Abhinav Imroz July 2024




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 कविताएँ

रश्मि रमानी, इंदौर, मो. 9827261567


पक्की ख़बर

जब सामने दिख रही हो

सिर्फ़ तबाही 

तब नहीं सोचा जा सकता 

तितलियों, फूलों और परिन्दों के बारे में 

एक-एक करके जब मरते हैं सैनिक

पल-पल गुज़रता है इस आशंका में 

कि, मौत यहीं आसपास तो नहीं

ऐसे में क्या बात की जा सकती है 

अधूरे कामों को पूरा करने की 

या कुछ नया शुरू करने की 

इन्हीं दिनों में चीज़ें नहीं होती वैसी 

जैसा कि उन्हें होना चाहिए रोज़ की तरह


राष्ट्रीय त्यौहारों पर बजते सलामी बिगुल सुनकर होती है खुशी और गर्व आमतौर पर 

किन्तु युद्ध के दिनों में इनका बजना 

भर देता है दिलों में दहशत 

हर सायरन रोक देता है कईयों की धड़कन भयभीत लोगों के मुँह से फूटते हैं

प्रार्थना के शब्द जाने-अनजाने 

हवा में तैरती हैं कुछ अस्फुट ध्वनियाँ 

कोई भी नहीं होता आश्वस्त 

सिर्फ़ बातों और सूचनाओं से 

हरेक को चाहिए पक्की ख़बर 

हाँ, अपनों के सही सलामत होने की

पक्की ख़बर


'सही-सलामत' और 'पक्की खबर' 

यही वे शब्द हैं 

जो बेहद महत्वपूर्ण होते हैं

युद्ध के दिनों में 

हार-जीत के नतीजे से कहीं 

ज़्यादा जरूरी है जीवित होना 

क्योंकि जिन्दा रहने पर ही तो 

जारी रह सकती हैं तमाम चीज़ें । 

ःःःःःःः

शहादत

तिरंगे में लिपटा ताबूत उतर रहा है 

टूट गया है एक बार फिर 

देशभक्ति का मिथक


इस बाज़ारू समय में

जब सब कुछ बिक रहा हो

तो, मजबूर शहादत क्यों न बिके ? 

फिर चाहे तमाशा ही क्यों न बन जाए 

फ़र्ज और देशभक्ति

ज़रूरत और मजबूरी के चलते 

दफ़न कर दिए जाएँ ज़रूरी सवाल


नहीं पूछता है कोई

कि, क्यों लड़े जाते हैं युद्ध

उस धरती के लिए

जिस पर एक-सा हक है 

इस संसार के हर एक प्राणी का 

और वह सभी की ज़रूरत है 

एक जैसी एक सरीखी

बावजूद इसके 

सुई की नोक भर भूमि से लेकर

लाखों मील धरती

क्यों बन जाती है अनचाहे युद्ध का कारण ? 

मारे जाते हैं अनगिनत सैनिक यों ही 

क्योंकि वे होते हैं

गरीब और मासूम

और तैयार किया जाता है उन्हें 

हुक्मरानों के इशारे पर आगे बढ़ने, पीछे हटने

और कभी-कभी कटकर मरने के लिए

सैनिक

मरते हैं हमारी खा़तिर

हम यानि देशवासी

देश यानि राष्ट्र

पर, जो मारे गए वे ? 

हमारे प्रहरी ! हमारे नौकर !

या मजबूर शहीद

जो लड़ा देते हैं अपनी जान

मुर्दा देश के लिए

और बेशर्म लोग इस घटना को

बेहिचक

देशभक्ति करार देते हैं । 

ःःःःःःः

मोहरे

मोर्चे पर खड़े हैं सैनिक

मोहरों की तरह 

हुक्म मिलते ही आगे बढ़ेंगे 

और टूट पड़ेंगे दुश्मन पर बेहिचक


खिलाड़ी हैं वे उस स्पर्धा के 

जहाँ हार का मतलब है मौत 

और जीत का इनाम है ज़िन्दगी


बमबारी और मृत्यु के बीच हैं चंद लम्हें

जिन्हें जीते हुए छूट जाता है मोह 

नहीं लगता है डर, ना ही याद आता है प्रेम सैनिकों को सिर्फ लड़ना ही नहीं

जीतना भी है 

पर जीतना एक मुश्किल सवाल है

क्योंकि जीत किसके लिए ?

अपने लिए 

विश्व विजयी तिरंगे के लिए !

या उस भ्रष्ट और जर्जर समाज के लिए 

मुर्दा है जिसका ज़मीर 

ख़त्म हो चुकी है जिसकी संवेदनशीलता

सब कुछ मिट जाने पर की जाएँगी

निरर्थक संधियां

जिनके मज़मून लिखेंगें वे ही लोग

जिन्होंने शुरू किया था युद्ध


शहीदों के सम्मान समारोह में 

बेमतलब कहे जाएँगें कुछ वीरोचित वाक्य 

शातिर कूटनीतिज्ञों की ज़बान से 

जिनके चेहरों पर होगी मक्कार मुस्कान 

युद्ध में शहीद चमकदार जवान 

शत्रु के छल का कम 

अपने आकाओं की लापरवाही का अधिक शिकार होते हैं भेड़ों की तरह 

उन्हें भोगनी पड़ती है वह सज़ा

जिसका कसूर उन्होंने किया ही नहीं

भेड़ों की ज़िन्दगी

ठंड में सुरक्षा का गर्म कंबल

और मौत !

लजीज़ दावत । 

ःःःःःःःः

शेष प्रश्न

युद्ध

क्या छोड़ जाता है अपने पीछे

विनाश, विभीषिका, क्षत-विक्षत शरीर

जले हुए जंगल, ज़हरीली बर्फ

और झुलसी हुई वादियाँ


पहाड़ों की शांत और पवित्र चोटियाँ 

रंग जाती है अचानक खून से

और दिशाओं में भर जाते हैं दारूण चीत्कार 

या क्रूर अट्टहास


युद्ध

शांति के समन्दर में उठता है भीषण ज्वार 

लहरों की मनमानी बहा ले जाती है

तमाम चीज़ें

दूध के दाँतों से लेकर

बूढ़ी निगाहों की ऐनक तक वे तमाम चीजें 

जो युद्ध में शरीक नहीं थीं । 

ःःःःःःःःः

बस, एक पल

बावजूद इसके कि

सैनिक नहीं होता दार्शनिक

पर किसी दार्शनिक से बेहतर जानता है वह

पानी का बुलबुला भर है ज़िन्दगी

फूट सकता है जो कभी भी

और अचानक ख़त्म हो सकती है उसकी कहानी


एक सिपाही नहीं लिखता रोजनामचा

न पढ़ता है भविष्यफल

न देखता है कैलेण्डर

और न ही भरोसा है उसे

आने वाले वक्त पर

हर एक तारीख़ हो सकती है आख़िरी

उसकी तकदीर की

भलीभाँति जानता है वह

कि, जो भी है बस यही एक पल है

जो सरक सकता है कहीं भी

ख़त्म हो सकता है कभी भी

बंदूक की गोलियों का शोर 

बमों के धमाके

और तोपों की गड़गड़ाहट के बावजूद 

उसे पता है सन्नाटे का मतलब 

वह जानता है बंकरों, खाईयों के रहस्य 

अच्छी तरह मालूम है उसे 

स्तब्धता संकेत है आँधी के आने का


गलत हो सकती है 

मौसम विभाग की चेतावनी 

जो सूचित करती है संभावना फक्त़ 

आँधी तूफान के आने की 

पर युद्ध में कोई मतलब नहीं संभावना का 

वहाँ तो हर घड़ी सिर्फ तैयारी है 

बेमायने हैं किन्तु-परंतु जैसे शब्द


तयशुदा है फ़ौजी की जिंदगी में सब कुछ

हर चीज़ घूमती है वहाँ

सिर्फ़

फतह और शहादत की धुरी पर । 

ःःःःःःः 

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‘‘इस दौर में ईसा तो नहीं कोई, मगर हाँ, 

जिस शख्स को देखो वही सूली पे टंगा है । ’’ 

(डॉ. हरिन्द्र श्रीवास्तव)

उपरोक्त पुस्तकें पढ़ने के उपरान्त मुझे याद आया कॉलेज की डिवेट का एक विषय ‘‘हास्य कहाँ है, उसमें भी है रोदन का परिणाम’’ ओशो ने भी कहा है ‘‘जिन्दगी जोखिम है । ’’ संघर्ष में सहज हो जाना ही परिपक्वता का परिचायक है । एकता अमित व्यास के उपन्यास अमीरन (नायिका) ने क्या-क्या नहीं झेला, अंततः नियति मान कर मन में सुप्त सकारात्मकता को जागृत किया । द्वंद्वों के दावानल से होते हुए जीवन सोने जैसा शोधित करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए । 

अवसाद में घूमने आते हैं इस जगह

मगर ज़िंदगी का घर सबसे प्यारा है

कश्मकश है

और बेहतर रास्ते की तलाश है

चलो ज़िंदगी के फ़लसफ़े में ढूँढते हैं

कोई लंबा व गोल रास्ता

जिनमें छुपे हों सच्चे संबंध

साथ निभाने के वादे

और प्यार की सौग़ातें

ये ज़िंदगी के रास्ते हमेशा से वहीं डटे खड़े हैं । 

राहें वहीं हैं राही बदल गए

दस्तूरे दुनिया और निज़ामें कुदरत

कबूल है, कबूल है, कबूल है । 

तथास्तु

इसी तरह राजी सेठ ने भी अपने उपन्यास तत्-सम् के विषय में लिखती हैं कि – 

"मेरी मंशा निश्चय ही यह बताने को थी कि जीवनक्रम में दुःखों का होना अनिवार्य है । वह किसी-न-किसी रूप में सदा हमारे सामने हैं । आकार-प्रकार, स्थिति-परिस्थिति बदलती है, दुःख के होने का सच नहीं बदलता । मनुष्य का जीवन इन स्थितियों के विरुद्ध अपने भीतर प्रतिकार का बल पैदा करना है, दुःख को मान लेना नहीं । ट्रेजडी दुःख के होने में नहीं है । (यह मनुष्य होने के नाते नियति है) दुःख से उपजे अवरोधों केा स्वीकार कर लेने में है । इस अर्थ में ‘तत्-सम’ जिजीविषा के अभिषेक का आख्यान है । "

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वंदना यादव की पुस्तक सैनिक पत्नियों की डायरी में भी यही संदेश मिलता है कि दृढ़ निश्चय एवं आत्म विश्वास ही जीवन नैया के दो पतवार हैं । 

चियर्स जिंदगी

आज प्रातः स्कॉच के साथ सैर से वापस आते हुई गली में एक आंटीजी ने पूछा, ‘आपके पति फौजी हैं । आपको डर नहीं लगता ?’ 

मैंने मुसकराकर कहा, ‘‘नहीं’’

एक फौजी की बेटी, एक फौजी की बहन, एक फौजी की पत्नी और एक फौजी की बुआ को बिल्कुल डर नहीं
लगता । गर्व होता है । मस्तक सम्मान में और ऊँचा उठ जाता है । ‘जय हिन्द’ स्वतः अपने आप मुँह से निकल आता है । 

प्राण-प्रणय और प्रारब्ध ही जीवन लीला की धुरियाँ हैं । यह जिन्दगी अगर जोखिम है तो हमें अपनी दानिशमंदी से इसे दोजख किसी भी सूरत में नहीं बनने देना होगा बल्कि चियर्स जिन्दगी के जज़्बे को आत्मसात् करना होगा।

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संस्मरणात्मक समीक्षा

प्रभा कश्यप डोगरा, पंचकूला (पंजाब) मो. 98725 77538


मोहन “राकेश” : रातों का देवता !

“राकेश” चंद्रमा......... घटती बढ़ती कलाओं का अधिष्ठाता !

चंद्रमा जो धरती के गहन हृदय तल में भी अपनी कशिश से ज्वार भाटा की उदात्त लहरें उठा लेता है.... अपने पूर्ण प्रकाशित रूप में भी और आमावस की काली रातों में अदृश्य रहकर भी ! !

धरती ( स्त्री) से उत्पन्न राकेश (चंद्रमा सा ही) धरती से दूर होकर भी उसी के चहुँओर चक्कर काटते रहे ता - उम्र, पर तृप्ति सदा ही छलती रही ! !

आज के भारत की या वैदिक काल से ही, सही मायने में प्रेम के भूखे फिर भी स्त्री पुरुष संम्बंधों को ही चहुँओर विभिन्न रूपों में देखने की प्रवृत्ति के धनी !

प्रेम को प्रकृति के विराट कैनवस पर चहुँओर सदा चित्रित देखने की क्षमता रखते हुए भी; मिलन को चित्रित तो पाते रहे पर उसके विरही स्वरूप को अनदेखा करते रहे और शायद यही उन्हें जीवनपर्यन्त तृषित बनाए एक के बाद एक स्त्री के सानिध्य के लिए दौड़ाता रहा मृगमारीचिका सा ! ! उनकी यह मानसिकता उनके लिए अभिशाप बनी रही तो हिंदी साहित्य जगत् के लिए वरदान ! इसी मानसिकता या कहूँ ज्वार के तहत वे एक के बाद एक स्त्री- पुरुष संम्बंधों को केंद्र में रख विभिन्न रचनाएँ करते रहे जैसे एक ही तस्वीर के विभिन्न आयाम चित्रित करते रहे; मानों अपनी ही “भूख” को वे विभिन्न व्यंजन परोस कर तुष्ट करते रहे ! ! 

मुझे लगता है वे कहीं न कहीं मानसिक रूप से रोगी(?) या (भोगी) थे ! ! इसे एक प्रकार का” मैनिया “कहूँ तो अतिशयोक्ति न होगी ! आशा है सुधि पाठकगण मुझे क्षमा कर पाएँगे मेरे उद्गारों के लिए !! यहां स्वयं मोहन राकेश के कथनों को मैंने जयदेव तनेजा की पुस्तक 'अधूरे रिश्तों की पूरी दास्तान' में पाया——“एक तरफ़ तो मैं बिलकुल अकेला रहना चाहता हूँ, और दूसरी तरफ़ अकेलेपन के कुछ घंटे भी मुझे दुश्वार लगते हैं । सोचता हूँ कहीं मैं एक विभक्त व्यक्तित्व तो नहीं लिए हूँ ? ……… किसी के सामने अपनी कमजोरी को स्वीकार नहीं करने देता । ” मेरा मानना है कि बहुत अधिक बौद्धिक व्यक्तित्व सामाजिकता के बंधनों में बंधने नहीं देता और कहीं न कहीं व्यक्ति अपने ही बौद्धिकता के विभिन्न स्तर के तारों में उलझ उलझ जाता है ! जैसे तराशे जाने के बाद, कांच से सपाट हीरे के 'हर कट' से, अलग-अलग रंग की किरणें विकीरित होती हैं ! ! यदि यह मेरा धृष्टता न लगे तो अपनी ही एक रचना यहाँ उद्धृत करना चाहूँगी - 

चादर के फूल 

रंग बिरंगे धागे हैं 

कुछ सुलझे, कुछ उलझे हैं 

जीवन चक्र का फ़्रेम चढ़ा 

साँसों का ताना -बाना कसा हुआ

गाँठों के बँधते जाने से ही 

कोरी चादर पर फूल खिले 

श्वेत श्वेत इस चादरपर हैं 

रंग बिरंगे फूल खिले 

रेखाएँ हैं कुछ रक्ताकार लिए

कुछ हैं नीली -पीली सी 

कुछ आड़ी तिरछी भी चलतीं 

जब काल का श्यामल रंग पड़े, 

बह निकले कजरा आँखों का 

यह रंग बिरंगे धागे हैं 

कुछ सुलझे कुछ उलझे हैं !!

जंडी (चंडी) वाली गली के तंग सीलन भरे मकान और उसमें रह रहे तमाम अपने रिश्तेदारों- जिसमें उनकी दादी भी थीं, अपने तमाम शक्क औ शुबहा के साथ संग ही संग उस ज़माने की तमाम बुजुर्ग औरतों के टोने टोटकों व वहमों वाले विचारों के साथ ! - के विभिन्न व्यक्तित्वों की कश्मकश और खींचतान व टकराव भरे वातावरण में अपने बचपन का जो विवरण स्वयं मोहन राकेश ने लिखा है -“ गली में खेलना मना है - सिद्ध पुरुष भानेशाहऔर कोढ़ी कलजुग प्रसाद की नज़र के मारे । ………माँ के बारे भी दादी माँ की राय अच्छी नहीं है । पिताजी को तो वो नज़र से बचाकर रखना चाहती हैं । ”

इस तरह देखें तो मोहन राकेश के बालमन की कच्ची मिट्टी पर पड़ रहे विभिन्न विचारों की छाप से उपजी मानसिकता का स्पष्ट विवरण उनकी यादों के गलियारों में बिखरा आसानी से दीखता है ! एक जगह वे स्वयं कहते हैं —“छत से पीछे एक घर का आँगन नज़र आता है । ……” दरअसल उनके लिखे अनुसार वह कंजरों का था और उन्हें देख मोहन राकेश के बालपन को उन्हीं की तरह नाचने गाने का मन करता व नाचने भी लगते पर दादीमाँ की घुड़की उनके मन में डर व वहम न जाने क्या क्या और कैसे कैसे विचारों को जन्म देता व उनकी मानसिकता की धरा पर गहरी छाप छोड़ता चला गया ! !

शायद यही वे कारण रहे होंगे जो “मोहन” को “राकेश “ के रूप में ढालते रहे और वयस्क” मदन मोहन गुगलानी “ अंततः “राकेश “ बन विभिन्न छटा बिखराता मानवीय रिश्तों की अनेक दास्तानों का जनक व रचैयता बन हिंदी साहित्य को तो चमकते मोती दे गया पर सीप के जीव-सा ता उम्र एक छटपटाहट लिए एक से दूसरी स्त्री की बाहों में पनाह खोजता अंत मेंअपनी छोटी सी ज़िंदगानी को (47वर्ष)हृदय के नाम ही दे गया ! ! 

यहाँ मैं फिर एक धृष्टता करना चाह रही हूँ ; अपनी एक और रचना रख लेखनी को विराम दूँगी ; क्योंकि राकेश तो “राकेश” हैं वे शिव और कृष्ण के मस्तक पर समान रूप से सुशोभित हैं –

जीवन-चदरिया 

छोटी पड़ गई 

जीवन - चदरिया 

चहुं ओर से  

खींच-तान कर

ओढ़ी जी भर भर

चदरिया

सित रंगी से हुई

मटमैली 

धोई खूब मल मल

चदरिया

सर ढांका अरु पैर सिकोड़े

फिर भी छोटी

पड़ गई चदरिया

भोर भई तो भारी लागी

साँझ ढले; छीजी चदरिया

चिंदी-चिंदी बिखरती जाती

ओढ़न को न बची चदरिया

छोटी पड़ गई

जीवन चदरिया !!! ....

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व्यंग्य

डॉ. दलजीत कौर, चंडीगढ़, मो. 94637 43144


निन्यानवें का फेर 

पृथ्वी पर काफ़ी चहल -पहल थी । मिठाई की ख़ुशबू आ रही थी । न कोई तीज न त्योहार, फिर इतनी रौनक़ किस लिए । ईश्वर ने अपने एक दूत से पूछा - आज पृथ्वी पर कौन -सा जश्न मनाया जा रहा है ?

पता नहीं प्रभु !आप कहें तो मैं जाकर पता कर आता हूँ । 

नहीं ! आज मैं स्वयं पृथ्वी-भ्रमण पर जाना चाहता हूँ । मुझे कहीं बाहर गए बहुत दिन हो गए । आजकल मनुष्यों में हॉलिडे पर जाने का बहुत चलन है । मैं भी दो दिन घूमकर आता हूँ । 

इतना कहकर भगवान पृथ्वी -गमन को चल पड़े । पृथ्वी पर आकर देखा । बच्चे माता -पिता संग मिठाई के डिब्बे लिए एक भव्य इमारत की ओर जा रहे थे । प्रभु अदृश्य हो कर उनके साथ हो लिए । जल्दी ही उन्हें समझ आ गया कि यह एक नामी -गिरामी स्कूल है । यहाँ आज बोर्ड का रिज़ल्ट आया है । अध्यापक भाग -भागकर अपनी रिजल्ट शीट दूसरों को दिखा रहे थे । ऐसा लग रहा था जैसे उनका ही रिजल्ट आया हो । वे अपने विद्यार्थियों के उच्च अंक दूसरों को दिखाकर, बता देना चाहते थे कि वे कितने मेहनती व इंटेलीजेंट हैं । वे कह रहे थे -हमने अपने विद्यार्थियों पर बहुत मेहनत की । फ़ला बच्चा पहले सत्तर प्रतिशत पर था । हमने उसे पचानवें तक पहुँचाया । उसके माता -पिता से बात की । उन्हें समझाया । सब्जेक्ट टीचर से बात की । और बहुत कुछ । प्रिंसिपल अध्यापकों की मीटिंग ले रहे थे । वे देखना चाहते थे कि उनके स्कूल का रिजल्ट कैसा है ? उनका स्कूल स्पर्धा की रेस में कहाँ है ?उनकी नज़र दूसरे स्कूलों के रिजल्ट पर थी । उसका रिजल्ट मेरे रिजल्ट से चमकदार कैसे ? कैसे ? कैसे ?

सौ में से निन्यानवें प्रतिशत से नब्बे प्रतिशत तक के बच्चों को हीरो समझा जा रहा था । उनके फोटो खींचे जा रहे थे । अख़बार वाले अपनी खबर के लिए उनके फोटो ले रहे थे । उनानवे प्रतिशत से अस्सी प्रतिशत वाले बच्चों पर भी किसी -किसी की नज़र जा रही थी । पर उनके साथ कुछ सौतेला व्यवहार किया जा रहा था । उन्हें शाबाशी मिल रही थी । उनके माता -पिता को भी बधाई दी जा रही थी । पर दूसरे नंबर पर । इससे नीचे नंबर वाले या तो स्कूल आए ही नहीं, जो आए वे अपने झुंड बनाकर इधर -उधर खड़े थे । इसी तरह क्रमवार माता -पिता भी बच्चों की प्रतिशत के अनुसार झुंड बना कर खड़े थे । 

प्रभु अब उनकी बातचीत सुन रहे थे । उच्च कोटि के माता -पिता सारा श्रेय ख़ुद को दे रहे थे । 

हमारे घर में माहौल ही ऐसा है । मेरे पिता डी०सी० थे । मैं डॉक्टर हूँ । हमने बच्चों को हर सहूलियत दी है । कही कोई कमी नहीं । रात -रात भर हम भी इनके साथ जागे हैं । यह परिणाम तो हमारी तपस्या का फल है । सब कुछ उनके भविष्य पर न्योछावर कर दिया । 

मध्य कोटि के माता -पिता दबी आवाज़ में बच्चों पर आरोप लगाते सुनाई दिए । 

क्या नहीं किया इनके लिए ?

अब देखो ! आगे कहाँ दाख़िला मिलता है ?

इन्हें पढ़ाई से ज़्यादा दोस्त, मोबाइल, घूमने से प्यार है । 

थोड़ी -सी मेहनत और कर लेते तो नब्बे की लाइन में आ जाते । 

अध्यापक गण भी होशियार बच्चों पर ही ज़्यादा ध्यान देती हैं । 

किस -किस से इनका रिज़ल्ट टॉप का बनना है । 

तीसरी श्रेणी के बच्चों के माता -पिता प्रभु को कहीं नज़र नहीं आए । शायद वे घर पर ही जूता लेकर अपने होनहार का इंतज़ार कर रहे थे । 

अभी प्रभु को सिस्टम कुछ -कुछ समझ आ रहा था कि किसी बच्ची ने स्कूल की ऊपरी मंज़िल से कूदकर जान दे दी । किसी ने बताया -उसके अंक उसके अनुसार कुछ कम आए थे । 

एक पिता बोले -हमारे समय में तो फेल होने पर भी हम ऐसा कुछ नहीं सोचते थे । हाँ ! इतनी दौड़ भी नहीं थी । 

चारों ओर भगदड़ मच गई । प्रभु यह सब देख घबरा गए । यह आत्महत्या वाला मामला उन्हें अच्छा नहीं लगता । उन्हें तो अपने अनुसार ही मृत्यु का सिस्टम पसंद है । उन्होंने देखा कि उनके यमदूत उस बच्ची की आत्मा को ले गए । प्रभु का मन बेचैन हो गया । वे उस बच्ची के घर की ओर चल दिए । वहाँ मातम फैला था । बच्ची की माँ विलाप कर रही थी -

हे ईश्वर ! तू कितना निर्दयी है । यह तूने क्या किया ?

प्रभु सोचने लगे -मैंने क्या किया ?

माँ अपने पति पर आरोप लगा रही थी -तुम्हें कितना कहा कि इसपर पढ़ाई का इतना दवाब मत डालो । अब बना लो इसे आई ए एस । हे भगवान तुम मेरी बच्ची को ले गए । 

पिता माँ पर आरोप लगा रहे थे - तुमने ही डाला इसे इतने बड़े स्कूल में । कितनी -कितनी ट्यूशनें रखी । बच्ची के पास खेलने -खाने का भी समय नहीं था । तुम बना लो इसे मेरी बहन के बच्चों से ज़्यादा होशियार । हे भगवान ! तुमने हमारा घर उजाड़ दिया । अब किसके सहारे जीएँगे?

ईश्वर इतने आरोप सह नहीं पाए । धम से नीचे बैठ गए । उन्होंने चारों ओर देखा । न प्रिंसिपल, न अध्यापक, न ट्यूशन वाले कोई वहाँ मौजूद नहीं थे । जो कुछ समय पहले सारा श्रेय ख़ुद को दे रहे थे । वे सब इस अनहोनी से पल्ला झाड़ गए । उन्होंने पास बैठे शख़्स के मोबाइल पर देखा । फ़ेसबुक पर स्कूल अपनी सक्सेस स्टोरी डाल रहा था । अध्यापक अपने टॉपर स्टूडेंट के साथ फ़ोटो डाल रहे थे । ट्यूशन टीचर सारा श्रेय ख़ुद को देते हुए फ़ेसबुक पर केक काट रहे थे । माता -पिता रिश्तेदारों को चिढ़ाने के लिए प्रतिशत बढ़ा -चढ़ा कर फ़ेसबुक पर डालकर सारा श्रेय ख़ुद को दे रहे थे । हर तरफ़ एक अजीब-सी दौड़ थी । ईश्वर बड़बड़ाने लगे -और ईश्वर का दिया जीवन ?उसका कोई महत्त्व नहीं ?यह अप्रिय घटना जो यहाँ घटी । उसका श्रेय किसे जाता है ?क्या है इसका कारण ?किस पर है इसका दायित्व ?

उनका मन उचाट हो गया । वे धीरे से उठे और स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया । रास्ते भर इस अंधी दौड़ के बारे में सोचने रहे । वे महल में धीरे से घुसे । कुछ देवता आपस में बात कर रहे थे । 

एक देवता बोले -जो रोज़ मंदिर जाते थे, उन्हें 95%अंक दिए मैंने । 

दूसरे देवता ने कहा -जिन विद्यार्थियों ने मेरा व्रत किया उन्हें 98% अंक मिले । 

तीसरे देवता बोले -सिर्फ़ मेरे भक्तों को 99%मिले । 

उनमें अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की बहस होने लगी । ईश्वर इस निन्यानवे के फेर में नहीं पड़ना चाहते थे । इसलिए सीधे अपने कक्ष में चले गए । 

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प्यार..एक सापेक्ष कविता

प्यार एक ख्वाब है, तन्हाई है सपनों का सफर

प्यार बस प्यार है रोशनाई है अपनो का असर

प्यार एक दरिया है एक धार है मझधार भी है

प्यार एक कश्ती है तूफान है पतवार भी है

                 प्यार मंजिल है मुसाफिर है साहिल भी है

                 प्यार स्वीकार है इंकार है झंकार भी है

                 प्यार व्यवहार है दरकार भी तकरार भी है

                 प्यार एक वास्ता एक रास्ता इकरार भी है

प्यार एक प्यास है एहसास है एक आश भी है

प्यार जीवन है एक राग है नैराश्य भी है

प्यार हो जाना है पा जाना है खो जाना भी

प्यार रूसवाई है चलना भी है रूक जाना भी

                  प्यार बादल है  बारिश है  हरजाई भी

                 प्यार सागर है उफान है गहराई भी है

                 प्यार तो दिल के खेतों मे ऊग आई फसल

                 प्यार बस प्यार है कोई दूसरा संसार नहीं


कमलेश कुमार दीवान, नर्मदा पुरम, मध्यप्रदेश

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कहानी

 शीला मिश्रा, बावड़ियां कलां, भोपाल (म.प्र.), 

मो. 9977655565

चिंदियों का सच

आज प्रदीप ऑफिस से कुछ जल्दी लौट आया । आते ही उसने माँ के कमरे में झांका, वे करवट लिए सो रही थीं । वह चिंतित हो उठा .... पाँच बजे तक माँ सो रहीं हैं....??. उसने तेजी से कमरे से बाहर आकर रसोई में चाय बना रही अपनी पत्नी को आवाज लगाई "मालिनी ! माँ को क्या हुआ ? अभी तक सो रही हैं ?"

" पता नहीं, क्या हुआ है । आज तो उन्होंने दोपहर में खाना भी नहीं खाया । "मालिनी के स्वर में चिंता स्पष्ट झलक रही थी । 

"अरे, क्यों नहीं खाया ? तुमने जिद करके थोड़ा सा तो खिला दिया होता । "

" मैंने तो खिलाने की बहुत कोशिश की पर वे मानीं ही नहीं..... हाँ, नाश्ते के बाद जरुर कह उठीं थीं कि मेरा हलवा खाने का बहुत मन कर रहा है तो मैंने बना दिया था, उन्होंने थोड़ा सा खाया भी, पर दोपहर में खाना खाने के लिए तो बिल्कुल ही नहीं मानीं, फिर यह कहते हुए ओढ़कर सो गईं कि मुझे उठाना नहीं, मुझे कुछ चाहिए होगा तो आवाज दे दूँगी फिर मैंने साढ़े चार बजे चाय के लिए आवाज दी पर वे सोती ही रहीं । "मालिनी ने चिंतित स्वर में कहा । 

प्रदीप परेशान हो उठा..... यह साधारण बात नहीं है । माँ तो बहुत नियम से रहतीं हैं, निश्चित समय पर ही सोना-जागना, भोजन करना व दवाई लेना.... । उसने मालिनी से कहा कि "तुम चाय बनाओ, मैं माँ को उठाता हूँ । "

वह माँ के कमरे की ओर गया, पलंग के पास जाकर "माँ" कह कर खड़ा रहा, कोई जवाब नहीं आया तो उसने धीरे से माँ को हिलाया, उनके शरीर में कोई हलचल नहीं हुई तो उसने "माँ- माँ" पुकारते हुए जैसे ही उनको हिलाया तो उनका शरीर एक तरफ लुढ़क गया ...वह चीख पड़ा -"मालिनी... ", 

मालिनी लगभग दौड़ती हुई आई, " माँ... माँ नहीं... उठ... रहीं हैं । "लगभग हकलाते हुए प्रदीप बोला । 

" क्या....... ! मैं...मैं.. डॉक्टर को बुलाती हूँ । "

थोड़ी देर में डॉक्टर आए और देखते साथ ही उन्होंने 'ना' में सर हिला दिया । प्रदीप व मालिनी को विश्वास ही नहीं हो रहा था । वे भौंचक से एक दूसरे को ताके जा रहे थे । अपने हृदय में उठती आकुल विह्वलता को प्रदीप संभाल नहीं पाए और मर्मशोषी पीड़ा में आक्रांत स्वर में "माँ- माँ"कहते हुए मालिनी के कंधे पर सिर रख बच्चों की तरह बिलख पड़े । प्रदीप के हृदय की अन्तर्वेदना को मालिनी ने बहने दिया‌ । कुछ देर बाद इस निर्मम सच को स्वीकारते हुए वे, मालिनी के साथ परिचितों को सूचित करने में व्यस्त हो गए लेकिन उनका गहरा भावनात्मक आघात, फोन पर अपनों से बात करते हुए भी बार -बार रुलाई के रुप में फूट पड़ता था । प्रदीप की यह अवस्था देख मालिनी ने पड़ोस से आई चाय उनको देते हुए कहा - "कुछ देर अपने कमरे में बैठकर चाय पी लीजिए, तब तक मैं बैठक में चादरें वगैरह बिछाकर सबके बैठने का इंतजाम कर देती हूँ । "शोकाकुल प्रदीप चाय लेकर अपने कमरे में आकर बैठ गये । अनायास उसके सामने अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे........एक तरफ आँखों में नमी लिए माँ का शांत व मौन धारण किया चेहरा था तो दूसरी तरफ पिताजी का सामान इधर-उधर फेंकते गुस्से से माँ को डांटता हुआ चेहरा और भीत दृष्टि से उन दोनों को तकता, सहमा -सा छोटे को गोदी में लिए मैं..... । जहाँ मेरी आँखों में डर होता, वहीं माँ की आँखों में होती नमी तथा छोटे की आँखों में विस्मय.......अतीत में झांकते ही यह दृश्य हमेशा उसके सामने उपस्थित हो जाता और गहरी टीस से भाव विह्वल हो वह बिलख पड़ता । पिताजी जरा -जरा सी बात पर माँ पर बरस पड़ते थे किन्तु माँ हमेशा शांत रहती थी । कितनी ही बातों पर उनको गुस्सा आता होगा, नाराजी जताने का मन करता होगा किन्तु कभी कुछ कहतीं नहीं । बस... उदासी के सघन पर्दों में अपने आप को ढांकतीं एक चुप्पी सी ओढ़ लेतीं थीं । धीरे-धीरे जब मैं बड़ा होने लगा तो उनके चेहरे को पढ़ने लगा था....., उन्हें समझने लगा था । उनकी मुखमुद्रा देख उनके अंतस में उठ रही लहरों का अंदाजा लगा लेता था । मुझे माँ की बेचारगी पर दुख होता, क्रोध भी आता परन्तु मैं कुछ नहीं कर पाता था । बस चुपचाप रहकर सबके व्यवहार को देखता रहता । जिस तरह पिताजी द्वारा गुस्सा किए जाने पर माँ की आँखों में आँसू मोती से झिलमिलाने लगते और वे मुख नीचे किए मौन रहतीं ठीक उसी तरह रिश्तेदारों द्वारा ताने कसे जाने पर, उलाहने दिए जाने पर माँ को बुरा लगता, वे आहत होतीं, उनकी आँखों में नमी सी छा जाती लेकिन वे रहतीं.... बिल्कुल मौन...बस........ कागज पर अपना गुस्सा उतार देतीं और जब मैं माँ के कमरे में जाता तो डस्टबिन में कागज की चिंदियों का ढेर देखता । जहाँ उनकी निपट दयनीय, असहाय सी, करुणा से भरी छवि मुझे विचलित करती, वहीं उनका मौन डराता भी था लेकिन फिर भी न जाने क्यों मैं हमेशा माँ के आसपास ही बना रहता, बार-बार उनका चेहरा ताकता, वे मेरे चेहरे को मायूसी के बादलों से घिरा देख हल्के से मुस्कुरा देतीं । वह मुस्कुराती छवि मुझे बहुत सुकून देती । जब थोड़ा बड़ा हुआ तो कुछ- कुछ समझने लगा था फिर एक बार दादी ने भी बताया था कि तुम्हारी माँ बहुत सीधी हैं बिल्कुल गऊ, और आईं भी हैं एक छोटे शहर व साधारण परिवार से और ..... तुम्हें पता है, तुम्हारे पिताजी के पुरखे जमींदार थे । एक बार दादाजी तुम्हारी माँ के गाँव में गये थे, वहाँ उनकी गाड़ी खराब हो गई, तो तुम्हारे नाना ने न केवल गाड़ी सुधरवाने में मदद की अपितु रात गहरा गई थी, तो अपने यहाँ ही उनके रुकने व खाने-पीने का इंतजाम भी किया । दादाजी ने उनकी आवभगत व संस्कारों से प्रभावित होकर तुम्हारे पिताजी के लिए माँ का हाथ माँग लिया । पिताजी व तुम्हारी दोनों बुआ इस रिश्ते से खुश नहीं थीं, इसीलिए तो वे सब, जब-तब अपना रौब तुम्हारी माँ पर दिखाते हैं । 

"आप तो बड़ी हैं, आपने उनको कभी रोका क्यों नहीं...? "कई दिनों से मन में कुलबुला रही बात उस दिन मेरी ज़बान पर आ ही गई थी । 

" जमींदारों का घर है बेटा..., "दादी ने एक आह भरकर बस इतना ही कहा था । 

दादी की बातें मेरे बालमन को जब तब मथतीं । मैं अपनी छोटी सी बुद्धि पर जोर लगाकर इन प्रश्नों के जवाब ढूँढता कि जमींदारों का मतलब क्या होता है....? रौब दिखाकर वे सब क्या हासिल कर लेते थे.... ? और माँ ..., माँ....उन चिंदियों में क्या लिखतीं थीं ...., ? पर कभी नहीं जान पाया..... । चिंदी की याद आते ही वह वर्तमान में लौटा । अचानक उसे ख्याल आया कि कहीं आज माँ ने कुछ लिखा तो नहीं...... और ...और ...फिर लिखकर उन चिंदियों को डस्टबिन में तो नहीं डाला, वह बदहवास -सा भागता हुआ माँ के कमरे में पहुँचा, डस्टबिन में चिंदियों का ढेर देख वह भावुक हो उठा और अश्रुपूरित नेत्रों से चिंदियों को बटोरने लगा । वह शीघ्र अतिशीघ्र अपने कमरे में पहुँच कर उन चिंदियों को पढ़ना चाहता था, माँ की उदासी व परेशानी की वजह जानना चाहता था । उसने अभी पहली चिंदी खोली ही थी कि बाहर गेट खुलने की आवाज आई । ताऊजी की बेटी महिमा दीदी व जीजाजी आए थे । उसने उन चिंदियों को अच्छे से सहेजकर अपनी अल्मारी की दराज में रख दिया फिर दीदी -जीजाजी के पास आकर बैठ गया किन्तु मन तो बस....चिंदियों में ही उलझा हुआ था, आखिरकार क्या लिखा होगा माँ ने ...... कहीं किसी बात पर नाराज तो नहीं थीं..... कहीं मालिनी से.... ? नहीं..... नहीं....., वो तो बहुत सेवा करती है उनकी ......फिर....., शंका -कुशंका के साये में वह बहुत देर तक लिपटा रहा । दीदी की आवाज से तंद्रा भंग हुई -"मैं खाना बनाकर लाई हूँ, तुम दोनों खाकर थोड़ी देर सो लो । सुबह से लोगों का तांता लग जाएगा । "

प्रदीप व मालिनी, दोनों ने ही खाने के प्रति अनिच्छा प्रगट की परन्तु दीदी ने बहुत आग्रह करके भोजन करवाया फिर कमरे में सोने के लिए भेज दिया । ऐसे में नींद क्या आती...बस माँ की छवि ही प्रदीप की आँखों में छाई हुई थी । माँ को याद करते हुए उसकी स्मृति में वह दिन आ गया जब नौकरी ज्वाइन करने के बाद वह उनको लेने गाँव गया था । पिताजी तो रहे नहीं थे इसलिए उसने ठान लिया था कि वह माँ को अपने पास ही रखेगा परन्तु माँ ने यह शर्त रखी कि पहले तेरी शादी हो जाए फिर तेरे साथ रहने आ जाऊँगी । बस.... शादी होते ही वह माँ को साथ ले आया । उसके बाद तो हम-सब छोटे की शादी में ही गाँव गये थे और तभी घर-द्वार-खेत सब छोटे के नाम कर दिए थे, उसे इन सबसे लगाव भी बहुत था परन्तु मुझे .... मुझे..वहाँ जमींदारी की बू आती थी, इसलिए माँ को भी वहाँ नहीं छोड़ना चाहता था और शायद.... वे भी नहीं रहना चाहतीं थीं..... । छोटे भी जब -तब माँ को अपने पास रहने बुलाता पर वे कभी गईं नहीं, इसलिए वह भी नाराज रहने लगा और माँ से मिलने कभी-कभार ही आता । 

अलसुबह ही प्रदीप के दोनों मामा व मालिनी के भैया -भाभी आ गये थे और नौ बजे तक छोटे भी । वह अकेला ही आया था । इसके साथ ही अन्य सभी करीबी रिश्तेदार भी आ गये थे । सभी अपनों के बीच प्रदीप ने माँ को अंतिम विदाई दी । 

तेरह दिन तक रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहा । फिर एक- एक करके सब अपने घर चले गए । कुछ थकान थी तो कुछ भावनात्मक टूटन, प्रदीप ने चार दिन की छुट्टी और ले ली । तभी एक दिन उसे अनायास उन चिंदियों की याद आई, जिसे वह अल्मारी की दराज में रखकर लगभग भूल चुका था, वह तेजी से उठा, दरवाजा बंद किया और अलमारी खोलकर, सारी चिंदियाँ निकालीं और उनको जोड़- जोड़ कर जतन से पढ़ने लगा । बड़ी मशक्कत के बाद वे जुड़ पाई थीं । उसमें लिखा था-" छोटे व बहू को मैंने माफ कर दिया । मन था कि एक बार उसे देख लूँ किन्तु.... मेरे मन का कभी कहाँ पूरा हुआ है ..... । शादी के बाद से सबकी अवहेलना व तिरस्कार झेलती आई हूँ किन्तु.... अपनी संतान जब सम्मान नहीं देती तो बहुत तकलीफ होती है । मैं अब किसी से कुछ नहीं चाहती, बस... ईश्वर से यही कहना चाहतीं हूँ कि अब मेरी शक्ति चुक गई है‌...., बस.... मेरी और परीक्षा मत लो....भगवन... ! मैंने सबको माफ कर दिया है...सबको..... । मैं सिर पर कोई बोझ लेकर जाना नहीं चाहती । तुम सब खुश रहो । " यह पढ़ते हुए प्रदीप को छोटे पर बहुत गुस्सा आ रहा था कितनी बार उससे कहा था कि माँ से आकर मिल जा, पर वो नहीं आया.....

प्रदीप ने आगे पढ़ना शुरु किया-" प्रदीप, तुम मेरा सहारा थे । तुम्हारी आँखों में झांकते हुए मैंने जो स्नेह व अपनत्व पाया है, उसी की बदौलत जीवन के सारे दुख झेल पाईं हूँ । आज तुमसे एक सच साझा कर रही हूँ.....तुम मेरी अपनी संतान नहीं थे बल्कि.... तुम्हें संभालने के लिए ही मुझे तुम्हारी माँ बनाकर लाया गया था किन्तु सबसे ज्यादा प्यार, अपनापन व सम्मान मैंने तुम्हीं से पाया । सब अपनों के लिए तो मैं पराई ही रही और तुम पराये होकर भी रहे... मेरे अपने, मेरे सबसे नजदीक.... । ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हें जीवन की सारी खुशियाँ मिलें । ''

प्रदीप हतप्रभ सा बार-बार इन पंक्तियों को पढ़ता रहा ...उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वे उसकी सगी माँ नहीं थीं....आँखों से बहती अश्रुधारा के साथ वह बुदबुदा उठा -"मुझे इतना प्यार......इतना स्नेह........ इतना अपनत्व....... दिया..और ...और....आप मेरी माँ 

नहीं.... ! ! कैसे मान लूँ...... ! आप बहुत महान हो माँ ....बहुत महान......, विशाल हृदया माँ..... इतना कहते -कहते उसके भावुक स्वर तेज होते गये और लगभग चीखते हुए वह कह उठा - "तुम मेरी हो माँ.., तुम ही मेरी अपनी माँ ..हो ...तुम. ..केवल . मेरी.. माँ हो... केवल मेरी माँ ...... " यह कहते- कहते उन चिंदियों को अपनी मुट्ठी में समेटे प्रदीप फफक कर रो पड़ा । 

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बोलियाँ (पंजाबी)


"भत्ता लै के चली खेत नूं"

भारत एक खेती प्रधान देश है । गाँव के किसानो की आर्थिकता खेती के उपर ही निर्भर करती है । किसान को समुची मनुष्यता का अन्नदाता कहा जाता है । उसकी मेहनत धरती की छाती से सोना उगाती है । 

इस सभी का सेहरा सिर्फ किसान के सिर पर ही नहीं लगता बल्कि उसकी घरवाली का भी उतना ही योगदान है  जो घर के काम-काज के इलावा खेतों मे उसके लिए भत्ता (खाना) लेकर जाती है । जैसे की निम्निलिखत बोलीयों मे वर्णन किया गया है ।

भत्ता लै के चल्ली खेत नूं 

जट्टी पंदरा मुरेबयां वाली । 

तेरे लोंग दा पया लिश्कारा-

हालीयां ने हल डक्क लये । 

जदों हँस के जट्टी ने घुंढ चुकेया- 

जट्ट दा थकेवां लह गया । 

हाड़ी वढूंगी बराबर तेरे- 

वे दाती नु लवा दे घुंगरू । 

उत्थे लै चल चरखा मेरा-

जित्थे तेरे हल वगदे । 

वे मैं मोंगरे तोड़ के ले आई-

रोटी खा लै चन्न मख्णा । 

जट्टी बण के सरों दा बूटा

भत्ता लै के चली दयोर दा ।



साभार: पंजाब की प्रसिद्ध बोलियां एवं गीत, निरंजन सिंह सैलानी, (स्टेट अवार्डी)

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कहानी

देवी नागरानी, मुम्बई, ईमेल : dnangrani@gmail.com


रखैल की बेटी

वह यूँ ही खड़े खड़े यादों के न जाने किन गलियारों से होता हुआ एक के बाद एक सिलसिलेवार ज़ंजीर का कैदी बनता जा रहा था. ज़ंजीरों की कहीं कमी तो नहीं? उन यादों की अनेक कड़ियाँ थीं, जो उसके ज़हन के तहों में दफन थीं. एक याद आकर जाती, उससे पहले दूसरी उसके साथ जुड़ जाती । ये बेड़ियाँ ही तो हैं जो मर्यादा की परिधि में एक औरत को बांधे रखती हैं, मुक्त ही नहीं होने देती.... वह सोचता रहा !

प्यार, परिवार और त्याग की परिभाषा ! 

क्या औरत का यह रूप भी हो सकता है? कहानी किस्सों में पढ़ा है, सुना... पर जीवन पथ पर अपने ही तन -मन की चारदीवारी की क़ैद में धंसी एक माँ के त्याग की परिभाषा प्रत्यक्ष सुनने, समझने और महसूस करने की हद तक मिलेगी, इसकी कल्पना मात्र से बदन में बिजली सी सिहरन बहने लगती, दिल में बिजली की तारों जैसी झनझनाहट थिरकने लगती, करंट की तरह डंक मारतीं. यादें ज़हन में एक दूजे को धकेलती हुई अपने वजूद को ज़ाहिर करने में रफ़्तार से दौड़ लगातीं.

आंध्र प्रदेश में रहने वाले लोग, ज़्यादातर स्त्रियां अपने प्रांतीय आचरण की, उसकी सभ्यता व संस्कृति की मुरीद होती हैं. वे औरतें अपनी रहनी करनी, बनाव श्रंगार का हमेशा ख्याल रखतीं हैं. उनके काले घने बालों की बुनी लंबी चोटी में गूंथे नारंगी व् सफ़ेद रंग के फूल उनके सौंदर्य को चार चाँद लगाते हैं. इन्हीं वसीलों से सुसज्जित होकर वे अपनी दिनचर्या के कार्यों को अंजाम देते हुए अपने अस्तिव की पहचान बनाये रखती हैं. 

सुबह सुबह उठ कर, पहले घर की चौखट के बाहर झाडू मारना, पानी छिड़कना, गोबर का लेप लगाना, अंत में पोछा लगाकर सफेद रंग के पाउडर (मोंगू) से चौखट के बाहर सुंदर रंगोली सी बनातीं, जो घर के भीतर आने वाले का स्वागत करती. फिर खुद नहा धोकर साफ सुथरी सूती साड़ी पहन, पूजाघर में कुल गुरू के सामने ज्योत जगा कर अपने गले में पड़े लाल-काले मोतियों और सुनहरी दानों वाले मंगलसूत्र, जिनके बीचोंबीच दो सोने की कटोरी नुमा सूत्र और उनके बीच एक रूबी समान लाल पत्थर के उस सूत्र पर चंदन और हल्दी का टीका लगाती और भगवान के नाम का जाप करते हुए उसे अपनी आँखों पर रखती. सुहागन होना वैसे भी एक औरत का सौभाग्य है और माँ बनना उसकी पूर्णता का प्रतीक ! गले में मंगलसूत्र व हल्दी सने पावों में बिछुए उनकी पहचान, उनकी सुहागन होने की निशानी, उनकी संस्कृति का प्रतीक व् प्रमाण !

तंगम्मा भी अपने अस्तित्व की मर्यादा को अपने वजूद के साथ एकाकार करके पुरुष प्रधान समाज में अपना स्थान बनाकर अपने लिए एक महफूज़ दायरा बनाने की कोशिश में सबसे अधिक प्रयासरत रहती.

सोच की परछाइयों से हक़ीक़त के दरवाज़े तक ले आने वाली, उसकी दी हुई दस्तक के जवाब में पुरानी खोली का दारवाज़ा खोलने वाली की कर्कश आवाज़ ने जैसे उसे नींद से जगा दिया. 

‘कौन है ? जाने कौन सुबह सुबह अपना सुख बर्बाद करके औरों का सुख लूटने चले आया है?’ दरवाज़े की सांकल खोलते ही उस सुकन्या ने अपने सामने एक सुशील नौजवान को खड़े पाया.

‘कौन हो भाई? यहाँ क्या कर रहे हो?’ वह एक ही सांस में पूछ बैठी.

वह खामोशी से उसे निहारते हुए मुस्कराने लगा.

‘टुकुर- टुकुर कर क्या देख रहे हो? क्या सुनाई नहीं देता या बहरे हो?’ कर्कशता बरक़रार रही.

‘…………….’ उसकी झुकी हुई आँखें, खामोश लबों से तालमेल खाती रही. 

‘अरे कुछ तो बोलो...क्या गूंगे हो? कहते हुए वह भी उसकी ओर निहारने लगी.

‘कुछ भी नहीं, बस यूँ ही .... !’ कहते हुए उसने एक भरपूर नज़र उसपर डाली और मुस्कराते हुए लाया हुआ पान उसकी हथेली पर रख दिया । 

“तुमने क्या मुझे बाज़ारू औरत समझ लिया है, जो आए दिन मुँह में पान बीड़ा दबाये, मेरे लिए एक लेकर दरवाज़े की सांकल खटखटाते हो, जैसे मेरा हाथ माँगने की भूमिका बांध रहे हो । “

वह चुपचाप आँखें झुकाये मंद मंद मुस्कराता और उसकी ओर यूँ देखता रहा जैसे वह कोई उसकी अपनी खोई हुई टकसाल हो .. !

छरहरा बदन, क़द 5’3”, तीखे नयन नक्श, सांवला रंग, जिस पर केसरी रंग की साड़ी, जिसका काला बार्डर उसके तन पर कसे हुए काले ब्लाउज़ के साथ सौन्दर्य को दुगुना कर रहा था. हाथ में हरे रंग की काँच की चूड़ियाँ, बालों के बीच माँग, माँग में भरा लाल सिन्दूर, माथे पर बड़ा सा लाल टीका जो उसकी सादगी में सौन्दर्य का प्रतीक बनकार दमक रहा था. नज़र जैसे-जैसे चेहरे से होते हुए नीचे उतरती तो पतली कमर में ठूंसा हुआ साड़ी का अस्त-व्यस्त पल्लू उसके यौवन की हिफाज़त पर उतारू होता दिखाई पड़ता. कमर के आस पास चिकनी चमड़ी पर से होता हुआ, चांदी का एक घुँघरुओं से जड़ा छल्ला झूलता हुआ, उसके हर क़दम पर कमर की लचकन के साथ कुछ ऐसी हलचल मचाता जैसे किसी ने ठहरे पानी में कंकर उछाला हो... !

समूचे शरीर पर से नज़र थिरकती हुई आकर उसके पावों पर अटक जाती. हल्दी सने पैरों की दूसरी उंगली में पड़े बिछुए उसके नारीत्व को सम्पूर्ण कर रहे थे.

अचानक उस ललकारती तेज़ आवाज़ ने जैसे उसे फिर नींद से जगाया.

‘तुम्हें शर्म नहीं आती, इस तरह किसी लड़की के यहाँ रोज़ आना-जाना, क्या तुम्हारे घर में कोई माँ बहन है या नहीं…?’

‘...................’

‘ क्या मुंह में मोती उगे हैं, जो मौन धारण कर लिया है?’

‘........................’

‘अगर आंखों ने अपना काम पूरा कर लिया हो तो तुम यहां से रफा दफा हो जाओ. मुझे अपने घर का काम करना है’ कहते हुए उसने जोर से दरवाजा बंद किया.

उल्टे पाँव घर के भीतर जाते हुए राजम्म सोचती रही कि यह कैसा इंसान है? जवान तो है, सुशील भी है. इतनी डाँट-डपट व् तिरस्कार के बावजूद भी पलट कर ग़लत शब्द का इस्तेमाल नहीं करता. कभी औरत के लिए बुरे व् अपमानित लफ्ज़ नहीं बोलता. क्या उसका यहां आना किसी उद्देश्य की पूर्ति है या उसके मन में कोई लालसा या इच्छा है जो वह व्यक्त नहीं करता, या करना नहीं चाहता? क्या जाने किस मजबूरी के तहत वह आए दिन यहां आता है, रुकता है, मुस्कुराता है और बहुत सी कड़वी बातें सुनकर लौट जाता है फिर आने के लिए.’ यह सोच उसे बार बार जकड़ती जाती. 

अगली बार जब उसकी दस्तक के जवाब में राजम्म ने दरवाजा खोला तो उसे देखते ही अपने भीतर की सारी कड़वाहट उंडेलते हुए पाँव का जूता निकाल कर बाहर फेंकते हुए कहा-’अपनी इज़्ज़त का ख्याल नहीं, न सही, कम से कम किसी लड़की के मान की धज्जियाँ तो मत उड़ाओ. तुम क्यों समझ नहीं रहे हो?’

 ‘...............’ वह मौन के दायरे में मूक खड़ा उसकी ओर देखता रहा.

‘मेरी बदनामी से तुम्हें क्या मिलेगा?’ वह जैसे उसे गलियाँ देते देते, तिरस्कार करते करते हताश हो गई थी. कुछ कहते कहते फिर चुप सी हो गई.

“...... मैं…. मैं…. !’ कहते कहते वह भी चुप हो गया.

‘यह क्या बकरी की तरह मैं-मैं कर रहे हो? तुम्हारी नजरें एक तेज धार की तरह मेरे बदन को भेदने में माहिर है, पर क्या तुम्हारी जबान को लकवा लग गया है. कि....... !’ राजम्मा अब कहने को तो बहुत कुछ कह जाती पर उसकी सोच यह दावा करती रही कि कोई तो बात है जो इतना सुनने के बाद भी, वही सौम्य मुस्कान चेहरे पर लिए वह लौट आता है, जहाँ इसके पहले कोई इस तरह सब्र और सभ्यता के पैमाने पर कोई खरा नहीं उतरा.

वह वापस आने के लिए लौट जाता, उस कडवाहट को अमृत में बदलने के लिए. माँ के ख़त से मिली हुई जानकारी उसे थी, पर राजम्मा तो अनजान थी. वह परखना चाहता था कि उसकी माँ जाई कितने पानी में है? क्या वह उस घर के संस्कार इस घर में ले आई है, माँ के दिए हुए संस्कारों का पालन कर रही है?

  और एक दिन जमी हुई बर्फ़ पिघल गई....दरवाज़े पर दस्तक देते ही जैसे दरवाज़ा खुला तो वह कह बैठा-“ राजम्म मैं तुम्हारा....भा....भाई. ना...नाराय...ण...तंगम्मा और नागेश्वर अय्यर का बेटा...." कहते हुए वह भीगी आखों से उसकी ओर देखने लगा.

"नारायण, मेरे भाई" वह खुशी के छलकते हुए आंसुओं से तर चेहरा अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछती जैसे उमड़ती हुई नदी की तरह आकर नारायण की चौड़ी छाती से लग गई.

नारायण ने राजम्म को अपने सीने से लगाते हुए, सर पर हाथ फिराया तो राजम्म को लगा कि वह एक घने शजर की छाँव तले खड़ी है.

"तुम..तुम यहाँ कैसे भाई....कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ."

इससे पहले कि वह और कुछ पूछती, नारायण ने उसके सर को थपथपाते हुए कहा..."बहन, माँ की चिट्ठी में तुम्हारा परिचय मिला और यह पता भी. इसी कारण मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ.’

‘भाई मेरे...भाई... मैं भी यहाँ एक बरस से माँ के आदेशानुसार तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही हूँ. माँ ने तो यहां भेजने के पहले मेरा स्वरूप ही बदल दिया, लगा जैसे मैं माँ का नया अवतार हूँ. और बार बार ताकीद करते हुए दो तीन बार आपके नाम का लेते हुए, आपके इंतजार करने की कड़ी हिदायत दी. पूछने पर यही कहा कि वह आकर तुम्हें बता देगा, और सँभाल लेगा. और मैं बस मैं यहाँ उलझनों के दरिया में डूबती तैरती आपका इंतज़ार करती रही.’ कहकर वह जैसे अपने बरसों से खोए हुए भाई की ओर सूने नयनों से देखने लगी.

"तो तुमने भी मुझे नहीं पहचाना?" कहता हुआ वह एक दबी मुस्कान को ज़ाहिर होने से रोकने लगा.

"नहीं इसीलिये ऐसी गुस्तखियाँ कर बैठी..., पर वह पान ले आना.....?"

"अरी पगली, बस यूँ ही देख रहा था कि माँ के दिये हुए संस्कार कैसे इस आँगन में महक रहे हैं, जिनकी खुशबू मुझे यहाँ तक खींच लायी है."

"भाई मुझे माफ कर देना. मैंने तुम्हें उन मर्दों की कतार में खड़ा किया जो औरत को फ़क़त विलास की वस्तु समझते हैं...और...."

"अरी पगली, तू सब कुछ भूल जा. अब तू अकेली नहीं, तेरे साथ तेरा बड़ा भाई है." कहते हुए नारायण ने घर की ओर देखा.

"भैया मेरी नादानी ने मुझसे क्या कुछ न कहलवाया .... !" अभी वह बात पूरी भी न कर पाई कि नारायण ने बीच में बात काटते हुए कहा" राजम्म, तुम और मैं एक ही माँ की कोख से जन्मे हैं. पर मेरा पिता नागेश्वर अय्यर और तुम्हारे पिता राघवन नागर. तुम्हारी खातिर माँ ने अपने ही बेटे से नाता तोड़ा और तुझे अपनी बेटी स्वीकार किया. बहुत बरस बीत गए, मैं माँ के आँचल की छाँव को तरसता रहा, पर उनके जीवन की त्यागमय पगडंडियों को याद करके नतमस्तक हो जाता हूँ. मेरे पिता एक हादसे में अपंग होकर, बस बिस्तर के हवाले हो गए... मैं शायद उस समय पांच साल का रहा होऊंगा शायद... ! माँ मुझे स्कूल भेजकर पिताजी की ज़रूरतें पूरी करके उसे खाना खिलाकर कुछ हिदायतों के साथ घर के बाहर चली जाती, और रात देर से घर लौटती जब मैं सो चुका होता. फिर यह सिलसिला तीन साल चला. एक दिन पिताजी को अटैक आया, और वे परलोक पधारे. एक तरह से माँ को उस दोगली ज़िन्दगी से निजात मिल गई. पर मैं फिर भी घाटे में रहा. माँ का प्यार मिला, मुझे नहीं 

तुझे ! माँ ने एक तरह से मेरा त्याग कर दिया, ताकि तू उन के जीवन के गलियारे का कोई अक्स अपने दिल के परदे पर न उकेर पाए.’ कहते कहते वह जैसे धुंध की परछाइयों में खो सा गया, अपने बीते हुए कल को आज के साथ जोड़ता रहा. 

‘राजम्म, यही तो वह घर है जहां मैं पैदा हुआ, बड़ा हुआ पर इतना बड़ा नहीं कि अपनी माँ के किसी काम आ सकूं. अपने अपंग पिता के लिए भी मैं कुछ नहीं कर पाया. जो कुछ किया माँ ने किया. उसने अपना आपा गंवा कर मेरी और तुम्हारी पहचान बनाने में बहुत कुछ खो दिया." कहते हुऍ नारायण राजम्म का हाथ थामे अपने ही घर में कदम रखते हुए सामने पसरी हुई खाट पर बैठा. वह शून्य नज़रों से उन दीवारों को देखने लगा जिनपर उसके बचपन की यादों के अनेक अक्स अब भी बाकी थे. राजम्म रसोई घर में जाकर चाय का पानी चूल्हे पर चढ़ाकर, अपने भाई के लिए पानी ले आई.

“भैया माँ के बारे में कुछ और बताइये ना ?" आतुर आवाज़ में राजम्म कह उठी. 

"यही वह बस्ती है, जहाँ माँ ने तुझे बेटी बनाकर पनाह लेने के लिए मजबूर किया. एक सुहागन के महान चरित्र में तुझे ढाल दिया. अपंग पति जब तक था, वह इसी चाल में अपना घर संसार बसाये हुए थी. तब वह मेरी माँ थी, मेरी बदनसीब माँ, जो अपने बेटे की पढ़ाई लिखाई के लिए राघवन नागर के अहसानों तले दबी उसके साथ वफ़ादारी का वृत निभाती रही, क्योंकि वह हर माह मेरी पढ़ाई का, और हॉस्टल में रहने का खर्चा बर्दाश्त करता था.”

"भैया, पर माँ की ऐसी कौन सी मजबूरी रही होगी जो वह यह घर छोड़कर नागेश्वर के घर रहने चली गई, जहाँ उसे जिल्लत के सिवा कुछ भी न मिला." राजम्म अब अधिक जानने के लिए सवालों के तांते बांधने लगी.

‘हाँ, माँ अपने व्रत का पालन करने में प्रबल रही. मेरे पिता नायर तो कई साल तक एक अपंग का जीवन बिताकर आखिर इस जहाँ से छुटकारा पा गए, और माँ को आजादी के नाम पर एक बदरंग क़ैदनुमा जीवन जीने के लिए छोड़ गये. मैं नागेश्वर का बेटा और तुम राघवन की बेटी, पर हमारी माँ वही है जिसे उसने रखैल बनाकर रखा.”

“मत लो उसका नाम मेरे भाई, वह पिता के नाम पर एक दरिंदा था. औरत क्या है, उसका त्याग और बलिदान क्या होता है मुझसे पूछो? मैं तो उसी माँ का बेटी हूँ जिसने मुझे पहचान देने और दिलाने के लिए सब कुछ दाव पर लगा दिया. खुद को कलंकित नामों से सुसज्जित करवाती रही. राघवन खुद उसे कभी ‘छिनाल’ तो कभी ‘रांड’ जैसे नामुराद नामों से संबोधित करता, तो कभी अपने मित्रों के सामने बड़े ही गर्व से उसे अपनी ‘रखैल’ का दर्जा देते हुए, मेहमान नवाजी के तौर तरीके सीखने के लिए ललकारता.. कुछ ऐसे जैसे कोई अपने मुलाजिम को भी नहीं पुकारता.” राजम्म घायल शेरनी की तरह गुर्राने लगी.

"राजम्म, उस औरत ने तो जिंदगी से सुलह करते हुए सब कुछ स्वीकारने का निर्णय लिया. आर्थिक बेबसी ने कुछ न करने की बेड़ियों में उसे यूं जकड़ लिया, कि माँ ने उस ज़मींदार राघवन नागर से अपने परिवार के लिए कुछ वक्त उधार लिया, बाद में जिसकी वह रखैल बनकर रही. ‘छिनाल’ व ‘रखैल’ का संबोधन सुनते सुनते वह जैसे इस अलंकार को भी अपना गहना मान बैठी. जब घर के अन्य सदस्य भी उसके सामने तिरस्कार से थूक जाते, तब भी वह अपने धर्म से परे न हो पाई. वचनबद्ध इंसान एहसान फरामोश कैसे हो सकता है? उसने अपने नारीत्व, मातृत्व व पतिव्रता अपनी मर्जी से गिरवी रखे, जिसके एवज़ उसका अपंग पति नागेश्वर अय्यर कुछ सालों तक इलाज पा सका. लेकिन उसकी मौत के पश्चात भी माँ ने अपना सिंदूर नहीं मिटाया, अपने गले से मंगलसूत्र, और पाँव के बिछुए नहीं उतारे. सदा सुहागान का वरदान समझ कर सजाये रहती.

राजम्म को अपना वह बचपन याद आया जहां उसने अपनी माँ तंगम्मा को एक भारतीय आदर्श नारी के रूप में देखा. राघवन नायर उसके पिता थे, पर न के समान. जब से उसने आँख खोली थी, अपनी समझ से अपनी माँ को बहुत कुछ झेलते हुए पाया, वह गालियाँ जो खुद नहीं सुन सकती थी, माँ को सुनते हुए, बर्दाश्त करते हुए पाया. घर के और सदस्य भी तिरस्कृत भाषा में उसे संबोधित करते.

“अरी ओ छिन्नाल, कलमुँही क्या तुझे ज़रा भी लाज नहीं आती. उस भड़वे के कमरे में रात-दिन सड़ती रहती है । ” यह आवाज़ आस-पड़ोस के झरोखों से नित नए सुर में सुनाई देती.

एक कहती---

“अरी यह नामुराद क्या पतिव्रता धर्म की मर्यादा भूल गई है जो उसकी रखैल होने का फ़र्ज़ पूरा कर रही है. इस लड़की के लिए अपने बेटे का त्याग कर दिया...उसे कहीं दूर पढ़ने के लिए भेज दिया है. अब बेटी को भी इस बस्ती से दूर रखने के सपने बुन रही है. अरे बदनाम बस्ती के बदनाम लोगों के बीच अभी भी इसकी शराफ़त पल रही है. देखो तो सही, कैसे पतिव्रता धर्म की पालनहार बनी फिरती है?’ ’

दूसरी कहती---

‘एक तरह से काम से काम रखती है. किसी की बातों में नहीं पड़ती. जब से पहला पति मरा है, राघवन के मकान को घर बनाने 

में लगी है. बेटी को भी काफी गुण कूट कूट भरे हैं. औरों सी नहीं है यह... !’ वह दूसरी उसके पक्ष में कहती. 

‘औरों सी नहीं तो कैसी है बता...?’ पहली औरत तुनक कर नाक मरोड़ती. 

और राजम्म किवाड़ की आड़ में अपने आप को माँ की नज़रों में तोलती को कभी औरों की ईर्षापूरक् नज़रों में तोलती....संधि का कहीं नमो-निशान न होता.

ख्यालों की दुनिया से हक़ीक़त से सामना करते हुए राजम्म ने नारायण की ओर देखते हुए कहा---

"माँ के प्रतिभामान संस्कृति का सौंदर्य, उसका व्यहवार लांछन व उल्लाहना से परे रहा, इसका मुझे अंदाज़ा है भाई."

"मैं भी बस इसी एक रिश्ते का कायल हूँ. पिताजी के गुज़रते ही राघवन ने धाक ज़माने की कोशिश की. बाद में मेरी पढ़ाई के खातिर माँ ने अपने आप को दाव पर रख दिया. इधर मैं हॉस्टल में और माँ राघवन के घर में रखैल बनकर रहने लगी. लेकिन वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकती थी, पर यह कभी नहीं कि कोई कोई तुम्हें "रखैल की बेटी" के नाम से संबोधित करे. .....बाकी तुम जानती हो." कहते हुऍ उसने अपने अश्क सोख लिये.

"भैया, माँ के त्याग की मर्यादा वंदनीय है, इसी लिये शायद मुझे एक सुहगान का पैरहन एवं शृंगार वरदान में दिया, और तुम्हारे आने का इंतजार करने के लिये अनुरोध किया. मेरे भाई तुम उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे हो, मुझे इस बात पर गर्व है." कहते हुए राजम्म उठी और अपने भाई के चरणों को छूने के लिये झुकी.

नारायण ने बड़े भाई का फर्ज निभाते हुऍ उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा-"एक बात याद रखना, अब तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी छोटी बहन राजम्म हो और अपने इस घर की मलिका हो. मैं सिर्फ़ माँ की बात का मान रखने का प्रयास कर रहा हूँ. उस देवी ने मुझसे अपने दूध की कीमत माँगी है- ‘एक बड़ा भाई बनकर छोटी बहन की रक्षा करो और उसके जीवन पथ के मार्गदर्शक बनो ! जहाँ मैं रहती हूँ, उस बदनाम बस्ती की ओर भूलकर भी रुख न करना. भूल जाना कि तुम्हारी कोई माँ है, बस दोनों मेरे संस्कार की लाज निभाना और खुश रहना.

सदैव तुम्हारी अभागन माँ."

‘नारायण भैया...” कहते हुए राजम अपने भाई के सीने से लग गई... !

मनोभावों की लहरों से किनारों का संगम परिपूर्ण हुआ.

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आलेख

डॉ. चेतना उपाध्याय, अजमेर, मो. 9828186706, 8094554488


मानवीयता का उपसंहार

कुछ कहानियां कितनी सच्ची सी होती है । पढ़ते पढ़ते ही लगता है कि आसपास में ही घटित होती प्रतीत हो रही है । जैसे ऐसी ही एक कहानी "सम्मान की पेंशन' अभी मुझे पढ़ने का अवसर मिला जो मुझे उड़ाकर 35-40 वर्ष पूर्व के मेरे बचपन में ले गया । हर पात्र मेरा अपना करीबी सा लग रहा था । हर घटना वैसी ही तो थी जैसी तब हुआ करती थी । रज्जो बुआ, बड़की ताईजी, बड़े दादाजी, नीलम चाची, छोटी दादी, मम्मी, पापा के बीच घटने वाली घटनाएं सभी कुछ वैसी ही थी । जो अभी कहानी में घटती दिखाई दे रही थी । बात बेबात उलझते थे.... और पल में ही सुलझ जाते थे । सुलझाने के लिए दादीजी की निगाह भर देख लेना ही काफी होता था । कभी दादाजी के खखारने की आवाज मात्र सुलझा जाती थी समस्याओं को । इस कहानी का अंत ऐसे ही सहजता से समझाने वाला था । मानो कहीं कुछ उलझा ही ना हो । इशारों में ही अपनी गलती समझ आ जाती थी और पल में ही स्वीकार ली जाती थी । बड़ों के मान की रक्षा करना छोटों का कर्तव्य हुआ करता था । जिसकी आपूर्ति वे बड़े ही सहज स्वाभाविक रूप में करते ही थे । पापा, मम्मी, 'चाचीजी हो या ताईजी किसी को मैंने दादाजी-दादीजी या ताऊजी पर पलटवार करते ना देखा था । दादी जी की आज्ञा बिना घर का पत्ता भी नहीं हिलता पर किसी अन्य के भीतर हीनता बोधक ग्रंथी कभी पैदा होती दिखाई नहीं दी । सभी कुछ संयुक्त परिवारों की आन बान शान पर सहजता से कुर्बान होता था । रिश्तों की मर्यादा सहज स्वीकार्य दिखाई पड़ती थी । 

फिर शुरू हुआ परिवारों में नारीवादी / पुरुषवादी सोच का दौर... इससे पहले हम दादा/दादी, नाना / नानी जैसे रिश्तों की डोर में गुँथे रहते थे....... अब नारीवादी/पुरुषवादी सोच मुखरित हो रिश्तों से बाहर पैर पसारने लगी पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को चारदीवारी के मध्य सुरक्षा की बजाय घुटन का एहसास होने लगा, उतना ही स्त्री घुटन बढ़ने लगी । स्त्री पुरुष समानता का दौर विकृत समाज की भेंट चढ़ता गया । स्त्री कमतर से कामतरी की ओर बढ़ने लगी । परिवारों में जो स्त्रियाँ, . सास-बहू, देवरानी-जेठानी, ननंद-भाभी हुआ करती थीं छोटी-मोटी नोक-झोंक, निंदा इसका भरपूर आनंद लेते हुए जीवन यापन करती थी... साथ ही अपनी पारिवारिक परंपराओं का तहे दिल से अनुपालन करती थीं । तीज त्योहार परिवारों की कड़ी से कड़ी जोड़ने का कार्य कर ही जाते थे । सामाजिक अंकुश भी फेविकोल की भूमिका अदा कर ही जाता था । 

सबकुछ धीरे-धीरे समय की भेंट चढ़ गया । रिश्तों की डोरी कच्ची पड़ती गई और उसमें गुंथे रिश्तों रूपी मोती बिखर स्वतंत्र व्यक्तित्व में तब्दील हो गए । परिवार का प्रत्येक व्यक्ति पृथक-पृथक स्वतंत्र अस्तित्व का मालिक हो गया । शैक्षिक व्यावसायिक समानता ने स्त्री को पंख दिए । ये वही पंख थे जो कभी पारिवारिक मान्यताओं के तहत बेरहमी से कतर दिए जाते थे । पंख कतरने के बाद भी स्त्रियाँ पारिवारिक हौसले की बदौलत कभी माँ तो कभी बेटी, कभी बहू तो कभी सास के रूप में उड़ान भर ही लेती थीं । क्योंकि वह जानती थी असली उड़ान पंखों से नहीं हौसलों से होती है । 

आज सभी के पास व्यक्तिगत पंख ही नहीं व्यक्तिगत आकाश भी मौजूद है । आप सभी जानते हैं धरती के पास अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति होती है । जैसे-जैसे आप पृथ्वी से दूर आकाश की ओर जाते हैं वह गुरुत्वाकर्षण शक्ति क्षीण होती जाती है । परिणाम स्वरूप हम धुरी से जुड़े नहीं रह पाते व पता ही नहीं चलता उड़ते उड़ते कब आपस में टकरा जाते है । ........... टकराते जाते है । क्योंकि पंख ही नहीं आकाश भी हमारा अपना है, गति भी हमारी अपनी है दिशाएँ भी हमारी अपनी है अतः उलझने भी नित्य नवीन अपनी ही है । जिससे हमारे हौसले भी जवाब दे रहे हैं । जिस धरती पर हम सहजता से स्थिर रह लिया करते थे आकाश को देखकर जी लिया करते थे आज इतना स्थिर व संतुलित रह पाना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो गया । 

वैसे यह खदबदाहट छोटी बुआ और रानू चाची की शादी के बाद से ही सुनाई व दिखाई देने लगी थी.. थी........ मगर हां दादीजी के नेतृत्व के चलते मुखरित नहीं हो पाती थी अक्सर ही ताई जी ढाल बनकर समस्याओं को अपने साथ किनारे से बहा ले जाती थी । समय हवा के घोड़े पर सवार हो तेजी से आगे निकल जाता था । तभी तो सारे रिश्ते पीढ़ी दर पीढ़ी आत्मानुशासित स्वरूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अनुभवों की पोटली थमाते आगे बढ़ते रहे । परिवर्तन संसार का नियम है, होना ही है । 

किंतु आज का समय कितना बदल गया ? कुछ समझ नहीं आता.. कहीं कोई बड़ा नहीं, कहीं कोई छोटा नहीं, उसके बावजूद भी समानता की आंधी इतनी जबरदस्त ? ऐसा लगता है चारों ओर जंगल सा माहौल । हम और हमारे परिजन एक दूसरे को कच्चा निगल जाने को आतुर । सामाजिक रिश्ते, सामाजिक मर्यादाएँ सब कुछ स्वाहा.... चारो और आग ही आग । कहीं थोड़ा दूर देखने का प्रयास करो तो सिर्फ धुँआ ही धुँआ रिश्तों का धुँआ । समाज, मानव समाज, सामाजिक गठबंधन इतने-कितने ढीले पड़ गए कि दिखाई ही नहीं दे रहे ?

हमने पुस्तकों में पढ़ा था, आदिमानव जब जंगलों में रहा करता था उसने सभ्यता, सामाजिकता की ओर कदम बढ़ाने से पूर्व पत्थर से पत्थर टकराकर आग जलाना सीखा था और अब आज सभ्य समाज में रहते हुए मानव को अनेक युग बीत चुके हैं । तो वह शनैः शनैः मानव से मानव टकराकर आग लगाने के तरीके सीख चुका है । कब, कहाँ, कैसे ? का कोई सानी नहीं । हल्की सी टकराहट चिंगारी ही नहीं सीधे आग की लपटें छोड़ देती है कब, कहां, कैसे, कौन झुलस जाए कुछ कहा नहीं जा सकता । जंगलराज चारों और पसरता ही जा रहा है । ऐसा लगता है कि मानो आदिकाल में आदिमानव ने इस तरह से अपने मस्तिष्क की विलक्षण क्षमताओं का सदुपयोग कर सभ्य समाज की ओर कदम बढ़ाए थे, ठीक उसी प्रकार ही वर्तमान मानव अपने मस्तिष्क की विलक्षणताओं का उपयोग कर उन्मुक्तता के साथ जंगलों की ओर कदम बढ़ा रहा है । जंगली जीवन की उन्मुक्तता उसे बड़ी ही गर्मजोशी से आकर्षित कर रही हैं यह आकर्षण इतना जबरदस्त है कि हमें स्वतंत्रता व स्वच्छदता के मध्य अंतर समझ ही नहीं आ रहा । हम दौड़े चले जा रहे हैं । कहां जाना है नहीं जानते हैं क्योंकि लक्ष्य निर्धारित करने, अपेक्षित योजनाएँ बनाने फिर उसकी क्रियान्विति को अमलीजामा पहनाने जैसे अत्यावश्यक मुद्दों पर कार्य हेतु हमारे पास समय ही नहीं है । आदि काल में हमने सूर्योदय के साथ पूर्व से अपनी दौड़ प्रारम्भ की थी, अब दौड़ते दौड़ते हमारे कदम पश्चिम तक पहुँच रहे है । ठीक वैसे ही जैसे हमने जंगलों से दौड़ लगाई थी.....सभ्य समाज की ओर । आज हम सभ्य समाज के मुहाने पर हैं । जहां से जंगल स्पष्ट दिखाई दे रहा है ...... .............. मगर हम अपनी दौड़ पर नियंत्रण रख पाने की स्थिति में अपने आपको असमर्थ पा रहे हैं । हमारी आँखों पर प्रगतिवादिता की पट्टी चढ़ी हुई है जिसके कारण हमारी नेत्र ज्योति कुछ धुंधला सी रही है । हम अपनी स्थिति स्पष्ट रूप में देख नहीं पा रहे हैं फिर चहुँओर स्वार्थ की आँधी भी इतनी तीव्र है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब उस बयार से प्रभावित हो उसकी रौ में बहने लगे हैं । 

पुरुष पुस्तकीय ज्ञान और अनुभवी ज्ञान का खज़ाना हम महसूस ही नहीं कर पा रहे हैं, उसके उपयोग की तो बात ही पैदा नहीं होती । हमारे बुजुर्ग, युवा और बालक सभी कुंठित से एक दूसरे की आस में एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं । इंसान स्त्री रूपी दो खेमों को कभी जोड़ता, कभी तोड़ता, कभी उलझता प्रतीत हो रहा है । तीसरा खेमा किन्नरों का भी मुखर होता जा रहा है । अस्तित्व की लड़ाई के चक्कर में हम सभी अस्तित्वविहीन होते महसूस हो रहे हैं । बुजुर्गों के सानिध्य में कभी बालकों को अपना बालपन जीने के भरपूर अवसर मिल जाया करते थे । युवा पीढ़ी उनमें फेविकोल का जोड़ की भूमिका अदा करती थी । और स्वयं स्वतंत्रता पूर्वक दैंनदिनी के कार्यों में अपनी उर्जा का सदुपयोग किया करती थी.. आज युवा पीढ़ी बुजुगों व बालकों के मध्य पत्थर की ठोस दीवार बनी खड़ी है परिणाम स्वरूप वृद्ध बालकों सी हरकतें करने लगे हैं, व बालक युवाओं सी । हमने पुस्तकों में पढ़ा था की बालक बूढ़े एक समान.....जी हाँ वे मासूमियत निश्च्छलता में एक समान होते हैं । शारीरिक क्षमता में भी तनिक सी समानता होती है । बालकों की मांसपेशियों व तंत्रिका तंत्र में आपसी सामंजस्य अभी पूरी तरह प्राप्त नहीं हो पाया होता है तो बुजुर्ग उस संतुलन के क्षय को भोग रहे होते हैं । दोनों ही इस रूप में लगभग समान । जी हाँ  अल्प क्षमता वाले । मगर वर्तमान स्थिति विकट है । परिवारों के वे ताने-बाने जो पूर्व में हुआ करते थे आज नदारद है । अपनी अपनी स्वतंत्र छवि गढ़ने को आतुर हमारे परिजन स्नेह पिपासा में ही दुनिया से रुखसत हो रहे हैं । सोशल मीडिया पर ही मात्र स्नेह स्रोत बरसते दिखाई देते हैं । शेष जगह तो प्यास और सिर्फ प्यास व्याप्त है । जिससे एक अधूरापन, खोखलापन सा सभी को परेशान कर रहा है । कोई किसी को समझना ही नहीं चाहता मगर अपेक्षा यही रहती है कि सामने वाला हमें समझे । हम मानवीय अनुभूतियों से परे होते जा रहे हैं....... अब इस करोनासंकट ने हमें प्राकृतिक स्वरूप में भी सामाजिकतओं से दूर कर दिया है..... । हम कहां थे, कहां जा रहे हैं.........जहां से चले थे वहीं जा रहे हैं । माटी के पुतले . माटी में समाने जा रहे है । आज आवश्यकता है हम दो पल ठहरे. । ठहरे........ . विचार........... हो सकता है हमारी आगामी पीढ़ी समाज में थोड़ा और टिकी रह पाए । 

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संस्मरण


श्रीप्रकाश सिंह 

उर्फ मनोज कुमार सिंह

उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय, 

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, 

पासीघाट, अरूणाचल प्रदेश, 

मो. 9436193458

एक यात्रा ऐसी भी

माँ दृष्ट है, सृष्टि है, माँ ही सृजन और सर्जना है । माँ संवेदना, चेतना, प्राण और भावना है । माँ अव्यक्त है, अकथ्य, अविकार, आकार और निरंकार है । माँ पूज्यतम परम आत्मा है- सर्वसंभ्राँत है । माँ शब्दातीत है, असीम है, अनंत है । माँ आकाश से भी अधिक विस्तृत और धरती से भी अधिक धीर और गंभीर है-माँ परम विशिष्ट है । माँ से पावन कुछ भी नहीं । न कोई शब्द, न कोई मंत्र, कोई धर्मग्रंथ भी नहीं – माँ पावनतम है । माँ की ममता उसकी आत्मा से भी बड़ी होती है, तभी तो माँ का जाप करने के लिये भगवान भी समय- समय पर अवतार लेकर माँ की गोद- में किलकारियां भरते सबसे पहले “माँ” शब्द का ही उच्चारण करते हैं । माँ की महिमा अपरम्पार है । माँ को परिभाषित कर दे- ऐसा न शब्द है, न अर्थ है, न बिम्ब है, न प्रतीक है- न चरित्र है, और ना ही चित्रकार है । माँ बस एक कोमल एहसास है । माँ मधुबन है, सावन है, मनभावन है- माँ तो बस एक मासूम पुकार है - माँ अद्वितीय है । 

यहाँ पर मैं एक दृष्टाँत ( संस्मरण) प्रस्तुत करना चाह रहा हूँ जिससे कि माँ की ममतारूपी महासागर से एक- आध मोती चुनकर मैं फिर से धनवान बन सकूं । 

मेरी माँ, हाँ, मेरी माँ ! मेरी माँ बूढ़ी हो चली थी - लगभग 70 वर्ष की उम्र हो गई थी । अनेक बीमारियाँ उन्हें जकड़ चुकी थीं- चलना, उठना - बैठना बहुत ही मुश्किल से हो पाते थे ! गालों पर झूलती झुर्रियाँ, बाल सफेद, धंसी ऑखे, पर उन बूढी ऑखों में बहती ममता की मंदाकिनी का अविरल प्रवाह कभी कम नहीं हुआ । अब तो सही से बोल भी नहीं पाती थीं - आवाज लड़खड़ाने लगी थी, पर बोलती तो एक दिन में न जाने कितनी बार अपने बेटे को ही पुकारती थीं ।

छुट्टी में मैं जब भी घर जाता तो एक छोटे बच्चे की भॉति अब भी वह मेरे पीछे पड़ी रहती थीं - “मुँह धोये कि नहीं, नास्ता किये कि नहीं ?” सुबह जगने के साथ ही ढ़ेर सारे प्रश्न एक ही साँस में कर बैठती थीं । अगर किसी कारण से “नहीं” शब्द मुँह से निकल गया तो खैर नहीं । एक दम से बरस पड़ती थीं - “तुम नहीं मानोगे, मैं तो समझाते थक गई हूँ कि समय से नाश्ता किया करो, समय से खाना खाओ... पर तुम सुनते कहाँ ? तुम अब अपने मन का हो गये हो, अब बड़े हो गये हो न ? अरे, अपनी हालत तो देखो, हाथ का नस- नस दिखाई दे रहा है- लगता है घर में खाना ही नहीं मिलता ।” हमेशा पीछे पड़ी रहेंगी - "यह खा लो, यह पी लो ।” क्या खिलाऊँ, क्या पिलाऊँ इसी धुन में खोई रहती थीं । कुछ पल के लिये घर से बाहर निकलूँ तो दस हिदायतें - “जल्दी आ जाना, किसी से वाद- विवाद मत करना- जमाना बहुत खराब है ।” जब तक घर न लौटूँ, तो उसे चैन ही नहीं । रात को सोते समय सरसो का तेल लेकर आ जाएँगी – मना करने पर रोष प्रकट करेंगी - “इसी तेल से तुम सभी को पाली - पोसी हूँ और अब तुम सभी को तेल लगाने से परहेज हो गया है- बाल भूआ बन उड़ रहा है, और सफेद भी होने लगे हैं- यह फैशन का नतीजा है । कह देती हूँ, चुप- चाप पड़े रहो- यह सरसों का तेल है, बहुत ही फायदामंद ... !”

उनकी ममता के आगे मेरी एक नहीं चलती । मैं भी क्या करता, माँ की गोद में अपना सिर रखकर सो जाता और तब मेरे बालों पर थिरकती उस ममता की देवी की बेजान कांपती उंगलियाँ फूलों की पंखुड़ियों- सी कोमल प्रतीत होती, और उनके ममतामयी सुवास में कब मैं अचेत हो जाता- पता ही नहीं चलता । रूग्ण जर्जर शरीर एवं उन बेजान उंगुलियों में वह कौन सी अद्दभुत औषधि थी, जो एक पल में सारे कष्ट, संताप और शोक को हर लेती थी ? शायद उनकी ममता...। अब हमें यह एहसास हो रहा है कि अपने अर्ध व्यस्क या तरूण बेटे को बच्चा बनाने की क्षमता एक माँ के ही पास होती है, और शायद इसी बल से ही तो सती अनुसूयिया ने ब्रम्हा, विष्णु और महेश को शिशु बनाकर पलने में झूला दी थी, और वे सर्वशक्तिमान भी पलने में झूलने के लिये कैसे विवश हो गये थे । धीरे- धीरे माँ की स्मरण शक्ति भी अब क्षीण होने लगी थी- बहुत कुछ भूलने लगी थी, यहाँ तक की अपना भी सुध- बुध खो रही थी, पर उनकी ममता कभी मनहूस नहीं हुई । 

माँ को अपने गाँव से बहुत प्रेम था । वह अपने गाँव के घर को छोड़कर लम्बे समय तक दूसरी जगह नहीं रह सकती थीं । यही कारण था कि मैं चाहकर भी माँ को सुदूर प्रदेश में अपने साथ नहीं रख सकता था । बहुत आग्रह, निवेदन और जिद्द करने के बाद बहुत थोड़े समय के लिए मेरे पास आती थीं, कुछ दिन साथ में रहने के बाद गाँव वापस लौट आती ।

अब माँ का शरीर शिथिल होने लगा था, और साथ ही उनका याददाश्त भी क्षीण होने लगी थी । चलना - उठना- बैठना भी मुश्किल हो गए थे । ऐसी स्थिति में माँ को अकेले गाँव में छोड़ना असंभव था । माँ की देख - रेख के लिए अपनी पत्नी श्रीमती सीमा सिंह को उनके पास छोड़ता तो कुछ दिनों बाद माँ को मेरे लिए चिंता होने लगती - "कहती, अरे बहुरिया, पता नहीं वह कैसे खाता - पिता होगा - बड़ा हो गया, लेकिन उसने अभी तक कुछ नहीं सीखा । सबका ध्यान रखता है, पर खुद के लिए लापरवाह रहता है । मैं तो बूढ़ी ठहरी, मुझे कुछ हो भी गया तो कुछ बिगड़ने वाला नहीं है, मेरा जाने का समय हो गया है । पर मनोज को कुछ हो गया तो तुम सबका क्या होगा, उसी के ऊपर तो पूरे घर की जिम्मेदारी है । उसका ध्यान रखना बहुत ही जरूरी है । मेरी मानो, तुम मनोज के पास चली जाओ ।" माँ जिद्द करके मेरी पत्नी को मेरे पास भेज देती । लेकिन अब किंचित मात्र भी माँ की ऐसी स्थिति नहीं थी की उसे गाँव में अकेले छोड़ा जा सके । अत: माँ को समझा-बुझाकर अपने कार्य स्थल शिलांग लाना पड़ा । माँ अब हम लोगों के साथ ही रहने लगी थी, हम लोगों को भी बहुत सुकून मिल रहा था । 

शाम को अपने कार्यालय से जब मैं घर आता था, माँ संध्या - दीप जलाकर मेरी प्रतीक्षा कर रही होती थी । आते ही बहुत प्यार से पूछती, "आ गए बेटा !" मैं मुस्कुराकर कहता - " हाँ, माँ, आ गया ।" अगर कभी अनमने भाव से या दबे स्वर में जबाब दे दिया तो उसे चिंता होने लगती । जब कभी असमय मुझे बिस्तर पर लेटा देख लेती तो धीरे - धीरे अपने कंपकंपाते पाँवों से मेरे पास आती, और मेरे सिर को सहलाते हुए कहती -" तबियत खराब है क्या बेटा !" जब कभी उसे लगता कि मैं उदास हूँ या थका – हारा हूँ, मेरे पास आ जाती, और मेरे सिर को सहलाते हुये पूछती- "बेटा, तवियत खराब है क्या, सिर दर्द कर रहा है- दबा दूँ ?" माँ का वह ममतापूर्ण स्पर्श ने हमारे जीवन के कठिन से कठिन संघर्ष को पल भर में हर्ष में बदल देता था । और मैं उस जीवंतता की देवी के बारे में यह सोचने के लिये मजबूर हो जाता था कि कि “ममता” में ऐसी कौन- सी शक्ति है, जिसके कारण शिथिल इंद्रियों के मध्य भी वह सशक्त और जीवंत रहती है, सभी चेतनशून्यता से अक्षुण परम जाग्रित रहती है, शाश्वत, चैतन्य एवं गतीशील बनी रहती हैं । लेकिन कोई उत्तर आज तक हमें नहीं मिला । उत्तर मिले भी कैसे- माँ की तरह उसकी ममता भी असीम और अनंत हैं, इसमें डुबकी ही लगाया जा सकता है, इसकी गहराई और ऊँचाई को नहीं नापा जा सकता है । माँ इतनी ऊँची है कि अखिल ब्रह्मांड के स्वामी भी उसके गोद में खेलते हैं । पर... पर, उस पल को क्या कहें जो कभी न खत्म होने वाला समय बन जायें, जो पहाड़ बनकर जीवन के पलड़े पर उसे तौला न जा सके, और जब सुनहरे यादों के बादल उससे टकरायें तो आँसू की धार बन बरस पड़ें, पर तूफानों को मोड़ देने वाली माँ कहीं भी न दिखाई दे...ओह...उस रात्रि के बाद मेरे जीवन में कभी सूर्योदय नहीं हुआ ।

वर्ष, 2016, माह, अप्रेल, दिनांक 26, शाम लगभग 6 बजे कार्यालय से अपने क़्वार्टर लौटा, सबकुछ सामान्य था । पूर्व की भाँति उस दिन भी संध्या - दीप जलाकर मेरी माँ मेरे आने की इंतज़ार में बैठी थीं । घर में प्रवेश करते ही पूछी - " आ गए बेटा !" मैंने कहा - " हाँ, माँ ! आ गया । आप चाय पी लीं !" " दुलहीन बना रही है - अब पीऊँगी ।" माँ ने कहा । इतने में मेरी पत्नी श्रीमती सीमा सिंह चाय लेकर आई - हम तीनों एक साथ चाय पिए । मैंने माँ से पूछा - " माँ, तबियत कैसी है ?" "ठीक हूँ, बेटा !" माँ ने जबाब दिया । माँ की स्थिति एक छोटे बच्चे के सामान हो गई थीं । पता नहीं कब उसकी तबियत खराब हो जाए, इसकी चिंता सदैव बनी रहती थी । माँ ठीक है, हस - बोल रही हैं, ठीक से खाना खा रही हैं, जानकर मन को बहुत ही चैन और सुकून मिलता था । उस दिन भी माँ ने कहा की वह ठीक हैं, देखने से भी ठीक लगती थीं, इसलिए मैंने चैन की साँस ली । मन थका हुआ था - मैंने माँ से कहा -" माँ, मैं अपने कपड़े बदल लूँ, तब आ रहा हूँ ।" इतना कहकर मैं अपने कमरे में आ गया ।

कपड़े बदला, मन थोड़ा - थका - थका - सा लग रहा था, इसलिए बेड पर लेट गया - आराम करने लगा । थोड़े समय बाद माँ मेरे कमरे में आई - मेरे सर पर हाथ रखते हुए बोलीं -" दिन भर काम करते - करते बाबू मेरा थक जाता है । लग रहा है आज तुम बहुत थक गए हो - दो तुम्हारा सिर दबा दूँ । " मैं मना करते ही रह गया, पर माँ कहाँ मानने वाली थीं - उनकी ममता के आगे अक्सर मैं हार जाता था । उस दिन भी हार गया । माँ ठंडा तेल मेरे सिर में लगाई - माँ की ममतामयी स्पर्श ने मेरे तन और मन को चन्दन की तरह शीतल कर दिया था । कुछ पल के लिए मेरी आँखे लग गई - मैं अचेत होकर सो गया था । कुछ समय बाद मेरी पत्नी ने मुझे जगाया- बोली, " चलिए खाना खा लीजिए, माँ आपका इंतज़ार कर रही हैं ।" हम और माँ एक साथ खाना खाए । खाने के बाद माँ को सुलाकर मैं भी अपने कमरे में सोने आ गया ।

जैसा की ऊपर मैं बता चुका हूँ कि उस रात्रि के बाद मेरे जीवन में कभी सूर्योदय नहीं हुआ । माँ नित्य सुबह चार बजे जग जाती थी, और भजन कीर्तन गुनगुनाने लगती थीं । और पाँच बजाते - बजाते अपनी नित्य क्रिया में लग जाती थीं । इस प्रकार हम लोग भी उषा काल में ही जग जाते थे, अगर किसी कारण से नींद नहीं खुली तो माँ आकर जगा देती थी और सूर्योदय की अरुणिम आभा से हम आच्छादित हो उठते थे । पर उस रात्रि की सुबह... न माँ जगीं न मेरा सूर्योदय ही हो सका । अन्य दिनों की भाँति उस दिन मेरे कानों में माँ के भजनों का ना मधुर स्वर ही गूँजा, और न ही माँ मुझे जगाने आई- मैं सोता ही रहा । हाँ, मेरे पहले मेरी पत्नी जरूर जग गई थी, पर वह भी उस दिन थोड़े विलम्ब से ही जगी थी । जागने के साथ ही उसके मन में यही ख्याल आया कि आज माँ जगीं नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है- वह तो हर हाल में सुबह चार बजते - बजते जग जाती हैं, कहीं उनकी तबियत फिर से तो खराब नहीं हो गई है । यह सोचकर वह माँ के पास आई । फिर डबडबाते हुए मुझे जगाते हुए कही - देखिये न माँ अभी तक जगी नहीं हैं !" मैं घबड़ाकर उठा, और माँ के पास गया - उन्हें हिलाया - डोलाया - माँ- माँ की आवाज लगाई ... पर ...पर न माँ के शरीर में कोई स्पंदन, ना हलचल और ना ही उनकी आँखें खुली - माँ हमें छोड़कर बहुत दूर जा चुकी थीं ।-कितना भी रोया, कितना भी चीखा, और कितना भी पुकारा, पर मेरी माँ ने मेरी एक न सुनीं -फिर से लौटकर नहीं आई । माँ की स्मृति हर पल, हर समय मेरे हृदय में और मेरे मानस पटल पर अंकित रहती है- एक मिनट के लिए भी मैं भूल नहीं पाता हूँ । पर कुछ स्मृतियाँ ऐसी है जो हृदय में अक्सर हूक पैदा करती रहती हैं । 

बात माँ के गुजरने के लगभग एक महीने पहले की थी । मुझे हिंदी राजभाषा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने के लिए कन्याकुमारी जाना था, जो संभवत : 15 मई, 2016 से निर्धारित था । मेरे मन में एक विचार आया की अच्छा मौका है, क्यों न माँ को भी साथ लेता चलूँ, कन्या कुमारी और रामेश्वरम भी घूमा दूंगा - माँ का तीर्थाटन भी हो जाएगा । फिर मेरे मन में इस बात का डर सत्ता रहा था कि ट्रेन से तीन दिनों की यात्रा और ऊपर से इतनी भयंकर गर्मी क्या माँ बर्दाश्त कर पाएँगी ? । एक तो माँ का कमजोर एवं रूग्ण शरीर, इतनी कड़ी गर्मी सहन कर पाएँगी ? - क्या करूँ, मेरे लिए बहुत अजमंजस की स्थिति थी । मेरी हार्दिक इस्छा थी कि माँ को भी साथ लेता चलूँ - मैंने माँ को कभी दक्षिण भारत नहीं घुमाया था, अत: मैंने माँ से पूछा - "माँ मैं कन्याकुमारी जा रहा हूँ, चलेंगी ?" 

माँ ने बहुत ही खुश होकर कहा -" हां, चलूँगी ।" माँ का जबाब सुनकर मुझे भी खुशी हुई, साहस भी बढ़ा, पर रह- रहकर मेरे मन में अब भी इस बात का डर बना ही रहता कि इतनी तीक्ष्ण गर्मी में इतनी दूर का सफर माँ सकुशल तय कर पाएँगी या नहीं, कहीं कुछ हो गया तो क्या करूँगा । फिर मैंने माँ से कहा - " माँ, जहां जाना है, वह यहाँ से बहुत दूर है - ट्रेन से जाने पर तीन दिन लगते हैं, और उधर बहुत ही गर्मी है - जा पाएँगी !" माँ ने कहा - " कहाँ जाना है ?" मैंने सोचा कि कन्याकुमारी या रामेश्वरम कहूंगा तो माँ दूरी का अंदाजा नहीं लगा सकतीं, इसलिए उन्हें दूरी का एहसास कराने के लिए कहा - माँ, श्री लंका के करीब जहाँ श्री रामचंद्र जी ने लंका जाने के लिए सेतु बनाए थे । माँ ने चौंक कर कहा - " श्री लंका जाना है बेटा - बहुत दूर है !" मैंने कहा - "हाँ माँ, ऐसा ही समझो !" माँ ने कहा - हाँ, बेटा चलूंगी ।" मैंने कहा -" पर माँ आप बीमार हैं - आपको इतनी दूर ले जाने में मुझे डर भी लग रहा है ।" माँ ने मुझसे जिद्द करते हुए कहा -" बेटा चलूंगी - मैं मर भी जाउंगी तो उधर ही मेरा दाह - संस्कार कर देना, पर मुझे भी साथ ले चलो !"

जाने के लिए माँ का उत्साह और उनका साहस देखकर मेरे अंदर भी उत्साह और साहस का संचार हुआ, निश्चय किया कि माँ को अपने साथ कन्याकुमारी ले जाऊँगा, और लौटते समय रामेश्वरम भी घुमा दूँगा - हर बुजुर्ग की यही चाहत होती है कि वे अपने बुढ़ापे में धार्मिक तीर्थ कर सके । मैंने ट्रेन का चार टिकट १२ मई २०१६ का गुवाहाटी से त्रिवेंद्रम का काट लिए थे, पर उसके पहले ही वह निर्दयी पल पहाड़ बनकर आया था, जब मेरी माँ मुझे छोड़कर अपने परमधाम को चली गई थीं । उनके जाने के साथ ही लगता है मेरा सब कुछ उनके साथ चला गया है – मेरे पास कुछ भी नहीं बचा हैं । उनके जीते मुझे आँसू के मोल समझ में नहीं आये थे, क्योंकि उन्होंने मेरी आँखों में कभी आँसू आने ही नहीं दिया था । मेरे हिस्से के आँसू वह खुद ही पीकर हमे मुस्कान देती रही थीं । मेरे जीवन पर आने वाले हर ऑधी- तूफान को उन्होंने मोड़ दिया था । मेरे उपर गिरने वाले न जाने कितने दुख के पहाड़ को अपनी कांपती उंगलियों पर रोक लिया था । मेरे पथ में फैले न जाने कितने कंटकों को अपने पलकों से चुनकर मेरे पथ में सिर्फ और सिर्फ फूल ही बिखेरे थे । लेकिन उनके जाते ही मानों मेरा पल- पल ही पहाड़ बन गया हो, जीवन रेगिस्तान हो गया हो, और तब यह समझ में आ रहा है कि माँ ही जीवन है, माँ ही जान है। अगर माँ नही, तो कुछ भी नहीं । बस शेष है तो माँ की पावन यादें- उनका संस्कार, दुलार और उनका मधुर स्वर- बेटे- बेटे की पुकार...

माँ के गुजरने के बाद मैं पूरी तरह से टूट चुका था- एक दम से शक्तिहीन हो गया था । दिमाग एक दम सुस्त हो गया था - कुछ सोचने- समझने और निर्णय लेने की मेरी क्षमता शून्य हो गयी थी । मुझे आज भी याद है कि मैं माँ के शव के पास जड़वत बैठा था, और मेरी पत्नी जोर- जोर से रोये जा रही थी - आगे क्या करना है, कुछ समझ में नहीं आ रहा था । पत्नी की रूलाई सुनकर आस पड़ोस के लोग जुटने लगे थे - कुछ लोग हिम्मत और संत्वना दे रहे थे, तो कुछ लोग माँ की अंतिम यात्रा की तैयारी कर रहे थे । उन सभी सुहृद लोगों के उस आत्मीय सहयोग एवं स्नेह को मैं अपने जीवन में कभी भुला नहीं सकता, जिन्होंने उस सुदूर प्रदेश में मेरी उस दुखद परिस्थिति में मेरा हर पल हर संभव सहयोग दिया था । माँ की अंतिम यात्रा की पूरी तैयारी हो चुकी थी, हमारे महाविद्यालय के सभी कर्मचारी गण, माँ की अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने के लिए इकट्ठा हो चुके थे । सफेद कफन में लिपटी माँ को अर्थी पर लिटाया गया था । अब माँ की अर्थी को कन्धा देने की बारी आई, किसी तरह से मैंने माँ की अर्थी को अपने कंधे पर उठाया था- माँ की अर्थी के भार तनिक महसूस नहीं हुआ था । शायद माँ एक अव्यक्त भाव बनकर मेरे हृदय में उतर आई थीं, और उस भाव से बोझिल मेरा हृदय पिघल कर मेरी आँखों से झर- झर बह रहे थे । मैं सोच रहा था कि जिस माँ की गोद में पला और बढ़ा हुआ, जिनके कोमल हाथों के स्पर्श ने न जाने मेरी कितनी असहनीय पीड़ाएँ हर ली होंगी ।, जिन पावन चरणों में बैठकर मैंने चारो धामों की पावन अनुभूति की होगी, जिनके शरीर के एक - एक रक्त से मेरे शरीर का निर्माण हुआ है, आज उस शरीर को मैं अपने ही हाथों अग्नि में सौपकर उसे भस्म करने जा रहा हूँ । माँ के जाने के बाद माँ का पार्थिव शरीर ही तो मेरे पास था, जो माँ के होने का एहसास दिला रहा था, पर कुछ पल बाद मेरे पास वह भी नहीं रहेगा - सोचकर कलेजा फट पड़ता था । जल्द ही वह समय भी आ गया, जब माँ को मुखाग्नि देनी थी - वह मेरे जीवन का सबसे कठिन समय था । हाथ काँप रहा था, मैं फूट - फूटकर रो रहा था, माँ के होने का एक अंतिम प्रतीक भी अब अतीत बनने जा रहा था । माँ अब से कुछ समय बाद फिर कभी देखने को नहीं मिलेंगी । बहुत कड़ुए सत्य से मेरा साक्षात्कार हो रहा था, जिससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता था । मैं भी नहीं मोड़ सका - माँ को मुखाग्नि दे दिया । देखते ही देखते माँ लपटों में लिपट गयीं - मैं चीख - चीखकर रोता रहा, माँ कुछ पल बाद ही अंतर्ध्यान हो गयीं । कुछ घंटे बाद माँ की अस्थि को उसकी भस्म - चिता से अपनी नम आँखों से एक मिट्टी के कलश में चुन- चुनकर रखा, और उसे लाल कपडे से ढककर अपने सीने से लगाए घर की तरफ प्रस्थान किया । उधर की मेरी यात्रा मुझे उतनी बोझिल नहीं लग रही थी, जितनी बोझिल लौटते समय की लग रही थी । जब माँ की अर्थी को अपने कंधे पर लेकर चल रहा था तो मुझे ऐसा लग रहा था कि माँ मेरे साथ चल रही हैं, अब भी वह मुझे मेरी उँगली पकड़कर चलना सीखा रही हैं - चलने की शक्ति दे रही हैं, पर इधर से मैं एक दम से अकेला था - शक्तिहीन, एक कदम भी बढ़ाना मुश्किल हो रहा था । हृदय में वेदनाओं का तूफान चल रहा था - खुद को संभालना बहुत ही मुश्किल हो रहा था, तभी मेरी आत्मा ने मानो, मुझसे कहा - अभी तुम अकेला नहीं हो, माँ की अस्थि - उसकी अंतिम निशानी अभी भी तुम्हारे पास है, जिसे अपने सीने से लगाए चल रहे हो ।" मेरा ध्यान अस्थि - कलश पर गया - हृदय को थोड़ी - सी शांति मिली । माँ के अस्थि - कलश के साथ मैं घर आया । दूसरे दिन से उनके अन्य संस्कार- कर्म में लग गया - उनके संस्कार का अंतिम कर्म तेरहवें दिन में पूरा होना था । इस प्रकार वह तेरहवाँ दिन भी आ गया - और माँ का अंतिम कर्मकांड भी पूरा हो गया । अब अस्थि विसर्जन करने की बारी थी - मन में योजना बना रहा था कि गाँव जाकर गंगा में माँ की अस्थि का विसर्जन करूंगा, तभी मेरे मन में ख्याल आया कि कन्या कुमारी जाने का टिकट पहले से बना हुआ है, और माँ को भी कन्या कुमारी जाने की बहुत इच्छा थी, माँ को उनके जीवन में तो कन्याकुमारी और रामेश्वरम नहीं घूमा सका, उनकी अस्थि ही क्यों न साथ ले चालू, कन्याकुमारी में पहले से निर्धारित कार्यक्रम में भाग लेने के बाद लौटते समय रामेश्वरम में ही हिन्द महासागर में माँ की अस्थि - विसर्जन कर दूँगा । यद्यपि कन्याकुमारी में मेरा पहले से तय कार्क्रम में सम्मिलीत होने की मेरी इच्छा अब समाप्त हो चुकी थी, क्योंकि माँ मेरे साथ नहीं होगी, फिर भी माँ की अंतिम इच्छा पूर्ण करने के लिए मैंने माँ की अस्थि लेकर कन्या कुमारी जाने का निर्णय लिया - सोचा माँ साथ में नहीं हैं, उनकी अस्थि तो मेरे साथ है, इसी से शक्ति पाकर मैं चला जाऊँगा - माँ ने भी तो कहा था -" मुझे भी साथ ले चलो, अगर मेरा कुछ हो भी जाएगा तो मेरा उधर ही अंतिम संस्कार कर देना ।" उसकी यह अंतिम इच्छा मुझे हर हाल में रामेश्वरम में विसर्जित कर पूर्ण करनी थी, जिससे कि उनकी आत्मा को शान्ति मिल सके । जैसा की मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ की माँ के जीवन में ही मैंने कन्याकुमारी के लिए ट्रेन का चार टिकट कटा लिया था, पर, माँ के जाने के बाद उनका टिकट मुझे केंसिल करना पड़ा था । अब मेरे पास तीन टिकट- खुद का, पत्नी और पुत्र का । माँ की तेरहवीं 10 मई को संपन्न हुआ, और टिकट 12 मई का था । ऐसी स्थिति में इतनी दूर यात्रा उस दुखद स्थिति में करना बहुत ही मुश्किल था, पर माँ की वह बात बार - बार याद आ रही थी, "मुझे भी साथ ले चलो, अगर मैं उधर मर भी गई तो मेरा उधर ही दाह - संस्कार कर देना ।" जीते जी मैं माँ की यह इच्छा तो पूरी नहीं कर सका, माँ को मैं सशरीर नहीं ले जा सका तो उसकी अस्थि ही क्यों न रामेश्वरम के सागर में ही विसर्जित कर दूँ, यही सोचकर मैंने कन्याकुमारी जाने का प्लान कर लिया । जाने वाले हम तीन थे - मैं खुद, मेरी पत्नी और पुत्र, पर एक चौथा भी था - माँ की अस्थि कलश । हमने गुवाहाटी - त्रिवेंद्रम ट्रेन पकड़ी । मैं 12 मई को गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पहुँचा । स्टेशन के अंदर प्लेटफार्म पर जाने के पहले रेलवे की सुरक्षा सुनिसश्चित करने के लिए प्लेटफार्म के प्रवेश द्वार पर यात्रीगण के समानों की जांच रेलवे पुलिस के द्वारा की जा रही थी । मैंने भी अपने बैग वगैरह की जांच करवाई, पर मेरी माँ का अस्थि- कलश अभी भी मेरी गोद में ही था । पुलिस ने मुझसे पूछा, "वह क्या है ? उसे भी दिखाईये !" - मैंने आर्त भाव से कहा - " साहब, यह कोई वस्तु नहीं है जिसकी जांच की जा सके - इसकी जांच ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीनों में से अभी तक किसी ने नहीं किया, पर आप अपना कर्तव्य का निर्वहन करते हुए देख लीजिये, मैं दिखा रहा हूँ । मेरी इतनी बात सुनते ही जाँच करने वाले अधिकारी ने कौतूहल होकर पूछ - "आखिर यह क्या है ?" मैंने विनम्रता से कहा - " साहब, यह मेरी माँ का अस्थि - कलश है - इसे रामेश्वरम विसर्जन करने जा रहा हूँ ।" इतना कहते हुए मैंने माँ के अस्थि - कलश के बंधे लाल कपडे को खोलकर दिखाना चाहा, उसके पहले उस अधिकारी ने कहा - " रहने दीजिये - इसकी कोई जरूरत नहीं है ।" उन्होंने ने हमें सस्नेह प्लेटफार्म के अंदर जाने की अनुमति दे दी । हम ट्रेन के अंदर अपनी - अपनी सीट पर बैठ गए - सामान भी सीट के नीचे व्यवस्थित करके रख दिए, पर अपनी माँ के अस्थि - कलश को अब भी अपनी गोद में ही संभालकर रखा था । ट्रैन में भी टीटी अथवा रेल पुलिस पूछती कि यह क्या है तो मैं बताता की यह मेरी माँ की अस्थि कलश है - वे लोग स्नेह प्रकट करते हुए चले जाते थे । हम तीसरे दिन सुबह त्रिवेंद्रम रेलवे स्टेशन पंहुचे । फिर वहा से कन्या कुमारी के लिए बस पकड़े, और कुछ ही घंटों में हम कन्या कुमारी पहुँच गए । मैं पहले से ही कन्याकुमारी में विवेकानंद केंद्र में रहने के लिए कमरा ऑनलाइन बुक करवा लिया था, तदनुसार हम अपने कमरे में चले गए । 

वहा पहुँच कर सबसे पहले मैंने माँ के अस्थि- कलश को उचित स्थान पर रखा । हम तीनों फ्रेश होकर माँ के अस्थि- कलश को नमन किया, और विश्राम करने लगे । विस्तर पर पड़े - पड़े मैं यही सोच रहा था कि माँ की पंच तत्व में विलीन अस्थि - बुभूति में कितनी शक्ति है की उसी शक्ति के सहारे मैं तीन दिनों की लम्बी यात्रा पूरी करके मैँ कन्याकुमारी सकुशल पहुँच गया । मुझे थोड़ा भी एहसास नहीं हुआ कि मेरी माँ मेरे साथ नहीं है । लेकिन यह एहसास कबतक ! जबतक माँ का अस्थि कलश मेरे साथ है । यही सोचते - सोचते मेरी आँख कब लग गई, पता ही नहीं चला । शाम को नींद खुली, मन में एक बार यह ख्याल आया कि कन्याकुमारी बहुत ही प्रसिद्द पर्यटक एवं तीर्थ स्थल है, इतनी दूर फिर से आना संभव नहीं होगा, इसलिए शाम को थोड़ा विवेकानंद मेमोरियल अथवा अन्य आस- पास की जगह घूम लें - कल से तो तीन दिनों के अपने कार्यालयी कार्यो में व्यस्त हो जाएंगे, फिर मौका नहीं मिलेगा कहीं घूमने का । यही सोचकर हम तीनों परिवार के सदस्य आस- पास के जगहों को घूमने के लिए तैयार हो गए, तभी मेरे मन में अचानक यह भाव आया कि हम सभी तो घूमने चले जायेंगे पर माँ यहां अकेली रह जाएगी । यह सोचकर मैंने अपनी पत्नी से कहा, "आप लोग चले जाइए, मैं नहीं जाऊंगा ।" न जाने का कारण पता लगने पर मेरी पत्नी और मेरा पुत्र भी जाने से मना कर दिए, और हम सभी कहीं नहीं गए । 

दूसरे दिन हिंदी राज भाषा के त्रिदिवसीय कार्यशाला के प्रथम दिन मैं निर्धारित केंद्र पर पहुँचा । इसके पहले भी मैं इसी संस्था द्वारा विभिन्न समयों मेँ अलग - अलग स्थानों पर करवाए गए ऐसे कार्यक्रमों मेँ मैं शामिल हो चुका था, इसलिए इस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक मुझे पहले ही जानते थे । मेरा मुंडन देखकर वे पूछे - आपने यह मुंडन करा रखा है ? मैंने कहा हाँ, "मेरी माँ गुजर गयी है, उनकी अंतिम क्रिया 12 मई को ही संपन्न हुई है - सोचा कि आप के इस कार्क्रम में सम्मिलित भी हो जाऊंगा और लौटते समय माँ का अस्थि विसर्जन रामेशवर में कर दूँगा ।" यह कहते हुए मेरी ओंखों में आँसू आ गए । उन्होंने मुझे सांत्वना देते हुए दुःख जताते हुए कहा- "ऐसी स्थिति में भी आप इस कार्यक्रम मेँ शामिल हो रहे हैं - यह शब्दातीत है ।" मेरे पीठ पर हाथ फेरते हुए वे अपने आगे के कार्यक्रम के संचालन में व्यस्त हो गए । कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया । सभी पदाधिकारी मंचासीन थे और सभी प्रतिभागी अपने - स्थान पर विराजमान थे । कार्यक्रम के मुख्या पदाधिकारी अपने स्थान से उठे - मुद्रा गंभीर थी - उन्होंने अपनी भारी आवाज में कहा - "यहाँ एक ऐसे भी प्रतिभागी उपस्थित हैं, जिनकी उपस्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती है ।" मेरा नाम लेते हुए संक्षिप्त में मेरे साथ घटित घटनाओं का जिक्र करते हुए मेरी माँ के शोक - सम्मान मेँ दो मिनट का मौन रखने की घोषणा किया । दो मिनट मौन रखने के बाद सभी लोग अपने स्थान पर बैठ गए, सभी की नजरें मेरी तरफ ही थीं - मेरी आँखों में आँसू थे । अल्पाहार के अल्प विराम के समय सभी ने मुझे स्नेहपूर्ण सांत्वना दिया - माँ की आत्मा की शान्ति के लिए रखे गए दो मिनट के मौन से मुझे नहीं पता की माँ की आत्मा को शांति मिली या नहीं, पर मेरी आत्मा को कुछ हद तक जरूर शांति मिली । यह सोचकर कि हमारे गाँव से हजारों किलोमीटर दूर भारत माता के उस पावन स्थान पर माँ को सम्मान मिला, जिस स्थान को सागर प्रतिदिन धोता है- इससे मुझे एक भावनात्मक शान्ति मिली । कार्यक्रम का पहला दिन समाप्त हुआ, विवेकानंद केंद्र मेँ आया जहां मैं ठहरा था ।

इस प्रकार मेरे तीन दिनों की हिंदी राजभाषा की कार्यशाला का कार्यक्रम समाप्त हो गया । दूसरे दिन शाम को चेन्नई के लिए ट्रेन थी । जैसे - जैसे समय बीत रहे थे, मेरे हृदय की वेदना भी बढ़ती जा रही थी । सोच रहा था कि अगले दो दिनों बाद मैं चेनई पहुँच जाऊंगा, और कुछ पल बाद ही मैं रामेश्वरम भी पहुँच जाऊंगा, जहाँ भगवान शंकर के चरणों को धोते सागर में मेरी माँ की अंतिम निशानी - उनकी अस्थि को विसर्जित कर दूंगा... पर कैसे मैं यह सब अपने हाथों कर पाउँगा, जिन हाथों को पकड़कर माँ ने मुझे चलना सिखाया था, जिन हाथों ने न जाने कितनी बार मेरे सिर पर न पड़े, पहाड़ जैसे बोझ को अपनी उँगुलियों पर थाम लिया था, न जाने कितनी बार मेरी तरफ आने वाले तूफानों के थपेड़ो को खुद ही सह लिया था, ऐसी ममतामई माता की अस्थि को मैं अपने हाथों से कैसे सागर में बहा सकूंगा । पर... पर मैंने खुद को समझाया कि इस कटु सत्य को हमें हर हाल में स्वीकार करना ही होगा । माँ के पुनर्वोदय के लिए उसके अस्थि - कलश को उस पावन सागर में अस्त करना ही होगा, और उसके पुनर्वोदय के एहसास से ही माँ की निरंतर सानिध्यता की अनुभूति कर सकेंगे । यह सोचते - सोचते पता नहीं कब मैं रामेश्वरम पहुँच गया था- मेरी पत्नी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा "चलिए, ऑटो से उतरिये, हम लोग रामेश्वरम पहुँच गए हैं ।" हृदय भावविह्वल हो उठा - माँ के अस्थि - कलश को गोद में लिए उसे अपनी नम आँखों से निहारते सागर की तरफ हम बढ़ गए । 

सागर के किनारे पंहुचकर सागर को प्रणाम किया, तत्पश्चात माँ के अस्थि - कलश को अपनी पत्नी श्रीमती सीमा सिंह को सादर पकड़ा दिया, और सागर में स्नान किया । चूँकी मुझे अस्थि विसर्जन के कर्मकांड के बारे में मालूम नहीं था । अतः मैं बिना किसी कर्मकांड करवाए मैं खुद ही माँ की अस्थि विसर्जन करने का निर्णय लिया । मैंने सोचा - "माँ " शब्द से पावन और शक्तिशाली मंत्र दूसरा कौन हो सकता है, जिसे अगर करूण पुकार किया जाए तो वह स्वर सिर्फ माँ तक ही नहीं पहुँचता, अपितु तीनो लोकों में पहुँचता है, फिर तर्पण करने वाले भगवान के पास मेरी करूण पुकार क्यों नहीं पहुँच सकती । यही सोचकर मैंने माँ के उस पावन अस्थि - कलश को गोद में लिया, और सागर में प्रवेश किया । सागर तट पर काफी लोगों की भीड़ थी, काफी संख्या में लोग सागर के किनारे कुछ कदम के अंदर स्नान कर रहे थे । उस सागर की मैंने एक विशेषता यह देखी कि अन्य जगहों के सागर की भाति रामेश्वरम के सागर में ऊँची-ऊँची लहरे नहीं उठ रही थी, सागर विल्कुल ही शांत था । मैंने सोचा कि मैं माँ के अस्थि - कलश को सागर के अंदर उस स्थान पर विसर्जित करूँ जहाँ लोग न पहुँच पाए, जिससे कि लोगों के पैरों का ठोकर मेरी माँ के अस्थि कलश को न लग सके । इसी विचार से मैं सागर के अंदर वहां तक चलता गया जब तक कि सागर का पानी मेरे गर्दन तक न आ गया । चुकी सागर तट इतना छिछला था कि सागर का पानी मेरे गर्दन तक पंहुचने में मुझे सागर के बहुत अंदर तक जाना पड़ा था । सागर के किनारे खड़े मेरे पुत्र और पत्नी बहुत चिंतित थे- चिल्ला - चिल्लाकर मुझे और अंदर न जाने के लिए मना कर रहे थे, पर मुझे इस बात का बिल्कुल ही ध्यान नहीं था कि सागर में हिंसक जीव - मगरमच्छ आदि भी रहते हैं, मुझे कहीं कुछ हो न जाए । मैं सागर के अंदर माँ के अस्थि- कलश को हाथ में थामें मैं किसी देवता - देवी की स्तुति न करके मैं "माँ - माँ " पुकार रहा था । मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि अपनी माँ के अस्थि - कलश को सागर में विसर्जित कर सकूं । पता नहीं मैं सागर में माँ के अस्थि कलश को थामें कितने समय तक खड़ा रहा - शायद कम से कम 20-25 मिनट से अधिक ही मैं सागर में खड़ा रहा होगा । कभी मैं " माँ - माँ "शब्द का जाप करता, तो कभी सूर्य देव की तरफ अपलक देखते हुए गायत्री मन्त्र का उच्चारण करता - लगता था कि सागर में स्नान करने के बाद सूर्य भगवान को जलार्पण करने के लिए जल की जगह अपनी अंजुली में माँ के अस्थि - कलश को ही अर्घ्य के रूप में अर्पित कर रहा था । मानो, मैं सूर्य देव् से कह रहा था - हे प्रभु आपको अर्पित करने के लिए मेरे पास इससे अधिक पावन और भावपूर्ण कुछ भी नहीं है, आपको इसे अर्पित करने के बाद मेरे पास कुछ भी नहीं रहेगा - मैं पूर्णरूपेण अकिंचन, अनाथ और असहाय हो जाऊँगा । आप मेरे इस अमानत को संभाल कर रखियेगा । मेरी आँखों से निर्झर अश्रु प्रवाहित हो रहा था - और अचानक मेरा हाथ काँपा - मेरी अंतिम और अमूल्य निधि - वह पावन अस्थि- कलश मेरे हाथों से छूट गया - कुछ पल बाद मैंने जब अपनी आँखे खोली - एक बार, सिर्फ एक बार फिर से माँ के उस पावन अस्थि - कलश को स्पर्श कर सकूँ, उसे नमन कर सकूँ, उसे अपने सीने से लगा सकूँ, इस निमित से मैं सागर की शांत सतह पर अपनी नजरें इधर - उधर दौड़ाई, माँ का वह अस्थि- कलश कंही भी नजर नहीं आया । शायद सूर्य भगवान ने अपने अर्घ्य - कलश के रूप में स्वीकार कर लिया हो, या सागर देव् उस कलश को अपना अमृत कलश के रूप में स्वीकार कर लिया हो । जो भी हो, पर उस समय मुझे जो अनुभूति हुई, वह किसी चमत्कार से काम नहीं था । जो मेरे लिए दुरूह कार्य था कि माँ की अस्थि का विसर्जन मैं कैसे कर पाऊंगा, इतना साहस कहाँ से लाऊँगा - अगर किसी तरह से विसर्जन कर भी दिया तो खुद को कैसे सम्भालूँगा, यह कटु विचार माँ के अस्थि - कलश को मेरे हाथों से छूटने के साथ ही एक अप्रत्याशित अनुभूति में बदल गई ।

जिस तरह से मेरा हृदय माँ के लिए व्याकुल, विह्वल और बेचैन हो रहा था - माँ की अस्थि कलश मेरे हाथों से छूटते और सागर के पावन गर्भ में समाते ही मेरी आत्मा को इतनी शांति मिली, जिसकी अनुभूति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है । अगर मैं अपनी उस अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करना चाहूँ तो इस तरह से मैं असफल प्रयास कर सकता हूँ. कि जिस तरह से एक साधक को उसकी साधना पूर्ण होने पर होती होगी, जिस तरह से एक योगी की योग साधना पूर्ण होने पर होती होगी, उस तरह से मेरी आत्मा को शान्ति मिली थी । हृदय पावनता से परिपूर्ण था, आत्मा एक साधक की ध्यानावस्था की स्थिति जैसी शान्ति थी । मैं माँ को नमन करते हुए पीछे मुड़ा, और सागर के किनारे जंहा मेरी पत्नी और मेरा पुत्र मेरा इंतज़ार कर रहे थे, आ गया ।

वंहा से हम सपरिवार रामेश्वरम भगवान की मंदिर जाकर भगवान शंकर का दर्शन किये, फिर आस- पास के पावन तीर्थ स्थलों का भ्रमण किये । शाम आठ बजे गुवाहाटी के लिए हमारी ट्रेन थी, समयानुसार मैंने ट्रेन पकड़ी- ट्रेन समय से चल दी । उधर से अर्थात गुवाहाटी से कन्याकुमारी और चेन्नई तक और इधर से चेनई से गुवाहाटी ट्रेन की यात्रा में एक बहुत बड़ा अंतर था । उधर से मेरे पास माँ का पावन अस्थि कलश था, इधर से मेरे पास वह अनमोल रत्न नहीं था । उधर से आते वक्त मेरे हृदय में व्याकुलता और वेदनाओं रूपी महासागर में उठती लहरों की थपेड़े मैं झेल रहा था, इधर से वह वेदनाओं का महासागर शांत था, पर जिस तरह किसी शांत जलराशि में कंकड़ फेंकने से उस जलराशि में हलचल पैदा हो जाता है, ठीक उसी प्रकार रह - रहकर मेरे हृदय में माँ की अनुपस्थिति का हूक उठती । कभी न समाप्त होने वाला हूक मेरे हृदय में आज भी है । और शायद मृत्यु पर्यन्त रहेगी । खैर...- मैं तीसरे दिन शिलॉग अपने गंतव्य पर पहुँच गया । अपने सरकारी क्वाटर के अंदर प्रवेश किया, पर पहले जैसे मुझे तनिक एहसास नहीं हुआ कि मैं अपने उसी क्वाटर में हूँ, जिसमे कभी मेरी माँ रहती थी । यह तो रही शिलाँग में मुझे आवंटित सरकारी क्वाटर की बात ।

कन्याकुमारी से शिलाँग लौटने के लगभग दो - तीन महीने बाद जब मैं अपने पैतृक गाँव गया तो मुझे अपना गाँव भी वीरान और अनजान लग रहा था, क्योंकि जिस गावं में मैंने जिस माँ के पावन गर्भ से जन्म लिया था, और जिस ममता की छांव में जहाँ मैं पला - पढ़ा और बड़ा हुआ था, वह मेरी माँ अब उस गाँव में नहीं थीं । जब मैं अपने उस घर में प्रवेश किया तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरे घर की दीवारें, आँगन सभी रो रहे थे । मुझे तनिक भी एहसास नहीं हुआ कि मैं अपने घर में हूँ । एहसास भी कैसे हो, जिस आँगन की मिट्टी को अबोध शिशु के रूप में कितनी बार मैंने खाई होगी, और माँ ने उन मिट्टियों को बार - बार अपनी उंगुलियों से मेरे मुँह से निकाली होंगी, जिन घर - आँगन के सतह को माँ ना जाने कितनी बार गोबर से लिपाई की होंगी, और उनकी पावन उँगलियों के सुमधुर स्पर्श और महक उस मिट्टी एवं सतह में घुला हो, कितनी बार घुटनों के बल चलते मेरा पूरा शरीर उस मिट्टी से मैं सना हूँगा, और माँ न जाने कितनी बार अपने आँचल से उस मिट्टी को मेरे शरीर से झारी होंगीं - बचपन में बारिश के दिनों आँगन में मैं छपक - छपककर नहाया हूँगा - माँ ने न जाने कितनी बार अपने उन्ही आँचल से मेरे भीगे शरीर को पोछा होगा - वे सारी सुनहरी यादे मेरे मानस पटल पर चलचित्र की भाँति चल रही थी । सभी यादें जीवंत हो गई थी - पर उन सुनहरे यादों की जननी मेरी माँ कही नहीं दिख रहीं थीं - मैं अपने ही घर में एक अजनवी की भांति ईधर - उधर देख रहा था - जिधर मेरी नजरें पड़ती उधर से ही मानो, मुझसे कोई प्रश्न कर रहा हो - दीवारे कहती मुझे पहचानते नहीं हो, जिसे माँ पुताई कर देती थी, और तुम फिर से मेरे शरीर पर कभी चाक से तो कभी पेन्सिल से मुझे गन्दा कर देते, और फिर से माँ मुझे साफ करती - भूल गए तुम कितना परेशान करते थे माँ को । आँगन की सतह कहती - शायद तुम मुझे भी भूल रहे हो ! अरे मैं वही हूँ, जिसकी धूलों से धूसरित होकर तुम कितना खुश हो रहे थे - और माँ तुम्हारे शरीर को साफ करते - करते थक जाती थीं । तुम्हे धूल न लगे, और मुझे भी खरोच न लगे - हम दोनों की सुरक्षा के लिए माँ गोबर से मेरी भी लिपाई करती रहती थीं । इसी तरह, आँगन में पड़े सील - लोढ़ा, ओखल आदि सभी मलीनता से इसी तरह से अपना परिचय देते हुए मुझसे अनगिनत प्रश्न कर रहे थे - पर मेरे पास कोई उत्तर नहीं था - मुझे सब कुछ अनजान लग रहा था । आँगन में माँ के द्वारा लगाई हुई तुलसी जो सूख गई थी, वह भी संकेतों में मुझसे बहुत कुछ कहने की कोशिश कर रही थी, पर मैं किसी को पहचान नहीं पा रहा था, क्योंकि उन सबका जिनसे पहचान थी - वह मेरी माँ उस घर में अब नहीं थीं । और तब से आज तक मैं बे- घर हूँ । पहले जब माँ गाँव में रहती थीं, तब मन करता था कि कब छुट्टी मिले, और मैं आपने गाँव जाऊँ, अपने घर जाऊँ । पर माँ के अब न रहने पर मुझे न उस गाँव में जाने की पहले जैसी उत्सुकता नहीं रहती है, ना ही वह घर ही मेरा अपना घर लगता है । मैं चाहे गाँव रहूँ, चाहे गाँव से हजारो किलोमीटर दूर अरूणाचल प्रदेश में हूँ, मेरे लिए सब सामान लगता है । काफी महीनों बाद आवश्यकतावश ही गाँव जाता हूँ । जब गाँव गए अधिक दिन हो जाते है तो गाँव के हमारे कुछ मित्र हमसे पूछते हैं कि तुम गाँव कब आओगे ? तो मेरा उत्तर होता है कि गाँव में आकर कहाँ रहूँगा मैं तो बे-घर हो गया हूँ । तब मित्र मुझसे फिर से प्रश्न करते हैं - "क्यों, गाँव में आप का घर तो है ही, आप ऐसे क्यों कह रहे हैं ?" तब मैं उनसे कहता हूँ कि वह अब घर नहीं रहा, वह तो मात्र अब बिरामालय है । वे लोग पूछते है- तब घर किसे कहते है ?" मेरा उत्तर यही होता है - "घर उसे कहते हैं जहाँ माँ रहती हो ।" 

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कहानी


श्यामल बिहारी महतो, बोकारो, झारखंड, 
फोन नं 6204131994


दांव पर जिन्दगी

बहु भात खाने जाना आरती को बहुत मंहगा पड़ा । 

उसने कभी कल्पना भी नहीं कि होगी उसकी ऐसी कीमत चुकानी पड़ेगी .. !

" लाल, तुम्हारी पत्नी तो बड़ी मस्त है ! बहुत मजा आया, पूरा वसूल हो गया.. । "

उसके मुंह से निकलने वाले ये वो शब्द थे, जो बेहोश होने के पहले मेरे कानों में समाये थे । आवाज सुना-सुना सा लगा था । उसके पहले के वे तीन कौन थे, जान नहीं पाई थी । सबने अपने चेहरों को ढक रखा था । कोई कुछ बोल भी नहीं रहा था । जैसे सब कुछ सुनियोजित ढंग से हो रहा था । एक के बाद एक चढ़े, कूदे और उत्तर गए । जैसे बेटिकट लफंगे बसों में चढ़ते उतरते हैं । न मैं चीख पा रही थी और न हिल डुल पा रही थी । पहले ही मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया था । दम घुट रहा था । जो आता आवेग से भरा हुआ होता, मेरी जान हलक पर आ जाती थी । 

फिर वहां क्या कुछ हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं । होश आया तो घर के विस्तर में पड़ी थी और घर वाले मुझे घेरे खड़े थे । मेरी आंखें लाल को ढूँढ रही थीं । वह एक ओर कोने में दुबका सा खड़ा था । चुप चाप । उसे देख विरक्ति से मन मेरा भर उठा । दिल में एक हूक सी उठी, दर्द का एक सैलाब सा उमड़ा ! उस दर्द का जोआ मैं अभी अभी भोग कर आई थी । मैंने अपनी मूड़ी विस्तर में घुसेड़ दी और औंधे मुँह रात भर पड़ी रही । 

" थाने चलो .. !" सुबह उठते ही मैंने लाल से कहा । 

" होश में आओ, पागल मत बनो, लोग जानेंगे- सुनेंगे तो क्या कहेंगे ? बाकी की जिंदगी बदनामी ओढ़कर जीना पड़ेगा । मुंह बंद रखो और रात की घटना को एक डरावना सपना समझ भूल जाओ .. !"

" यह मेरे जीवन का सवाल है ! मैं गाय- बकरी नहीं हूँ, थाने चलो .. !" मैंने जोर दी और घर से बाहर निकल आई ।

आरती ने अपना लिखित बयान थाने में जमा कर दिया । 

" आपने लिखा है, आखिरी वाले की आवाज सुनी-सुनी-सी लगी थी ..?" थानेदार रंजन चौधरी ने आरती से पूछा । 

" जी हां सर, कुछ दिन पहले एक शाम " लाल " कह घर के बाहर से किसी ने आवाज दी थी, तब मैं आंगन में सांझा बाती दे रही थी । ये वही आवाज थी । "

" घटना के पूर्व की कुछ बातें बता सकती है ..?"

" सर, शादी घर से हम दोनों नौ बजे चल दिए थे । नर्रा गांव के बाद ही जंगल शुरू हो जाता है । सिंगारी मोड़ पर हमें मुड़ना था । लाल ने होर्न बजायी तो मैंने पूछा " रात को होर्न बजाने का क्या मतलब ..?"

" गलती से बज गया .. !" लाल ने कहा था । 

आरती का बयान दर्ज कर लिया गया । बड़े बाबू रंजन चौधरी ने लाल पर एक नजर डाली । लेकिन कुछ कहा
नहीं । लाल, बड़े बाबू की चुभती नजरों का सामना न कर सका । उसका गला सूखने लगा था । 

बाद में एक महिला कांस्टेबल की निगरानी में मेडिकल टेस्ट के लिए आरती को सदर अस्पताल फुसरो भेज दिया गया । 

शाम को थाने के बड़े बाबू को मेडिकल रिपोर्ट मिल गई । सामूहिक दुष्कर्म की पुष्टि हो चुकी थी । 

बड़े बाबू रंजन चौधरी का दिमाग अब घोड़े से भी तेज गति से दौड़ना शुरू कर दिया था । 

अगले दिन पुलिस ने लाल को उसके घर से उठा लिया । घर वालों ने इसका कड़ा विरोध किया । लाल के बड़े भाई ने मंत्री से शिकायत करने की धमकी तक दे डाली " गुनाहगारों को पकड़ने की जगह भाई को ले जा रहे हैं, यह अच्छा नहीं कर रहे है, मंत्री जी को इसका जवाब देना पड़ेगा आपको .. !"

" आपको जहां शिकायत करनी है, कीजिए, पर इतना जान लीजिए इस कांड की गुत्थी आपके भाई से जुड़ी हुई
है !"

" इसके पीछे जरूर कुछ बात होगी.. !" गाँव में भी चर्चाएँ शुरू हो गई थी । 

आरती दुष्कर्म कांड में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया, जब लाल की गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद उसकी निशानदेही पर गुप्त छापामारी कर पुलिस ने उन चारों दुष्कर्मियों को एक साथ धर दबोचा ! 

उसके पहले थाने ले जाकर पुलिस ने लाल को खूब ढंग से उसका स्वागत किया । पहले पानी और फिर उसे चाय पिलाई गई । फिर " तुम्हारा कहना है कि उस बलात्कारी को तुम नहीं जानते हो जो तुम्हारा नाम जानता है ?" बड़े बाबू का सवाल । 

" मैं सच कहता हूं सर, मैं उसे नहीं जानता .. !"

" तुम सब जानते हो.. !" बाकी शब्द लाल की गाल पर पड़े बड़े बाबू के जोरदार चाटें ने पूरा कर दिया था । फिर तो वह सीडी की तरह चालू हो गया था । 

डेढ़-दो घंटे चली धर पकड़ अभियान और फिर बाद में उन चारों के बयान ने समूचे क्षेत्र में एक सनसनी सी फैला दी थी । लोग सकते में आ गए थे ! इस दुष्कर्म काँड से बहुतों को हैरानी हुई थी । विश्वास और भरोसे पर ऐसा क्रूरतम प्रहार हुआ था, जिसका फिलहाल किसी के पास कोई उत्तर नहीं था । 

" शराबी और जुआरियों पर भरोसा करना आज के दौर में बड़ा मुश्किल है । " किसी ने जोड़ा था । 

" यह दुनिया अब भरोसे की काबिल नहीं रही . !"

" औरतें कहीं सुरक्षित नहीं है, न पेट में, न घर में और न पतियों के संग- साथ.में. !"

" औरतें कारवां चौथ, वटवृक्ष सावित्री पूजा और न जाने क्या कुछ करती हैं अपने पतियों की सलामती के लिए, अगर वही पति पत्नी के साथ ऐसा विश्वासघात करता है तो उस पत्नी पर क्या असर पड़ेगा, सोचने वाली बात है.. !"

मगनपुर गांव में दुष्कर्म कांड को लेकर गप्प- शप, काफी बढ़ गई थी और गली मुहल्लों में जिसे देखो वही लाल और आरती के संबंधों की बाल की खाल उतारने में लगा हुआ था । 

" लगता है, अब दोनों में कभी नहीं पटेगी.. !"

" पटने जैसी बात ही नहीं है ! आरती दबने वाली औरत भी नहीं है । होती तो वह थाने जाती ही नहीं । "

" कामकाजी महिलाएँ जमाने से टक्कर ले रही हैं.. !"

" यह बड़ी बात है .. !"

" उसके साथ गलत हुआ है, उसकी इज्ज़त का सौदा किया गया और उसे लूट लिया गया.. !"

" लाल इतना बड़ा कमीना निकलेगा, हम तो सोच कर ही हैरान है !"

" उसका मुँह देखता हूँ, हमेशा सूअर जैसा थथूना किये रहता 

है .. !" लाल के प्रति कुछ लोगों का गुस्सा इस तरह भी फूट रहा था । 

आरती के भीतर भी एक तुफान उठा हुआ था, जो उसके दिलो-दिमाग को मथ रहा था । उसके भीतरी संसार में रात दिन अनवरत मंथन चल रहा था । भयानक लहरों के साथ उसके भीतर एक ज्वार-भाटा उठी हुई थी और देह में दावानल सी भभक रही थी । मन भारी था, भोगे हुए ज़ख्मों की टीस थी । जीवन में मिली इतनी बड़ी चोट की गहराई को वह नाप नहीं पा रही थी । एक दागदार जीवन की चादर को ओढ़े वह किस तरह जी पाएगी । लोगों की चुभती नजरों का सामना वह कैसे करेगी । ये सोच-सोच कर उसके दिमाग की नसें फटी जा रही थीं। एक तरफ दागदार जीवन का एक गहरा समंदर सामने था और किनारा दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा था । लहरों के बीच जैसे जीवन उसका आ फंसा था । और उसका जो नाविक था उसने बीच मंझधार में ही उसका साथ छोड़ दिया था । राजेश भी उसके जीवन से दूर जा चुका था । अपने से दूर जाने को उसने खुद उसे मजबूर कर दिया । 

 दस साल पहले उसके बेरंग जीवन में एक बदलाव आया था । मन उसका उन्मुक्त गगन में उड़ने लगा था । लगा था जीवन को एक गति मिल गई है । जीवन से पहली बार लगाव हुआ था, उसे प्यार हो गया था जिंदगी के इस पल से । वह पेंशन डिपार्टमेंट में राजेश की सहायक थी । पेंशन का काम करते करते दोनों कब इतने करीब आ गए कि एक दूसरे को देखे बिना दोनों का रहना मुश्किल हो गया । सुबह आफिस में पहले वो दोनों ही पहुँचते, पहले चाय पीते, फिर दोनों काम पर लग जाते, फिर दोपहर को दोनों लंच साथ-साथ करते । छुट्टी होती, पहले आरती नीचे उतरती फिर राजेश । तब तक आरती का आदमी आ चुका होता । यह सिलसिला नौ दस साल तक बड़े प्रेम से चला । अचानक एक दिन आरती ने राजेश से कहा -" अब हम एक ही आफिस में एक साथ रह कर काम नहीं कर सकते हैं । उसे हमारे रिश्तों की भनक लग चुकी है, कहता है " मुझे मालूम हो चुका है, तुम दोनों रोज मिलते हो, अगर यह मिलना बंद नहीं हुआ, अगर तुमने उसका साथ नहीं छोड़ा तो, देखना एक दिन तुम दोनों में से किसी एक को मार कर जेल चला जाऊंगा.. !" 

वह डर गई थी, अपने लिए नहीं, बल्कि राजेश के लिए डरी थी, यह सनकी उसको कुछ कर न दे । वह राजेश से बेइंतेहा प्यार करने लगी थी । लोग भी कहते हैं कि जुआरी और शराबियों से जितना दूर रहो, उतना ही बेहतर है । 

फिर उसका पति लाल तो एक अव्वल दर्जे का जुआरी था और शराबी भी । जुआ और शराब के शौकीन लाल नशे में धूत रात को अक्सर देर से घर आता, जब सब लोग सो रहे होते । उसका खाना टेबल पर रखा रहता था । कभी खाना खाता कभी सोई हुई आरती का ही भक्षण कर लेता । आरती इसी तरह की एक बेस्वाद जिंदगी जी रही थी । जिसमें न प्यार का  गुलकंद था और न उमंग की कोई तरंग । इस उबाऊँ जीवन से राजेश ने अपनी बांहों में भर कर उसे उबार लिया था । एक जीवंत एहसास के साथ । 

पति के दबाव में आकर आरती ने उसी राजेश से एक दिन दूरी बना ली -" टेंशन के साथ जीवन जीना सही नहीं है.राजेश. ! हम अलग रह कर भी अपने प्यार के एहसास के साथ रह लेंगे " अपने ही हाथों अपने अरमानों की गला घोंटने को आरती विवश हो चुकी थी । 

दूसरी तरफ राजेश हर हाल में आरती के साथ जुड़े रहना चाहता था । वह कोई भी जोखिम उठाने को तैयार था -" आरती, मैं तुम्हें आसमान के चाँद तारे तो लाकर नहीं दे सकता, पर अपनी पलकों में जरूर बिठा कर रखूँगा । मैं तुम्हें जीवन में कभी धोखा नहीं दूंगा । यह मैं वायदा करता हूं.. । तुम मुझे छोड़ने की बात मत करो, मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊँगा । तुम मुझे अपने से दूर मत करो । लौट आओ.. आरती लौट आओ .. !" राजेश रोने लगा
था । 

" राजेश, मैं तुम्हारी जुदाई बर्दाश्त कर लूँगी । हर हाल में जी लूँगी । लेकिन तुम्हें कुछ हो जाए, यह मैं सहन नहीं कर सकूँगी । वह पागल हो चुका है, उस पर भरोसा नहीं कर सकती । हमारा प्यार जिंदा रहे, इसके लिए तुम्हें जिंदा रहना होगा । !"

" तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है.. !" आँसू पोंछते राजेश चला गया था । 

सप्ताह दिन बाद ही राजेश ने अपना तबादला दूसरे एरिया के एक आफिस में करवा लिया था । तब से दस साल का एक लंबा समय बीत गया । फिर दोनों कभी नहीं मिले । 

अखबार से ही राजेश को आरती के साथ हुए दुष्कर्म की जानकारी हुई । वह गुस्से से सुलग उठा । कभी फोन ना करने की कसम तोड़ा " आखिर उस कमीने ने, अपना असली रूप दिखा ही दिया न, मैं कहता रहा, वह तुम्हें धोखा देगा । बहुत पहले ही उसके चेहरे पर मैंने हरामीपन पढ़ लिया था । बार-बार तुम्हें आगाह करता रहा । अब क्या कहूँ.. !"

" तुम कैसे हो..?" फोन रिसीव करते ही आरती की आँखों से आँसू झरने लगे थे । 

" यह सब जान सुन कर कैसे कहूँ कि ठीक हूँ.. !" 

देर तक दोनों के मुंह बंद रहे ! सिर्फ सांसों की आवाजें आती जाती रहीं । 

राजेश का फोन आना आरती के घायल तन मन में चंदन का लेप जैसा था । एक पल के लिए वह जख्मों को भूल गयी थी । 

वह बिस्तर पर पीठ के बल लेटे-लेटे कभी ऊपर छत को तो कभी उस छिपकली को देख रही थी जिसने अभी-अभी एक उफिया को निगल लिया । तो क्या उसे भी उस उफिया की तरह निगल नहीं लिया गया था । वह खुद को समझने और समझाने में लग गई थी । 

आरती को हमारे आफिस में एक कुशल महिला कर्मचारी का खिताब मिला हुआ था । आफिस में हर किसी के प्रति उसका व्यवहार हमेशा मर्यादित और मधुर रहा है । बेतुकी बातें कभी उसके मुंह से नहीं सुनी गई और न दस सालों की नौकरी में कभी किसी के साथ उसे लड़ते झगड़ते देखा गया था । सिवाय राजेश को छोड़कर । राजेश ही एक मात्र ऐसा था जिसके साथ आरती अक्सर लड़ती झगड़ती थी । पर यह झगड़ा हिरण और शिकारी जैसा नहीं था । राजेश काजल की तरह उसकी आँखों में बसा हुआ था । फिर एक दिन आरती के कारण ही उसे यह आफिस छोड़ना पड़ा था । 

आरती आकस्मिक अवकाश ले रखी थी । उसकी दरखास्त मेरी टेबुल पर पड़ी हुई थी और आज ही सभी अखबारों में आरती बलात्कार कांड को लेकर समाचार छपा था । समाचार क्या था ? पूरा का पूरा सच उगल कर रख दिया गया था । प्रभात खबर ने बयानों को कहानी की तरह छाप दिया था । एकदम अखबारी भाषा में ! 

चारों दुष्कर्मियों का बयान खटिया के चार पावों की तरह था । देह से वे चारों अलग थे । लेकिन बयान उन चारों का अलग नहीं था । सबने एक स्वर में कहा - " हमने कोई बलात्कार नहीं किया है ! हमने इसके लिए पैसे दिए थे.. !" बलात्कारियों का यही सामूहिक बयान था । 

बयान की शुरुआत घनश्याम साहू से हुआ था " हमेशा की तरह उस दिन भी हम पाँचों जुआ खेल रहे थे । लाल सारा पैसा हार चुका था । वह उठ कर जाने लगा । थोड़ी दूर जाकर रुक गया । फिर पीछे मुड़ा और सामने आकर बोला " एक दांव और खेलूंगा, एक लाख का, बोलो खेलते हो ?"

" पर तुम्हारे पास पैसे है कहां ? उधार का हम नहीं खेलेंगे.. !" मैंने साफ मना कर दिया । 

लाल एक दम से लहक उठा था - 

" दस लाख है मेरे पास .. !" जवाब में उसने ने कहा । 

" अभी तुम्हारी जेब में दस टका नहीं था, यह दस लाख कहां से आ गया ..?" बीच में फूचा बोल उठा । 

" मेरी पत्नी कितने लाख की है, मालूम है तुम लोगों को ..?" 

" हां, हां, मालूम है, पर उससे क्या ? जुआ खेलने के लिए तो तुम्हें वह सौ का नोट भी नहीं देती .. !" जीभ निकाल कर मैंने रोब से कहा । 

" एक लाख के रूप में मैं उसी पत्नी को आज दांव पर लगाता हूँ.. !" लाल ऊँची आवाज में बोल पड़ा था । 

" क्या, होश में तो हो ? पत्नी को दांव पर लगाएगा ? महाभारत याद है ..?" मैं अचंभित उसका मुँह ताकने लगा था-" जुआ का नशा उस दिन शायद उस पर भूत की तरह चढ़ गया था । लाल अपनी दाँत किटकिटाने जैसा करने लगा था । 

" बोलो, दांव लगाते हो, .. बोलो लगाते हो " वह अपनी ही धुन में बोलता गया । 

मैं सोच में पड़ गया था । मैं लाल की पत्नी और उसके स्वभाव को जानता था । जान लेगी तो सबकी जान ले लेगी । एक दम बिंदास औरत थी । और मिजाज की कड़क भी । कोई भी उसके सामने जाने से डरता था । मज़ाक करना तो दूर की बात । उस जैसी औरत की सवारी करना शेरनी की सवारी करने जैसी थी । ' हां - ना ' के बीच हम चारों कुछ देर तक उबक डूबक होते रहे । तभी सोमा मोदी बोल उठा - " घनु, गाँव में सभी मुझे " घनु " ही कहते हैं, उसने कहा " मान जाओ, हमारा क्या जाएगा, हारेंगे तो उसका पैसा उसे लौटा देंगे । .. और यदि जीत गए तो . !" बोलते बोलते वह रूक गया था । 

फिर जाने किस सोच के तहत हमारे मुंह से " हां, हम तैयार हैं " निकल गया । 

फिर उसी जगह, उसी बांस गुदाओं के बीच हम पांचों बैठ गये थे । आधा घंटा पहले जिस जगह को अलविदा कह निकल गये थे । फिर ताश निकल गई । बाजी बिछ गई । खेल शुरू हो गया । हम चारों के बीच एक अजीब सी कशमकश की स्थिति उत्पन्न हो गई थी । देह की नसों में तनाव महसूस करने लगे थे । लाल का और भी बुरा हाल था । जंग का मैदान हो या खेल का मैदान । जीत हर किसी की पहली प्राथमिकता होती है । परन्तु उस वक्त लाल का खेल - खेल जैसा नहीं लग रहा था । उफनती नदी में किसी को ढकेल देने वाला उसका भाव देख एक पल के लिए मैं डर ही गया था । वह पहले वाला लाल नहीं लग रहा था । उसके खेलने का अंदाज भी बिल्कुल नया था । और उसका चेहरा तीर से बिंधे सूअर सा हो गया था । पहले ऐसा नहीं होता था । हम खेल को खेल की तरह लेते थे । हां, खेलने में एक जुनून होता था । बस जीत लेने का जुनून । लेकिन हार जीत का जरा भी ग़म नहीं होता था । आज हारे है, कल जीतेंगे भी " यही भाव सबों के चेहरे पर चिपका हुआ होता था । हंसी ठिठोली भी चलता रहता था । लेकिन उस दिन, उस घड़ी सब ख़ामोश थे । डर था । कहीं किसी के बोलने से जीत हार में न बदल जाए । 

" फिर क्या हुआ था..?" थानेदार रंजन चौधरी ने पूछा था । 

" पहले के दो बाजी में हार जीत का फैसला न हो सका .. !" घनश्याम ने कहना जारी रखा " फिर हम तीसरी बाजी खेलने बैठे, लाल ने तीन बार खेल को बीच में रोका, हर बार उसकी सोच बदली बदली-सी लगती । हम उसकी ओर देखते, वह चूहे की माफिक हँस देता- 

" यही लास्ट खेला होगा, इसके बाद हम नहीं खेलेंगे.. !" मैंने कहा । उसने मुझे घूर कर देखा । खेल शुरू - पांच मिनट.., दस मिनट.. और पन्द्रह मिनट.. ! अबकी जीत का इक्का मेरे हाथ में था.. ! खेल समाप्त हो चुका था । लाल बाजी हार चुका था । दांव पर लगाई पत्नी को वह हार चुका था । फुचा तुरी ने फच से बोल दिया -" हमने तुम्हारी पत्नी को जीत लिया है.. !"

लाल ने कुछ नहीं कहा । 

मैंने आहिस्ता से नजरें उठा कर लाल को देखा । वह निर्विकार भाव से मुझे देख रहा था । वह शांत नहीं था । सहज भी नहीं था । 

तभी मैंने कहा -" लाल, जुए में हमने तुम्हारी पत्नी को जीत तो लिया है, परन्तु फायदा क्या.?..यह बात जो उसे कहने जाएगा, उसे चप्पल खानी पड़ेगी, और हम नहीं चाहते कि जीत कर किसी की चप्पल खायें.. !"

" तो तुम्हें जीत का फायदा चाहिए । ?" लाल ने अपनी भाव भंगिमाओं को लपटते हुए कहा था । 

" बिल्कुल हमें चाहिए.. !" फुचा तुरी कुछ ज्यादा ही फुदक -उचक रहा था । 

" जीत का फायदा तो हमें मिलना चाहिए.. !" यह सोमा मोदी था । 

" जुआ में औरत जीतने का मजा तो मिलना ही चाहिए.. !" रघु साव ने पहली बार मुंह खोला । 

" मतलब कि इस जीत का तुम चारों को फायदा चाहिए -यही न ?" 

" हां, .. !" हम चारों ने एक साथ कहा । 

" ठीक है, तुम चारों मेरे " पे फोन "पर एक लाख भेजो- 

अभी.. !"

" हम चारों, तुम्हें एक लाख क्यों दें..?" मैंने विरोध जताया । 

" तब फिर जाओ, मेरी पत्नी से जाकर कहो कि हमने तुम्हें जुए में जीता है.. !"

हम चारों एक दूसरे का मुंह देखने लगे । 

अंत में हमने लाल की बात मान ली और पच्चीस पच्चीस हजार कर उसके खाते में एक लाख रुपए भेज दिए.. !"

" चार दिन बाद इस पैसे का मजा लेने को तैयार रहना- टच में रहना.. !" लाल ने कहा और उठ कर चल दिया था । 

" तुमने अपनी ही पत्नी के साथ ऐसा खेल क्यों खेला..?" आखिर में रंजन चौधरी ने लाल से पूछा था । 

" वह मेरी पत्नी थी ही नहीं । उसके जीवन के साथ मेरा कोई मेल नहीं था । वह हमारे घर में रहती जरूर थी । लेकिन मैं उसके दिल में नहीं रहता था । मेरी पत्नी होकर भी वह मेरे साथ एक बंटी हुई जिंदगी जी रही थी । उसकी आंखों में तो राजेश बसा हुआ था । उसके साथ जो कुछ भी हुआ, उस पर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है, वह इसी लायक थी.. !" 

" बंटा हुआ जीवन जी रहा था, इसीलिए ऐसा किया " कुछ अखबारों ने उसके इसी बयान को हेडलाइन बनाया था । 

दूसरे दिन चारों दुष्कर्मियों के साथ लाल को भी टेनुघाट जेल भेज दिया गया । बलात्कारियों के बयान और पुलिस चार्जशीट को अदालत ने गंभीर अपराध माना और इसी को आधार बनाया और सप्ताह दिन में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी सामने आ गया । 

अपने फैसलों की वजह से चर्चित जज मलिक साहब के सामने बचाव पक्ष के धाकड़ वकील शतीश महथा की एक भी दलील काम नहीं आई, जज मलिक साहब ने उनकी एक नहीं सुनी और चारों दुष्कर्मियों को उनके किए कर्मों अनुसार बीस- बीस साल की और मुख्य आरोपी मानते हुए लाल को बत्तीस साल कारावास की सजा सुना दी । इतने बड़े मामले को छोटे समय में ही फैसला सुना कर मलिक साहब फिर चर्चा में आ गए थे । 

एक बालिग और दूसरा नाबालिग दो बेटों की मां आरती को अब अपने जीवन का फैसला करना था, जो आसान नहीं था । उसके जीवन को छला गया था और उसे जलील किया गया था, अपने ही हाथों और अपने ही लोगों द्वारा । वह मर्माहत कम आहत ज्यादा थी । घर के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी । तभी आरती का बड़ा बेटा रूपेश ने बाहर आकर यह कहा -

" लाल हमारा बाप था, पर अब वह हमारे लिए मर चुका है.. !" भीड़ को चौंकाया था । वह गुस्से में था और घर के बाहर लोगों के बीच कह रहा था - " अपने इस कुकृत्य से उसने हमारी मां का ही अपमान नहीं किया है, हमें भी समाज में जलील किया है, सिर नीचा किया है.. ! " 

चालीसवां बसंत पार कर चुकी आरती का शरीर आज भी लोगों को आकर्षित कर रहा था और यह बखूबी उसे भी पता था । परन्तु उसे यह पता नहीं था कि जिंदगी एक दिन उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ी कर देगी, जहां टी वी चैनल वालों के सामने उसे अपनी बात रखने की नौबत आन पड़ेगी, एक नजर उसने बाहर खड़ी भीड़ को देखा और फकत इतना भर कहा कि - " घर, सुरक्षा और इज्जत की जिंदगी जब दांव पर लग जाए, तब उस बंधन को तोड़ बाहर निकल जाना ही बेहतर है, औरतें ताश का पत्ता नहीं होतीं, उसका भी अपना वुजूद होता है "बोलते बोलते आरती की आवाज गंभीर होती चली गई थी । लोगों ने उसको इतनी संजीदा कभी नहीं देखा था, उस घटना के बाद ! इसी के साथ आरती कमरे की ओर मुड़ गई थी !

“ इस तरह का साहसिक निर्णय हर औरत नहीं ले सकती !” 

बाहर खड़ी भीड़ से किसी ने कहा था । 

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कहानी

सुदर्शन प्रियदर्शिनी,  Ohio 44147, 'U.S.A.'

Email : sudershen27@gmail.com

बड़े घर की बेटी

मेरे प्रियतम! आज वह घड़ी आ गई है जबकि मैं, किसी के समक्ष जिह्वा खोले बिना, केवल तुम्हारे समक्ष अपने अंतर्मन की छाई हुई गहरी वीरानी, विवशता और पीड़ा को प्रकट कर सकूँ । आखिर हर एक बात की कोई सीमा होती है । नदी भी दो कूलों पर अपनी निश्चित परिधि के अन्दर बहती है । जब कभी वह किनारे के उस कठोर बन्धन को तोड़ना चाहती है, तभी चोट खाकर पीछे लौट जाती है । 

मैंने बहुत सहा है, मेरे प्रियतम! तुम्हें शायद वह दिन याद होगा जब शरद पूर्णिमा की रात में तुमने मुझ पर अपना सारा प्यार उड़ेलते हुये कहा था- "देखती जाओ और चुप रहो मेरी अचला! जब तुम्हें अधिक तंग करेंगे तो मैं इन्हें छोड़ कर चला जाऊँगा और तुम्हें इनकी छत्र-छाया से दूर... बहुत दूर ले जाऊँगा मेरी रानी । " परन्तु मैंने अन्दर ही अन्दर वेदना का घूँट पीते हुआ कहा था- नहीं मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूँगी । तुम तरुण हो और पिता जी बूढ़े हो चले हैं । तुम जिन जीवों के मुँह में भोजन ग्रास डालते हो, क्या मैं उनके मुख से कौर छीन लूँ? ... कभी नहीं । मुझे वह क्या कहेंगे? मेरे लिये उनके हृदय में एक अभिशाप जनित फटकार और दारुण घृणा उमड़ेगी जो मुझे जीते जी जला देगी । मैं तुम्हें चाह कर भी यह अन्याय कभी नहीं करने दूँगी । 

यह तो मेरे कहने की बात ही नहीं कि मेरे पिता कितने बड़े धनिक हैं । लक्ष्मी रात-दिन उनके पैरों को पखारती है । जहाँ सदैव हर एक के लिए द्वार खुला है, तुम वहाँ के दामाद हो और मैं बेटी । क्या हमारे लिये वहाँ स्थान नहीं होगा? और तुम यह जानते हो कि मैंने जिस लाड़-प्यार के झूले में जीवन की शैशव और यौवनावस्था की देहरी पार की है उसके लिये यह सब नितान्त नवीन अनुभव है । मैंने सुना है कि मेरे नौकर ने तुम्हें सब बता दिया है । उस दिन बड़ी दीदी (अचला की ननद ) को मैंने पड़ोसिन के समक्ष अपनी प्रशंसा में यह शब्द कहते सुना था... नौकर कहता है कि अगर उनको कुछ भी नापसन्द होता था तो मायके में बीबी थाली में पानी डालकर उठ जाती थीं । 

परन्तु मुझे याद नहीं कि मैंने प्रथम दिन से ही ऐसे कभी नाक- मुँह सिकोड़ा हो । मैंने अपने अरमानों का और अन्दर दबी हुई भावनाओं का हनन किया है तो केवल तुम्हारे लिये । तुम जानते हो कि भारतीय नारी का समस्त प्रेम, श्रद्धा और भाव उसके पति में निहित होते हैं । प्रभात की ओस की तरह, पुरुष की दृष्टि चाहे कितनों पर थिरकती रहे परन्तु भारतीय नारी को पति के बाद कोई इच्छा नहीं रहती है । नारी के लिये स्वाति नक्षत्र की बूँद की तरह पति ही सब कुछ है । पति परमेश्वर है, विधाता है चाहे वह उसे पाँव की जूती समझे या अपने हृदय की रानी । केवल पति के चरणों में रहने के लिये नारी सब कुछ सह सकती है । मैं नहीं चाहती कि ससुराल का द्वार छोड़कर मैं पिता की वैभवशाली देहलीज पर आधीन होकर पैर रखूँ । मैं पिता के प्रौढ़ कन्धों से छूट चुकी हूँ तो अब क्यों अमावस की काली रात्रि बनकर उनके मस्तिष्क पर चिन्ताओं की रेखाओं-सी उनके आस पास लहराऊँ? मैं ससुराल में ही रहूँगी चाहे उपेक्षिता बनकर रहूँ, मुझे स्वीकार है । 

जब मेरे समक्ष पिता के राज में पले हुये शैशव की मधुर स्मृति के सुहाने दृश्य आते हैं, तब अनजाने ही मेरी छाती गर्व से फूल उठती है । पर न जाने क्यों, मैं देखती हूँ कि मेरे नयन के कोरों में अश्रु-बिन्दु भी छलक उठते हैं । मैं जानती हूँ कि मैं सहनशील हूँ इसलिए मौन हूँ । बड़ी दीदी हैं, उन्हें और तुम्हें छोड़ने को दिल नहीं चाहता । 

इस घर में अगर मैंने किसी बड़ी आत्मा के दर्शन किये हैं तो वह बड़ी दीदी हैं । जो यदा-कदा मेरे गुणों को माता जी के समक्ष बखानती रहती हैं । यही नहीं, घर की चारदीवारी के बाहर भी पड़ोसियों से मेरी तुलना आज के आधुनिक वैभवशाली वातावरण में पली हुई चटकीली, भड़कीली और लज्जाहीन लड़कियों से करती रहती हैं । यह ठीक है या नहीं, मैं नहीं जानती, परन्तु इतना अवश्य कह सकती हूँ कि उनमें विवेक और बुद्धि है । क्योंकि मुझमें कितने गुण और दोष हैं, यह मैं नहीं जानती । प्रत्येक मनुष्य में दुर्बलतायें होती हैं, जिन पर वह संघर्षो से जूझ कर ही विजय पा सकता है । मैं जानती हूँ, कि माता जी क्या चाहती हैं, परन्तु मैं चाहकर भी वह नहीं बन सकती । उस दिन की बात मैं भली प्रकार जानती हूँ । भला मैं कोई अन्धी हूँ जो न पहचानूँ ? क्या मुझमें बुद्धि नहीं है... आखिर मैंने भी दसवीं तक कापियाँ और पुस्तकें फाड़ी हैं । मुझे भी संसार के कुछ भेदभाव का ज्ञान है । तुम सब सिनेमा के बहाने लड़की देखने जाते हो इसलिए न कि तुम्हारी दूसरी शादी हो जाये? मैं यह भी जानती हूँ कि माता जी को मैं पसन्द नहीं हूँ । माँ की ओर से लादी गई विवशता से तुम बेमन और उदास होकर आते-जाते हो । मैं नहीं जानती कि यह आडम्बर है या सच । दीदी तुम्हारे साथ कभी क्यों नहीं जाती हैं? यह भी मैं नहीं जानती । परन्तु वह मुझसे स्नेह करती हैं, प्यार करती हैं और कभी-कभी बातों-बातों में फफक कर रो भी पड़ती हैं । मैं पूछती हूँ परन्तु वह कुछ बताती नहीं हैं । फिर सोचती हूँ कि शायद माँ पर क्रोध हो या अपने भाग्य पर, क्योंकि उनका निखरा हुआ सौन्दर्य, भोली आँखों का मौन निमन्त्रण, गालों की सुन्दरता, एक अच्छे खासे प्रौढ़ व्यक्ति की विलासी प्रवृति में नष्ट हो रही है । माँ बाप ने उन्हें दुहाजू के साथ बाँध दिया था । भला कौन अपना भरपूर यौवन किसी बूढ़े खूसट की गोद में बिखेरना चाहेगा? इसीलिये देखती हूँ कि उनके चेहरे पर वीरानगी और अभाव की गहरी लकीरें सदैव के लिये खिंच कर रह गई हैं । परन्तु उनकी विवशता को, और उनकी ही नहीं प्रत्येक नारी के आन्तरिक बन्धन को मैं जानती हूँ । 

काश! तुम भी कभी नारी को समझने की चेष्टा करते या नारी होते तो समझ पाते कि नारी गूंगी गाय है, उसे चाहे जिससे बाँध दिया जाये चाहे गन्दी बदबूदार कीचड़ भरी नाली के साथ या किसी घुप अन्धेरी कोठरी में, जहाँ कभी रवि ने अपनी ज्योति को बिखेर कर न देखा हो । यह सब क्यों हैं? तुम स्वयं जानते हो । दीदी को देखकर कभी-कभी मुझे तुम पर क्रोध आता है कि तुम्हें तब क्या हो गया था? तुमने चुपचाप यह अत्याचार कैसे सह लिया था? काश ! कि तुम्हारा ब्याह पहले हो जाता तो मैं दीदी पर यह अत्याचार न होने देती । तुम भी जानते हो कि मेरे ननदोई हर समय खाँसते रहते हैं । मुझे तुमसे भय लगता है कि, तुम बुरा न मान जाओ पर सच कहूँ, उन्हें दमे का रोग है । 

काश! तुम सच्चे भाई होते और एक बहिन के हृदय में पैठकर उसके अन्तर की पीड़ा को पहचान पाते । 

मुझे तुम्हारे सुनहरे मार्ग से हटाने के लिये, कई बार जो निष्फल प्रयत्न किये गये हैं, वह मेरे लिये सदैव स्मरणीय रहेंगे । परन्तु मुझे कभी तुम्हारी ओर से वीरानी या उदासी अनुभव हुई हो ऐसी कोई बात नहीं है । मैंने तुम में सचमुच प्रेम का वह भण्डार पाया है जो एक देवता - पति में पाया जाता है । 

कदाचित तुम भी कई बार मेरी उस भाभी के विषय में सोचते होगे जो माता जी को एक क्षण में न जाने कितनी बार कचोटती है । मैं विनाशिनी हूँ जिसने तुम्हारे माता जी के अंतस की शांति को झकझोर कर रख दिया है । उनके सुनहरे स्वप्न को तोड़ दिया है । मैंने बहुत बार तुमसे बहुत कुछ कहने की सोची पर तुम्हारी ओर से इस विषय पर मौन पाकर चुप्पी साध ली । मैंने कभी जबान खोलने का साहस तक नहीं किया । लेकिन मैं माता जी की एक परख की प्रशंसा करूँगी कि उन्होंने मेरी इस कमी को पितृत्व के वैभव से कभी पूर्ण नहीं होने दिया । मैं जो कुछ भी लाऊँ या मेरे पिता जो भेजें, वह उन्होंने किस लेखे में लिखा है, कह नहीं सकती परन्तु मैंने अपनी ओर से सदैव उन्हें उदासीन ही देखा है । मेरे मायके की ओर से वह संतुष्ट हैं, सुखी हैं, परन्तु एक ही बात, जो सब से बढ़कर है, उन्हें सदैव कचोटती रही है । 

मेरे साथ का ही तो कमरा है, जहाँ रात को दीदी और माता जी सोती हैं । मैंने दीदी को एक बार नहीं, हजारों बार कहते सुना है कि माँ तू अपने पैरों पर कुल्हाड़ी आप ही मार रही है । अपने घर की सुख-शांति को स्वयं विनाश के मुँह में दे रही है । तेरी लड़कियाँ, मैं या मेरी छोटी बहिनों में कौन से लटकन लगे हुये हैं । पहले घर की ओर देखो माँ ! लड़की वालों को तो ऐसा कहना या करना ही नहीं चाहिए परन्तु दीदी क्या करें? उनका बस ही कहाँ चलता है? वह तो स्वयं पराधीन हैं । वह स्वयं मेरे जैसी नारी हैं, जिनका परिस्थितियों और सैकड़ों विवशताओं ने मुँह बन्द कर रखा है । वह लड़की तुम्हें पसन्द आई या नहीं, मैं नहीं जानती, परन्तु चुपके से, जो मेरे कमरे के साथ वाले कक्ष की खुसर-पुसर से मैंने सुना है, उससे लगता है कि तुम चुपके-चुपके विवाह करने जा रहे हो । मुझे आश्चर्य है कि आज रात भी तुम में कोई अन्तर नहीं दीखा बल्कि पहले का सिमटा हुआ प्यार और भी उमड़ पड़ा है । तुम भी अच्छे आदमी हो... नहीं ! ...नहीं ! एक सफल पति हो । 

मैं अब तक चुप रही थी हालांकि दीदी ने मुझे कई बार भड़काने का प्रयत्न किया था । मुझसे यहाँ तक कहा था कि अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो ऐसा - ऐसा करती । वह मुझे कहती हैं कि मैं भोली हूँ क्योंकि मैं हर बात को, हर हानि को हर वस्तु को स्पष्ट रूप से सबके सामने रख देती हूँ, चाहे उससे मुझे डाँट फटकार और गालियाँ ही क्यों न मिलें । मैंने कभी चुपके से नुकसान करके उसे छिपाने का प्रयत्न नहीं किया । परन्तु मैं सदैव ही माता जी के समक्ष अपना मुँह काला करवाने के लिये और फटकार सुनने के लिये गई हूँ । दीदी ने ऐसे अवसरों पर मुझे सदैव डाँटा है, धमकाया है । परन्तु मैं इस स्थिति में भी जरा सा सिर ऊँचा उठाकर चलना नहीं चाहती । मैंने जीवन में एक ही उद्देश्य रखा है कि जो एक बार बड़ा बनकर के जीवन में समा गया वह बड़ा ही है । मेरे इस सीमित मस्तिष्क की परिधि उसे छोटा या घिनौना रूप कभी नहीं दे सकी और न ही दे सकती है । बड़ों के समक्ष जबान खोलना मेरी आत्मा की आवाज के विरुद्ध है । इसलिये माता जी को इस अपने अन्तिम पत्र में छोटा या नीच ठहराऊँगी तो मेरी आत्मा मुझे धिक्कारेगी । मेरी भावनायें मुझे कचोटेंगी । तुम मेरे पति हो, सब कुछ हो और मैं चाहती हूँ कि अन्त तक तुम्हारा पवित्र नाम ही मेरे अंतस में रहे । 

प्रातः माँ के द्वारा चाय में कुछ पिलाने का एक और निष्फल प्रयास किया गया वह मैं चाहते हुये भी नहीं पी सकी थी । यद्यपि पिछली रात, तुम्हारे सो जाने के बाद, मैं प्रकृति की रंगीनियों और वीरानियों, पतझड़ और बसंत की फिजाओं में, सामने उगे हुये लम्बे ताड़ और नीम के वृक्षों के एक-एक पत्ते से सलाह कर चुकी थी और उनसे आज्ञा ले चुकी थी । चाँद की एक-एक किरण ने मेरे आँसुओं पर थिरक कर अपनी सहमति प्रकट की थी । जीवन की सारी गहराईयों में, निराशाओं और आशाओं के बीच जो मैंने तथ्य और निचोड़ निकाला था उसके अनुसार मुझे वह अमृत प्याला पी जाना चाहिये था । परन्तु उस समय मेरे मस्तिष्क में तीन विचार थे - प्रथम तो यह कि फिर तुम्हें यह अन्तिम उद्गार भरा पत्र न लिख पाती, जिसे शायद पढ़ने के लिये या उस पर मनन करने के लिये भी तुम्हारे पास समय न होगा । तुम्हारे पास समय हो या न हो, तुम्हारी भावनायें या प्यार मुझ में निहित हों या न हों, मेरा सब कुछ तुम्हीं में निहित है, इसीलिये यह पत्र लिखा है । दूसरा कारण यह कि आज के इस वैज्ञानिक युग में कोई रहस्य गुप्त रह सके, यह आश्चर्य है का विषय है । बड़वानल की तरह जब यह संवाद वायुमण्डल में फैल जायेगा कि सास ने बहू को विष दे दिया तो हो सकता है तुम्हें और माँ को कानूनी लोहे की जंजीरों मैं बँधना पढ़े, जो मेरे लिये कदाचित असहनीय है । तीसरा कारण यह है कि आज शाम को दीदी चली जायेंगी । उनके सामने मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकती । जीते जी कड़ी भावना का कड़वा विष कौन पी सकता है? मेरी भी दुर्बलता है कि मैं भी नहीं पी सकी । और यह एक नन्हीं सी रीता । 

मेरे जाने का समाचार कहीं तुम्हारे कुटुम्ब के उज्जवल नाम पर कोई काला धब्बा न लाये इसीलिये मैंने यह सब किया है । परन्तु प्रियतम ! तुम संसार से कह सकते हो कि मैं रात्रि की गाड़ी से मायके चली गई हूँ । मेरे मायके में इतनी दूर आसाम की चाय के उद्यानों की डरावनी घाटियों में कोई पड़ोसी पूछने नहीं जायेगा कि अचला मायके गई है या कहीं और । और मैं मायके नहीं जा सकती हूँ जैसा मैंने पीछे लिख दिया है । तुम अपने मन की शांति के लिये या घर-परिवार के लिये मुझे शहर से उत्तरी ओर आनन्द भवन के मन्दिर के बाहर जो बड़ा उपवन है जिसके ठीक बीच में जो एक गहरा कुआँ है, प्रातः की सुनहरी बेला में, ठीक सूर्य उदय होने के डेढ़ घंटे के बाद, उस कुएँ के प्रतिबिम्बित काले पानी पर तैरते देख लेना । मैं जानती हूँ कि उस कुएँ से कोई पानी नहीं भरता, इसलिये मुझे वहाँ कोई देख नहीं सकता । बहुत दिनों के पश्चात देखने पर मेरी विचित्र शक्ल से कोई पहचान नहीं सकेगा । और बहुत दिन बाद भी बहू घर न आये तो लोग बातें बनायेंगे, तो अपनी इस बदनामी से बचने के लिये शहर छोड़ सकते हो, मकान बदल सकते हो । जहाँ तुम और तुम्हारी नई पत्नी, माता जी और अन्य परिवार के सदस्य बेखटके समाज की तीक्ष्ण दृष्टि से दूर निष्कलंक रह सकते हैं । और फिर माता जी ठीक हो जायेंगी । तुम्हारे अंतर्मन में शायद अदृश्य रूप में छाई हुई अभाव की रेखा भी पूर्ण हो जायेगी । 

तुम अच्छा, अन्त में मैं तुम्हारी नवपत्नी, जो मेरे अनुमान से अवश्य ही सुन्दर, पतली, कोमल और चटकीली होगी, क्योंकि मैं तुम्हारी अपेक्षा शरीर में काफी मोटी थी, और तुम्हारे सुख एवं वैभव के लिये तुम्हें शुभकामनायें भेंट करती हूँ । माता जी तुम जैसे सुन्दर बेटे को सुन्दर जोड़ी के रूप मैं देखना चाहती थीं, जिसमें मैं सर्वथा असमर्थ और प्रतिकूल थी । मैंने काफी प्रयत्न किया परन्तु वास्तविकता और दो दिलों में जो दरार पड़ गई थी, कब जा सकती थी?

प्रियतम ! अन्त में एक और बात है जो बहुत ही आवश्यक और दर्दनाक है । इस पर शायद तुम्हारी भी आँखों में आँसू आ जायेंगे । मेरी रीता को तुम सदा अपनी समझना क्योंकि है तो तुम्हारी अपनी ही, परन्तु जो दूसरी पत्नी के आने से तुम्हारे लिये दूसरी हो जायेगी । 

और देखो प्रियतम! जब भी उसमें यौवन के अंकुर फूटने के साथ उल्लास और मोटापन आने लगे तो तुम बेशक उसका गला घोंट देना । मैं पत्र लिख रही हूँ और रीता मेरे सामने है । मेरी आँखें उसे देखकर बार-बार डबडबा जाती हैं । उसे छाती से लगाकर बार-बार चूमती हूँ, भींचती हूँ, परन्तु फिर भी इस समय तुम्हारा और माता जी का हित उसके छोटे से हित और स्नेह के समक्ष बड़ा और विशाल लगता है । 

माता जी दिन पर दिन घुल रही हैं । कहीं वह इसी दुःख में मर न जायें, इसलिये यह सब कर रही हूँ । रीता मेरी ओर खिसकती आ रही है । उसकी आँखों में, ऐसा लगता है, जैसे कोई बहुत बड़ा संदेश है, जो शायद नारीत्व का है । परन्तु मैं भी विवश हूँ । अगर वह लड़का होती तो मुझे तनिक भी दुःख नहीं होता । लड़की है उसे न जाने कौन-कौन सी विडम्बनाओं का शिकार होना पड़े । परन्तु फिर भी अब बस करती हूँ । रीता मेरी ओर खिसकती आ रही है । ऐसा न हो कि वह मेरा पत्र फाड़ दे और मेरी करी- कराई मेहनत मिट्टी में मिल जाये । मेरा जी भी चाह रहा है कि जाने से पहले उस पर जी भरकर अन्तर का सारा प्यार, दुलार और उद्गार उड़ेल दूँ । वह बच्ची है, अभी क्या समझे । 

प्रियतम देखो, उसे सदा अपनी रीता समझना । और अब तुम्हें कभी बाहर जाने में कठिनाई नहीं होगी । तुम एक छरहरे बदन वाली के साथ घूम सकोगे, सैर कर सकोगे । कोई नहीं कहेगा कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारी अपेक्षा बहुत मोटी है । रीता बहुत दुःखी करे तो उसे मेरे मायके भेज देना । पिता जी को भी पत्र लिख रही हूँ । वह तुम्हारे पास नहीं आयेंगे, परन्तु शायद रीता को लेने आयें । 

मुझे मानवता के स्वार्थ पर आज क्रोध आ रहा है । एक दिन माता जी ने मुझे घर में लाकर पड़ोसिनों से कहा था- "सुन्दरता कोई धोकर पीनी है । मोटी है तो क्या हुआ गुण होने चाहिये और फिर इतने बड़े घर की बेटी है । " अंतिम बार मेरा प्यार स्वीकार करो ।

तुम्हारी,   अचला

साभार: ‘काँच के टूकड़े’ से जिसका पहला संस्करण 1962 में छपा था दूसरा संस्करण 2023 में आ चुका है।

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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग


डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता,  उज्जैन (म.प्र.),  मो. 9424560115


मृदुभाषी-अल्पवर्णित वीर माता सुमित्रा

एक बार भूपति मन माहीं । 

भै गलानि मोरे सुत नाहीं । 

गुर गृह गयउ तुरत महिपाला । 

चरन लागि करि । बि

नय बिसाला । । 

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड 189-1

एक बार राजा दशरथजी के मन में बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं हैं । राजा तुरन्त ही गुरु वसिष्ठजी के घर गए और चरणों में प्रणाम कर बहुत विनय की । 

राजा दशरथजी ने अपना सारा दु:ख-सुख गुरुजी को सुनाया । गुरु वसिष्ठजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया और कहा धैर्य धारण करो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और भक्तों के भय को हरने वाले होंगे । मुनि वसिष्ठजी ने शृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न करवाया । शृंगी ऋषि के यज्ञ से अग्रिदेव हाथ में चरू (खीर हविष्यान्न) लिए प्रकट हुए । तब महर्षि वशिष्ठजी ने कहा- 'हे राजन! तुम जाकर हविष्यान्न (पायस) को जिस रानी को जैसा उचित हो वैसा भाग बनाकर बाँट दो । उसी समय राजा ने अपनी पत्नियों को बुलाया । कौसल्या आदि सब रानियाँ वहाँ चली आईं । राजा ने पायस का आधा भाग कौसल्या को दिया और शेष आधे के दो भाग किए । वह उनमें से एक भाग राजा ने कैकेयी को दिया, शेष जो बच रहा उसके दो भाग हुए और राजा ने उनको कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रख कर अर्थात उनकी अनुमति से और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्रा को दिया । 

दीनों पर दया करने वाले कौसल्या के हितकारी कृपालु प्रभु का जन्म हुआ । 

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ । सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ । । 

वह सुख संपति समय समाजा । कहि न सकइ सारद अहिराजा । । 

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड 195-1

कैकेयी और सुमित्रा- इन दोनों ने भी सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया । उस सुख सम्पत्ति, समय और समाज का वर्णन सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कर सकते । 

नामकरण-संस्कार का समय जानकर दशरथजी ने ज्ञानी मुनि वसिष्ठजी को बुला भेजा । मुनि वसिष्ठजी ने कहा- हे राजन्! इनके अनुपम नाम हैं फिर भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा-

जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी । । 

सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक बिश्रामा । । 

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड 197-3

ये जो आनन्द के समुद्र और सुख की राशि है जिस (आनन्द सिन्धु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम 'राम' है जो सुख का भवन और सम्पूर्ण लोकों को शान्ति देने वाला है । 

विस्व भरन पोषण कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई । । 

जाके सुमिरन ते रिपु नासा । नाम सत्रुघ्न बेद प्रकासा । । 

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड 197-4

जो संसार का भरण-पोषण करते हैं, उन (आपके दूसरे पुत्र) का नाम 'भरत' होगा । जिनके स्मरण मात्र से शत्रु का नाश होता है उनका वेदों में प्रसिद्ध 'शत्रुघ्न' नाम है । 

दो. लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत अधार । 

गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार । । 

श्रीरामचरितमानस दो. 197

जो शुभ लक्षणों के धाम, श्रीरामजी के प्यारे और सारे जगत के आधार है गुरु वसिष्ठजी ने उनका नाम 'लक्ष्मण' ऐसा श्रेष्ठ नाम रखा । 

राजा दशरथजी की तीन रानियों में सुमित्राजी का चरित्र सबसे अधिक रोचक है क्योंकि वह मानस में अल्पभाषी मृदुभाषी है तथा दूसरी तरफ उनसे वार्तालाप करने वाले पात्र भी बहुत कम है । अल्पभाषी पात्र सुमित्राजी हैं किन्तु वह सूर्यवंश के राजपरिवार की प्रतिष्ठित, स्वाभिमानी और अनेक गुणों से सम्पन्न प्रतिष्ठित नारी भी
है । सुमित्राजी का राजा दशरथ से भी वार्तालाप बहुत कम ही पाया गया है । सुमित्राजी दु:ख-सुख, हानि-लाभ, संयोग-वियोग और विनोद-विषाद सबको समान समान दृष्टि से देखती है । समता की यही श्रेष्ठ भावना सुमित्राजी को स्वार्थ से एकदम दूर रखती है और सबके साथ सौहार्द्र-मित्रता के सूत्र में बाँधती है । सुमित्राजी ने अपने जीवन में कोई इच्छा प्रकट नहीं की और न कोई महत्वाकांक्षा । 

लक्ष्मण को वन में विदा करते समय सुमित्राजी का मुँह मानस में प्रथम बार खुलता दिखाई देता है । इसके पूर्व उन्हें बोलने के अनेक अवसर थे, पर वह हर परिस्थिति में मौन रही । माता सुमित्राजी का प्रथम वार्तालाप श्रीराम के वनगमन के समय पुत्र लक्ष्मण के साथ बड़ा रोचक, शिक्षाप्रद तथा अनुकरणीय है । लक्ष्मणजी ने श्रीरामजी के साथ वन जाने के लिए बड़ा हठ करके अंत में श्रीरामजी को राजी कर लिया किन्तु श्रीराम तो बड़े अनुशासनप्रिय थे अत: लक्ष्मण से कहा कि तुम अपनी माता से मेरे साथ वन चलने की अनुमति प्राप्त कर लो । 

मागहु बिदा मातु सन जाई । आवहु बेगि चलहु बन भाई । । 

मुदित भए सुनि रघुबर बानी । भयउ लाभ बड़ गइ बडि हानी । । 

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड 73-1

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- हे भाई! जाकर माता से विदा माँग आओ और शीघ्र वन को चलो । रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीराम की वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गए । बड़ी हानि दूर हो गई और बड़ा लाभ हुआ । लक्ष्मणजी बड़े ही उदास मन से माता सुमित्राजी के पास गए और वनगमन की कथा विस्तार से उन्हें सुनाई । लक्ष्मणजी मन ही मन सोच रहे थे कि हे विधाता! माता वन जाने का कहेंगी या नहीं । कैकेयी पर दशरथजी के प्रेम से सुमित्राजी ने अपना सिर धुना तथा अपना कुसमय जानकर भी धैर्य नहीं खोया । बड़े ही प्रेम से उन्होंने लक्ष्मण से कहा-

तात तुम्हारी मातु बैदेही । पिता रामु सब भाँति सनेही । । 

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड 74-1

हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता है और सब प्रकार से स्नेह करने वाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं । 

एक आदर्श माता के रूप में सुमित्राजी ने लक्ष्मण को अल्प शब्दों में जो शिक्षा दी, वह प्रत्येक माता के लिए अनुकरणीय है । 

गुर पितु मातु बंधु सुर साई । सेइअहिं सकल प्रान की नाई । । 

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित रखा सबही के । । 

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड 74-3

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी इन सबकी सेवा प्राण के समान करनी चाहिए । फिर श्रीराम तो प्राणों के भी प्रिय हैं, हृदय के भी जीवन हैं और सभी के स्वार्थ रहित सखा है । हे तात्! हृदय में ऐसा जानकर उनके साथ वन को जाओ और जगत् में जीने का लाभ प्राप्त करो । 

लक्ष्मण को माता सुमित्रा द्वारा वचन और कर्म से श्रीसीतारामजी की सेवा करने का उपदेश अत्यन्त ही अनुपम है । वे कहती हैं कि संसार में वही युवती, स्त्री पुत्रवती हैं जिसका पुत्र श्रीरामजी का भक्त हो । नहीं तो जो श्रीराम से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी । पशु की भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है । 

तुम्हरेङ्क्षह भाग रामु बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीं । । 

सकल सुकृत कर बड़ फलु एहु । राम सीय पद सहज सनेहू । । 

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड 75-2

सुमित्राजी लक्ष्मण से कहती हैं कि तुम्हारे ही भाग्य से श्रीराम वन को जा रहे हैं । हे तात् (पुत्र)! दूसरा और कोई कारण नहीं है । पापियों का भार पृथ्वी पर और भूमि का भार शेषनाग पर है, लक्ष्मण शेषावतार होने के कारण उन्हीं के सिर पर भार है, उसी के उतारने को राम वन में जा रहे हैं, इसलिए तुम्हारे भाग्य खुल गए हैं अथवा तुम वन में उनकी अच्छी भलीभाँति सेवा कर सकोगे इसलिए तुम्हारा बड़ा भाग्य है । सब पुण्यों का यही बड़ा फल है, जो सीताराम के चरणों में स्वाभाविक प्रेम हो । 

तदनन्तर सुमित्राजी लक्ष्मण को शिक्षा देती हुई कहती हैं- राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह इनके वश स्वप्न में भी मत होना । सब प्रकार के विकारों का त्याग करके मन, वचन और कर्म से श्रीसीतारामजी की सेवा करना । तुमको वन में सब प्रकार से आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और श्रीसीताजी रूप माता-पिता हैं । हे पुत्र! तुम वही करना, जिससे श्रीरामजी वन में क्लेश न पावे । यही मेरा उपदेश है । हे तात! मेरा यही उपदेश है जिससे वन में तुम्हारे कारण श्रीरामजी और श्रीसीताजी सुख प्राप्त करें और पिता, माता प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की याद भूल जाएं । तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजी ने इस प्रकार हमारे प्रभु लक्ष्मणजी को शिक्षा देकर वन जाने की आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्री रघुनाथजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो । वह माता सुमित्राजी की सीख-उपदेश, लक्ष्मणजी सुनकर उनके चरणों में सिर नवाकर तुरन्त वहाँ से चल दिए । 

तदनन्तर कौसल्या एवं सुमित्रा से चित्रकूट में सीताजी की माता श्रीसुनयना मिलती है तब सुमित्रा ने कहा-

सुनि ससोच कह देवि सुमित्रा बिधि गति बड़ि बिपरीत विचित्रा । । 

जो सृजि पालइ हरइ बहोरी । बालकेलि सम बिधि मति भोरी । । 

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड 282-1

देवी सुमित्राजी शोक के साथ कहने लगी- विधाता की चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टि को उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है । विधाता की बुद्धि बालकों के खेल के समान भोली (विवेक शून्य)
है । 

चित्रकूट में सुनयनाजी कौसल्या, सुमित्रा से मिलने आती है कौसल्याजी ने उनके समक्ष श्रीराम को वन से लौटने हेतु कई विकल्प रखती है- जैसे लक्ष्मण को घर (अयोध्या) रख लिया जाएं और भरत वन जाएं । 

लाखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी । सब भइ मगन करुन रस रानी । । 

नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि । सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि । । 

सब रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ । तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ । । 

देबि दंड जुग जामिनी बीती । राम मातु सुनि उठि 

सप्रीती । । 

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड 284-3,4

कौसल्याजी का स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियाँ करुणरस में निमग्न हो गईं । आकाश से पुष्प वर्षा की झड़ी लग गई और धन्य-धन्य की ध्वनि होने लगी । सिद्ध योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गए । 

सारा रनिवास देखकर थकित रह गया अर्थात निस्तब्ध हो गया तब सुमित्राजी ने धीरज धर के कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गई है । यह सुनकर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं । अयोध्याकाण्ड में सुमित्राजी का यह अंतिम वार्तालाप है । 

मानस मेें उत्तरकाण्ड में श्रीराम के लंका से रावण के वध उपरान्त अयोध्या लौटने पर उनकी श्रीराम से मिलने का वर्णन अत्यन्त ही अद्भुत है । 

दो. भेटेउ तनय सुमित्रां राम चरन रति जानि । 

रामहि मिलत कैकइ हृदयं बहुत समुचानि । । 

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ । 

कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोमु न जाइ । । 

श्रीरामचरितमानस 6 (क), 6 (ख)

सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजी की श्रीरामजी के चरणों में प्रीति जानकर उनसे मिलीं । श्रीरामजी से मिलते समय कैकेयीजी हृदय में बहुत सकुचाईं । लक्ष्मणजी भी सब माताओं से मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए । वे कैकेयी से बार-बार मिले परन्तु उनके मन का क्षोभ (रोष) नहीं जाता । 

यही मानस में सुमित्राजी के अंतिम संवाद का वर्णन है । इस प्रकार मानस में सुमित्राजी अल्पवर्णित और मृदुभाषिणी माता के रूप में वर्णित है ।     


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कहानी

कमला दत्त, 

Georgia 30030, U.S.A., Email : kdutt1769@gmail.com


धीरा पंडित, केकड़े और मकड़ियाँ


तुम घर पर रहो । 

वह बाहर रहे । 

तुम स्वतंत्र जीवन बनाओ । 

तुम उसका घर न उजाड़ो, तुम्हारा भी बना रहे । 

तुम आज़ाद हो । 

तुम आज़ाद हो !

कोई हथौड़े मारता रहा था धीरा के दिमाग में । उसने कुर्सी मेज़ के पास सरकायी थी, सिर मेज़ पर टिकाया था, कुछ देर सुबकी और फिर सिर मेज़ पर ज़ोर-ज़ोर से पटकना शुरू कर दिया था । कुछ देर डॉ. जर्सिकी हतप्रभ बैठे रहे थे, उनसे कुछ भी करते न बना था और फिर झटके से उठकर उन्होंने धीरा को कंधों से कस कर पकड़ लिया था, “स्टाप इट, स्टाप इट!” और कुछ लम्हों में धीरा उनके हाथों के दबाव से शिथिल पड़ गयी थी और फिर रुक-रुक कर सुबकती रही थी और बीच-बीच में किसी आहत जानवर की तरह कराहती रही थी

फिर एक के बाद एक पेपर नैपकिन टोकरी में गिरे थे । 

"तुम इसी तरह नैपकिन फेंकती रही तो जाने मुझे कितने और डिब्बों का ऑर्डर देना पड़ेगा । "

धीरा के आँसू भरे चेहरे पर खिसियानी हँसी आ कर लौट गयी थी । 

और फिर कई लम्हों तक अपने में खोयी रही थी वह । डॉ. जर्सिकी के परे, दीवार से परे कुछ खोजती उसकी आँखें पथरा गयी थीं । 

डॉ. जर्सिकी ने कुरेदा था, "क्या सोचने लगीं ?"

कमला दत्त की यादगारी कहानियाँ :: 37

"कुछ भी नहीं । "

"कुछ तो सोच रही थीं..."

इस बीच कुर्सी से उठकर जर्सिकी ने खिड़की के परदे खोल दिये थे । बाहर पेड़ों का रंग कुछ-कुछ बदल रहा था । इस बार पतझड़ कुछ जल्दी ही आ गया है । धीरा की 'हूँ' पतझड़ की हवा के साथ वातावरण में तैर गयी थी । 

सरदी से पहले सरदी आने का अंदेशा । 

“हाँ, कहो, क्या सोच रही थीं?"

“बचपन में हम लोग शिमला में रहते थे । चारों ओर पेड़ों पर बंदर रहते थे । एक बार एक बंदरिया का बच्चा मर गया था । वह मरे बच्चे को छाती से चिपकाये इधर-उधर भटकती रही थी । कराहती रही थी । फिर बच्चे की लाश गलने लगी - चारों ओर सड़ांध फैलाती हुई । आसपास के लोग डर गये थे कि बिमारी न फैल जाये । फिर कुछ समझदार लोगों ने पुराने चीथड़ों का गोला बनाया था, उसे मिट्टी के तेल में भिगो, आग लगा, पेड़ पर फेंका, जहाँ बंदरिया बैठी थी । आग के डर से जब वो भागी तो बच्चे की लाश अलग हो जमीन पर गिरी और लोगों ने उठाकर उसे जला दिया । पर बंदरिया कई दिनों तक कराहती रही थी । "

धीरा को फिर अपने में खोये देख डॉ. जर्सिकी फिर पूछ बैठे थे, “क्या सोचने

लगीं? हाँ, कहो, क्या सोच रही थीं?"

"कब ?"

" इस वक़्त, अभी । "

"बस, उस दिन की बात । "

"किस दिन की बात ?"

उस दिन धीरा ने ही बिल्डिंग सुपरिटेंडेंट की मिन्नत की थी, “मैं बस उसे एक बार देखना भर चाहती हूँ, क्या अपनी गाड़ी में मुझे ले जायेंगी ?"

"क्या करोगी देखकर, सब समझती तो हो..."

यह एक हारा हुआ युद्ध है - एक हारा हुआ युद्ध !

और फिर कार में बैठते हुए एक बार मिसेज सलेवन आशंकित हुई थीं, "सह सकोगी उसे तुम, उस सबको । है इतनी सहनशक्ति ?"

धीरा ने ही कहा था, "क्या मरीज कभी सर्जरी के लिए तैयार होता है मिसेज सलेवन ?... एक बार देख लूँगी तो शायद मन सम्भल जाये । मुझमें सच बर्दाश्त करने की हिम्मत आ जाये । "

मिसेज सलेवन ने जैसे ही कार रोकी, जीत की गाड़ी बर्कशाझर टाउन हाउसेज के सामने रुकी । वह कार से निकल कर इधर-उधर देख रहा था । फिर नाटे कद और सुनहरे बालों वाली एक लड़की उससे लिपट गयी और वे वहशियों की तरह एक-दूसरे को बेतहाशा चूमने लगे थे । धीरा कार से निकल कर पगलायी हुई सी उनकी तरफ भागने लगी थी । मिसेज सलेवन ने उसे जबरदस्ती कार में वापस धकेला । 

दूसरी मंजिल की खिड़की से एक परदा सरका था, एक पुरुष मुख भी जीत और उस लड़की को ताकता लगा था । धीरा ने सोचा था, क्यों नहीं वह पिस्तौल दाग देता? क्या उसके पास पिस्तौल है ? 'महायुग का आदिम' क्या यह सब बरदाश्त करता ? जानवर भी अपने साथी को किसी और के साथ जाते देख लड़ाई करते हैं धीरा को उस टेलीविज़न कार्यक्रम की याद हो आयी थी जहाँ एक कैराबू दूसरे को घायल कर देता है, फिर विजयी कैराबू मादा के साथ चल देता है । तो जीत और वह लड़की विजयी है? खिड़की वाला चेहरा और स्वयं वह हारे हुए हैं? क्या उन्हें मैदान छोड़ देना चाहिए? फिर उसे एकाएक चक्कर आ गया था । मिसेज सलेवन ने गाड़ी मोड़ी, एक रेस्तरां में रोककर उसे जूस पिलाया था और अपार्टमेन्ट बिल्डिंग में पहुँच कर कहा था, "तुम अपने किसी हिन्दुस्तानी मित्र को फ़ोन करो । आज का दिन तुम्हें अकेले नहीं रहना चाहिए । "

जब मिसेज सलेवन ग्रॉसरी शॉपिंग से लौटीं तो कॉरीडोर में लोगों की फुसफुसाहटें और गैस की बू भरी थी और अधमरी धीरा अस्पताल पहुँचा दी गयी थी । और हफ्ते भर बाद लौटी तो उसकी सहेली बिन्दु ही उसे जबरदस्ती डॉ. जर्सिकी के पास ले आयी थी । अब तो यह बात पुरानी हो गयी है । परत-दर-परत कितना खोला था धीरा ने डॉ. जर्सिकी के सामने । एक पूरी संस्कृति, एक पूरी सभ्यता । इस बार तो धीरा, पूरे साल भर के अंतराल के बाद आयी है, डॉ. जर्सिकी के पास - एक बार फिर बिलखती हुई । 

किसी एक सेशन में वह देर तक जर्सिकी को घूरती रही थी... "इस तरह क्या देख रही हो?"

“आप मेरे पिता जैसे लगते हैं । सोलह की थी, जब पिता का देहान्त हुआ था । बड़े भाई ने ही सम्भाला मुझे, और मेरे छोटे भाई को । माँ दादी गाँव रहीं । भाभी ने कभी नयी-नयी साड़ियाँ नहीं खरीदीं । प्रोफेसर की तनख्वाह में कुछ ज़्यादा होता नहीं और फिर वहाँ तो महंगाई ही इतनी है । "

"पर धीरा, मेरी समझ में नहीं आता, बिना कुछ जाने-बूझे तुमने शादी को हाँ कैसे कर दी? तुम पढ़ी-लिखी थीं..."

उनकी कही बात को पूरी संस्कृति पर टिप्पणी मान धीरा नाराज़ हो उठी, “वहाँ भी परिवार देखे जाते हैं, बात वैसे ही है, जैसे कम्प्यूटर मिलाता है सब-कुछ और । कम्प्यूटर भी तो गलत हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें चलाने वाले आदमी ही तो होते हैं । और यहाँ के ही सारे विवाह कहाँ सफल हो जाते हैं...

डॉ. जर्सिकी ने समझाया था, “तुम्हें इस तरह डिफेंसिव नहीं होना चाहिए" और फिर कह उठे थे, “आप सभी हिन्दुस्तानी आलोचनाओं को इतने व्यक्तिगत तौर पर क्यों लेते हैं? शायद यह प्रवासियों की नियति है । अपनी ज़मीन से अलग होने का दुःख और कटाव । और यह अपराध-बोध भी कि उन्होंने अपनी ज़मीन छोड़ दी है सुख-सुविधाओं के लिए, सो वहाँ की हर वस्तु को रोमांटिक तरीके से देखने लगते हैं । ..."

धीरा पिछले चार सालों से कॉलेज में प्रोफेसर थी । अच्छा लड़का मिल नहीं रहा था । एक डॉक्टर से सगाई हुई थी पर उसकी माँ बड़ी लालची थी । माँ भाई तो ज़मीन बेचने को तैयार थे, पर धीरा ही अड़ गयी थी, “मैं कोई बिकाऊ गाय नहीं, पढ़ी-लिखी हूँ, नाक-नक्शा, कद-काठी सभी कुछ तो है । "

और फिर जीत उन दिनों शादी के लिए भारत आया हुआ था । उसकी माँ-बहन आयीं और धीरा को पसंद कर
गयीं । 

“मुझे तो पहले से ही शक करना चाहिए था । जब देखने आया और जैसा कि रिवाज़ है, चाय के बाद हम दोनों को कुछ देर अकेला छोड़ा गया था कि बात कर लें, तसल्ली कर लें, खाक तसल्ली होती है पन्द्रह-बीस मिनट में । जानते हैं, पहला सवाल क्या पूछा था ?"

"क्या पूछा था ?"

... कि तुम किसी को प्यार करती हो? किसी से था इस तरह का कोई सम्बन्ध तुम्हारा?

"बड़ी खीज़ आयी थी उस सवाल पर । सिर हिला कर ज़ाहिर किया था नहीं, मेरा किसी से सम्बन्ध नहीं, नहीं, मेरा किसी से प्यार नहीं । अगर सम्बन्ध होगा तो आपसे शादी के लिए हाँ क्यों करूँगी । ”

भाभी ने समझाया था - कोई घटना घटी होगी बेचारे से कहीं और । अमरीका में रहकर लोग बड़े स्पष्टवादी हो जाते हैं । यह नहीं जानता कि हमारी धीरा ऐसी-वैसी लड़कियों में से नहीं है । 

और फिर दो हफ्तों में तो शादी हो गयी थी । सभी ने कहा था - कितना मिलनसार है, कितना मीठा बोलता है । तेरह साल अमरीका रहा है । पर ज़रा भी फूँ-फाँ नहीं । 

“भाई ने हिम्मत से ज़्यादा खर्च किया था । शादी के बाद उन तीन हफ्तों में जीत सारे दिन पीछे-पीछे भागता रहा था- धीरा ! 

धीरा ! -कहकर लोगों के सामने बाँहों में भर लेता था । चूम लेता था । 

सच बड़ी शर्म आती थी । मना करने पर कहता था - अरे भाई, तुम मेरी ब्याहता हो, भगाकर नहीं लाया घरवालों ने भी समझाया था तुम खीजा न करो । तेरह साल अमरीका रहा, यह सब तो चलेगा ही...'

"डॉ. जर्सिकी ने चौंकाया था, "धीरा, फिर किस सोच में पड़ गयीं?"

"उन हफ्तों में लगा था, फ़िल्मों में देखा प्यार, कहानियों में पढ़ा प्यार ज़िन्दगी में भी हो सकता है और यह भी सच था कि वह पहला पुरुष था, जिसने मुझे बाँहों में लिया था, प्यार किया था और कहा था- तुम सुंदर हो, प्यारी हो । लोग इतना झूठ इतनी आसानी से कैसे बोल लेते हैं? हनीमून के लिए हम लोग नैनीताल गये थे । वहाँ झील पर घूमते-घूमते कभी-कभार लगा था, बड़ा उखड़ा उखड़ा है, शायद मुझसे नाराज़ । मैंने पूछा तो बस, टाल गया । सोचा, शायद मेरी शर्म-झिझक ने उसे नाराज़ कर दिया है । बस, यही कहता रहा कि वहाँ की लड़कियाँ तो बड़ी चालाक होती हैं । बस, कोई भरोसा नहीं । कहेंगी कुछ, करेंगी कुछ मतलबी... बस, फिर मेरे वीजा के पेपर्स जमा कर वह अमरीका लौटा था । उसमें सात-आठ महीने तो लगने ही थे । 

आते ही उसने टेलीग्राम भेजा और फिर एक लम्बा बड़ा प्यारा खत; और फिर खत आने बन्द हो गये थे और जब मेरे पाँच खतों का जवाब नहीं आया तो घबरा कर मेरी माँ और भाभी उसकी माँ से मिलने गयी थीं । माँ ने कहा था, 'बस जी, वैसे ही काम में लग गया होगा । ज़रा आलसी है । नहीं जी, हमने शादी के लिए कोई जबरदस्ती नहीं की । पहले भी तीन बार आया था । हर बार 'न' ही करता रहा । हमने तो इतना भी कह दिया था, वहीं कोई पसंद है तो ले आ । हम सभी शगुन का अपना चाव पूरा कर लें । हर बार यही कहता रहा वहाँ कोई नहीं है, मुझे नहीं करनी शादी, मैं सैलानी आदमी हूँ शादी मुझसे नहीं निभेगी... और इस बार आते ही कहने लगा - माँ, बड़ा चाव है न तुझे मेरी शादी का, सो कर दे अब... हमने कहा था - बच्चा, तू बरसों से टालता रहा है । अब इतनी जल्दी अच्छी लड़की और सब बन्दोबस्त कैसे करें? हमें पहले लिखा होता, लड़कियाँ ढूँढ कर रखते । अब पाँच हफ्तों में क्या होगा! सभी बन्दोबस्त कैसे करें...

.कहने लगा, माँ, इस बार नहीं हुई तो कभी नहीं होगी । फिर न कहना...बस जी, हम दौड़-धूप में लग गये । धीरा हमें पसंद आ गयी और उसे भी । बस, यही कहता रहा, बड़ी समझदार लड़की है । मुझे तितलियों जैसी लड़कियाँ पसंद नहीं, ज़्यादा उम्दा नहीं, पर क्या बढ़िया व्यक्तित्व है । ...'

धीरा सोच कर कसैली हँसी हँसी थी । 

यारी के लिए चुलबली अमरीकी !

शादी के लिए समझदार हिन्दुस्तानी !

... उसकी माँ बस यही कहती रही थीं बार-बार 'भाई साहब, फिक्र न करें । आपकी बेटी है तो हमारी भी बहू है । बस जी, डर लगता है । सुना है, अमरीकियों में रिवाज़ है, लड़कियाँ लड़कों के पीछे पड़ी रहती हैं । और हाँ भाई साहब, अपना जीत तो है भी सोना, गबरू जवान बस जी, अभी ज़रा डाँट के खत लिखती हूँ । बस जी, ज़रा लापरवाह है । भाई साहब, आपकी तो इतनी वाकफियत है, ज़रा वीजा ऑफिस में ज़ोर लगाईये न ! धीरा जाये, वहाँ सब कुछ सम्भाले, हमारा तो जी, एक ही लड़का है । पोते-पोतियों की आस लगाये बैठे हैं हम भी...'

और धीरा पैर छूने को हुई तो 'दूधो नहाओ, सौ पूतों वाली हो' का वह आशीर्वाद...धीरा डॉ. जर्सिकी को भारतीय संस्कृति में पुत्रों का महत्व समझाती रही थी । 

प्रत्युत्तर में डॉ. जर्सिकी ने बताया था, -“धीरा, यहूदियों में भी यही है । "

फिर उस महीने एक खत आया था और फिर लम्बी चुप्पी । इस बीच उसकी माँ एक बार फिर आयी थी । वीजा वालों को कोसती हुई, 'सुना है जी, अपने हिन्दुस्तानी भी झूठी बीवियाँ ले जाते हैं । तभी तो वीजावाले इतने सख्त हो गये हैं । भाई साहब, सच कहती हूँ, हमें कोई ऐसी-वैसी बात का पता होता तो आपको धोखे में न रखते । हम भी तीन-तीन लड़कियों वाले हैं । आपकी खज्जल ( परेशानी) - खराबी हमसे नहीं देखी जाती । '

फिर आने वाले छह महीनों में सिर्फ दो खत आये थे । अड़ोसी -पड़ौसी, नाते-रिश्तेदार भी पूछने लगे थे - धीरा कब जा रही है । खत-वत तो आते रहते होंगे । 

भाई, भाभी, माँ, दादी और मैंने सबने वह एक रटा-रटाया जवाब दिया था बार-बार । सब ठीक है जी, पिछले हफ्ते ही खत आया था । बस जी, एक-दो महीने की बात है । हमारे पास भी रह ले । जाने फिर कब वापस आये और इतनी दूर से कहाँ जल्दी आया जाता है ?

वीजा मिल गया था । सब तैयारी शुरू थी - नये कपड़े, साड़ियों पर फाल, नये ब्लाउज । फिर जीत की माँ रोते हुए पहुँची थी, 'भाई साहब, लगता है उसका दिमाग खराब हो गया । कहता है, अभी न भेजो धीरा को । मैं यहाँ मुसीबत में फँसा हूँ| धीरा से शादी जैसे एक गलती ही हो गयी । माँ, उसे न भेजो यहाँ...'

पहले घर में गुस्सा, फिर रोना और फिर ख़ामोशी घिर आयी थी । 

फिर जीत की माँ, मेरी माँ, भाई, भाभी का सम्मिलित फैसला - यहाँ रख कर भी क्या होगा, लोग बातें अलग बनायेंगे, बस वहाँ भेजें जैसे-तैसे । यह वहाँ पहुँची सो सारी बात सम्भाल लेगी । यह कैसा फितूर है कि मर्जी से शादी कर गया है और अब कहता है, न भेजो । 

दादी का लगातार एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना, 'जाको राखे साइयां मार सके न कोय । ' और फिर कई किस्से-कहानियाँ । जुनेजा का जँवाई नहीं बुलाता था अपनी बीवी को ...बस जी, किसी मेम के चक्कर में पड़ गया था । बस जी, वहाँ गयी और सब ठीक कर लिया । शरमे का जँवाई उसका भी वही हाल । लड़की वहाँ गयी, पहले कोशिश की, बात सम्भल जाये, जब नहीं हुआ तो तलाक ले लिया । घर-पैसे अपने नाम करवाये । अब तो सुना है जी कि दूसरी शादी भी कर ली । बस जी, थोड़ी हिम्मत, थोड़ा सब्र - सब ठीक हो जायेगा । 

सोमवार का व्रत रख धीरा! शिवलिंग पर पानी चढ़ा धीरा! पूर्णमासी का उपवास रख धीरा ! सब ठीक हो जायेगा । 

धीरा थोड़ी मंगली है - मूँगा पहनाओ जी । 

धीरा सभी व्रत-त्योहार मन्नते डॉ. जर्सिकी को समझाती रही थी । 

रोने-धोने के बावज़ूद धीरा भेज दी गयी थी सब कुछ सम्भालने के लिए, डरी सहमी धीरा, मिठाई के डिब्बों, हारों को सम्भालती हुई हवाई जहाज़ में बैठी थी । पेटी लगाने में कितनी मुश्किल हुई थी । साथ वाले गुजराती परिवार ने बड़ा हौसला दिया था । कॉलेज में लड़कों को पढ़ाने वाली धीरा अचानक बड़ी लाचार और अपाहिज हो आयी थी । न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर बिना कुली के बड़े-बड़े बक्से उठाने में बड़ी दिक्कत हुई थी । कस्टम के बाद गुजराती परिवार ने बार-बार एनाउंसमेन्ट करवाया था - मि. जीत, कृपया अपने आगंतुक से एयर इंडिया के काउंटर पर मिलें, मि. जीत, कृपया...

शायद कार से आ रहा हो, रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी हो । कई बार सैक्रामेंटो टेलीफ़ोन किया था, बस, घंटी बजती रही थी, बजती रही थी । 

आने वाले हादसों के डर से धीरा वहीं अधमरी हुई जा रही थी । थकी-हारी धीरा ने रात होटल में बितायी थी । सुबह मिठाई के डिब्बों, परिचितों के रिश्तेदारों को सौंपने के लिये लाये तोहफों को सम्भालती हुई धीरा सैक्रामेंटो वाले हवाई जहाज़ में बैठी थी । फूलों की मालाएँ बैग में निचुड़ी हुई बदबू देने लगी थीं । धीरा ने बार-बार चूड़े की चूड़ियाँ गिनी थीं, जो भाभी ने आते वक़्त जबरदस्ती उसके हाथ में डाल दी थीं, हाथीदाँत की चूड़ियाँ, हाथी कि तरह अ
डिग । सुहाग । 

"डॉ. जर्सिकी, वह सैक्रोमेंटो एयरपोर्ट पर भी नहीं था । जानते हैं, उन दिनों, मैं इतनी डरी-सहमी भी थी कि गला सूखने पर इतनी हिम्मत नहीं थी कि कोक मशीन में पैसे डाल कोक निकाल लूँ । एक बार मन चाहा, किसी से कहूँ, ये लीजिये पैसे, मुझे एक कोक निकाल दीजिए । वाटर फाउंटेन था पर डर था, कहीं गलत चला अपने को ही भिगो न लूँ । दो घंटे एयरपोर्ट पर ही बैठी रही थी । फिर एयरपोर्ट एथॉरिटी के लोगों ने सुझाया था - आपके पास पता है, टैक्सी लेकर घर चली जायें । वैसे अंग्रेज़ी स्कूल की पढ़ी थी, हैरान हुई थी, कोई मेरी बातचीत समझ नहीं रहा था, हर बात दो-दो, तीन-तीन बार समझानी पड़ी थी । कैब वाला अर्पाटमेंट बिल्डिंग के बाहर उतार चलता बना था । बाहर का दरवाज़ा खोलने पर अंदर लॉबी में पहुँच गयी । वह अपार्टमेन्ट में नहीं था । हार कर लॉबी में ही अपने बक्सों पर बैठ गयी थी । पर आने-जाने वालों को मुस्कुराती हुई । अजनबी शहर अजनबी लोग - बड़ी मुश्किल से अपने को रोने से रोका था । और फिर कोई मिसेज सलेवन को बुला लाया था - 'तो आप हैं श्रीमती जीत? मुझे तो लगा कि वह उस सुनहरे बालों वाली सुंदरी के साथ वह शादी करने वाला है...” और फिर मेरे चेहरे पर आये भावों को देख कह उठी थीं, “चिन्ता मत करो सुंदरी, तुम उसके लिए ठीक हो, उस लड़की से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत । "

मिसेज सलेवन अपार्टमेन्ट में बैठा कर चली गयी थी । 

माँ की कहीं बातें धीरा के दिमाग में तैरती रही थीं - उसके पैरों पर सिर रख कहना, जैसी भी हूँ, तेरी हूँ । तू ही रख लाज हमारी भी और अपनी भी । शादी तो तूने मुझी से की है, कुछ ऐसा-वैसा भी हो गया है, तो छोड़ उसे । न बाप-दादों की इज्ज़त पर पानी फेर । तू भी खानदानी, हम भी खानदानी । कोई लल्लू-पंजू नहीं । 

सुनहरे बालों वाली औरत की तसवीरें चारों ओर बिखरी थी । चाय के लिए बहुत मन होने पर भी वह कुकिंग रेंज जला नहीं पायी थी । माचिस की डिब्बी कहीं थी नहीं । यकायक भूख लग आयी थी । हवाईजहाज़ में भी कुछ खाने का मन नहीं हुआ था । भूख से बहुत कसमसाने पर फ्रिज में देखा था उसने, दो सड़े टमाटर, एक प्याज़, बियर की कुछ बोतलें - बस, इनके अलावा कुछ नहीं था वहाँ, हार कर साथ लाये मिठाई के डिब्बे से कलाकंद निकाल खाया था आज भी सब कुछ वैसा का वैसा ही याद है - मोतीचूर लड्डू के कई डिब्बे उसके घरवालों ने थमा दिये थे । जीत को बहुत पसंद थे । 

हँसी थी वह, लड्डू भी कोई खाने की चीज़ हुए !

डॉ. जर्सिकी पूछ उठे थे, “क्या बात है धीरा, बड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रही हो ?" कहते हुए शर्म आयी थी कि ज़हन में मिठाइयाँ घूम रही हैं । कुछ पल पहले बिलखने वाली धीरा मिठाइयों की याद से बच्चों की तरह खुश हो आयी थी ।

एक चुप्पी, और वह फिर उस पहली रात में पहुँच गयी थी । सोफे पर बैठे-बैठे गठरी बनी सो गयी थी । रात गये जीत आया था । उसके अंदर आने से पहले शराब की भभक, “तुम यहाँ ? लिखा तो था तुम मत आओ । फिर क्यों आ गयीं? कोई वज़ह थी तुम्हें यहाँ न बुलाने की । "

खुद्दार धीरा उसके पैरों पर सिर तो नहीं रख पायी थी पर बच्चे की तरह सुबक पड़ी थी । कब जीत आया, कब उसे बाँहों में घेरा और कब बिस्तर पर गये - वह सिहरन आज तक तन-मन में बसी है । और कुछ पलों में बरसों से उफनता समुद्र जैसे शान्त हो गया था । 

फिर सुबह जीत ने ही झकझोर कर उठाया था, "कुछ ज़रूरी बात कहनी है तुमसे, उठो, सुनो । 

वह पलंग के कोने पर सिर झुकाये बैठा था और लगातार बोलता गया था, "कोई वजह थी तुम्हें यहाँ न बुलाने की । तुम्हें समझना चाहिए था, यहाँ आकर तुमने हालात और जटिल कर दिये हैं । मेरे एक अमरीकन औरत से बरसों से सम्बन्ध हैं । तुमसे ज़्यादती हुई । मैंने सोचा था, हिन्दुस्तान आऊँगा, शादी करूँगा, सब ठीक हो जायेगा । जैसे पागलपन में ही सब कुछ हो गया । पागलपन में तो किये गये कत्ल की भी सजा नहीं मिलती । "

चाहकर भी वह कुछ कह नहीं पायी थी कि पागलों को पागलखाने में रखा जाता है, सड़कों पर नहीं छोड़ा जाता कि हर आने-जाने वाले पर पत्थर फेंके, उन्हें आहत करें । 

"उस औरत से शादी क्यों नहीं की?"

"कट्टर कैथॉलिक है । कैथॉलिक धर्म में तलाक अवैध है । "

"तो क्या कैथॉलिक धर्म अवैध सम्बन्धों की इज़ाजत देता है ?"

"यही तो मेरी लड़ाई रही है उससे । और ऐसी ही एक लड़ाई के बाद भारत लौटा था और शादी हो गयी । ..." आप जानवर हैं जो बाँध दिये गये ? हिन्दुस्तानी औरत तो गाय की तरह बाँध दी जाती है । आप तो मर्द थे !

वह अपने में ही बोलता रहा था, "वह धर्म की वजह से तलाक नहीं ले सकती और हम एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते । उसके पति ने तो स्थिति स्वीकार कर ली है और फिर तीन बच्चे भी हैं । हमारी यातना कौन देख रहा है ?"

..और मेरी यातना कौन देख रहा है?

"तुमसे शादी करके बहुत आश्वस्त लौटा था । उसे फ़ोन तक नहीं किया था । फिर जब ऑफिस में मिले, तो पुराना सब कुछ एक साथ उमड़ आया । मैं उसे बारह सालों से जानता हूँ । वह मेरे रोम-रोम में बसी है । हम एक-दूसरे के पूरक हैं । हमारे लिए कौन आसान है, बिना शादी के यह रिश्ता निभाना और अब तुम आ गयी हो... । "

“मैं आ गयी हूँ क्योंकि आप मुझसे शादी कर आये थे । आप ही हमारे घर आये थे और हर वक़्त धीराधीरा !... वह प्यार! सब दिखावा था, सब नाटक ? और आपके नाटक की कीमत चुकायेंगे ज़िन्दगी भर मैं और मेरे घरवाले । ”

“तुम रहो इस अपार्टमेन्ट में, कुछ आगे की पढ़ाई शुरू कर लो । मैं फीस दूँगा । तुम आत्मनिर्भर बन जाओ । और शायद कोई दूसरा आदमी तुम्हें यहाँ मिल जाये । " लगा था, जैसे उबलता तेल किसी ने कानों में उड़ेल दिया है । बस, जड़ बनी बैठी रही थी । 

सम्भलने पर सोचा था अगर बहुत प्यार दूँगी, तो शायद सम्भल जाये । क्या नहीं है मेरे पास जो उसके पास है । गांधारी धृतराष्ट्र के लिए अंधी बनी रही थी । सावित्री सत्यवान को यम के पास से लौटा लायी थी, क्या मैं जीत को मरिया से नहीं लौटा पाऊँगी । 

डॉ. जर्सिकी उसकी गांधारी, सावित्री - सत्यवान की बात सुन बहुत खीजे थे, “धीरा, छोड़ो उसे । उसकी ज़िन्दगी में अब कोई और है । तुम्हारा सत्यवान लौटना चाहता था और जीत नहीं । धृतराष्ट्र अंधा था, सभी के लिए, न कि सिर्फ गांधारी के लिए । "

डॉ. जर्सिकी उसकी बातों को दकियानूसी मान उसे शायद पागल ही मान बैठे थे और एक बार फिर झल्लाये थे, “तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो, समझदार हो, पर सच्चाई यह है कि तुम्हारी सावित्री - सत्यवान वाली कहानियाँ बकवास हैं... उबकाऊ समझदार बनो... इसे स्वीकार करो... स्वीकार । "

इस बार जब धीरा आयी तो डॉ. जर्सिकी ने सोचा था, धीरा तो गांधारी से भी बहुत आगे निकल आयी है अब । 

धीरा ने ही सुझाया था, "क्यों न हम दोनों कुछ दिनों के लिए बाहर जायें, एक-दूसरे को समझने की कोशिश करें तो शायद सब ठीक हो जाये । ”

"धीरा, तुम्हारा कसूर नहीं, मैं उस औरत को दिलोदिमाग से अलग कर ही नहीं पाता । हमारे पास जो कुछ है वह इतना विशेष और इस लायक है कि उसके लिए कोई भी त्याग किया जा सके । " उसने प्रतिवाद किया था । 

बहुत मिन्नतों के बाद जीत माना तो वे कुछ दिनों के लिए हवाई गये थे । दूसरे ही दिन बाथरूम से लौटी तो मरिया से टेलीफ़ोन पर बात कर रहा था । शर्म-लिहाज़ छोड़ धीरा बिफर उठी थी । "क्या उसे कल रात का ब्यौरा दे रहे थे कि तुम्हारी पत्नी उसके बराबर नहीं और उसकी जगह सुरक्षित है ? और क्या वह वेश्या भी अपने पति के साथ सोने के बाद तुम्हारे साथ नोट्स कंपेयर करती है..." जीत ने तड़ातड़ कई तमाचे जड़ दिये थे । बचपन में एक ही बार मार खायी थी । प्लीज़ प्लीज़ कहने वाली धीरा पगला गयी थी । लैंप, कपड़े, सूटकेस जाने क्या-क्या ज़मीन पर पटक दिया था उसने और फिर रोते-बिफरते फर्श पर ही ढेर हो गयी थी । 

वे दो दिन बाद ही सैक्रोमेंटो लौट आये थे । 

कई-कई बार धीरा ने अपने आपको समझाया था, मैं मन लगा पाठ करूँगी तो सब ठीक हो जायेगा । सोमवार का व्रत रखूँगी तो सब कुछ ठीक हो जायेगा । ज्योतिषी वगैरह किस-किस के पास नहीं भटकी थी । एक अमरीकन महिला एक साइकिक के पास ले गयी थीं । उस दिन की याद से तो आज भी दहशत होती है । उस अंधेरी गुफा जैसे कमरे में वह बैठी थी । चारों तरफ बिल्लियों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें थीं । कमरे में बस एक ही टिमटिमाती रोशनी । लगा था, तस्वीरों की बिल्लियाँ किसी दम नोच लेंगी, फिर तस्वीरों की बिल्लियों की आँखें मरिया की आँखों में बदल गयी थीं । 

साइकिक ने चौंकाया था उसे, “उसका कोई कपड़ा लायी हो?" उसने डरते-काँपते हाथों से जीत का स्वेटर उसे पकड़ाया था । कुछ पल स्वेटर को थामें मुंदी आँखों से बैठने के बाद उसने बोलना शुरू किया था, "मुझे कुछ दिखाई दे रहा है । आग-ही-आग! जलता हुआ मकान और गिरती हुई दीवारें, और तुम दब रही हो उनके नीचे । फिर न कहना कि लार्वन ने नहीं कहा कि निकलो इस रिश्ते से, निकलो इस रिश्ते से ! पर डरो नहीं, पर डरो नहीं, एक बड़ा प्यारा पुरुष मुख भी है - आग में तुम्हें सहारा देता हुआ, दुलारता हुआ । "

शायद भैया है । साइकिक के यहाँ से लौटने पर समझ में नहीं आया कि किससे डर रही हूँ मैं, उससे या जलते मकान से ?

बिल्लियाँ स्वप्न में कई-कई दिनों तक नाचती रही थीं । 

कई-कई बार समझाया था खुद को और कई-कई बार बहुत टूटी थी । कई बार फ़ोन उठाने पर दूसरी तरफ से किसी ने बिना जवाब दिये फ़ोन रख दिया था । वह जीत पर चीखी थी, अपनी रखैल से कहना, फ़ोन पर जवाब दिया करे, कुछ सलीका सीखे । और वह खुद सलीका-तमीज सभी कुछ भूलती जा रही थी । जीत के बहुत रात गये लौटने पर वह भभकी थी । पगला कर उसने चूड़ियाँ-प्लेटें जाने क्या-क्या तोड़ा था । जीत को सज-धज कर जाते देख दरवाज़ा रोक खड़ी हो गयी थी । दरवाज़े पर से धकेले जाने पर सिर दीवारों पर ज़ोर-ज़ोर से पटका था और फिर प्लेटों और चूड़ियों के टुकड़े बीनते - बीनते खुद ही लहूलुहान हुई थी । जाने कितनी रातें उस अजनबी शहर में इसी तरह बेसहारा सुबकते कटी थीं

“मैं तुम्हें कब मना करता हूँ, तुम भी बाहर जाओ, डेटिंग 

करो । "

धीरा चीखी थी, "तुम तो शर्म-लिहाज़ सब पी गये हो । मैं अब पति के रहते ब्यॉय फ्रैंड ढूँढ़ने जाऊँ?"

और उसने कहा था, "फिर तो और भी ज़रूरी है, हम तलाक ले लें । "

भाई के दोस्त का शिकागो से फ़ोन आने पर वह सिसकती रही थी । "तुम समझदारी से काम लो । ” दोस्त की बीवी ने कहा था, “थोड़ा बेशर्म बनाओ अपने आपको । यह भी अमरीकी औरतों के तितलीपने पर मरते हैं । वरना क्या है इन सफेद चमड़ीवालों के पास ? अच्छी नाइटीज़ खरीदो और..."

और एक रात नाइटी पहन उसका इंतज़ार करते हुए वह सचमुच वेश्या हो गयी थी । वह रात गये नशे में धुत्त लौटा था । 

वह हफ्तों बिस्तर से लगी रही थी । 

डॉ. जर्सिकी ने बार-बार समझाया था, "धीरा, या तो परिस्थिति से समझौता कर लो और इसी में जियो या इस रिश्ते से उबर जाओ, अपने दोस्त बनाओ, अपनी ज़िन्दगी जियो । "

भाई के दोस्त की बीवी ने समझाया था, “ये भी एक बार फँस गये थे एक मेम के चक्कर में बेबी सिटर थी । जब पता चला तो वो झोटे से पकड़ा, वो हालत खराब की कि दोबारा हिम्मत ही नहीं पड़ी उसकी इनसे मिलने की...'

और धीरा ने एक दिन बड़ी हिम्मत से मरिया को फोन किया था, "आखिर आप चाहती क्या हैं? कृपया मेरे पति को अकेला छोड़ दीजिए । "

"ऐसा ! तुम तो इस तस्वीर में बहुत बाद में आयी हो । अगर इसे सुलझा न पाओ, तो यह तुम्हारा कसूर है । " हैं-हैं करती एक खुर्राट अमरीकी आवाज़ ने रिसीवर रख दिया था और धीरा के दिमाग में बार-बार घूमता रहा था - अगर इसे सुलझा न पाओ, तो यह तुम्हारा कसूर है... अगर इसे सुलझा न पाओ, तो यह तुम्हारा कसूर है..

डॉ. जर्सिकी ने सुझाया था, “तुम वापस हिन्दुस्तान क्यों नहीं लौट जातीं?"

भाई का खत आया था, “वैसे धीरा, तुम खुद समझदार हो । दोबारा नौकरी मिलनी यहाँ कौन आसान है । और लोग दुनिया भर की बातें बनायेंगे । हमने किसी को कुछ बताया भी नहीं है । दोबारा शादी के अवसर भी यहाँ ज़्यादा नहीं हैं और अब कुछ सालों में मीना भी शादी के लायक हो जायेगी । तुम तो समझती हो । खुलकर अब क्या लिखें । अपना कैरियर वहीं बना लो और कुछ अरसे में शायद कोई अच्छा लड़का तुम्हें भी मिल ही जाये । "

जिस शादी में धीरा का कोई अधिकार नहीं, जिस तलाक पर धीरा का कोई अधिकार नहीं होगा, वही मीना की शादी में रुकावट बन जायेगा । 'क्या कसूर है मेरा ?'

माँ का खत आया था, समझ-बूझवाला और दादी का खत अलग, वही सबसे हिम्मतवाली लगी थीं, “कुड़िये, तू आ जा इत्थे । दोनो मांवा-धीवां रल- मिलके रह लवांगे । रुढ़ जाना ऐ कोई वलैत है ? इक छड्डी, दूजी ब्याही, दूजी छड्डी तीजी ब्याही । असी कोई कुड़ी सुटनी नई सी । ओदी माँ ही आयी सी झोली अड्डे; मैं तां पहला ही कहंदी साँ जिड़ा वोटी दे अगे-पिच्छे फिरदा है, ज़रूर कोई ऐब 

होयेगा । बिना ऐबवाला मीन - मेख करेगा । अग्गे पिच्छे नहीं फिरेगा । तू आ जा कुड़िये, की करेंगी पराये मुल्क विच कलम - कल्ली । रब वी नेकां नूं तंग करदा है । कुड़िये याद रख, जाको राखे साइयां मार सके न कोय..."

एक बच्चा पैदा कर लो । 

क्या बदलने वाला है बच्चे से, जो शादी से नहीं बदला, यहाँ आने से नहीं बदला । बस, मैं बंध जाऊँगी एक और जान से । 

वह कम्प्यूटर की पढ़ाई निभा नहीं पायी थी और जीत-मरिया ही दिलोदिमाग पर छाये रहे थे । 

डॉ. जर्सिकी ने सलाह दी थी, "तुम पढ़ी-लिखी हो, दूसरा साथी ढूँढ़ो । जिनके पति मर जाते हैं, वे भी तो गुज़ारा करती हैं । 

मेरा पति मरा नहीं, अभी वह मरा नहीं... उसने सोचा था । 

एक आदमी किसी दूसरे की ज़िन्दगी से ऐसा खिलवाड़ कैसे कर लेता है? इसने वेद मंत्रों को साक्षी मान मुझसे शादी की है... छोड़ो, अब वेद मंत्रों को । धीरा या अकेली रहो या कोई और साथी ढूँढ़ों । 

अब इस उम्र में मुझे कौन मिलेगा ? कौन अधेड़ वय ?

डॉ. जर्सिकी ने पश्चिमी मनोविज्ञान की कसौटी पर उसे आँका था । यहाँ की परम्परा के अनुसार परीक्षण किया था । उसकी मानसिक स्थिति पर तर्क-वितर्क किया था । वह बार-बार उन्हीं पर झल्लायी थी । 

"तुम्हें यहाँ आना ही नहीं चाहिए था । अब आयी हो तो अपने हक़ के लिये लड़ो । अपने को मज़बूत बनाओ । हम हरदम सहनशीलता का लबादा ओढ़ यह ज़ाहिर करते हैं, हम सब कुछ सह लेंगे । जीत ने और लड़कियाँ भी देखी होंगी पर उसे तुम ही क्यों पसंद आयी ? तुम ही क्यों समझदार लगीं? लगा, तुम सब सम्भाल लोगी । तुम घर पर बीवी बनी रहोगी और वह बाहर प्रेमिका बनाये रखेगा । सब कुछ सहने वाली तुम और औरतों से उसके सम्बन्ध को भी सह लोगी । तुम इतनी दयनीय क्यों बनी रहती हो? इतनी सहनशीलता और विनम्रता क्यों ?"

“पिता की मौत के बाद लगा था, ज़िन्दगी पर मेरा कुछ हक़ है ही नहीं । जैसे मैं बोझ रही हूँ, माँ पर, भाई-भाभी पर । भाई फीस दे देते थे, पर क़िताब कॉपी के लिए पैसे माँगने में भी शर्म आती थी, झिझक रहती । हमेशा लगा, जो हम पर खर्च किया जा रहा है, भाई भाभी के बच्चों से छीना जा रहा है । बोझ होने का अहसास हमेशा बना रहता था । वैसे ऊपर से कोई बात कभी नहीं हुई, पर कई छोटी-छोटी बातें तो होती हैं जो अनचाहे असर करती जाती हैं । अपनी पहली तनख्वाह से मैंने ढेरों चीजें खरीदी थीं, भाई-भाभी, माँ, दादी, बच्चों सभी के लिए, बड़ा अच्छा लगा था तब । ”

डॉ. जर्सिकी ने तर्क छोड़ा नहीं, “धीरा, चलो मान भी लिया जाये कि वहाँ कि स्थिति पर तुम्हारा अधिकार नहीं था, पर तुम्हारी अबकी स्थिति और अब के फैसले पर तो तुम्हारा अधिकार है । तुम चाहो तो कुछ भी कर सकती हो । "

वह डॉ. जर्सिकी पर बिफर पड़ी थी, “मेरी स्थिति पर मेरा इतना ही अधिकार है, जितना कि उन फिलिस्तीनियों का, जो पहले अपने घरों से निकाले गये और फिर एक शरणार्थी कैंप से दूसरे में खदेड़े गये और फिर दीवार से लगा कर गोली से दाग दिये गये । उनकी नियति पर उनका अधिकार है - आइए, हमें घरों से बेघर कीजिए, हमें और हमारे बच्चों को गोली से दाग दीजिए, हम आपकी गोलियों के शिकार होना चाहते हैं ?"

“समानताएँ हैं धीरा, लेकिन चीज़ों को नाटकीय बना देने की प्रवृत्ति भी तो तुम में हैं, उन्हें बढ़ा कर देखने की । अपने-आपको तुम पराजितों में मिला कर क्यों देखती हो?"

तुम जीत से उबर सकती हो । 

तुम तलाक से उबर सकती हो । 

और फिर वकील ने जीत के बॉस से बात की थी लेकिन उसने कहा था, "वैसे तो मुझे इस बेसहारा लड़की पर तरस आता है पर देखिए, उसने वक्त-बेवक्त फ़ोन पर मरिया को धमकियाँ दे बड़ी बेबुद्धि का काम किया है । वह आसानी से यह साबित कर सकता है कि यह औरत पागल है और साथ रहने के काबिल नहीं । और उसकी मरिया को जान से मार डालने की धमकियाँ हम सबने सुनी हैं । वह उसे पागल करार दे सकता है । "

पागल करार दे सकता है... धीरा को अपने शहर के पागल की याद आयी थी, जहाँ-तहाँ नंगा खड़ा बच्चों के छेड़ने पर पत्थर उठा उन्हें डराता हुआ, पागल ! पागल !

और फिर जीत दस साल की नौकरी छोड़ चला गया था । धीरा के हिस्से में आये थे चेकिंग एकाउन्ट के तीन हज़ार डॉलर, पुरानी क्रॉकरी और कुछ चीथड़ा फर्नीचर |

इस बार धीरा पूरे साल भर के अंतराल के बाद आयी है । वह पंचिंगवाली नौकरी से आगे नहीं बढ़ पायी थी । जैक उसे ऑफिस में ही मिला था । उसकी बीवी उसे छोड़ उसके दोस्त के साथ भाग गयी थी । धीरा के पीछे लग गया था वह, "मैं तुम्हारे पति की तरह दुःख नहीं पहुँचाऊँगा । मैं तुम्हें बड़े प्यार से रखूँगा । मैं तुम्हें सब से बचाऊँगा, तुम्हारी रक्षा करूँगा । तुम कहोगी तो यहीं शादी कर लेंगे । तुम कहोगी तो हिन्दुस्तान जा कर करेंगे । "

पहले कुछ महीने धीरा अपने को बचाती रही थी । फिर हार गयी थी, लगा था, इतना प्यार करता है । शुरू से ही डॉ. जर्सिकी ने समझाया था, "धीरा, थोड़ा समय बीतने दो, थोड़ा समय बीतने दो... धीरा, तुमने एक पति के चंगुल से निकलते ही जैक में दूसरा पति ढूँढ़ लिया है, इतनी जल्दी ?"

और फिर तो उसने डॉ. जर्सिकी के पास जाना ही बन्द कर दिया था । लगा था बहुत कुरेदते हैं । बहुत आहत करते हैं, बेवज़ह के सवाल पूछ-पूछ और फिर फीस भी तो बहुत ज़्यादा लेते हैं । 

अब डेढ़ साल के बाद धीरा ने शादी की बात चलायी तो जैक मुकर गया था, "देखो धीरा, बहुत असमानताएँ हैं हम दोनों में- भाषा, संस्कृति की... और अब तो मेरी पिछली बीवी भी मेरे दोस्त से अलग रह रही है, और फिर मेरे बच्चे । हमारा वह सूत्र तो रहेगा ही । मैं एक ही गलती दोबारा नहीं करना चाहता । हम और दूसरों के साथ भी क्यों न हिले-मिलें... हम और तुम दोनों...'

धीरा इस बार पहुँची थी, गुस्से से उबलती हुई रोती हुई । 

" तुम्हारा यह कहना कि उसने तुम्हारा इस्तेमाल किया है, ठीक नहीं । इस पिछले लावारिसी के साल में उसने तुम्हें सहारा दिया, जीत को भूलने में मदद की । पति द्वारा छोड़ी धीरा को सहारा चाहिए था और पत्नी द्वारा छोड़े गये जैक को आश्रय । तुमने उसे सम्भाला और उसने तुम्हें । तुम दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी । यह ज़रूरी नहीं कि तुम दोनों अब एक-दूसरे के साथ बन्ध जाओ । "

“पर वह तो कहता था, हम शादी करेंगे । हमेशा-हमेशा के लिए साथ रहेंगे । "

"कमज़ोर व्यक्ति बहुत कुछ कहता है और सशक्त होने पर सभी कुछ भुलाया जाता है । तुम जीत से उबर चुकी हो... तुम जैक को भी भूल जाओगी । धीरा, कहाँ खो गयी थीं?"

“जानते हैं, मुझे क्या याद आ रहा है । वह टेलीविज़न कार्यक्रम जिसमें दिखाया था कि केकड़े की एक किस्म होती है, जिसमें नर हमेशा घूमता रहता है, ऐसी मादाओं की तलाश में, जिनकी केंचुल उतरी रहती है । वह पहले उन्हें आश्रय देता है । अन्य जानवरों से बचाता है और जब कमज़ोर मादा उस पर आश्रित हो, सुरक्षित महसूस करने लगती है तो अचानक वार कर उस पर जबरदस्ती कर लेता है और आहत घायल मादा को छोड़ अन्य केंचुल उतारी मादाओं की तलाश में निकल पड़ता है । "

डॉ. जर्सिकी हँसे थे, “एक और टीवी प्रोग्राम वह भी था, जहाँ मकड़ी की एक किस्म उस जबरदस्ती के बाद नर को ज़िन्दा निगल जाती है । "

"आप चाहते हैं, मैं वही मकड़ी बन जाऊँ?"

"नहीं-नहीं, केकड़े और मकड़ी के बीच और भी रास्ते हैं । "

धर्मयुग, दिसम्बर 1985












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