खातिर पछताना क्या । 


यह सृष्टि बनी तब से लेकर 

देवों का अर्चन होता है; 

जिनसे कुछ लाभ मिला उनका

वन्दन अभिनन्दन होता है । 

कुछ देव नहीं दे पाए अगर 

आँसू के अर्घ्य चढ़ाना क्या । 

है यत्न किया पर मिला नहीं, उसके खातिर पछताना क्या । 

होंगे अहसान बड़े कोई

जिसके कारण से वह दूर हुआ; 

मौसम ही होंगे कुछ ऐसे

जिस कारण वह मजबूर हुआ । 

माना गमगीन हुआ तन-मन 

मोती सम अश्रु लुटाना क्या । 

है यत्न किया पर मिला नहीं, उसके खातिर पछताना क्या । 


नदियाँ, सदियाँ जीवनवाली 

बहती जातीं, चलती जातीं 

जो छूट रहे, जो टूट रहे 

उनसे मिलकर कहती जातीं 


संयोग-वियोग-नियति दोनों 

फिर इन पर शोक मनाना क्या । 

है यत्न किया पर मिला नहीं ,उसके खातिर पछताना क्या । 

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मेरा दीप न कंपित होगा

आँधीवाली तेज हवाएँ 

चाहे कितना जोर लगा लें; 

गर्जन-तर्जन वाली बिजली 

चाहे कितना शोर मचा ले । 

जलने में विश्वास अपरिमित 

अम्बर में वह अंकित होगा । 

मेरा दीप न कंपित होगा । 


चाहे गर्तोंवाले नर्तन 

उसको कितना ही ललचाएँ;

रत्नाभूषण सजी शिलाएँ 

चाहे कितनी ही भा जाएँ । 

दौना-दीप लहर पर चलता 

रुककर कभी न संचित होगा । 

मेरा दीप न कंपित होगा । 


देव-दनुज हो अथवा मानव 

भेद न उनसे करना सीखा; 

समता ममता चिन्तन अर्चन 

सब कुछ बाँटा एक सरीखा । 


ज्योति वल्लरी लौ कहती है 

कभी न कोई वंचित होगा । 

मेरा दीप न कंपित होगा । 


काया में यह छोटी बाती 

बहुत दूर तक हरे अँधेरा; 

घाटी गर्त गुफाएँ मिलकर

सबने इसको आकर घेरा । 

यह दृढ़ स्वर उद्घोष कर रहा 

तम से नहीं सशंकित होगा । 

मेरा दीप न कंपित होगा । 


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ओ नये भोर की प्रथम किरण 

ओ नये भोर की प्रथम किरण 

वरदान तुम्हें देना होगा । 

जगतीतल नव संचरित हुआ 

शुचिता का स्वर उच्चरित हुआ;

प्राची ने तव सम्मान किया 

नव शिशु विहान ने गान किया । 

हे रश्मिरथी 

हे रवि तनया !

प्रतिदान तुम्हें देना होगा । 

वरदान तुम्हें देना होगा । 


संवत्सर शुभ लाना होगा 

स्वर्णिम ध्वज लहराना होगा ;

तुम सकल विश्व की कल्याणी 

भूतल जीवों की वरदानी 

हे प्राण-हिता

हे देव-जया !

संज्ञान तुम्हें लेना होगा । 

वरदान तुम्हें देना होगा । 



आई है बड़ी महामारी 

संत्रस्त हुई दुनिया सारी,

लेकिन मानव भी खूब लड़ा 

साहस से सम्मुख डटा खड़ा 

हे सूर्य-सुता 

हे प्राण-प्रभा !

सम्मान उन्हें देना होगा । 

वरदान तुम्हें देना होगा । 


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थोड़ी तपन छिपाकर रक्खो

जब सम्बन्ध बर्फ बन जाएँ 

सोच बनी हो सर्द हवाएँ ;

उद्वेलन की गति बढ़ जाए 

भावों की गिरती उल्काएँ । 

तव प्रणयांकुर उगने खातिर 

थोड़ी तपन बचाकर रखो । 

थोड़ी तपन छिपाकर रक्खो । 


गंध कहीं नभ में खो जाए 

पुष्प नवल ही मुरझा जाए ,

कहीं सरोवर नज़र न आए 

पंछी मरुथल में भरमाए । 

छुई मुई-सी शरमाने की 

थोड़ी छुअन बचाकर रक्खो । 

थोड़ी तपन छिपाकर रक्खो । 


गीली लकड़ी सुलग न पाती 

चिनगारी जलकर बुझ जाती; 

पवन कहीं जाकर छुप जाता 

चूल्हा भी ठंडा पड़ जाता । 


तब अदहन के तपने खातिर 

थोड़ा दहन बचाकर रक्खो । 

थोड़ी तपन छिपाकर रक्खो । 


जब संवाद मौन हो जाएँ 

होंठ हर किसी के पथराएँ ; 

उपवन गहरी निदिया सोए 

बादल नीरवता ही ढोए । 

ऐसे अवसर में कहने को 

थोड़े वचन बचाकर कर रक्खो । 

थोड़ी तपन छिपाकर रक्खो । 


प्रतिभाएँ कुंठित हो जाएँ 

चिन्तन सारा दीमक खाएँ:

नवल कल्पना पनप न पाए

सपनों पर पाला पड़ जाए । 

तब सपनों के उगने खातिर 

थोड़े सपन बचाकर रक्खो । 

थोड़ी तपन छिपाकर रक्खो । 










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राह में अपनी न यों ही 

राह में अपनी न यों ही 

दुःख के सिक्के उछालो । 

है तिजोरी अनुभवों की 

रखो अच्छे से सँभालो । 


राह पथरीली चुभन है 

किन्तु असली तो लगन है 

पैर चलने में मगन हैं

कंटकों को भी नमन है । 

झुलसते हों पाँव तो फिर 

धूप चादर की बिछा लो । 

राह में अपनी न यों ही 

दुःख के सिक्के उछालो । 


बिजलियों का खूब डर है 

प्रलय की आंधी प्रखर है 

लुप्त आगे की डगर है 

मनुजता ही दाँव पर है । 


अंगदी तुम पाँव रखकर 

साख - पुरखों की बचा लो । 

राह में अपनी न यों ही 

दुःख के सिक्के उछालो । 


आज मंथन का समय है 

हर निशाचर अब अभय है 

वन्दनाओं में न लय है 

अमृत में विष का विलय है । 

चाहते हो रत्न तो फिर 

हृदय-सागर को खँगालो । 


हिंसकी कुख्यात वन है 

दिशाएँ भयप्रद विजन हैं

नहीं पंथी या स्वजन हैं

गरजते घनघोर घन हैं । 

चाहते हो पार जाना 

कष्ट में डुबकी लगा लो । 

राह में अपनी न यों ही 

दुःख के सिक्के उछालो । 

है तिजोरी अनुभवों की 

रखो अच्छे से सँभालो । 

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देखो अंकुर उगा रेत में

बिना जलद के अहसानों के 

नहीं मिले वर पवमानों के ;

तुहिन कणों ने स्वप्न दिखाया 

किरणों ने झकझोर जगाया । 

दबे बीज ने आँखें खोलीं 

देखो अंकुर उगा रेत में । 


उसको मिला कुपोषित साया 

फिर भी सोते से उठ धाया; 

वीराने में उसका क्रंदन 

कौन करे स्वागत अभिनन्दन । 

मौसम कहता मेरे कारण 

श्रेय ले रहा सेंत-मेत में । 


खड़ी दुपहरी ने धमकाया 

क्षुधित-तृषित है उसकी काया 

नखलिस्तानी हँसी उड़ाते 

नमी जरा-सी पास न लाते । 

कहते उसकी ओर न देखो 

नहीं उगा वह किसी खेत में । 

देखो अंकुर उगा रेत में । 




जब कोई वरदान न होगा

कर्मों के ही होंगे लेखे 

कर्मकांड होंगे अनदेखे ; 

भयप्रद कोई शाप न होगा 

जीवन भी अभिशाप न होगा । 

जब कोई वरदान न होगा । 


ऊँच-नीच वाले ये झंडे 

तरफदारियों के हथकंडे ; 

राजा-परजा वाली बातें 

छीन-झपटवाली सौगातें - 

तब इनका सम्मान न होगा । 

जब कोई वरदान न होगा । 


सम्राटों की विरुदावलियाँ 

दरबारों की दीपावलियाँ, 

सिंहासन का वंश न होगा 

ताजों का भी अंश न होगा । 

नेकी का चालान न होगा । 

जब कोई वरदान न होगा । 


श्रम की केवल होगी पूजा 

और न होगा मारग दूजा; 

मनुज रूप में सुर आयेंगे 

कुछ करके वे दिखलायेंगे । 

देवों का अहसान न होगा । 

जब कोई वरदान न होगा । 

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दर्प की चट्टान पर की चोट

दर्प की चट्टान पर की चोट 

गई है कुछ दरक-सी 

ध्वस्त होने में नहीं ज्यादा समय है । 


गिरिवरों तक दृष्टि पहुँची थी न कोई 

पंगु साहस था उमंगें शिथिल सोईं ;

किन्तु नव-नव ज्वार आया नव प्रभामय 

अनुभवों की रश्मियाँ उसमें पिरोईं । 

दिख रहा संकल्प अब सन्निकट 

चढ़ाई दीन-सी है 

शिखर पाने में नहीं ज्यादा समय है । 


क्रूर था दुश्मन समय था वीर उनका 

वह समझता था धरा को एक तिनका ;

स्वयं को वह विश्व का जेता बताता 

तुच्छ समझा था मिला था साथ जिनका |

शत्रु की चालें हुईं सब व्यर्थ 

हलचलें क्षीण-सी हैं 

विजय पाने में नहीं ज्यादा समय है । 


घना तम नैराश्य का यह जानता हूँ 

पार करना है कठिन यह मानता हूँ ;

किन्तु वह भी संभ्रमित भयभीत भी है 

पार करने की उसे जब ठानता हूँ । 

उठ रहा तम्बू तमस का 

तमिस्रा पीन-सी है । 

सुबह होने में नहीं ज्यादा समय है । 


दर्प की चट्टान पर की चोट 

गई है कुछ दरक-सी 

ध्वस्त होने में नहीं ज्यादा समय है । 

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क्षणिकाएँ

रिश्ते

डाइन ने 

सदा एक घर छोड़ा है;

रिश्तों ने 

इस परम्परा को भी तोड़ा है । 

 ……

माना कि 

माना कि हम 

समय के मारे हैं ;

इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं 

कि हम समय से हारे हैं । 

 ……

समाज

हमारा समाज 

तेल की कुप्पी है 

किसी ने तीली जलाई 

तो भड़क उठता है 

वरना चुप्पी है । 

 ……..

वह

वह- 

जो भी बैठा मौन है 

उसे समझना कठिन है 

कि वह कौन है । 

कवि

कवि-

तभी तक बेहतर है 

जब तक कि वह मेहतर है । 

 ………


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मुक्तक


छपी हुई कीमत वाली कलमें आईं बाजारों में 

नीलामी के बाद पहुँचती हैं सज्जित दरबारों में ;

फिर भी कुछ अन-पहचानी-सी स्याही वाली कलमें हैं

जिनकी गणना की जाती है धारदार हथियारों में । 





धरा के विस्तृत पटल पर लिख दिया अपनी जबानी 

है गगन की पीठ पर अंकित किया अपनी कहानी ;

देव तुम, मैं तो मनुज हूँ, दे रहा फिर भी चुनौती 

मिटाकर भी देख लो मानव सृजित कोई निशानी । 


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