Sahitya Nandini June 2024



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 व्यंग्य

एकता अमित व्यास

गाँधीधाम, कच्छ, गुजरात, मो. 9825205804


आधुनिक युग के द्रोणाचार्य और एकलव्य

नई नई लेखिका बनी हूँ बस अभी अभी आनन फ़ानन में एक उपन्यास भी लिख डाला है । ईश्वर की कृपा, माँ के आशीर्वाद और सच्चे मित्रों की प्रार्थनाओं से उपन्यास का असर कुछ यूँ हुआ कि उपन्यास का प्रथम संस्करण छपने के पहले ही बुक हो गया, और अब तो नई साज सज्जा के साथ दूसरा संस्करण भी उपलब्ध है । फिर कुछ प्रबुद्ध समीक्षकों द्वारा की गई समीक्षाओं को तो साहित्य जगत में हाथोंहाथ लिया गया और कुछ समीक्षाओं से तो किताब पढ़ने की प्रेरणा मिली आम जनमानस को थोड़ी-सी ही सही । 

एक बड़ी ही वरिष्ठ लेखिका के प्रेम और नवोदित लेखकों को मंच देने के अभियान के परिणाम स्वरूप देश की राजधानी में प्रथम उपन्यास का विमोचन भी हो गया, लगे हाथ कुछ बड़े समीक्षकों ने उपन्यास की समीक्षाएँ भी कर दी, सोशल मीडिया की दया दृष्टि के चलते उपन्यास का छोटा मोटा ही सही भोकाल सा बन गया,ऐसा एक छुटभैया नेता का कहना है । 

तो इस नए घटनाक्रम के बाद आस-पास के गुणी लोगों में रंग परिवर्तन का गुण बड़ी ही तेज़ी से खुलकर सामने आने लगा, अलबत्ता यह गुण उनमें पहले से ही मौजूद था । और इस विकास की अवस्था में एक वरिष्ठ कवि और उनके चमचा रूपी मित्र अचानक ही आ टपके थे हमारे निवास स्थान पर कभी हम इन आधुनिक गुरु शिष्य की जोड़ी को देख रहे थे तो कभी अपने ग़रीब खाने को और अंत में सब छोड़ छाड़कर हमने उनसे सीधे-सीधे ही पूछ लिया कैसे आना हुआ क्या लेंगे ठंडा या गर्म, वैसे भी शहर का तापमान कुछ अधिक ही है । 

कुछ प्लेटें मौसमी फलों की और शीतल पेय पदार्थों के ग्लासो को प्रेम पूर्वक उदरास्त करने के बाद देश काल और परिस्थितियों की चर्चा बड़ी ही गंभीरता से समाप्त करते हुए बड़े नेता का चोला पहने हुए वरिष्ठ कवि महोदय बोले, भले ही आपकी किताब का राजधानी में विमोचन समारोह हो गया है…किन्तु अभी तक आप स्थानीय मंच पर विमोचित नहीं हुए हैं और संभावनाएं भी कम है इसलिए सही मायने में आप लेखक हैं ही नहीं ओर समीक्षक तो आप बिलकुल भी नहीं है क्योंकि आपने मेरे जैसे प्रतिष्ठित कवि के काव्य संग्रहों की अब तक तो समीक्षाएं की ही नही है । अगर आप प्रतिष्ठित लेखक और आलोचक बनना चाहती हैं तो तुरंत ही मेरे कविता संग्रहों को अलमारी के निचले बाले खानें में से निकाल कर (यदि वे वहाँ अब तक है तो) टेबल पर सजा लीजिए और रत जगा कर दो चार धाँसू सी समीक्षाएं लिख डालीये हमारे कविता संग्रहों पर । 

आखिरकार नई नई बनी हुई लेखिका हैं आप और कुछ ख़ास जान पहचान भी नहीं है आपकी इस शहर के साहित्यक समाज में, अगर आपको जीना है और प्रतिष्ठित लेखक समूह द्वारा स्वीकारोक्ति चाहती हैं तो प्रतिष्ठित और जमे हुए लेखकों और कवियों से संपर्क स्थापित करीये ठीक वैसे ही जैसे पुराने ज़माने में चारण भाट किया करते थे (ये कहकर उन्होंने ख़ुद को साहित्य का अघोषित राजा, घोषित कर दिया था) और मुस्कुराकर अपने मित्र रूपी चमचे की तरफ़ मुख़ातिब हुए– पार्थ अब तुम्हारी बारी– इशारा पाते ही उनके अभिन्न मित्र ने बोलना शुरू किया देखें समीक्षा तो आपको इनकी पुस्तकों की शीघ्र अतिशीघ्र कर ही लेनी चाहिए इससे आपको मान सम्मान और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी, बस यही छोटी सी सलाह है जो आपका भविष्य सजा सँवार सकती है वरना… वैसे भी स्थानीय मंच पर आप विमोचित हो ही नहीं सकेगीं, लाख कोशिश के बाद भी,हमारे सहयोग के बाद शायद कुछ बात बन जाए, सोचियेगा जरा गंभीरता से,और जाते-जाते मीठी मुस्कान के साथ बोले श्रेष्ठ लेखन की कला कौशल और जीवन भर का अध्ययन, भाषा की पकड़, साहित्य के प्रति समर्पण कुछ ख़ास महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि नेटवर्किंग ज़रूरी है और प्रतिष्ठित लेखकों कवियों के साथ संबंध । सोच विचार के फ़ैसला करीयेगा अच्छा लेखक और कवि होना कोई बड़ी बात नहीं है सबसे ज़्यादा आवश्यक है बड़े और प्रतिष्ठित लेखकों का आशीर्वाद, आज के इस संसार में । पर पता नहीं क्यों मेरे कानों ने सुना “ लिखने का कौशल आप में भले ही न हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता है अच्छे चमचे बनने के गुण ज़रूर सीख लीजिएगा काम आएंगे”

जाते हुए वरिष्ठ कवि महोदय और कनिष्ठ कवि महोदय को हमने मान सम्मान और प्रतिष्ठा का वास्ता देकर एक बार फिर सोफे पर प्रतिष्ठित करने में सफलता हासिल कर ली और बड़ी ही विनम्रता से कनिष्क कभी महोदय से वार्तालाप प्रारंभ करते हुए कहा कविवर यदि आपको स्मरण हो कि पद्य यानी की रसात्मक काव्य रचना मैं मेरा हाथ थोड़ा सा तंग है, और अनेका नेक गोष्ठियों में पूरी निश्चितता के साथ मंच पर ही मेरी काव्य रचनाओं को लघु कथा की संज्ञा आप पहले ही दे चुके हैं और आपके ही द्वारा दिए गए इस मान सम्मान और आशीर्वाद के फलस्वरूप मैंने लघुकथा रचना करनी भी प्रारंभ कर ही दी है । अब आप ही कहिए एक अनाड़ी नौसिखिया आप जैसे प्रतिष्ठित कवियों और लेखकों की रचनाओं पर कैसे समीक्षाएँ और आलोचनाएँ कर सकता है कहीं भूल चूक हो गई और अनाड़ीपने में हम आपके कविता संग्रह का पूर्ण रूप से मान सम्मान नही कर पाए तो, इस पाप की भरपाई हम अगले सात जन्मों तक भी नहीं कर पाएँगे । और रही बात आपकी तथा कथित छल योजना(मैनीपुलेशन) की वो तो कभी हमें करना आया ही नहीं, हम सीधी सच्ची बात करने का संस्कार लेकर, संस्कारधानी से चले हैं तो अपने अभियान को बीच में ही कैसे छोड़ दे फ़िलहाल आप मौसम का तकाज़ा देखीये दोपहर हो गई है तापमान का पारा पचास बावन छूने को उतावला हो रहा है कहीं कोई अनहोनी न हो जाए । वरिष्ठ और कनिष्क कवि के प्रस्थान के बाद । 

मैं और मेरी पहली किताब कोने में दुबकर बैठ गए हैं और विचार कर रहे हैं अच्छे चमचा बनने के गुणों को सीखना शुरू करे……..

या हरिशंकर परसाई के चरणों में बैठकर एकलव्य की तरह ज्ञानार्जन में लीन हो जाऊँ । 

क्या कहते हैं आप सब…

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समीक्षा

हरिशंकर राढ़ी, नई दिल्ली, मो. : 09654030701

Email: hsrarhi@gmail॰com


बालूरेतवा : ग्राम्य-जीवन का बाइस्कोप

हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यासों की एक श्रेष्ठ शृंखला रही है और परंपरा भी । वैसे तो साहित्यिक विधाओं को अनेक उपविधाओं में सुविधा के लिए वर्गीकृत करने में कोई दोष नहीं है, किंतु जब उपविधाओं में वर्गीकरण कमतर या बेहतर साबित करने के लिए किया जा रहा हो, तब अटपटा या अनुचित लगना स्वाभाविक होता है । हिंदी उपन्यासों में ‘आंचलिकता’ का विभेद दोनों ही दृष्टियों से किया जाता रहा है । प्रश्न चाहे रेणु के ‘मैला आँचल’ का रहा हो, शिवप्रसाद सिंह के ‘अलग-अलग बैतरणी’ का रहा हो या रामदरश मिश्र के ‘पानी के प्राचीर’ का रहा हो । यह सच है कि आंचलिकता का बोध होने पर पृथक क्षेत्रों-प्रदेशों के पाठकों को कुछ शाब्दिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, किंतु ये कठिनाइयाँ इतनी बड़ी नहीं होतीं कि भाव-संप्रेषण या अर्थग्रहण में बहुत बड़ी समस्या पैदा करती हों । कथा चाहे किसी भी अंचल की हो, उसमें मानवीय संवेदनाएँ, सुख-दुख और जीवन-दर्शन कमोबेश एक जैसा ही रहता है । सकारात्मक पक्ष लिया जाए तो इससे सांस्कृतिक विवधिता के भी साक्षात्कार होते हैं । कहा जा सकता है कि भाषा के क्षेत्रबद्ध होने के कारण आंचलिक रचनाओं की पहुँच कुछ कम जरूर हो जाती है, किंतु ऐसी रचनाएँ अपने देश और काल को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबिंबित करती हैं । 

इस श्रेणी में अभी हाल में प्रताप गोपेंद्र का एक उपन्यास आया है ‘बालू रेतवा’ । पूरे उपन्यास से गुजरने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि यह उपन्यास बीसवीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक से आखिरी वर्षों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों की महागाथा है । कथन को दुहराया जाए तो भाषा एवं परिवेश के आधार पर भले ही यह उपन्यास क्षेत्रविशेष का दस्तावेज हो, संवेदना और जीवन शैली के आधार पर यह समूची हिंदी पट्टी को परावर्तित करता है । एक-एक घटना, निर्धनता के आयाम, सामाजिक जीवन, अशिक्षा के बीच जीवन से सीखने की प्रक्रिया और एक औरत का संघर्ष जैसे तत्त्व इस उपन्यास को पठनीय बनाते हैं । अपने लाख भौतिक विकास एवं शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद आज के सामाजिक क्षरण काल में यह उपन्यास अपने कथानक एवं चरित्रों के माध्यम से सीखने वालों को बहुत कुछ सिखा सकता है । एक दृष्टि से यह उपन्यास कम-से-कम आधी सदी की अवधि के भारतीय ग्रामीण जीवन का ऐसा चित्र खींचता है, जो सामाजिक इतिहास के अध्येताओं के लिए उपयोगी होगा । 

‘बालू रेतवा’ बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक में ठेठ गाँव में जन्मी एक स्त्री की जीवनगाथा है, जो उसके किशोरावस्था से अंतिम संस्कार तक के जीवन एवं संघर्षों को ठेठ देशी अंदाज में प्रस्तुत करता है । सच कहा जाए तो उपन्यास की मुख्य पात्र जीरिया के बहाने यह किसी प्रकार की नारेबाजी से दूर नारी विमर्श एवं नारी सशक्तीकरण की कहानी है । यह स्त्री संघर्ष एवं जिजीविषा का अनगाया गीत है, उसकी बहादुरी एवं सूझबूझ का दस्तावेज है । उपन्यास की नायिका जिरिया एक अशिक्षित-अदीक्षित, अभावग्रस्त ग्रामीण स्त्री है, जिसका स्त्रीत्व उसके किशोरावस्था से मृत्युपर्यंत उसके साथ सकारात्मक रूप में बना रहता है । सारांशतः कहा जाए तो जिरिया की कथा कोई गल्प नहीं, आधी सदी पहले भोगा गया हर ग्रामीण स्त्री एवं समाज का यथार्थ है । 

कथानायिका जिरिया के इर्द-गिर्द घूमती ‘बालू रेतवा’ की कथा प्रेमचंद की परंपरा को जीवित करती है । प्रेमचंद परंपरा से अलग इसे इस अर्थ में माना जा सकता है कि उपन्यासकार भावुक क्षणों के अतिरिक्त जिरिया को कहीं कमजोर नहीं होने देता । जिरिया ने कुछ अपने परिवेश से सीखा है, तो बहुत कुछ उसे जीवन के अभावों ने सिखाया है । ये वही अभाव हैं, जो पिछली सदी के मध्य एवं उत्तरार्ध तक उत्तर भारत के गाँवों के वैश्विक अभाव थे, सदाबहार थे । वह काल में शिक्षा, अन्न एवं धन की कमी, महामारियों एवं जातिप्रथा की शक्तियों से लड़ते हुए बीतता था । समय के लंबे वितान के तले ऐसी कथाएँ गाँव-गाँव में बिखरी रही होंगी, जिन्हें उपन्यासकार ने बहुत करीने से समेटा है । 

कथा का प्रांरभ बनारस के मणिकर्णिका घाट से होता है, जहाँ अंतिम संस्कार के लिए लाए गए अनगिन शवों में एक शव जिरिया का भी है । प्रारंभ से संकेत मिल जाता है कि यह किसी के लंबे और जद्दोजहद भरे व्यक्तित्व की जीवनगाथा होगी । श्मशान घाट के रेखांकन से कथा में उत्सुकता पैदा हो जाती है, जो अपनी साधारणता के बावजूद अंत तक बनी रहती है । शवदाह के समय उपस्थित होने वाले चित्र, डोमराज का शब्दचित्र एवं अंततः मुखाग्नि के बाद उपजी करुणा के बीच पूर्वदीप्ति (फ्लैश बैक) के माध्यम से जीरिया के जीवन की कहानी शुरू हो जाती है, जो अपने साथ-साथ तत्कालीन परिवेश एवं समाज को लपेटती हुई चलती है । जिरिया के पुत्र श्रीपत की स्मृतियों के गवाक्ष से कथा दिखने लग जाती है । 

कहानी जिरिया के गाँव बगहिया से प्रारंभ होती है । अहीरों के परिवार में जन्मी वह एक अल्हड़ किशारी है, जिसकी उम्र का चढ़ाव उसे अभावों की भनक नहीं लगने देता । एक स्वछंद हिरणी की भाँति वह अपनी समवय सखी बरता के साथ उछलती-कूदती कुँवर नदी की ओर चली जाती है । कुँवर नदी उसकी जान है । वह कुँवर नदी की रेत में लोटती-पोटती है, बैठती है और बरता के साथ जीवन जीती है । उसके लिए कुँवर का अस्तित्व उतना ही अपरिहार्य है, जितना रानी रूपमती के लिए नर्मदा का । उसी में कपड़े धोना, नहाना और तैरना उसके जीवन का अभिन्न अंग है । कथा का भौगोलिक विस्तार जिरिया के मायके ‘बगहिया’ से लेकर ससुराल ‘पुरवा ’तक है । बीच में कुँवर बार-बार आती है, मानो वह उसके जीवन के पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध को जोड़ने वाली सेतु हो । उसे कुँवर से इतना आत्मिक लगाव है कि उसके जीवन का अंत भी कुँवर के आँचल में ही होता है । 

उपन्यास की कथा एवं परिवेश निस्संदेह लेखक का अपना परिवेश है । लेखक प्रताप गोपंेद्र आजमगढ़ के मूल निवासी हैं और उपन्यास के परिवेश को देखते हुए यह मान लेने में संकोच नहीं होना चाहिए कि पूरा कथानक उनके गाँव या आसपास का होगा । यह तो नहीं कहा जा सकता कि उपन्यास में वर्णित बगहिया और पुरवा का वास्तविक अस्तित्व है या नहीं, किंतु कुँवर आजमगढ़ की प्रमुख नदी है । यह भी सच है कि कुँवर के आसपास के निवासियों में कुँवर से मातृवत् जुड़ाव है । बगहिया और पुरवा इसी नाम से अस्तित्व में न भी हों, तो भी ऐसे बगहिया और पुरवा वहाँ न जाने कितने होंगे । 

‘बालू रेतवा’ की कहानी किसी युग के जन-जन की कहानी है । पिछली सदी के मध्य के ग्रामीण परिवेश में जन्मे सर्वहारा वर्ग की कहानी है । देखा जाए तो कहानी में न कोई विशेष मोड़ है, न नाटकीयता । किंतु यही इस कथानक की विशेषता है । लेखक ने कथा का ताना-बाना जिस सूक्ष्म निरीक्षण एवं संवेदना से बुना है, वही इसे एक पठनीय उपन्यास बना देता है । जिरिया के बहाने ग्रामीण अंचल की एक किशोरी का नवविवाहिता, प्रौढ़ा एवं अंततः उपेक्षित वृद्धा में यथाकालिक परिवर्तन एवं उसके मनोविज्ञान का सूक्ष्म चित्रण करता हुआ वह एक कालखंड को उकेर देता है । 

जिरिया का विवाह परंपरानुसार बहुत कम उम्र में हो जाता है और युवावस्था की दहलीज पर पाँव रखते ही गौना हो जाता है । अब तक वह अपनी सखी बरता के साथ कुँवर नदी के तट पर रेत में बैठी अठखेलियाँ करती है, नदी में कपड़े धुलती है । गौने का दिन पड़ते ही उसे अपनी उम्र का एहसास हो जाता है । नियत तारीख पर गौने जाती है । उसके पति नंदू एक गँवई कसरती भोले-भाले नौजवान हैं । मायके की अपेक्षा उसकी ससुराल ‘पुरवा’ के लोग कम हैसियत के हैं, या यह भी कह सकते हैं कि लगभग गरीब हैं । एक बड़ी ननद है, जो अपनी ससुराल के बजाय प्रायः पुरवा में पड़ी रहती है । छोटी ननद से जिरिया की खूब छनती है । समय के साथ वह एक लड़की लक्ष्मी की माँ बनती है । यहाँ तक का अंश सुखद है और बड़े मजे में चलता है । 

घर में भयानक अर्थाभाव है । दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है । यहाँ उपन्यास के काल का स्पष्ट संकेत मिल जाता है, जिसका अभी तक पाठक केवल अनुमान लगा सकता था । बंगाल की ओर मजदूरों की भारी कमी है । ठेकेदार युवकों को बहला-फुसलाकर, कमाई का लालच देकर बंगाल ले जा रहे हैं । नंदू भी तैयार हो जाते हैं । अब कथा करुणपक्ष प्रारंभ होता है । नंदू का वियोग तक तो फिर भी ठीक है, साल भर बाद नंदू के असमय मौत की खबर पूरा घर तोड़ जाती है । गाँव में सन्नाटा पसर जाता है । जिरिया के जीवन का वसंत रीत जाता है और संघर्ष की गाथा चल पड़ती है । कुछ दिनों बाद वह अपने देवर चंदू से विवाह करके उसी घर में फिर आ जाती है, जिसे अपने पति के गुजरने के बाद छोड़ गई थी । 

जिरिया धीरे-धीरे बिना नारी सशक्तीकरण का प्रतीक बनने लगती है । अपने घर की निर्धनता को दूर करने के लिए भैंस का दूध-दही मियाँने में बेचने लगती है, सूद पर पैसा चलाने लगती है और अंततः नाती-पोते वाली जिरिया अपने घर को समृद्ध कर जाती है । एक भारतीय किसान के पास जो कुछ होना चाहिए, उसके पास 

है । बेटे विकास की राह पर हैं । कानपुर में मकान है । लेकिन, जिरिया उपेक्षा का शिकार होकर, स्वाभिमान को प्राथमिकता देते हुए कुँवर नदी के बालूरेतवा में प्राणोत्सर्ग कर देती है । जैसे बालू रेतवा बोल पड़ता है । 

उपन्यास के कथानक पर अधिक बात न की जाए तो बेहतर होगा । उपन्यास की जान उसका कथानक नहीं, उसका ट्रीटमेंट है । समग्रता को संक्षेप में कहा जाए तो उपन्यासकार सूक्ष्म अवलोकन, मनोभावों के अध्ययन, परिस्थितियों को समझने, देश-काल से जुड़े रहने और संवेदनाओं की गहराई तक जाने में कुशल है । उसकी यही शक्ति एक अतिसाधारण कथा को विशिष्ट बना देता है । उसे किस्सागोई का तरीका मालूम है, उसमें गाँव की मिट्टी की पूरी गंध समाई हुई है । यदि इन तत्त्वों को निकाल दिया जाए या कम कर दिया जाए तो ‘बालू रेतवा’ रेत का टीलामात्र रह जाएगा । 

उपन्यास में जो तत्त्व रेखांकित किए जाने चाहिए, उनमें कारुणिक दृश्यों का चित्रांकन प्रमुख है । जिरिया के गौने का दिन लेकर उसके ससुर बगहिया जाते हैं । दिन रख दिया जाता है, ससुर वापस चले जाते हैं । लेकिन उनके जाते ही जिरिया की माँ और काका (पिता) जिस मनोवेदना को प्राप्त होते हैं वह द्रष्टव्य है; जिरिया के अस्तित्व और उससे अलग होने का एहसास बहुत गहरा है । एक दृश्य देखें - 

“फिर काका ने वहीं पाटी पर रखे माई केे बायें हाथ पर हाथ रखकर धीरे से दबाया- ‘घर केतना अकेला रह
 जाएगा । ’

माई ने काका की आँखों में आँखें डालीं, बोली कुछ नहीं । काका समझ गए, उन्होंने राख खुलझार कर नीचे दबी आग को हवा दे दी थी । ”

यह निःशब्द रुदन कोई संवेदनशील व्यक्ति ही समझ पाएगा । यहाँ तक कि जगह-जगह आए ‘हे राम!’ अपने आप में बहुत कुछ कह जाते हैं । ऐसा लगता है कि इन दो शब्दों में दुनियाभर का कारुणिक अर्थ भर दिया गया
है । भारतीय जनमानस में बेटी की बिदाई का दर्द अकथ है । कालिदास से लेकर आधुनिक युग तक के साहित्य में इससे कारुणिक प्रसंग आकस्मिक मृत्यु के अतिरिक्त शायद ही कुछ और होता हो । और, नंदू के मृत्यु का समाचार जब पुरवा में आता है तो जिरिया की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । वह कारुणिक माहौल जिसमें पूरा गाँव रो रहा है, कुछ सूझ नहीं रहा है, उसे लेखक ने पूरी शिद्दत से उतारा है । 

उपन्यास की दूसरी शक्ति उसकी स्थानीय भाषा है । वह पुरानी बोली, जो अब भोजपुरी क्षेत्र से भी लगभग उठान पर है । यद्यपि ठेठ भोजपुरी के शब्दों के बहुतायत प्रयोग से उपन्यास आंचलिकता की सीमा में बँधता है, किंतु यही इसकी शक्ति भी है । कहा जाए तो उचित होगा कि ‘बालू रेतवा’ काशिकी या भोजपुरी बोली के शब्दों का म्यूजियम है । न जाने ऐसे कितने शब्द प्रयोग किये गए हैं, जिन्हें पढ़कर बीता जमाना याद आ जाता है । वे शब्द भले ही क्षेत्रीय हों, किंतु भावों का जितना भार वे उठा सकते हैं, किसी परिष्कृत भाषा के शब्द में वह ताकत नहीं
है । बिटिहिनी, मतहाई, सैंकी, खैंचड़, दिठौनी एकादशी, घौदार, यहि गौं, रंड़हो-पुतहो, सुदेवस, फेंचकुर, पुलुई, नौहड़िया, दाढ़ीजार, गोड़ी, छरियाना, रीन्हना, ठौरिक, छछ्छा काल, बउरहिया जैसे न जाने कितने शब्द प्रसंगवश आते रहते हैं । 

उपन्यासकार को लोकसंस्कृति का पूरा ज्ञान है और वह उसका पूरा प्रयोग यथास्थान करता चलता है । तत्कालीन समाज में विवाह की रस्में, बरात का स्वागत, लवंडा नाच, परिछन, त्योहार, कड़ाह का चढ़ना, दसौनिहों का आना, भूत-प्रेत का अंधविश्वास, घर में महिलाओं की जचगी, सौर, वर्णव्यवस्था और बहुत कुछ उपन्यास में कथा के सूत्र में गुँथकर आता है और विस्तार देता है । यह भी कहना आवश्यक लगता है कि लोकगीत एवं पारंपरिक गीत लेखक की जुबान पर हैं । मस्ती, शृंगार, त्योहार से लेकर विरह के गीतों की उपस्थिति कथा को काल एवं समय से जोड़े रखने में बहुत सहायक है । यदि उपन्यास के शीर्षक की बात की जाए तो यह केवल कुँवर के बालू रेतवा से संबद्ध नहीं है । मणिकर्णिका घाट पर जिरिया का पार्थिव शरीर अग्नि को समर्पित है; श्रीपत श्मशान घाट पर बैठे अतीत में डूबे हुए हैं और उनके कानों में वहाँ का एक प्रचलित गीत गूँज जाता है- बालू रेतवा पे बँगला छवा दा किशोरी लाल, आवे लहर गंगा की । यह गीत काशीनाथ सिंह अपने उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में उद्धृत करते हैं । इसमें किंचित पाठभेद भी मिलता है, जिसमें ‘आवे लहर गंगा’ के बजाय ‘जमुना’ का प्रयोग है । भारतीय ग्राम्यलोक में नदियों को जीवन से जोड़कर रखा गया है । गंगा हों, जमुना हों या कोई अन्य नदी, उसे बालू रेतवा बहुत प्यारा है । उससे प्यारी सी शिकायत भी है- बालू रेतवा डगरिया चलब कइसे ?

दर्द के गीतों का अपना एक तिलिस्म होता है । प्रताप गोपेंद्र इस तिलिस्म को समझते हैं । जिरिया के गवने का दिन रखा गया है । माई दर्द की मारी हो गई है । वह जिरिया के चले जाने के बाद का दृश्य देखती है और गा उठती है- ‘बाबा निमिया क पेड़ जनि काटा, निबिया चिरैया बसेर!’ नंदू बंगाल चले जाते हैं । सालभर हो गए, कोई खबर नहीं आती । जिरिया को प्रीतम के अभाव की हूक उठती है और वह बड़े सीधे-सरल शब्दों में गा उठती है- ‘सुधिया आवेले बलमुआ के त खूब रोइला’ । अब इससे अधिक विरह बोधक भाव इससे सरल शब्दों में मिलना तो असंभव है । पूरे उपन्यास में, ऐसे न जाने कितने गीतों के मुखड़े भरे पड़ें हैं, जो लोक जीवन के धरोहर हैं । 

उपन्यास को रोचक बनाने एवं सही आकार देने में लेखक की वर्णन शैली का सबसे बड़ा हाथ है । वह किसी भी बात को पूरी तरह बताए बिना छोड़ता ही नहीं । उपन्यास से गुजरते हुए लगता है कि हम छह-सात दशक पहले के गाँव का चलता-फिरता चित्र देख रहे हैं । इसीलिए इस उपन्यास को ग्रामीण जीवन का बाइस्कोप कहना समीचीन जान पड़ता है । तमाम रस्मों, परंपराओं, अवसरों एवं कार्यों का वह जीवंत चित्र बनाता है । हाँ, कथा के उत्तरार्ध में कहीं-कहीं वर्णन सीमा का अतिक्रमण करता हुआ लगता है । उदाहरण के लिए जिरिया के प्रसव का प्रसंग न दिया जाता तो बेहतर होता । यहाँ वर्णन जुगुप्सा की हद तक चला जाता है । दूसरा प्रसंग नौटंकी नाच में लवंडा का तैयार होना और पार्ट खेले जाने का वर्णन सजीव होते हुए भी मुख्य कथा में बाधा पैदा करता हुआ लगता है । इससे कसावट में किंचित कमी आती है । 

‘बालू रेतवा’ केवल दर्शन ही नहीं प्रस्तुत करता, वह गाँवों की बदलती तसवीर भी दिखाता है । जिरिया का जीवन संग्राम उसका अकेले का नहीं है, और वह केवल अकेले के लिए नहीं लड़ रही । वह गरीबी, जातिवाद, पुरुष सत्ता, और रूढ़ियों से भी लड़ रही है । जातिवाद एवं सामंतवाद, जातियों में अपने से छोटी जाति से श्रेष्ठता का सर्वाधिक सशक्त रूप गाँवों में मिलता है । कड़ाह का रस कुत्ते द्वारा चाट लिया जाना स्वीकार्य है, किंतु दलित का छू जाना नहीं । मुसहरों का पत्तल चाटना संभवतः जाति आधारित समाज का सबसे वीभत्स चेहरा है और पूरे समाज के विरोध के बावजूद जिरिया का मुसहरों को पंक्ति में बिठाकर, परोसकर भोजन कराना जातिवाद के विरुद्ध क्रांति का बिगुल है । जिरिया उन नारियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो अन्याय के विरुद्ध अपने दम पर खड़ा होना जानती हैं । वे पली-बढ़ी भले ही बालू रेतवा पर हों, लेकिन उनके पैरों के नीचे की जमीन मजबूत होती जा रही है । 


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समीक्षा


समीक्षक : हरिशंकर राढ़ी, नई दिल्ली, मो. : 09654030701

Email: hsrarhi@gmail॰com

 डॉ. वीणा विज ‘उदित’,  जलंधर, मो. 96826 39631


मोह के धागे

साहित्य और लोक में किस्सागोई के कई दौर गुजरे हैं । समय के साथ कहानी की भाषा-शैली, कथ्य एवं उद्देश्यों में बड़े परिवर्तन देखे गए, किंतु मोटे तौर पर इन्हें दो खाँचों में रखा जा सकता है । एक तो नई कहानी से पहले का दौर, दूसरा नई कहानी का । लोक की कहानियों में भी परिवर्तन आया है, लेकिन उतना नहीं जितना साहित्य-लोक की कहानियों में । घटना और भाग्य से जुड़ी फतांसी कहानियों के बाद क्रमशः मनुष्य के जीवन की कशमकश, उसकी मानसिक स्थिति एवं विडंबनाओं का युग आया, जो अभी चल रहा है । देखा जाए तो कुछ कहानीकारों ने स्वयं को नई कहानी में पूरी तरह ढाल लिया, जबकि कुछ ने दोनों के बीच का रास्ता अपनाया । ऐसी कहानियों में वीणा विज ‘उदित’ की कहानियों को रखा जा सकता है । उनका कहानी संग्रह ‘मोह के धागे’ ऐसी ही कहानियों का प्रतिनिधित्व करता है । 

संग्रह में औसत लंबाई की कुल 18 कहानियाँ हैं, जो हमारे समय के समाज में पनपते अकेलेपन, टूटन और विचलन को शब्दांकित करती हैं । लेखिका ने आधुनिक समाज की व्यापक पड़ताल की है और अनेक संवेदनशील किंतु उपेक्षित मुद्दों को उठाया है । यहाँ दो बातें बोनस के तौर पर जोड़ी जा सकती हैं कि लेखिका ने नारीमन की कशमकश, उसकी पीड़ा और उसकी अतिरिक्त समस्याओं को बेहतर ढंग से पेश किया है । ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि एक नारी को नारी ही बेहतर समझेगी । दूसरी बात उसका भारतीय एवं पाश्चात्य जगत का अघोषित तुलनात्मक अध्ययन है । वीणा विज ‘उदित’ संयुक्त राज्य अमेरिका में रहती हैं, इसलिए पाश्चात्य पलायन, वहाँ की चमक-दमक और आंतरिक खोखलेपन को नजदीक से देख रही हैं । संस्कृतियों का अंतर, प्रवासी भारतीयों की पीढ़ियों में विदेश में अपनी संस्कृति बचाए रखने एवं आधुनिकता से सामंजस्य बनाए रखने की जद्दोजहद भी वे देख रही हैं । इसलिए ऐसे कथानक एवं परिवेश उनके इस कहानी संग्रह में बारंबार आवाजाही करते रहते हैं । 

पहली कहानी ‘मोह के धागे’, जिस पर पूरे संग्रह का नामकरण हुआ है, एक स्त्री के प्रेम और संवेदनाओं की मार्मिक कथा है । लेखिका ने इस कहानी में पूर्वदीप्ति, यादों और अनुभूतियों का सहारा लेकर ताना-बाना बुना है । कहीं-न-कहीं इसके कथानक में प्रेम की मीठी सर्द हवा चल रही है । कथानक बहुत विस्तृत नहीं है, किंतु जितना भी है, संवेदनशील है । प्रस्तुतीकरण की बात की जाए तो यह कहानी बहुत कसी हुई है । सच पूछा जाए तो यह संग्रह की सर्वोत्तम कहानी है । इससे कदाचित मिलती-जुलती कहानियाँ और भी हैं, लेकिन कहानी का जैसा ट्रीटमेंट इसमें है, वैसा दूसरी कहानियों में नहीं है । 

लेखिका का जीवन और कार्यक्षेत्र दो देशों में तो फैला ही है, अपने देश में भी वह अलग-अलग प्रदेशों में रह चुकी है । पंजाब, मध्यप्रदेश और कश्मीर से उसका निजी नाता रहा है तथा इन प्रदेशों में उसके जीवन का लंबा हिस्सा गुजरा है । इसका प्रभाव कहानियांे की भाषा, क्षेत्रीयता और मानव मन के अध्ययन की व्यापकता पर पड़ा है । बाकी चीजों को कुछ देर के लिए दरकिनार भी कर दिया जाए तो भाषा की चर्चा करनी पड़ेगी । संग्रह की कुछ कहानियों में मध्यप्रदेश की बुंदेली भाषा का प्रयोग बेधड़क मिलता है, जो प्रसंगानुकूल अच्छा ही नहीं लगता, बल्कि कहानियों की वास्तविक प्रतीति में सहायक है । बुंदेलखंड की भाषा का प्रयोग कहानी को जमीनी बनाता है । संग्रह की दूसरी कहानी ‘साझी’ में इस प्रकार की भाषा का प्रयोग बहुतायत में है । उदाहरण के लिए बिहारी बाबू का एक कथन उद्धृत किया जा सकता है - “हे सारदा मैया! हमार मोड़ी की रक्छा करौ!” इस छोटे से कथन में भाषा की पूरी आंचलिकता मौजूद है । 

अनेक कहानियों में लेखिका ने सामाजिक मुद्दे उठाए हैं । इसे यों भी कह सकते हैं कि कई पूर्वाग्रहों और कु-परंपराओं को मिटाना उसका उद्देश्य है । प्रकारांतर से वह समाज में सुधार का लक्ष्य लेकर चलती है । ‘ढलती साँझ’ में हमारे समाज में वृद्धाश्रम की आवश्यकता का मुद्दा उठाया गया है । निःसंदेह, वृद्धाश्रमों की आवश्यकता समाज के नैतिक पतन की ओर संकेत करती है । भौतिकवाद एवं अर्थप्रधानता के चलते आज की युवा संताने केवल अपने सुख-सुविधा एवं मनोरंजन को जीवन का लक्ष्य मानने लगी हैं । उन्हें अपने वृद्ध माता-पिता को साथ रखने में या उनके साथ रहने में कोई लाभ नजर नहीं आता । आज के दौर में माँ-बाप युवा पति-पत्नी के लिए बोझ हो गए हैं, क्योंकि उनको साथ रखने से उनकी जिम्मेदारियाँ ही नहीं बढ़तीं, अपितु उनकी स्वच्छंदता पर भी रोक लगती है । ‘ढलती साँझ’ कहानी में लेखिका का उद्देश्य तो निस्संदेह संवेदनाओं को उभारना रहा होगा, किंतु कहानी में कहानी कम, निबंध ज्यादा हो गया है । 

एक और कहानी ‘नन्हीं चीखें’ भ्रूणहत्या और कन्या भ्रूणहत्या के इर्द-गिर्द घूमती है । पुरुषवादी समाज में कन्याएँ सदियों तक अवांछित रही हैं । विज्ञान की प्रगति के साथ भ्रूण का लिंग निर्धारण संभव हो जाने से कन्या भ्रूणहत्या के मामले बढ़े हैं । सरकार द्वारा गर्भ में लिंग परीक्षण को गैरकानूनी घोषित कर देने के बावजूद कुछ डॉक्टर अधिक पैसे के लालच में लिंग परीक्षण करने से बाज नहीं आ रहे । यही नहीं, युवावस्था के जोश में असावधानी से यौन-संसर्ग करनेवाली युवतियाँ भी अनचाहे गर्भधारण का शिकार हो रही हैं और वे भी अंततः डॉक्टरों के लिए असीमित कमाई का माध्यम बन रही हैं । ‘नन्हीं चीखें’ की ऐसी ही डॉक्टर ऊर्जा गर्भपात से धन तो खूब कमाती है, किंतु अंततः वह पश्चात्ताप की अग्नि में जलने लगती है । यह कहानी भी बहुत अच्छी बन सकती थी, यदि इसमें उचित-अनुचित के निर्णय की बजाय केवल कहानी बुनी गई होती । 

विदेशी धरती पर बसे भारतीयों का यहाँ की धरती पर जितना भी मान-सम्मान हो, उन पर जितनी भी हसरत भरी दृष्टि हो, वे अपने स्तर पर वहाँ की धरती पर कम संत्रासों से नहीं गुजर रहे होते । जड़ों से कटे प्रवासी अपने एकांत और अकेलेपन के क्षणों को जैसे-तैसे काटते हैं । उसके लिए वे तरह-तरह के उपाय खोजते हैं, खुशियाँ टटोलते हैं, किंतु अंततः भौतिक समृद्धि के अतिरिक्त कुछ नहीं पाते । देखा जाए तो यही कथ्य ‘तीन चौक्के’ कहानी में प्रस्तुत किया गया है । सप्ताहांत में किटी पार्टियों, वाइन के गिलास, श्लील-अश्लील लतीफों के सहारे जीवन सुखमय नहीं होता और न विकृत यौन संबंधों से प्यार उत्पन्न होता है । अमेरिकी धरती पर घटने वाली इस कहानी में अनु, आयशा, डॉ पैम, राजन, बिन्नी जैसे चरित्र फिसलते जीवन चरित्र के प्रतिनिधि हैं । 

‘हथेली पर सूरज’ कहानी असंगत और अनुचित विवाह के व्यूह में फँसे युवक-युवती की कहानी है । इसमें पुरुष के पाखंड, प्रेम विवाह एवं व्यवस्थापित विवाह के बीच की जद्दोजहद, लड़के के पिता की पुरातन सोच और पति की नपुंसकता का कारक स्थिति को और अधिक जटिल कर देता है । कहना न होगा कि यह एक जटिल समस्या है और हमारा समाज इसके संक्रमणाकाल से गुजर रहा है । कहानी की स्त्री चरित्र अमिता समाज के ऐसी ही पितृसत्तात्मक सोच की शिकार है । न जाने कितनी महिलाएँ ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रही हैं । यह कहानी एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, किंतु अपने ट्रीटमंेट में कहीं-न-कहीं विफल हो जाने से कहानी कमतर रह जाती है । वस्तुतः कहानी का मर्म अच्छा है, स्त्री विमर्श केंद्र में है, नारी की जागृत वेदना है, किंतु कहानी का घटनाक्रम अपूर्ण है । घटनाओं की कड़ियाँ ठीक से नहीं जुड़तीं और कुछ छूटा हुआ-सा लगता है । 

‘बालू भित्तिका’, ‘टीके वाली’, ‘एक और गुनाहों का देवता’, ‘कलफ लगी साड़ी’ आदि कहानियाँ भी अपने विषय को ठीक से उठाती हैं । वे किसी न किसी मुद्दे को रेखांकित करती हैं और जगाती हैं । लेखिका का अध्ययन और अनुभव व्यापक है । उसने साहित्य और मनोविज्ञान का अध्ययन किया है तथा जीवन को कई परतों में देखा है । भाषाओं-बोलियों की विविधता और शब्दभंडार उसके पास है । इन सबका उसने अच्छा प्रयोग भी किया है । संग्रह की कहानियाँ दुनिया के कई दृश्य दिखाती हैं तथा पाठक को सोचने पर विवश करती हैं । वे संकेत कर जाती हैं कि हमारी दुनिया में जो कुछ हो रहा है, वह बहुत अच्छा नहीं है । एक विशेषता और दिखती है कि कथाकारा ने किसी भी कहानी को जबरदस्ती सुखांत बनाने की कोशिश नहीं की है । अर्थात् जो जैसा है, वैसा ही दिखा दिया है । यह बात अलग है कि कई प्रसंगों में चरित्रों को विचलन का दंड मिलता हुआ दिखाई देता है । 

नई और साहित्यिक कहानी के अनेक कारकों के मौजूद होने के बावजूद सभी कहानियाँ पूरी तरह साहित्यिक श्रेणी में नहीं खड़ी हो पातीं । आज के दौर में कहानी का उद्देश्य केवल शिक्षा देकर या सुखांत करके खुश कर देना नहीं है । साहित्यिक कहानियों का एक प्रमुख कारक भाषा और साहित्य का संस्कार देना भी है । कहानी ऐसी हो जो पाठक को रुककर सोचने-मथने को विवश कर दे । इसके लिए भाषा और मनोविज्ञान का समन्वय आवश्यक होता है । रचना वही है जो स्वयं बहती जाए । इस संग्रह में भाषा का कथ्य एवं मनोविज्ञान से समन्वय कमजोर दिखता है, अन्यथा अपने विषय एवं मर्म के आधार पर यह संग्रह अविस्मरणीय बन सकता था । एक सजग कथाकार इस बात का पूरा ध्यान देता है कि उसका कथन एवं प्रस्तुतीकरण प्रवचन की श्रेणी में न आ जाए । साहित्यिक कहानियों का पाठक प्रबुद्ध और सतर्क होता है, वह उपदेश एवं प्रवचन जैसी शैली से दूर रहना चाहता है । 

कहीं-कहीं लेखिका विधा के अनुसार ठीक निर्णय नहीं ले पाती कि क्या कहना चाहिए और क्या नहीं । ‘कलफ लगी साड़ी’ के प्रथम अनुच्छेद में वह संचालिका की भूमिका में आ जाती है, जो कि कहानी के लिए अवांछित है । वह कहती है- “खैर, इसी बात पर ‘कलफ’ अर्थात् सुरक्षा कवच लगी साड़ी पर प्रस्तुत है यह प्रतीकात्मक कहानी! कुछ बताने का मन है । यह उन्हीं दिनों की बात है । ” सच पूछा जाए तो रचनाकार को शब्दों के मामले में एक सीमा तक कंजूस नहीं तो मितव्ययी जरूर होना चाहिए । वीणा विज इस मामले में कई जगह अपव्ययी लगती
हैं । वे तमाम स्थलों पर संवादों एवं कथनों के अर्थ, अनुवाद बताती चलती हैं और कई जगह कोष्ठकों का प्रयोग करती हैं । ये कारक निबंधों में स्वीकार्य हैं, कहानी में नहीं । 

संग्रह की कहानियों में भाषायी संक्रमण प्रभावी है । संभवतः यह लेखिका के अधिक समय तक अमेरिका में रहने का दुष्प्रभाव हो सकता है । कई कहानियों में लेखिका ने अंगरेजी के शब्दों का प्रयोग बहुतायत में किया है, धड़ल्ले से किया है । अंगरेजी शब्दों का प्रयोग आजकल सामान्य है, खासकर वहाँ, जहाँ उसके हिंदी विकल्प या तो मौजूद नहीं हैं या हैं भी तो बहुत कठिन या मज़ाक के स्तर के । इस संग्रह की समस्या उन अंगरेजी शब्दों को ज्यों-का-त्यों रोमन लिपि में लिख देना । ऐसे बारंबार के प्रयोग इसे कहानी के बजाय किसी तकनीकी विषय का निबंध बना रहे हैं । इसके आगे चलते हैं तो प्रूफ की गलतियों ने इस संग्रह को गंभीर बनने ही नहीं दिया है । कहीं-कहीं तो एक पृष्ठ पर बीसों गलतियाँ हैं । विराम चिह्नों की बातें तो छोड़ दें, शब्दों की वर्तनी को पूरी तरह उपेक्षित किया गया है । किसी साहित्यिक कृति को यदि इतने हलके तरीके से छापा जाएगा तो उसमें गंभीरता कहाँ से आएगी । हाँ, पुस्तक की छपाई, कागज और कवर बहुत ही अच्छा है । 

कहना होगा कि ज्वलंत सामाजिक मुद्दों, सशक्त पात्रों, मनोभावों की समझ, विषय की विविधता और संवेदनशीलता के बावजूद यदि संग्रह में एक सशक्त साहित्यिक कृति नहीं बन सकी है तो उसके पीछे तकनीकी कमियाँ, कहानी का ट्रीटमेंट और छपाई की उदासीनता है । यदि लेखिका इन पर सतर्क हो जाए तो निःसंदेह उसकी आने वाली कृतियाँ व्यापक प्रभाव छोड़ पाने में समर्थ होंगी ।  (21 अप्रैल, 2024) 

पुस्तक का नाम : मोह के धागे (कहानी संग्रह) / लेखिका : वीणा विज ‘उदित’ / प्रकाशक : बिंब - प्रतिबिंब प्रकाशन / फगवाड़ा, पंजाब / पृष्ठ : 125 मूल्य : रु 225/-


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पत्र

डॉ. वीणा विज 'उदित', जलंधर, मो. 96826 39631


कश्मीर में शुभ संकेत 

मई -जून दोनों महीनों में मैं कश्मीर में हूं हमेशा की तरह । वादी की हवाओं और फिजाओं में जो अम्नो- चैन की बयार बह रही है, उससे चारों ओर शुभ संकेत आ रहे हैं । लोगों के चेहरों पर उल्लास है, संतुष्टि है, उत्साह है । 

यदि आप पर्यटन संबंधी समाचार और रिपोर्ट्स की सुर्खियां पढ़ते हैं तो सैलानियों की भीड़ से आपको विश्वास होता होगा कि कश्मीर अब शांतिपूर्ण और खुशहाल स्थल बन गया है । उग्रवादियों की समस्या पूर्ण रूपेण समाप्त हो गई है 2019 में भारत सरकार द्वारा जम्मू और कश्मीर को भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य के रूप में विशेष दर्जा दिए जाने के बाद से कोई समस्या नहीं बची है । दिल्ली से इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया है भारत इसके बुनियादी ढांचे में लाखों का निवेश करके विकास ला रहा है । परंपरागत रूप से पर्यटक इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है । प्राकृतिक सुंदरता ऐसी संपदा है जो जाति धर्म से ऊपर उठकर लोगों को आकर्षित करती है । तभी तो कहते हैं-

" धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है । "...

‌‌शासन की ओर से अनुच्छेद या धारा 370 को निरस्त करने से लोगों में आत्मविश्वास जाग गया है । जो कहते थे धारा 370 को हिलाया भी गया तो यहां खून की नदियां बह जाएगी आज वह बहुत प्रसन्न हैं । इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ा है । इसे ऐसे ही हौव्वा बनाया हुआ था । महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्यटन विभाग द्वारा विदेशी पर्यटकों की संख्या में 700% की वृद्धि दर्ज की गई है । इसी तरह भारतीय पर्यटक तीर्थ यात्री हैं जो हिंदू पौराणिक कथाओं से जुड़े प्राचीन धार्मिक स्थलों की तीर्थ यात्रा करते हैं विशेष रूप से सत्ता में बीजेपी के होने से हिंदुत्व दर्शन के प्रभुत्व को मजबूत करने के लिए प्रमुख धार्मिक स्थलों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है । रेलगाड़ी से भी कश्मीर को जम्मू से जोड़ दिया गया है । रास्ते में आने वाले पहाड़ों नदियों को पुलों और सुरंगों से जोड़ दिया गया है । यह बहुत ही कठिन कार्य था जिसे पूर्ण किया गया । 

अभी पिछले महीने कश्मीर में 2023 में हुई G20 की बैठक में पर्यटन को बढ़ावा देने और फिल्म निर्माताओं को आकर्षित करने की योजनाओं की घोषणा की गई,यह पहल खूब सफल रही । पिछले महीने ही रोहित शेट्टी ने कश्मीर पर अनुच्छेद 370 हटाने के बारे में पहली फिल्म लाल चौक में शूट करी है उसका नाम है । "नए भारत का नया कश्मीर" जिसमें अजय देवगन और जैकी श्रॉफ हैं । लोगों का उत्साह देखते ही बनता था । 

खेलों को भी प्रोत्साहन दिया गया है । डल झील में नौकाओं की दौड़ पिछले वर्ष से आरंभ हो गई है । इसी प्रकार इंटरनेशनल शतरंज प्रतियोगिता भी 2022 से आरंभ हो गई है । डल झील में वॉटर स्कीइंग और गुलमर्ग में आईस स्केटिंग और स्कीइंग के नजारे भी दिखना शुरू हो गए हैं । पहलगाम में गोल्फ के टूर्नामेंट हो रहे हैं अब लोगों के हौसले बुलंद हो गए हैं । कोई पूछता है कि क्या पर्यटक के रूप में कश्मीर जाना सुरक्षित है तो उसका जवाब है ---"हां" । पर्यटकों को अब उग्रवादियों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है । पर्यटक अब कश्मीर में सुरक्षित हैं । वैसे आर्मी अभी भी कश्मीर घाटी में पूरी तरह तैनात है । कश्मीरियों में यह धारणा घर कर गई है कि आर्मी से वे भी सुरक्षित हैं । 

पिछले वर्ष सन 2023 से सारे कश्मीर की सड़कों के किनारे तिरंगे के रंगों की रोशनी से बिजली के खंबे चमकने लगे हैं यही अमृत महोत्सव है । श्रीनगर के लाल चौक में जहां कभी तिरंगा फहराना नामुमकिन था । अब वहां चौबीसों घंटे तिरंगा झंडा हवा में लहराता रहता है । 

उसके दामन में बैठने के लिए लाल चौक में बैंच बिछा दी गई हैं । लाल चौक की यह तस्वीर कभी किसी ने ख्वाब में भी नहीं सोची थी । श्रीनगर में तो इतनी भीड़ होने लगी है कि पर्यटक लोगों के कंधे एक दूसरे से टकराते हैं चलते हुए । जिन पर्यटकों को कश्मीरी लोग हेय दृष्टि से देखते थे, आज उनकी आव- भगत करते हैं!

कश्मीरी लोग बहुत प्रसन्न है कि उन्होंने इतना पैसा कमाया है जिसका सारी उम्र ख्याल ही नहीं किया था । जहां केवल गर्मियों में पर्यटक दिखते थे वहीं अब दो वर्षों से लगातार बारहों महीने सैलानी कश्मीर घूमने आ रहे हैं । विंटर स्पोर्ट्स भी खूब चलता है । पहलगाम में लोगों ने अपने घरों को होटल, पैलेस और गेस्ट हाउस में बदल दिया है तब भी सब होटल बुक रहते हैं । लोगों को ठहरने की जगह नहीं मिलती है । इंटरनेट का भी इस सबमें बड़ा हाथ है । इस समय सारी बुकिंग इंटरनेट से होती है । घोड़े वाले अब टैक्सी वाले भी बन गए हैं । 

 हवाई अड्डा भी भीड़ का अड्डा बन चुका है । लोगों के चेहरे खुशी से दमकते हैं । कश्मीरी मोदी की बहुत तारीफ करते हैं और खुले आम कहते हैं कि मोदी ने इतनी स्कीम्स निकाली है कि जिसने आज फायदा नहीं उठाया वह कभी तरक्की नहीं कर सकेगा । 

बाकी चुनाव का नतीजा आने पर कश्मीर की वास्तविक स्थिति का ज्ञान होगा इस बार पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए हैं भारी मतदान हुआ है । यह सब कश्मीर के लिए शुभ संकेत हैं । 

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पुस्तक समीक्षा


जसविन्दर कौर बिन्द्रा

नयी दिल्ली, मो. 9868182835, ईमेल- jasvinderkaurbindra@gmail.com 


ऐ वहशते-दिल क्या करूं (संस्मरणात्मक उपन्यास)

जीवन की सार्थक फिलसफी से रूबरू


लेखक - पारुल सिंह 

प्रकाश​क - शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, सीहोर मप्र 466001

प्रकाशन वर्ष - 2024

मूल्य- 300 रुपये, 

पृष्ठ संख्या - 234

पारुल सिंह मूलतः एक कवियित्री है, यह बात उसके पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाती है । ‘ऐ वहशते-दिल क्या करूं’ उसका प्रथम संस्मरणात्मक उपन्यास है । इस उपन्यास का विषय दिल की सर्जरी के समय और बाद में हस्पताल में बिताए कुछ दिनों का लेखा-जोखा है । मज़े की बात यह है कि इस उपन्यास का पात्र कोई काल्पनिक, पौराणिक, इतिहासिक, उत्तर-आधुनिक या किसी वाद-विमर्श के दायरे में से नहीं है । सच तो यह है कि ये ‘बाय वन गैट वन फ्री’ वाली स्थिति जैसा है, जिसमें लेखिका स्वयं ही केंद्रीय पात्र के रूप में बिराजमान है, हांड-मांस की जीती-जागती महिला । पहले हैरानी हुई कि सर्जरी संबंधी संस्मरणों में क्या लिखा होगा, सर्जरी से पहले की पीड़ा, बाद के कष्ट, दुख-तकलीफें..... । हस्पतालों का बुरा हाल, डाक्टर-नर्सों की भागमभाग, वहां फैली अव्यवस्था, गंदगी, कर्मचारियों की परिवारजनों व संबंधियों संग नुक्ताचीनी और सबसे बढ़ कर वहां का रुदन भरा माहौल व चिल्लम-पौं! हां, यदि यह कोई सरकारी हस्पताल होता तो उपरोक्त वर्णित सब कुछ होता परन्तु यह दक्षिणी का दिल्ली का एक प्रतिष्ठित हस्पताल है, जिसकी गुणवत्ता कई दशकों से बरकरार है, इसलिए ऐसा कुछ नहीं था । 

पारुल अपनी बीमारी की शुरूआत और उसकी मुख्य-मुख्य घटनाओं के द्वारा एक प्रकार से इस उपन्यास की भूमिका बांध देती है । नपे-तुले शब्दों में, मुख्य बात पर फोकस करती है । इससे अंदाजा हो जाता है कि लेखिका के पास रचनाशील कौशल है । उसे मालूम है, कहां उसे विस्तार देना है और कहां बात को संक्षेप में समेट देना है । वह ओपन हार्ट सर्जरी के बहाने, पाठकों के सामने अपने आप को खोल कर प्रस्तुत कर देती है । हार्ट की सर्जरी करते हुए, उसके डाक्टरों ने उसका हार्ट खोल कर, लीक हो रहे वाल्व को बदला और इधर लेखिका ने इस का फायदा उठाते हुए, सर्जरी के बाद आई.सी.यू और बाद में वार्ड के चंद दिनों के अनुभव साझा करते-करते, अपने जीवन, बचपन, स्कूल-कालेज व विवाहित जीवन की कुछ-कुछ टुकड़ियों को पाठकों सामने ‘लीक’ (उजागर) कर दिया । जिससे कुल मिलाकर जो तस्वीर बनी, उससे लेखिका के पारिवारिक चरित्रों के गृहिणी, पत्नी, माँ, लेखिका, बेटी, मित्र के विभिन्न रूपांे के साथ उसका व्यक्तित्व, स्वभाव, संवेदनशीलता और जीवन को जानने-समझने का नज़रिया सामने आया । 

लेखिका ने सर्जरी के लिए ओटी में जाने के साथ ही पाठकों को अपने साथ बांध लिया । एंथेसिया के प्रभाव में चेतनाशून्य होने से पहले उसने अवचेतन रूप से सारे हस्तपताल का चक्कर लगाया और लॉज में प्रतीक्षा में उदास बैठे मां-बाप और पति के साथ अनेक बातें कर, उन्हें दिलासा दिया । उसने अपने अंर्तमन से देख लिया कि उसके परिवारवाले किस स्थिति में वहां बैठे क्या सोच रहे होंगे । फिर उसने डाक्टरों के सामने समर्पण कर दिया ।

आई.सी.यू के उन दो-चार दिनों जिसे उसने मानसिक पर्यटन और ‘सोलो ट्रिप’ का नाम दिया । जहां उसके करने के लिए वैसे तो कोई काम नहीं था, वह पूरी तरह से डाक्टरों व नर्सें के साथ बहुत सारी टयूबों-नालियों व मशीनें के हवाले थी । उसका सदुपयोग उसने मानसिक पर्यटन करते हुए किया, जब उसके पास वक्त ही वक्त था । वह कुछ भी सोचने के लिए आज़ाद थी । उसकी सोच ने अपने पूरे जीवन को एक चक्र रूप में फिर से खंगाल लिया । हस्पताल में सभी ने उसकी पूरी देखभाल भी की परन्तु दो दिन बाद उससे कह दिया गया कि भई, डाक्टरों ने तुम्हें बचा लिया है, अब अपने आप को खुद संभालो । सारी उम्र डाक्टर व नर्सें उसके साथ-साथ नहीं रहेंगे । उसे स्वयं को मजबूत करने के लिए लंबी-लंबी सांसे लेना, भाप लेना, फिजियो थैरेपी के लिए उठना-बैठना पड़ेगा । इसमें न पानी पीने की इजाज़त थी और न बार-बार सोने की । अत्यन्त प्यास के समय उस आधे गिलास पानी की अहमीयत और बेसुध सो जाना बहतु बड़े सुखों में शुमार होने के बारे में पता लगा । 

रचना के केंद्र में लेखिका स्वयं अवश्य है परन्तु उसने आई.सी. यू. के अन्य सभी मरीजों की भी जानकारी, उनके दैनिक क्रिया-कलापों, उनकी बीमारी के बारे में भी बताया । छोटी-छोटी घटनाओं से, कुछ अस्पष्ट वाक्यों से उनके स्वभावों को भंाप लिया । डोरा सिंह या धोरा सिंह की हठधर्मिता, सुदेश जी का जीवन से एकदम किनारा कर लेना । एक युवक का सर्जरी से पहले घबरा जाना । इससे पता लगता है कि लेखिका कहीं भी, कभी भी स्व-केंद्रित स्वभाव की नहीं रही, तभी उसने न केवल आई.सी. यू के उस समय मौजूद मरीजों से पाठकों का परिचय करवाया बल्कि जब कभी भी अपने जीवन के किसी हिस्से को खोला तो उसमें मां-बाप के साथ, अध्यापक, प्रिंसीपल, सखियां, सीनियर सभी शामिल होते गए । लेखिका द्वारा खोली खिड़की से अनजाने में ही पाठकों को अस्सी के दशक के स्कूल-कालेजों की एक झलक मिल गई । कस्बेनुमा छोटे स्थान पर रहते हुए भी, डाक्टर पिता और दूरअंदेश मां के साये में, वह आत्म-विश्वास से लबरेज़ होती गई । हालांकि अपनी सोच से अधिक समझदारी दिखाते हुए उसने सखा मनोज के साथ सांसों को बचाने का एक नायाब तरीका भी खोज निकाला ताकि मृत्यु के समय अपनी आखिरी बात कहने पर उसे सांसों की कमी न हो, पर उसे मालूम नहीं था कि ये सांसे मृत्यु से बहुत पहले ही उसके साथ आंख-मिचौली खेलने लगेगी और इन्हें बचाए रखने के लिए उसे डाक्टरों के साथ स्वयं भी बहुत मेहनत करनी पड़ेगी । सर्जरी की शरीरिक पीड़ा से बचने के लिए उसे मर जाना बेहतर लगा, जो अच्छे डाक्टरों, चिकित्सीय देखभाल से संभव नहीं हो पाया । तभी तो पाठकों को इस संदेश का व्यावहारिक स्वरूप देखने को मिला कि ‘आत्मबल से मौत को भी हराया जा सकता है । ’ 

इसमें संदेह नहीं, लेखिका न केवल बहुत अच्छी ‘ऑब्ज़र्वर’ है बल्कि उसकी याददाशत भी अच्छी है । तभी स्वयं तकलीफ में होने के बावजूद उसने नर्सों, डाक्टरों, वार्ड ब्यॉज़, खाना पहुंचाने वाले कर्मचारियों और मरीज़ों का पल-पल का हिसाब रखा । वह अपने चेतन मन से जान पायी, नर्सों, डाक्टरों के पास अपने जीने के लिए वक्त नहीं । सारा समय एक टांग से दूसरी टांग पर वे सभी इधर-भागते रहते हैं । इसी भागमभाग के कारण डाक्टरों के लिए उनके मरीज़ ‘ऑब्जेक्ट’ बन कर रह जाते है । कुछ वाक्यों का इस्तेमाल केवल औपचारिकतावश किया जाता है । मरीज की ओर से उसके जवाब की प्रतीक्षा किए बिना आगे कदम पर बढ़ जाना, उनकी व्यवस्तता की निशानी है परन्तु किसी की भी गलती को न बख्शने वाली लेखिका ने अपने डाक्टर की अत्यन्त प्रशंसा करते हुए भी उसके स्वभाव के रुखेपन व डांट को नज़रअंदाज़ नहीं किया । शायद इसी कारण पुस्तक के फ्लैप में उनके प्रिय डाक्टर ने भी इस बात को स्वीकार किया कि उसे मरीजों के सामने और भी बेहतर ढंग से पेश आना चाहिए । कई बार मरीज की बेहतरी के लिए ही कुछ सख्ती बरतनी पड़ती है पर जैसे डा. अमिता हर हाल में मुस्कराहट का पल्ला नहीं छोड़ती, वही संगमा जैसी नर्स अवसर अनुसार शतरंज की चाल देती । हठधर्मी धोरा सिंह को भी उनकी छोटी सी नर्स कैसे नियंत्रित कर लेती थी और वह उसका हर कहा चुपचाप मान लेते थे । कामकाजी स्त्रियां के लिए नौकरी और गृहस्थी को संभालना कितना मुश्किल होता है । विडंबना यह है कि भारत में घर के सभी काम उसे ही निपटाने हैं, भले वह डाक्टर ही क्यों न हो । 

लेखिका और उसके पति का आपसी रिश्ता बहुत प्यारा सा है, दोनों बिना कहे एक-दूसरे को समझ लेते हैं । उनके आपसी रिश्ते द्वारा गृहस्थ जीवन की वास्तविकता सामने आती ही हैं कि पति-पत्नी के रूप में बहस और लड़ाई करना उनके अधिकार-क्षेत्र में आता है परन्तु जब वे मां-बाप की भूमिका में आते हैं तो वे एक अलग पार्टी न हो कर एक इकाई होते हैं । 

रचना की लेखन-शैली की बात करें तो वह अत्यन्त प्रभावित करती है । हर अध्याय एक शेयर से स्वागत करता दरवाजे पर खड़ा मिलता है । उसी से होकर पाठक उस अध्याय में प्रवेश करता है । बरगद की टहनियों व पत्तों से अपनी पसंद के एक-एक करके कई पुराने गीत उतार कर, वह अपने आप को उनमें डुबो लेने का हुनर जानती है । इन गीतों के चलते ही वह कालेज के होस्टल में भी सखियां बनाने में कामयाब हो गई थी । इसे उपन्यास कहा जाए....मैं सोच रही हूं क्योंकि कल्पनाशीलता तो कहीं भी नहीं है । यह संस्मरणात्मक रचना जरूर है । एकाध हफ्ते के अपने हस्पताली भ्रमण से लेखिका यह संदेश अवश्य देना चाहती है कि हमें किसलिए जीना है और क्यों ? क्या धोरा सिंह की तरह अपनी मर्ज़ी का जीवन जीने के लिए वह हस्पताल वालों से नाराज़ होना क्योंकि वह यहां से निकल कर, अपने मन की करना चाहता है । या लेखिका की तरह कि तकलीफें झेलने से अच्छा है, मर ही जाओ । पर नहीं, ये इतने डाक्टर, नर्सें, उनके परिवारजन, स्नेही उनका जीवन बचाने के लिए रात-दिन एक किए हुए हैं या अपनी उन दो बेटियों के लिए, जिनमें से एक को होस्टल में रखा है और छोटी को बहन के पास । अपने उन मां-बाप के बारे में सोचना, जो उसके दिल की हर बात को दूर बैठे ही महसूस कर लेते हैं । इसलिए कहने के लिए किसी भी व्यक्ति का जीवन उसका अपना होता है, परन्तु वह नितांत अकेला नहीं होता, उसके जीवन पर उसके स्नेहियों और परिवारजनों का भी उतना ही हक होता है । 

लेखिका अपने जीवन व बीमारी द्वारा पाठकों की जीवन की सार्थकता से पहचान करवाती है । आखिर ऐसे पल सभी के जीवन में कभी न कभी आते ही हैं, यह बात अलग है कि हर कोई इस मोहतरमा द्वारा इन्हें आनंद के पलों की तरह इन्जॉए भले न कर पाएं मगर जीवन की अहमीयत को तो अवश्य स्वीकार करेगा ही । 

लेखिका के चुलबुलेपन और मुस्कराहट के साथ, उसकी गंभीर सोच का स्वागत...!


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समीक्षा



सुधा जुगरान, देहरादून


संजीव जायसवाल ‘संजय’


सूर्य की अर्धांगनी हो तुम

प्रसिद्ध लेखिका आ. सुधा जुगरान जी ने मेरी नयी पुस्तक 'सूर्य की अर्धांगिनी हो तुम' की सशक्त व विस्तृत समीक्षा की है जिसके लिए हृदय से आभारी हूँ समीक्षा-सूर्य की अर्धांगनी हो तुम सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ : 

संजीव जायसवाल 'संजय' एक ऐसा नाम जिन्हें पसंद करने वाले पाठक आज देश में ही नहीं विदेश में भी हैं । उनकी कई पुस्तकें विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं । हर आयु वर्ग के पाठकों के दिलों पर राज करने वाले, अनेकानेक सम्मानित सम्मानों से अलंकृत सुप्रसिद्ध साहित्यकार संजीव जायसवाल 'संजय' जी की नवीनतम पुस्तक "सूर्य की अर्धांगनी” हो तुम जब हाथ में आई तो पढ़वा कर ही मानी । 

संजीव जी की रचनाएँ इतनी रोचक होती हैं कि उन्हें बच्चे तो क्या बड़े भी चाव से पढ़ लेते हैं । बच्चों जैसी भोली रचनाओं के साथ उनके तीखे कटाक्ष करते हास्य-व्यंग्य पढ़ने वाले को आश्चर्यचकित करते हैं । 

साथ ही वयस्क पाठकों के लिए सामाजिक समस्याओं पर लिखी उनकी कहानियाँ पाठकों को हैरत में डालती है क्योंकि वे वर्तमान समय में चल रही किसी भी समस्या को अपनी कहानियों में ढालने में सिद्धहस्त हैं । पुरुष होते हुए भी वे अपनी कलम से महिलाओं की समस्या व पक्ष को जितनी मजबूती से रखते हैं, वह उन्हें विशिष्ट बनाता है । प्रस्तुत संग्रह में भी उनकी कहानियाँ महिला अधिकारों व उनके समाजिक सरोकारों की लड़ाई लड़ती हुई दिखाई देती हैं । 

इसके अलावा संजीव की लिखी प्रेम कहानियां किसी भी युवा पाठक को उनका मुरीद बना देती है । यही कारण है कि समकालीन साहित्यकारों में संजीव जी का नाम विशेष रूप से लोकप्रिय हैं । 

स्त्री पुरुष के साथ अलग-अलग स्तरों पर कई रिश्तों को जीती है लेकिन पुरुष का स्त्री से कुछ रिश्तों को छोड़ एक भाव पर आधारित रहता है । जब किसी स्त्री पर उसकी चालबाज़ियाँ काम नहीं करती तो सबसे आसान होता है उसके चरित्र को कलंकित करना । ऐसी ही कहानी है "संबंध" के प्रोफेसर व उसके शिष्य राजन की । राजन जो वास्तव में उसका सहपाठी था । कुछ साल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के कारण शिक्षा के क्रम में गैप आने की वजह से वह एमएमएसी में उसका शिष्य बन बैठा । रजनी भ्रष्ट विभागाध्यक्ष के हाथ नहीं आई और उसने रजनी व राजन के संबंधों को सरे आम निलाम कर दिया पर कहते हैं न कि स्त्री जब खुद पर उतर जाती है तो उसके सामने कोई नहीं टिक सकता । अत्यंत सामयिक व लाजवाब अंत है कहानी का । 

स्त्री को सीढ़ी बना कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों का शगल होता है फिर चाहे वह स्त्री उनकी प्रेमिका ही क्यों न हो । इसी विषय पर आधारित है कहानी "सीढ़ी" । जिसमें नायक सोमन रेणुका से प्यार करने का नाटक कर अपने प्रमोशन के लिए अपने एमडी के साथ दो रात रहने का प्रस्ताव रखता है लेकिन समझदार रेणुका ऐसी चाल चलती है कि वह कहीं का नहीं रहता और एमडी को भी गलती का अहसास होता है । 

एक सरोगेट मदर की भावनाओं पर लिखी मार्मिक कहानी “मदर” । भले ही सरोगेट मदर की शुरुआत पैसों के लेन-देन से आरंभ होती है लेकिन बच्चे के आने की आहट सरोगेट मदर को रियल मदर की भावनात्मक मानसिक स्थिति में तब्दील कर देता है । लेकिन कहानी के अंत में सरोगेट मदर को तर्कसंगत निर्णय लेना ही पड़ता है । 

अगर स्त्री निडर होकर अपने पर उतर आए तो दरका हुआ शीशा उसकी इज्जत का नहीं अपितु दगाबाज पुरुष की बिखरती इज्जत,सपनों व परिवार के टूटे-फूटे अक्शों व करियर की बरबादी का हो सकता है । बस जरूरत है, बिना डरे गलत को गलत और सही को सही कहने की व समझने की । बेहद खूबसूरत व विचारणीय कहानी “अगर शीशा दरका तो” । 

नाम के अनुरूप ही पवित्र सी कहानी "पाकीजा” । कहानी कई स्तर पर अलग-अलग नजरिया पेश करती है । एक विदेशी नायिका रुखसार व भारतीय फौज के कैप्टन की सलज्ज व भीनी-भीनी सी प्रेम कहानी के बहाने आतंकवाद व आतंकवादी व उनके झांसे में आने वाले आम नागरिक, जिनके भावनात्मक पक्ष को ये भारतीय फौज की गलत तस्वीर पेश करके उनका मानसिक शोषण कर आंतक का साम्राज्य स्थापित करते हैं । रुखसार के साथ पुलिस चौकी में अनाचार होता है, वह आतंकियों के साथ देने लगती है । नायक उसे समझाते हुए कहता है 'जुल्म औरतों पर हो रहे हैं चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों । इसे किसी धर्म विशेष से जोड़ कर जेहाद की बात करना गलत है । तुम्हें जो वीडियो उन्होंने दिखाए हैं वे इसीलिए बनाए गये हैं । वरना कोई उनसे पूछे कि वे उस समय वहां कर क्या रहे थे' एक मधुर सी प्रेम कहानी जो जटिल समस्या पर आधारित है । साधुवाद । 

एक लड़की की इज्जत किसी ऐय्यास पुरुष के लिए मात्र मन बहलाव का साधन होता है और लड़की को कभी न भरने वाला नासूर बदले में मिल जाता है । लेकिन लड़की चुप बैठने के बजाय अपने साथ हुए अपराध का बदला अवश्य ले, साथ ही अपनी सामाजिक छवि भी बरकरार रखे । कहानी “इंतकाम" यह संकेत देती है ऐसा ही एक तरीका प्रस्तुत कहानी की नायिका भी अपनाती है जिससे असलियत किसी को पता नही चलती और नायक आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है । 

कॉलेजों में नये आए विधार्थियों की रैगिंग के नाम पर उनके साथ बदतमीज़ी करना और छोटी सी बात का आत्मसम्मान का प्रश्न बना तूल पकड़ना कई बार खौफनाक अनुभव दे देता है । ऐसी खबरे अखबारों की सुर्खियां भी बनती हैं । कई बार संवेदनशील विधार्थी इस स्थिति को ले नहीं पाता है और आत्महत्या कर लेता है । रैगिंग के लिए सख्त कानून बनने के बावजूद अपराधिक मनोवृत्ति वाले युवा क्षणिक मनोरंजन के लिए ऐसा कर गुजरते हैं जिसके परिणाम उनके खुद के लिए भी दुखदायी होते हैं । विशेषकर अगर रैगिंग की शिकार कोई लड़की बन जाती है तब बात छोटी कदापि नहीं रह जाती । प्रस्तुत कहानी "एंटी रैगिंग मिशन" में भी इंजीनियरिंग कॉलेज की एक ऐसी ही रैगिंग की घटना को चित्रित किया गया है । अत्यंत सामयिक रचना । 

शीर्षक कहानी “सूर्य की अर्धांगनी हो तुम" जो ह्रदय को झिंझोड़ कर रख देती है । क्या वास्तव में कोई खूबसूरत पत्नी अपने गुण संपन्न पति से संतान इसलिए नहीं चाहेगी क्यों कि वह काला व बदशक्ल है । लेकिन कहानियां भी इसी समाज से आती हैं और समाज में हर तरह के लोग होते हैं । कहानी की नायिका का विवाह अपनी खूबसूरती के कारण एक ऐसे अरबपति लड़के से हो जाता है जो देखने में काला व बदशक्ल है । वह उससे संतान नहीं चाहती क्योंकि संतान भी उसकी ही तरह होगी लेकिन सहेली का पति जिस तरह से उसका नजरिया बदलता है वह काबिले तारीफ है । व्यक्तिगत स्तर पर कहूँ तो पुरुष हो या स्त्री, सुंदर होकर गुणवान हों या ना हों लेकिन गुणवान स्त्री पुरुष हमेशा सुन्दर होते हैं और यही स्थायी सुन्दरता है । बेहद खूबसूरत कहानी । 

प्रत्येक कहानी की कथावस्तु तो उत्कृष्ट है ही अपितु भाषा शैली काव्यात्मक होने के कारण पाठकों को अगली कहानी पढ़ने के लिए विवश करती है । दृश्य चित्रण में तो संजीव जी को महारत हासिल है । संग्रह की अन्य कहानियाँ भी अपनी रोचकता, कथानक व भाषा शैली के कारण मन मस्तिष्क को बींधती है । आकर्षक कवर पेज के साथ पुस्तक अद्विक प्रकाशन से प्रकाशित हुई है । पेपर बैक में इसकी कीमत 180 रुपये है । मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक भी संजीव जी की अन्य पुस्तकों की ही तरह चर्चित होगी । इस सुंदर पुस्तक के लिए मैं संजीव जी को हार्दिक बधाई देती हूँ । 


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समीक्षा

समी, वीणा विज “उदित”, जलंधर, मो. 96826 39631

लेखक: डॉ. उमा त्रिलोक, मोहालीचंढ़ीगढ़, मो. 98111 56310


ध्वनि को अपनी सांसों में समेटे उमा त्रिलोक की जादू भरी स्मृतियाँ

छोटी-छोटी 57 भाव अभिव्यक्तियां काव्य रूप में पधार कर गदर मचा बैठी हैं । उमा जी की यह कविताएं "स्मृतियां" नाम से काव्य पुस्तक का रूप धरकर उनके दिल की धड़कन उनकी पुत्री को समर्पित हैं । 

सभ्या प्रकाशन से छपी यह पुस्तक भीतर बाहर रंगों से भरपूर सुसज्जित है । हर कविता के समक्ष कोई ना कोई चित्रकारी मन मोह लेती है । इसके लिए मैं प्रकाशक को बधाई देती हूं । 

शब्द को कितना रोका किंतु वह खामोशी में झंकृत हो गया । वहीं कोहरे की चादर ओढ़े सुबह दुबकी है । पेड़ पौधे शिकायत करते हुए से लगते हैं पर शोर नहीं करते । 'यह जरूरी तो नहीं'- बुकमार्क की भांति किताब में पड़े रहना ही काफी है बस एक दूजे के लिए होना बस होना ही बहुत है । 

"इन दर्द की कड़ियों में / यकीनन कोई साझेदारी है"

साझेदारी--में कितनी हैरानगी है कि कहीं मैंने भी अपनी कोई कड़ी इसमें जोड़ दी है!

सब ऋतुएं आईं,मगर चली गईं -लेकिन दर्द क्यों ठहर गया?

कवियित्री प्रकृति से सवाल करती लगती है । इसी तरह किसी निर्बल और बेबस के लिए न्याय मांगना और उसके लिए मन्नत मांगना एक हटके खयाल आया है । जबकि लोग तरह-तरह की मन्नतें मांगते रहते हैं । बिना बोले ही कर सकते हैं कुछ दूसरी बातें, अर्थात एक दूसरे के साथ बैठना ही बहुत होता है । 

यहां यही स्पष्ट हुआ है । 

इसी तरह खिड़की खोल दो, मत छूना बेल को जो स्नेही सपनों में खोई है । आस लगाए बैठी कभी मुस्कायी है तो कभी रोई है । 

प्रतीक्षा और मुलाकात इन में भी एक आस चल रही है । बरसात में भीगने पर एक गीत ओढ़ा ऐसा कि चिर प्रतीक्षा हो गई है । 

आहुति कविता में कन्या के जन्म का वही टंटा कि घर में मुसीबत आ गई, नारी विमर्श दृष्टिगत है । 

हो आना, एक बार--मंदिर के पिछवाड़े जो सपने बोए हैं उनमें एक उपवन खिला है । तुम वहां एक बार हो आना । इसी तरह क्यों, गीत, वह क्षण सभी कविताएं अपने में एक आस लिए ठुमक ठुमक कर चल रही हैं । 

कहीं बीत न जाए वसंत, बहुत सुंदर भाव लिए अनजाने प्रियतम को उलाहना दे रहे हैं कि देर ना करना कहीं वसंत ना बीत जाए, इंतजार में । 

“ निपट सकते हैं

बाहर की भीड़ से,

यदि भीतर सन्नाटा हो

शून्य का झरना बहता हो । "

तभी तो भीतर की भीड़, विचारों की भीड़ और द्वंद्वों की भीड़से निपटा जा सकता है । 

इसी तरह सड़क से अर्ज करना कि मुझे भी तेरी तरह चलना है यह जाने बिना कि मंजिल क्या होगी । 

अच्छा लगा पत्ते का अपना महत्व बताना फूल को कि मेरे बिन तुम कैसे पल सकते हो"मैं पत्ता हूं"में । 

इनकी टाइटल कविता "स्मृतियां" से मन भारी सा हो जाता है जब पता चलता है कि कुर्बानियों के साए में स्मृतियां संभाल कर रखी है उनसे मिलने के लिए । 

मैं स्त्री हूं--में लड़की को शादी के समय दी गई आशीषों में हिदायतें दी जाती हैं, सबको ज्ञात है लेकिन इसमें फिर नारी विमर्श दिखाई देता है । 

पीड़ा की परिभाषा, भी यही समेटे है । लॉकडाउन में इंसान और परिंदों की विवशता दृष्टिगोचर होती है । आशावाद लेकर चल रहे हैं सब । 

“वह'कविता भी ध्यान खींचती है जब यह पता चलता है कि जिसे हम ढूंढ रहे हैं वह है ही नही केवल ढूंढना ही रह जाता है । 

आज के जमाने और पुराने जमाने में कितना अंतर है यह रहने दो कविता से स्पष्ट है । जो एक टीस दे जाती है । 

कान्हा और राधा के प्यार को भी छेड़ दिया है । तभी तो सारे रंग सिमट आए हैं स्मृतियों में । 

दर्शनिकता का पुट भी दिखाई देता है 'हवा' कविता में!

चलते चलते एक पुकार है---'तुम आना'! अभी भी लेखिका का मन है कि मेरी लिखी अधूरी सतर को पूरा कर जाना । तुम आकर मुझसे सट कर बैठना और मैं उन लम्हात को अपने पहलू में समेट लूंगी । 

प्रेम रस में पगी उमा त्रिलोक की कविताएं गहन अनुभूतियों को समेटे हैं । कर्तव्य, उल्लास ,पीड़ा जैसे अंतर भावों को उकेरते हुए मौन से बाह्य की ओर अग्रसर होती हैं । 

इस काव्य संग्रह में नए भाव प्रकट करने के लिए बहुत-बहुत बधाई उमा जी को और साहित्य जगत में इसका स्वागत हो इसके लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं देती हूं । 

सप्रेम


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समीक्षा

समीक्षक: एकता अमित व्यास,  गाँधीधाम, कच्छ, गुजरात, मो. 9825205804

डॉ. संतोष श्रीवास्तव


कर्म से तपोवन तक : (कथा माधवी गालव की)

मेरा नाम एकता अमित व्यास है और मैं नमक के प्रदेश कच्छ की पुत्रवधू हूँ । यूँ तो संतोष जी से मेरा पहला परिचय मेरे जन्म के समय से है । कहने का तात्पर्य यह है कि हम दोनों को अपने जीवन की पहली ऑक्सीजन संस्कारधानी मिली थी, अर्थात हमारा जन्मस्थान जबलपुर है । 

दोनों के ही संस्कारों में जाबालि ऋषि और नर्मदा के जल का DNA है । किन्तु संतोष जी से मेरा सांसारिक परिचय इनके उपन्यास 'नागा साधु और उनकी रहस्यमय दुनिया' के माध्यम से हुआ था । पहले ही दूरभाष वार्तालाप पर इनसे एक ज़ोरदार डाँट मिली थी, जो आज तक मेरे कानों में गूंज रही है । डाँट की अधिक जानकारी चाहते हैं, तो अमीरन की भूमिका पढ़िएगा । और दरस परस तो आज पहली बार हुआ है । 

तो अब माधवी पर आते हैं । 

सबसे पहले मैं आप सभी को बताती चलूँ कि, न तो मैं समीक्षक हूँ, न मुझमें समीक्षा करने की समझ है और न ही सामर्थ्य । समीक्षा के नियमों से भी मैं अनजान हूँ । 

मैं ख़ालिस रूप से एक पाठक हूँ और पुस्तक पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया उतने ही जोश से सुनाती हूँ जितने जोश से, मैं बचपन में देसी फिल्म 'शोले' की कहानी सुनाया करती थी- “दूर से एक घोड़ा आ रहा है"

"तुम्हारा नाम क्या है बसंती” वग़ैरह वग़ैरह...

वैसे इन सब फ़ालतू की बातों का इस प्रतिक्रिया से कोई लेना देना नहीं है । मैं तो बस अपना डर भगा रही हूँ जो आप सब महानुभावों के सामने बोलने में महसूस हो रहा है । 

ख़ैर....

मुझे तो उपन्यास के नाम से ही दिक़्क़त है । अब आप कहेंगे- क्या दिक़्क़त है भाई? वैसे भी आपको क्या पता नाम कैसा होना चाहिए । तो मेरी समस्या ये है कि उपन्यास का नाम 'कर्म से तपोवन तक' कथा माधवी गालव की...

क्या वाक़ई में यह कथा माधवी के अलावा किसी और की भी हो सकती है? मेरे ख़याल में तो उपन्यास का नाम होना चाहिए 'कथा माधवी के शोषण की', ये सिर्फ़ मेरा विचार है । 

एक थी द्रौपदी, राजा द्रुपद की लाडली । राजा द्रुपद ने अपनी बिटिया को अपने फैसले लेने, यहाँ तक कि अपना वर खुद चुनने की स्वतंत्रता दी । उसे यह आत्मनिर्भरता दी और द्रौपदी ने चुना, मछली की आँख में निशाना लगाने वाले धनुर्धर अर्जुन को । लेकिन अपने सपनों के राजकुमार का हाथ पकड़कर जैसे ही वह अपनी ससुराल पहुँची, एक ग़लत वचन के चलते बिना उसकी मर्ज़ी के पाँच भाइयों में बाँटकर पांचाली बना दी गई । 

एक थी अहल्या, ऋषि गौतम की पत्नी । वह इतनी ख़ूबबसूरत थी कि तमाम देवताओं समेत देवराज इंद्र का मन उसे पाने को डोल उठा । इंद्र ने छल से ऋषि गौतम का रूप धरा और अहल्या के समीप पहुँच गए । इधर गौतम ऋषि ने यह देखा तो अहल्या को पाषाण हो जाने का शाप दे दिया । यानी एक पुरुष ने उसे छला, तो दूसरे ने बिना किसी ग़लती के सज़ा दे दी । 

द्रौपदी और अहल्या ही नहीं, ताउम्र पतिव्रता धर्म का पालन करने के बावजूद अग्नि परीक्षा के लिए मज़बूर हुई माता सीता से लेकर विवाह के तुरंत बाद पति से 14 साल का विक्षोह सहने वाली उर्मिला तक, हमारी पौराणिक कथाओं में ऐसी कई महिला पात्र मिलती हैं, जिनकी निष्ठा, कर्त्तव्य परायणता एवं त्याग का सही मोल नहीं किया गया । देखा जाए तो उनके साथ अन्याय ही हुआ । इन्हीं में से एक थी माधवी । उसके पिता ने अपनी दानशीलता साबित करने और अपना वचन पूरा करने के लिए उसकी मर्ज़ी के बिना ही गालव के हवाले कर
दिया । माधवी महाभारत काल की एक ऐसी भुला दी गई नायिका है, जिसके लिए उसका ताउम्र कुँवारी बने रहने का वरदान ही सबसे बड़ा शाप बन गया । 

माधवी पहले अपने पिता द्वारा एक पुरुष को सौंपी गई । फिर उस पुरुष द्वारा कई और पुरुषों को । फिर भी वह गूँगी गुड़िया क्यों बनी रही? उसके मन में क्या चल रहा था? उसने विरोध क्यों नहीं जताया? महाभारत की कई अन्य महिला पात्रों की तरह माधवी के नज़रिए को भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया है । उसका विद्रोह एकदम आखिर में तब दिखता है, जब वह अपने पिता को स्वयंवर के लिए मना कर देती है । 

लेकिन, लगातार कई पुरुषों द्वारा बेदी पर चढ़ाई गई माधवी की वेदना, उसकी कुर्बानी, उसके दर्द ने कई सुधि साहित्यकारों को झकझोरा और उन्होंने अपनी तरह से उसके साथ न्याय करने की कोशिश की । 

श्री मदन मणी दीक्षित

श्री विष्णु सखाराम खांडेकर (ज्ञानपीठ साहित्य अकेडमी पुरस्कार)

श्री सुधाकर शुक्ल

श्री विजया जहाँगीदार

इनमें से एक नाम है साहित्यकार भीष्म साहनी का, जिन्होंने 'माधवी' नामक एक नाटक लिखा और महाभारत की इस गूँगी गुड़िया को आवाज़ दी । उसे एक स्त्रीवादी नज़रिया दिया । यह नाटक स्त्री के शोषण और समाज में उसके दोयम दर्जे को समझने के कारणों की भी पड़ताल करता है । 

भीष्म साहनी की माधवी भले ही पितृसत्ता के तहत बोई गई स्त्री के त्याग और कर्त्तव्य पालन वाली सोच को मानकर पिता द्वारा चुने पुरुष गालव को अपना लेती है, पर वह गालव के सामने कई बार सवाल खड़े करती है । गालव की प्रतिज्ञा का टूल बनने के लिए तैयार होने के पीछे भी भीष्म साहनी माधवी को एक वजह देते हैं कि उसे गालव से प्रेम हो गया था और प्रेम की ख़ातिर तो एक स्त्री क्या कुछ नहीं कर जाती । इसलिए अपने प्यार को उसकी गुरु दक्षिणा से मुक्त कराने के लिए गालव का साथ देती है माधवी । 

हर्यश्व के दरबार में ज्योतिषी उसके आँख, जीभ, तालू, वक्ष, नितंब, हर अंग-प्रत्यंग की जाँच करता है कि क्या वाकई वह दिव्य गुणों वाली 

है । माधवी यह अपमान सहने से लेकर विश्वामित्र से गालव को गुरु दक्षिणा से मुक्त करने के बदले ख़ुद को स्वीकारने की याचना तक करती है । आखिर में वापस अनुष्ठान कर कौमार्य प्राप्त करने से इनकार कर देती है । 

वह स्वयंवर में गालव को चुनती है । उसे यकीन था कि गालव उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेगा । आखिर उसने सब कुछ गालव के लिए ही तो किया था । 

लेकिन गालव चार बच्चे को जन्म देकर कमजोर, अधेड़ और अनाकर्षक हो चुकी माधवी को अपनाने को तैयार नहीं होता । वह बार-बार माधवी को मनाता है कि वह अनुष्ठान करके फिर से कुमारी और सुंदरी बन जाए । लेकिन माधवी नहीं मानती; बल्कि गालव को ललकारती है-

"मुझे देखकर ठिठक क्यों गए गालव? मैं अब पहले जैसी माधवी तो नहीं हो सकती हूँ न । तुम किस माधवी के लिए छटपटाते रहते थे? मैं तुम्हारे लिए केवल निमित्त मात्र थी । मैं तुम्हें पहचानते हुए भी न पहचान पाई । ”

इस तरह भीष्म साहनी आखिर में माधवी को अपनी देह पर अधिकार देते हैं । भीष्म साहनी के अलावा कई और कलमकारों की नज़रें माधवी की इस कहानी पर रुकी हैं । लेखिका माधवी महादेवन ने अंत में सब कुछ त्याग कर जंगल में रहने वाली माधवी पर 'ब्राइड ऑफ द फॉरेस्ट' किताब लिखी । इसमें उन्होंने माधवी की कोख के मूल्य पर भी जोर दिया । वहीं कवि कुलदीप अपनी कविता में माधवी के साथ हुए अन्याय पर करारी चोट करते हैं । 

स्वयंवर के पाखंड को तोड़कर

अंत में मैंने

स्वयं का ही वरण किया

और तब मुझे लगा

कि

दूसरों की तरह मैं भी जीवित हूँ

इसके बावजूद, वास्तव में माधवी को सही मायने में न्याय शायद ही कभी मिल पाए । 

संतोष जी द्वारा लिखित उपन्यास 'कर्म से तपोवन तक' पढ़ने के दौरान बार-बार मेरे मन में एक ही सवाल उठता रहा- क्यों गूँगी गुड़िया बनी रही माधवी ?

पूरे घटनाक्रम में माधवी को अन्याय सहते हुए दिखाया गया; किन्तु वह शास्त्रार्थ करना भी जानती थी, यानी वह विदुषी है । जैसे कि वह कहती है-

“निरामिष होना न होना मनुष्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, लेकिन किसी के प्राण लेना मन बहलाव कैसे
हुआ । ”

वहीं दूसरी तरफ़ जब माधवी के पहले तीर से तेंदुए का शिकार हो जाता है, तो राजा गदगद हो उठते हैं । राजा तो पहले से ही...

और इस ख़बर ने माधवी को सौतेलेपन से निजात दिला दी और सभी रानियों ने माधवी का स्वागत गले लगाकर किया.....

वाक़ई बस इतना ही...

तो फिर उसका शोषण छोड़कर उसे पूरे मान सम्मान के साथ आज़ाद कर देते ना?

इतनी विषम परिस्थितियों के बाद भी माधवी ने अपने स्त्री सहज गुणों पर ज़रा भी आँच नहीं आने दी । यही तो विशेषता है नारी की कि ईश्वर ने उसे न जाने किन तत्वों से गढ़ा है, वह क्षण भर में अपनी पीड़ा भुलाकर दूसरों के हित के लिए तत्पर हो उठती है । माधवी ने सब कुछ भुलाकर गालव के प्रति उमड़े प्रेम से भर उठी । (पेज नंबर 25)

संतोष जी ने अपनी लेखनी में हमेशा नायिकाओं को हज़ारों गुणों से नवाज़ा है, जिनमें से एक है धैर्य । जैसे कि वह पेज नंबर 35 पर गालव से कहती है- “समय व्यर्थ नहीं जाता समय हमेशा मूल्यवान होता है, अपना मूल्य देखकर ही बीतता है । ”

उपन्यास में आदिकाल से चले आ रहे पुरुष के प्रपंच और उसकी ओछी मानसिकता का उदाहरण देते हुए लेखिका लिखती हैं- “माधवी तुम सोच रही होगी कि मैं कितना असंयमी और कठोर हूँ । क्या करूँ पुत्र सुख से वंचित हृदय की पीड़ा से ऐसा हो गया हूँ, तुम्हारे साथ रहकर सुधर जाऊँगा । ”

क्या वाक़ई जिसके राजनिवास में पहले से ही रूपवती-गुणवती रानियाँ भरी पड़ी हैं, वह राजा एक और माधवी के आने से सुधर जाएगा । 

आज भी यह मानसिकता कहीं कहीं देखने को मिल जाती है जैसे स्त्री ना हुई कोई सुधार केंद्र हो गया । 

कहानी का सबसे रोचक भाग मेरे लिए वह है जहाँ विश्वामित्र माधवी से कहते हैं-

"यह बताओ माधवी, क्या तुमने स्वयं को मान-सम्मान दिया । ”

और यहीं पर असली प्रश्न समाज के सामने खड़ा हो जाता है कि क्या आज की स्त्री ख़ुद का मान-सम्मान कर पाती है । कहीं-कहीं अत्याधिक स्वतंत्रता के चलते वह अपने स्त्री सहज गुणों को भी नकार देती है । और फिर विश्वामित्र के द्वारा वही बात कह दी गई जो हम सालों से सुनते चले आ रहे थे- "तुम कितने भी तर्क दो माधवी; किन्तु तुम अपनी दुर्दशा की स्वयं दोषी हो । ”

पर मेरा प्रश्न यहाँ उपस्थित सभी गुणीजनों से है कि हम सदा से सुनते आ रहे हैं कि भाग्य से अधिक कुछ भी नहीं है । फिर क्यों उन राजाओं ने अपने भाग्य को पलटने के लिए माधवी से पुत्र उत्पन्न किए?

क्या पुत्र अधिक ज़रूरी है या नीति अनीति?

यदि स्त्री किसी पर-पुरुष के साथ ग़लत है, तो पुरुष भी पर-स्त्री के साथ ग़लत ही होगा, चाहे काल कोई भी क्यों न हो, महाभारत का काल हो या 2024 का । 

इस प्रश्न को मैं बार-बार ख़ुद से पूछती हूँ कि क्या एक मात्र माधवी ही विकल्प थी? और भी तो कई विकल्प हो सकते थे । एक तरफ़ माधवी सक्षम थी तो दूसरी तरफ़ इतनी मजबूर क्यों और कैसे?

कभी-कभी मुझे लगता है कि क्या लेखिका यहाँ एक नई माधवी नहीं गढ़ सकती थी, जो विरोध करती अपने पिता का और अन्य व्यवस्थाओं का । हो सकता है मेरी ये सब बातें कोरी कल्पना मात्र हो या फिर नवोदित पाठिका की दुष्टता का परिणाम, पर मैंने आपसे पहले ही कहा है मैं समीक्षक नहीं, न तो मेरी समीक्षा करने की सामर्थ्य है और न ही समझ । मैं तो बस एक पाठक हूँ और ये सारी पाठक की जिज्ञासाएँ मात्र हैं । इस पुस्तक ने मेरे विचारों में खलबली मचा दी, मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया और उसी खलबली का परिणाम है कि नज़र लगाए बैठी रही कि लेखिका एक और उपन्यास लिखें जिसमें नई माधवी हो । सुदृढ़ और सक्षम मज़बूत माधवी हो जो अपने ज्ञान का प्रयोग न सिर्फ़ अपने लिए बल्कि समाज के लिए भी करना जानती हो; क्योंकि ज्ञानी तो वह पहले से ही है । 

तथास्तु!!!                                                                                 



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रिपोर्ट   

रश्मि रमानी को साहित्य संवर्धन पुरस्कार

सिंधी भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति को समर्पित संस्था अखिल भारत सिंधी बोली एं साहित सभा, नई दिल्ली द्वारा स्टेट प्रेस क्लब, गांधी हॉल इंदौर में आयोजित वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में द्विभाषी कवियित्री एवं अनुवादक वरिष्ठ साहित्यकार, रश्मि रमानी को साहित्य संवर्धन पुरस्कार से पुरस्कृत किया
गया । इस अवसर पर उन्हें पुरस्कार स्वरूप 50 हज़ार रूपये की सम्मान राशि शॉल एवं सम्मान पत्र प्रदान किया गया । साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सिंधी परामर्श मंडल की सदस्य, अनेक पुरस्कारों से सम्मानित रश्मि रमानी की कविता, अनुवाद और आलोचना की 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । इंदौर के लोकसभा सांसद शंकर लालवानी एवं टीम इंडिया के प्रख्यात क्रिकेटर नरेंद्र हिरवानी ने देश की आठ विभूतियों को इस समारोह में पुरस्कृत किया । 

अभिनव इमरोज़ परिवार की ओर से रश्मि रमानी जी को बहुत बहुत बधाई


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समीक्षा




त्रिवेणी प्रसाद दूबे ‘मनीष’

डॉ. सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’


च्यवन चरित- एक पौराणिक पुरोधा के अनुपम चरित्र को रेखांकित करता अनूठा महाकाव्य

च्यवन चरित हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकार डॉ.सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’ द्वारा पौराणिक काल के च्यवन ऋषि के चरित्र पर रचित महाकाव्य है । यह इनका तीसरा महाकाव्य है । इसके पूर्व इनके दो महाकाव्य नामत: ‘भारतीयम्’ और ‘मख क्षेत्रे मनोरमा’ प्रकाशित हो चुकें । अब तक इनकी कुल अठारह कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं । 

डॉ.सत्यदेव एक अनवरत छंद साधक हैं । इसके अतिरिक्त उनका स्वभाव एवं आचार शोधी तथा भ्रमणशील है । इस स्वभाव के कारण वे निरंतर नवीन विषयों पर शोधात्मक सृजन में रत रहते हैं । उनका अद्यतन महाकाव्य ‘च्यवन चरित’ उनके इसी विशेष आचार का साहित्यिक उत्पाद है । जिस पौराणिक ऋषि के सम्बन्ध में अधिकांश लोग एक छोटा सा प्रस्तर भी कठिनाई से लिख पायेंगे उस पर एक महाकाव्य का सृजन डॉ.सत्यदेव के अद्वितीय साहित्यिक कौशल का परिचायक है । 

‘च्यवन चरित’ महाकाव्य में कुल त्रयोदश सर्ग हैं । इसका प्रारम्भ मंगलाचरण सर्ग से होता है । इस सर्ग में महाकवि द्वारा ब्रह्म, उनकी आह्लादिनी शक्ति, गणपति, वाणी, गंगा, सरयू, कावेरी, हनुमान, व्यास, वाल्मीकि,पाराशरादि ऋषियों तथा वेद-पुराण-आर्षग्रंथों की वंदना की गयी है । पुरुषोत्तम श्रीराम पर रचित निम्न गंगोदक छन्द विशेष अवलोकनीय है:

“राम आदर्श राजा, पिता पुत्र हैं,

बंधु हैं धर्य औ’ शान्ति का रूप हैं । 

शक्ति औ’ शील सौन्दर्य व्यक्तित्व हैं,

उष्णता में भरे नीर के कूप हैं । 

त्याग में भोग का क्षेत्र विस्तार है,

सृष्टि में राम तो भूप के भूप हैं । 

भाव जैसा धरें रूप वैसा दिखे,

राम छाया कहीं तो कहीं धूप हैं । । ”     (छंद संख्या ६०)

द्वितीय सर्ग, परम विख्यात तमसा के माहात्म्य एवं लोकमंगलकारिता से संबद्ध है । इस सर्ग का निम्नांकित प्रथम छन्द जो दुर्मिल सवैया में है, स्वत: ध्यान आकर्षित करता है:

“सरयू दिशि दक्षिण है तमसा,

मिलि औधपुरी छवि छाजत है । 

घिरि जंगल मंगल हैं करतीं,

जलवायुन के सुख साजति है । 

तट आश्रम सिद्धि तपस्वि बसे,

तप तेज प्रभा सुविराजति है । 

सब जीव स्वछन्द हिये विहरें,

जहॅं नंदन की छवि लाजति है । । ” (छंद संख्या १)

तृतीय सर्ग में ऋतु वर्णन के अंतर्गत प्रकृति का मनोरम वर्णन समाविष्ट है । यह सर्ग वर्तमान युग में बहुत प्रासंगिक है क्योंकि इसमें कवि ने पर्यावरण प्रदूषण की ओर संकेत करते हुए उसके निवारण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया है । एक छन्द स्वत: आकर्षित करता है:

“मेघ आकाश में घूमते ढूँढ़ते,

गर्जते पूछते क्या हुई बात है । 

प्यास के त्रास में धैर्य को तोड़ते,

नीर संत्रास में ये हुई घात है । 

ताल पाताल में नीर का क्या करें,

सूखते से दिखे नेत्र को ज्ञात है । 

नीरदाता चले नीर को खोजने,

नीर से ही धरा जिंदगी प्रात है । । ” (छन्द संख्या २)

चतुर्थ सर्ग में महाकवि ने सनातन ऋषि की परम्परा पर प्रकाश डाला है जबकि पंचम सर्ग ऋषियों के प्रदेय को विवेचित करता है । ये दोनों सर्ग आज की नई पीढ़ी के लिए ज्ञानवर्द्धक और उपयोगी हैं । चतुर्थ सर्ग का प्रथम छंद विशेष अवलोकनीय है:

“ऋषियों वाली यह पुण्य धरा,

यम नियम तपस्या तेज वरा । 

प्रकृति प्रज्ञता वैभव इनका,

अन्तस का कल्मष निपट जरा । । ” (छन्द संख्या १)

इसी प्रकार सर्ग ५ का अंतिम छंद ऋषियों के प्रदेय का कुशल रेखांकन करता है:

“लोभ औ’ मोह में ना करो कर्म को,

बुद्धि संकीर्ण जो वो कहाॅं जानता । 

कींच में पाँव जो एक होता पड़ा,

दूसरे भी पड़े है यही ठानता । 

होशियारी नहीं चालबाजी नहीं,

वो छिपा आपमें है सभी जानता । 

जो कहे वो करो है इसी में भला,

किन्तु होता हठी वो कहाँ मानता । । ” (छंद संख्या ७०)

आगे के सर्गों में ‌महर्षि च्यवन के जीवनचरित का रोचक एवं रसात्मक वर्णन है । ‘च्यवन ऋषि का जन्म’ शीर्षक षष्ठम सर्ग के निम्नांकित दो छन्द महर्षि के जन्म का आभास कराते हैं:

“सूकर जलकर राख बना तब,

ब्रह्म तेज साकार हुआ जब । 

ठहरा कौन तेज के आगे,

तपो तेज साकार हुआ तब । । (छन्द संख्या २४)

………………………

यही च्यवन ऋषि कहलाये हैं,

मातु पुलोमा सुत जाये हैं । 

पूर्व प्रसव ही प्रकट हुए हैं,

तपो तेज में जग छाये हैं । । ” (छन्द संख्या २५)

सप्तम सर्ग में ‘ब्रह्माचरण और तपस्वी जीवन’ शीर्षक से महर्षि च्यवन से सम्बन्धित विशिष्ट तथ्य प्रस्तुत हैं । सर्ग के निम्न छन्द विशेष विचारणीय हैं:

“च्यवन ऋषि की आठ सिद्धियाँ,

तप के बल पर उन्हें मिली थीं । 

ऐसी सिद्धि इस धरा पर,

इससे पहले नहीं पली थी । । (छंद संख्या ४२)

……

प्रथम सिद्धि जो धार दिया था,

अनाहत चक्र पार किया था । 

कुण्डलनी जागरण घिया था,

जाग्रत स्वरूप सदा जिया था । । (छन्द संख्या ४३)

…….

कालचक्र से किया वापसी,

वृद्ध से च्यवन युवा हुए थे । 

चन्द्रमा चक्र औ कालचक्र,

निज को सेतु सदृश लिये थे । । (छन्द स़ख्या ४४)

…….

काया छिपी कृश हुई लेकिन,

नहीं योग में आयी बाधा । 

घोर तपस्या किया च्यवन ने,

योग लक्ष्य संयम ने साधा । । (छन्द संख्या ५५)

च्यवन-सुकन्या नामक अष्टम सर्ग के प्रथम छन्द में वन में सखियों सहित विचरती राजकुमारी सुकन्या के सुरम्य रूप एवं पुलकित मनोदशा का रेखांकन श्लाघनीय है:

“विहरैं वन बीच उलीच हिये,

सब साथ अकाश चढ़े हुए हैं । 

मन भाव सुभाव खिले मुख पे,

दृग चंचल चाल चले हुए हैं । 

जहँ चाह भरी वहँ राह भरी,

पद ज्यों मन पाठ पढ़े हुए हैं । 

निज लक्ष्य सुदक्ष प्रवीन लगीं,

सबको मनु काम गढ़े हुए हैं । । ” (छन्द संख्या १)

इस सर्ग का निम्न अंतिम छन्द भी ध्यातव्य है:

“एक दूजे के लिए जो भरा प्रेम हो,

एक से जो दिखे धर्म सौन्दर्य है । 

लक्ष्य में भाव कल्याणकारी भरा,

पूज्य की भावना कर्म सौन्दर्य है । । 

बात खाँचे ढली रूप साँचे ढली,

योग की साधना तर्क सौन्दर्य है । 

साधना साध्य में जो समावेश हो,

क्षेत्र सादृश्य हो शर्त सौन्दर्य है । । ” (छन्द संख्या १५०)

महाकाव्य के नवम सर्ग(च्यवन-शर्याति) में महाराज शर्याति के रथ का वर्णन बड़ा ही प्रभावी बन पड़ा है:

“अश्व जो हैं जुते श्वेत के वर्ण हैं,

प्राप्त आदेश को खड़े कान हैं । 

चार संख्या भरी चाल की तीव्रता,

रेशमी साज-सज्जा जड़े शान हैं । 

स्पंदनों से जुते भाँप लेते दिशा,

डोर आदेश प्रस्थान संधान हैं । 

है रथारूढ़ शर्याति शोभा बढ़ी,

अश्व का यान ये वंश की शान है । । ” (छन्द संख्या १)

इस सर्ग के समापन में कवि ने अपने विशेष गंगोदक छन्द के माध्यम से किया है:

“संग जैसा मिला सोच वैसी बनी,

जान औ’ बूझ के संग साथी चुनो । 

कर्म पे ध्यान दो धर्म पे ध्यान दो,

ऑंख को खोल के वृत्तियों को गुनो । 

जो बुरे कर्म हैं कष्ट देते सदा,

अंत सत्कर्म की भाव माला बुनो । 

त्याग दो त्याज्य है जो सभी के लिए,

है सभी ईश संतान धारा धुनो । । ” (छन्द संख्या ५७)

दशम सर्ग में ‘च्यवन का प्रदेय’ रेखांकित करता प्रथम छन्द विशेष प्रासंगिक है:

“त्याग औ’ तेज से सिद्धि की प्राप्ति थी,

मंत्र की शक्ति पे शस्त्र को भान था । 

अग्नि या वारि की बाण वर्षा करे,

शास्त्र की युक्तियों का भरा ज्ञान था । 

शस्त्र औ’ शास्त्र में शास्त्र ही श्रेष्ठ था,

शास्त्र में शस्त्र का भी दिशा ध्यान है । 

ब्रह्म के ज्ञान को प्राप्त वर्चस्व था,

ज्ञानियों का दिशा बोध में मान था । । ” (छन्द संख्या १)

महाकाव्य का एकादश सर्ग ‘अध्यात्म’ शीर्षक से विशिष्ट आध्यात्मिक तथ्यों की प्रस्तुति करता है । सर्ग के प्रथम छंद का अवलोकन आवश्यक है:

“यहीं जन्म की भूमि तेजस्वियों की,

यहाँ गंग की धार भी पावनी है । 

यहीं ध्यान में ब्रह्म की धारणा की,

बही भाव धारा लगी लावनी है । । 

यही विश्व की श्रेष्ठ नैसर्गिकी है,

तथा वृष्टि की धार भी सावनी है । 

यहीं श्रेष्ठ वीरों व्रती की धरा है,

यहाँ विश्व सिंहों सजी छावनी है । । ” (छन्द संख्या १)

इस सर्ग का निम्नांकित अंतिम छन्द एक सकारात्मक सामाजिक संदेश का प्रसारण करता है:

“राष्ट्र रागी बनो हेतु त्यागी बनो,

शास्त्र आदेश में राष्ट्र की सर्जना । 

राष्ट्र ही मूल हो माथ पे धूल हो,

पावना देश में राष्ट्र की चन्दना । । 

भाव में राष्ट्र हो चाव में राष्ट्र हो,

हो मतादेश में राष्ट्र की अर्चना । 

राष्ट्र भी देव है सर्वथा सेव है,

वेद संदेश में राष्ट्र की वंदना । । ” (छन्द संख्या ४६)

महाकाव्य का द्वादश सर्ग ‘सत्य सनातन’ शीर्षक से अनेक सनातनी सत्य प्रस्तुत करता है । सर्ग का निम्नांकित प्रथम छंद देखें:

“ब्रह्म के ध्यान औ’ स्वास्थ्य की दृष्टि से,

योग आयाम ही मुख्य आधार है । 

जोड़ को मोड़ना साधना ग्रंथि की,

साॅंस से फेफड़े का खुला द्वार है । । 

अंग प्रत्यंग की शक्ति की वर्धनी,

ये क्रिया रूप में देह से प्यार है । 

योग से है मिली कौशली दक्षता,

जो करे ज़िन्दगी वर्ष सौ पार है । । ” (छन्द संख्या १)

महाकाव्य के अंतिम सर्ग में ‘उपसंहार’ शीर्षक से बासठ छन्द समाविष्ट हैं । सर्ग का अंतिम छन्द विशेष अवलोकनीय है:

“ज्ञान का यज्ञ है भान का यज्ञ है,

आश विश्वास के मान का यज्ञ है । 

खोलता ज्ञान भंडार के द्वार को,

है कृपा भाव जो बुद्धि का अज्ञ है । । 

संत माहात्म्य की भाव धारा बही,

बूझता है वही जो धिया तज्ञ है । 

ग्रंथ को सौंपता सर्वथा भाव से,

प्राणि जो सच्चिदानंद का प्रज्ञ है । । ” (छन्द संख्या ६२)

‘च्यवन चरित’ काव्यकृति महाकाव्य के सभी लक्षणों से युक्त है । नियोजित सर्गबद्धता के साथ-साथ इसमें महान चरित्र, ऋतु वर्णन, नगरों एवं मंदिरों का वर्णन, राज्य वर्णन, न्याय व्यवस्था, जीवन मूल्यों इत्यादि के वर्णन का सुन्दर समावेश है । इस काव्यकृति में सभी काव्य रसों की अभिव्यक्ति है । शांत रस इसका अंगी रस है । कृति के प्रारम्भ से अंत तक मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रधानता है । काव्य गुणों की दृष्टि से इस कृति में प्रसाद, माधुर्य तथा ओज का विनियोग कुशल रूप में हुआ है जो पाठकों और श्रोताओं के लिए आनंददायक है । अलंकार-प्रयोग की दृष्टि से भी यह महाकाव्य बहुत समृद्ध है । इसमें शब्द और अर्थ से सम्बन्धित अनेक अलंकारों का सहज उपयोग हुआ है । कृतिकार को चरित्रों को आदर्श और यथार्थ के उच्च धरातल पर चित्रित करने में पूर्ण सफलता मिली है । कृति में वैविध मात्रिक एवं वर्णिक छंदों का उत्तम प्रयोग हुआ है । सर्वाधिक गंगोदक सवैया का प्रयोग हुआ है पर उसके अतिरिक्त दुर्मिल सवैया, सुंदरी सवैया, मदिरा सवैया आदि का भी कुशल प्रयोग हुआ है । 

यह काव्यकृति पुन: इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि डॉ.सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’ जी गंगोदक सवैया के सम्राट हैं । 

इस महाकृति की एक विशेषता यह भी है कि इसमें कृतिकार का प्राक्कथन ‘यात्रा वृत्तांत’ के रूप में विद्यमान है जिसका शीर्षक ‘जब च्यवन ने गर्भ से च्युत होकर माता की रक्षा की’ अत्यन्त सहजता से एक पौराणिक सत्य को प्रसारित करता है । इस प्राक्कथन को पढ़कर कृतिकार की नैसर्गिक यायावरी और उनके गहन अध्ययन तथा शोधी प्रवृत्ति का सुबोध होता है । उन्होंने इसमें च्यवन ऋषि को प्राप्त ऐसी आठ सिद्धियों का उल्लेख किया है जो किसी भी अन्य ऋषि को प्राप्त नहीं थीं । इस तथ्य का महाकाव्य में भी सुंदर समावेश हुआ है । उनके द्वारा किया गया तमसा नदी की सुषमा और महिमा का वर्णन श्लाघनीय है । कृतिकार द्वारा इस तथ्य को भी रेखांकित किया गया है कि ‘च्यवन ऋषि सूर्यवंशी राजाओं की न्याय व्यवस्था, धर्माचरण, मर्यादा, प्रजावत्सलता, सत्यप्रियता, वचन बद्धता, समान भागीदारी, स्वास्थ्य के प्रति सजगता आदि को भली भाँति जानते समझते और स्वीकार करते थे । अयोध्याराज के राजकीय वैद्य च्यवन ऋषि के आश्रम में आते थे । जड़ी बूटियों, स्वास्थ्य संबंधी सम्पूर्ण जानकारी च्यवन ऋषि से प्राप्त करते थे । प्रजा भी स्वास्थ्य संबंधी परामर्श लेने और जड़ी-बूटियों को प्राप्त करने आश्रम में आती थी । च्यवन के ज्ञान, अनुभव का राजा सम्मान और उपयोग करते थे । ”

कृति को ‘च्यवन-चरित: एक दृष्टि’ शीर्षक से साहित्य भूषण डॉ. उमाशंकर शुक्ल ‘शितिकंठ द्वारा लिखित प्रस्तावना का प्रसाद भी प्राप्त है । उनके अनुसार ‘भारतीय सभ्यता और संस्कृति के महान आलोक-स्तम्भ-ऋषि च्यवन जैसे उदात्त व्यक्तित्व पर केंद्रित यह अनुसंधानपूर्ण महत् प्रबन्ध काव्य विविध लोक-मांगलिक स्वरों से उद्भासित है । ’

इस महाकृति की भूमिका विद्वान प्रोफेसर डॉ.हरिशंकर मिश्र जी द्वारा लिखी गयी है । डॉ. हरिशंकर के शब्दों में ‘च्यवन ऋषि को आधार मानकर अभी तक इतनी विविधयामी रचना दृष्टिगत नहीं हुई है । ’

महाकृति ‘च्यवन चरित’ का आवरण संदेशयुक्त है । उसमें विद्यमान ऋषि की विशिष्ट मुद्रा पौराणिक काल में निहित आध्यात्मिक चिन्तन का बोध कराती है । कृति के अंत में समाविष्ट ‘गणाधार सवैया और उसका व्याकरण’ तथा ‘घनाक्षरी और उसका व्याकरण’ उसके पठन-पाठन को सुगम बनायेगा । कृति का मूल्य रुपया सात सौ पचास मात्र है जो इस महाकृति की गहनता के समतुल्य प्रतीत होता है । यह कृति किसी भी छन्द-प्रेमी और महाकाव्य अनुरागी को सहज रूप से आकर्षित करेगी । इसके अतिरिक्त इसमें छन्दों के प्रति लगाव को उन्नत करने की भी पर्याप्त क्षमता है । निस्संदेह यह कृति डॉ. सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’ का मानव-समाज को प्रदत्त एक दुर्लभ साहित्यिक उपहार है जिसका सुधी प्रयोग और उपयोग मानवता का पाठ पढ़ाते हुए पौराणिक-काल के कालजयी तत्वों से भिज्ञ बनायेगा । 


पुस्तक : ’च्यवन चरित’ ( महाकाव्य ) 

लेखकः डॉ. सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’

प्रकाशकः शतरंग प्रकाशन,लखनऊ-226001, 

मूल्य : 750 रुपये सजिल्द, 

त्रिवेणी प्रसाद दूबे ‘मनीष’, 

ए-305, ओ.सी.आर. विधान सभा मार्ग;लखनऊ 

द्वारा -सुरेन्द्र अग्निहोत्री, मोः. 9415508695

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प्रकाशनार्थ साहित्यिक खबर

हिंदी गजल के मूल ढांचे में रहकर, इस विधा में अभिनव प्रयोग कर रहे हैं चैतन्य किरण : सिद्धेश्वर

हिंदी गजल की परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं , युवा शायर चैतन्य किरण । " रेखा भारती मिश्रा 

पटना : 28/05/24 ! 

चैतन्य किरण द्वारा प्रस्तुत ग़ज़लों में -सुर्ख़ आँखों में फ़साना दर्द का,ज़िंदगी है इक तराना दर्द का!/ दर्द दिल की कोई दवा करना,इश्क़ में तुम नहीं गिला करना / आग बुझ जाए न मुहब्बत की,अपने पल्लू से तुम हवा करना /दुनिया में अहिंसा का एक उन्वान है भारत,दरियादिली की आज भी पहचान है भारत । /हरेक बाप-माँ की कमाई हैं बच्चे,ख़ुदा से भी बढ़कर खुदाई हैं बच्चे । /पान, गुटखा तुम्हें काहे को ज़हर लगता है, इन्हें चबाने में लोहे का जिगर लगता है.. जैसी गजलों ने इस काव्य महफिल को यादगार बना दिया । युवा शायर चैतन्य किरण ने एकल काव्य पाठ में अपनी एक दर्जन हिंदी गजलों का पाठ किया । 

कहते हैं लोग कि कविताओं की बाढ़ सी आ गई है । इस बात को मैं स्वीकार नहीं करता, क्योंकि कविता के नाम पर जो कुछ आज(अधिकांशतः)परोसा जा रहा है, वह कविता है ही नहीं या तो गद्य में विचार है या सपाटबयानी । छोटे आकार में कुछ भी लिख देना कविता नहीं । ग़ज़ल देखने में जितना आसान लगता है, लिखना उतना आसान नहीं है । क्योंकि ग़ज़ल का एक अपना शास्त्रीय आकार- प्रकार और स्वरूप होता है । उसमें रदीफ़ क़ाफ़िया और मात्राओं का जोड़ घटाव होता है । प्रत्येक शेर का अपना वजन होता है । और भी बहुत कुछ होता है एक ग़ज़ल में, जिसे ग़ज़ल लिखने पढ़ने वाले खूब समझते हैं । किंतु शौकिया रूप से ग़ज़ल लिखने वाले बहुत सारी भूल कर जाते हैं । वे रदीफ़ और क़ाफ़िया पर तो ध्यान देते हैं किंतु हर शेर के वजन और मात्राओं पर नहीं । गजल जैसी कोई भी छाँदिक रचना आजाद गजल या नज़्म हो सकती है गजल नहीं । चैतन्य किरण की ग़ज़लों को पढ़ते हुए लगता है कि लयात्मकता में अपनी ग़ज़ल को ढालने के अपेक्षा, विचार भाव की गहराई को मापने में वे ज्यादा सक्षम है । इसलिए वे समकालीन ग़ज़लों की भीड़ में अलग ढंग से पहचाने जाते हैं । जब वे कहते हैं -" दर्द दिल की कोई दवा करना /इश्क में तुम नहीं गिला करना!/ आग बुझ जाए न मोहब्बत की, अपने पल्लू से तुम हवा करना ! आज समकालीन हिंदी ग़ज़ल में दोनों तरह की ग़ज़लें देखी जा रही है । और चैतन्य किरण जैसे कई युवा शायर हिंदी गजल के मूल ढांचे में रहकर,इस विधा में अभिनव प्रयोग कर रहे हैं । 

भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में, गूगल मीट के माध्यम से, फेसबुक के अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के पेज पर, हेलो फेसबुक कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए संयोजक सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया । 

अपने अध्यक्षीय टिप्पणी में चर्चित कवियित्री रेखा भारती मिश्रा ने कहा कि -" चैतन्य जी की ग़ज़लें दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, गोपाल दास नीरज आदि के ग़ज़ल लेखन परंपरा को आगे बढ़ाती है । इन्होंने अपनी ग़ज़लों में समाज का हर वर्ग और सामाजिक परिवेश को खूबसूरत तरीके से प्रस्तुत किया है । ये भारत मां पर ग़ज़लें लिखते है तो जन्म देने वाली जननी मां पर भी गजलें लिखते हैं । इन्होंने अपनी ग़ज़लों में अलग अलग भाव को विस्तार दिया है जो समाज और परिवेश की गंभीरता को भी दर्शाती है । "

हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन में देश भर के चुने हुए एक दर्जन नए पुराने कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया जिनमें मुख्य अतिथि चैतन्य किरण अध्यक्ष रेखा भारती मिश्रा एवं विशिष्ट अथिति डॉ मंजू सक्सेना के अतिरिक्त हजारी सिंह, ऋचा वर्मा, सरल मेहता,सुधा पांडे, सपना चंद्रा, राज प्रिया रानी, श्रीकांत गुप्त,एकलव्य केसरी, सिद्धेश्वर,पूनम कुमारी डॉ अनुज प्रभात, इंदु उपाध्याय आदि थे । ऑनलाइन कवि सम्मेलन का समापन हुआ प्रभारी एकलव्य केसरी के धन्यवाद ज्ञापन से । 

हेलो फेसबुक कवि सम्मेलन में ऑनलाइन काव्य पाठ करने वाले के अतिरिक्त अन्य कवियों में प्रमुख थे - अनीता मिश्रा 'सिद्धि', राश दादा राश, नीलम श्रीवास्तव, सोहेल फारुकी ,विज्ञान व्रत ,, घनश्याम कलयुगी ,रजनी श्रीवास्तव अनंता, रामनारायण यादव , निवेदिता, पदमज़ा शर्मा, निर्मल दे, श्रीकांत, मीना कुमारी परिहार,कुमारी नवनीत आदि । 

प्रस्तुति : बीना गुप्ता, जन संपर्क पदाधिकारी 

भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना, बिहार, मोबाइल 9234760365



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