Sahitya Nandini July 20234

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 समीक्षा


डॉ. रेनू यादव, 

असिस्टेंट प्रोफेसर, भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा - 201312

ईमेल: renuyadav0584@gmail.com 

सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

अमीरन (उपन्यास) : एकता अमित व्यास 

पुस्तक : अमीरन 

लेखक : एकता अमित व्यास

विधा : उपन्यास

प्रकाशन : सभ्या प्रकाशन, नई दिल्ली


एकता अमित व्यास का पहला उपन्यास है ‘अमीरन’  । अमीरन नायिका के लिए एक अजनबी महिला के द्वारा संबोधन है । अमीरन सिर्फ पैसों से अमीर नहीं बल्कि हृदय और हिम्मत से अमीर है । अमीरन संवेदना के स्तर पर अमीर है, जो विपरीत परिस्थिति में बिना किसी चीख-चिल्लाहट के अत्यंत समझदारी से फैसला लेती है । एकता अमित व्यास की अमीरन सिर्फ एक किरदार नहीं है, बल्कि हमारे आस पास के घरों की कहानी प्रतीत होती है जो कि किस्सागोई के माध्यम से हमारे मन-मस्तिष्क में अपनी जगह बनाए रहती है । उपन्यास की सफलता इस बात में है कि कहानी का सूत्र कहीं भी छूटने नहीं पाता और भरपुर जिज्ञासा के बीच किस्सागोई बरकरार है, जिसे पाठक एक ही बैठक में पढ़ सकता है । 

यह उपन्यास अपने पति से प्रेम करने वाली साधारण पत्नी तथा सुलझी हुई स्त्री के दृष्टिकोण से लिखी गई है । दरअसल स्त्रीवादी नज़रिए से देखें तो एक स्त्री एक ही समय में स्थापित और विस्थापित दोनों होती है । मायके में उसे ‘ससुराल ही जाना है’ या ‘पराए घर की बर्तन है’ आदि के बोध से उसे मानसिक रूप से विस्थापित किया जाता है तो दूसरी ओर ससुराल में ‘पराए घर से आयी है’ कह कर सदैव विस्थापित रखा जाता है । इस कहानी में सास बहू के अधिकार की लड़ाई नहीं है, बल्कि एक हँसता खेलता परिवार है । फिर भी अमीरन एक दूसरी स्त्री, जो प्रेमिका है उसके कारण विस्थापित होने के भय से ग्रसित है । जो कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अधिकार भावना के तहत आता है ।  परिवार एक ऐसी संस्था है जहाँ एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कर्तव्य और भावनाओं के माध्यम से जुड़ा रहता है और एक-दूसरे पर अधिकार भी रखता है । जहाँ भावनाओं की डोर कमज़ोर होने लगती है, वहाँ रिश्तों के ऊपर खतरे का बादल मँडराने लगता है । और वहीं से शुरू होता है पत्नी के अपने ही घर, स्थान और अधिकारों से वंचित होने का भय । उसे डर होता है कि कहीं पति की प्रेमिका उसे विस्थापित कर स्वयं स्थापित न हो जाये तथा प्रेमिका की पूरी कोशिश स्वयं को स्थापित करने में होती है ।  

यह उपन्यास दिव्या माथुर की कहानी ‘ज़हरमोहरा’ की याद दिलाता है । त्रिकोणिय प्रेम में अधिकार भावना और प्रेम का स्खलन दोनों ही ईर्ष्या का कारण बनते हैं । ज़हरमोहरा कहानी में भी पत्नी महिका अपने पति की ज़िन्दगी में पुरानी प्रेमिका लीसा के लौटने से दुखी रहती है और संदेह के कारण वह डिप्रेशन की शिकार हो जाती है तथा प्रेमिका लीसा अपने प्रेमी की पत्नी को उसकी ज़िन्दगी से बेदखल करके अपनी जगह बनाने की कोशिश करती है, लेकिन जब उसे महिका के प्रेग्नेंट होने की ख़बर मिलती है, वह अपनी जान दे देती है ।  

इस उपन्यास में लिसा की भाँति दिव्या अपनी जान नहीं देती किंतु मानसिक रोग की शिकार अवश्य हो जाती है, जिसका कारण यही होता है कि उसकी तमाम कोशिशों के बाद भी वह अपने प्रेमी की पत्नी को उसकी जगह से विस्थापित नहीं कर पाती है । इस त्रिकोणिय रिश्ते में यह तो स्पष्ट है कि जब तक पुरूष नहीं चाहेगा तब तक प्रेमिका उसकी पत्नी को हिला भी नहीं पायेगी । प्रेमी आकाश प्रेमिका दिव्या की सभी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी अमीरन को उसके अधिकारों से वंचित नहीं करता । हालांकि दो बातें इस उपन्यास में स्पष्ट हैं कि यह आखिरी तक तय नहीं है कि आकाश दिव्या से प्रेम करता भी है अथवा नहीं, यह एक संशय की अवस्था है अथवा संकेतों में दृष्टिगत होता है । दूसरा, अमीरन और आकाश दोनों के रिश्ते में दूरियाँ हैं, इसके बावजूद अमीरन का विश्वास खंडित होने पर भी वह पीड़ा से बचने के लिए सत्य को देखना और स्वीकारना नहीं चाहती ।    

देखा जाए तो दिव्या अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब भी होती है जैसे कि दिव्या के परिवार के साथ आकाश का अधिक घुलमिल जाना, अमीरन से पूछे बगैर आकाश का लॉकर से सोने की चेन दिव्या के घर में देना, बड़े बड़े गिफ्ट देना, उनके घर ठहरना और वस्तुओं के साथ-साथ बेटी सिया का भी दिव्या के साथ जाकर छुट्टियाँ मनाना तथा सिया का गलत शिक्षा से शिक्षित होना आदि । यह सभी घटना-क्रम इस बात की इंगित करता है कि अमीरन के स्थान पर दिव्या प्राथमिक हो गई है तथा दिव्या का हस्तक्षेप बढ़ गया है । वह बौद्धिकता का आवरण ओढ़े अपनी समस्त लालची महात्वाकांक्षाओं को पूरी करने के लिए आकाश के धन, समय और बच्ची सिया को बड़ी ही चालाकी से अपने अधिकार क्षेत्र में ले लेती है । अमीरन को मिलने वाला टाइम, स्पेस और इमोशनल सपोर्ट दिव्या को मिलने के कारण अमीरन अपने ही घर में हाशिए पर खड़ी महसूस करती है ।  

दिव्या सहानुभूति, चिंता, प्रेम, नफरत सभी दाव खेलती है, लेकिन अमीरन को जब नहीं हिला पाती तब आखिरी दाव होता है उसकी भाभी का अमीरन के घर जाकर दिव्या और आकाश के रिश्ते का सच बताना । यह दाव काम तो करता है कि अमीरन और आकाश के रिश्ते में खिंचाव आ जाता है लेकिन टूटता नहीं है । यह दिव्या के लिए घातक होता है और यही उसके मानसिक रोग का शिकार बनने का कारण भी होता है । ‘प्रेम न हाट बिकाय’ दिव्या आकाश के पास से उच्छिष्ट-सी लौट आती है ।  

लेखिका इस उपन्यास का अंत पाठकों पर छोड़ देती हैं कि आकाश सचमुच दिव्या से प्रेम करता है अथवा वह सम्मान और प्रभाव में यह सब करता है ! दरअसल ज़िन्दगी में भी सभी रिश्तों का सत्य सामने नहीं आ पाता, लेखिका यथार्थ के आइने में पत्नी के नज़रिए, संदेह, पीड़ा, द्वंद्व, अंतर्द्वंद्व तथा स्वाभिमान को स्पष्ट करती हैं न कि आकाश और दिव्या के । इसलिए इस उपन्यास में पत्नी का पक्ष उभर कर सामने आता है, न कि आकाश और दिव्या का । आज कल पॉकेट नॉवेल का समय है, पॉकेट नॉवेल में इसी तरह का सस्पेन्स दिखाई देता है ।  

इस उपन्यास में सबसे संदेहास्पद पात्र है आकाश । दो स्त्रियों के बीच घड़ी की पेण्डुलम की भाँति डोलने वाला आकाश दोनों ही स्त्रियों को मानसिक रूप से बीमार कर निर्दोष बाहर निकल जाता है । इस कथानक में दोनों ही स्त्रियों की चाभी आकाश के हाथ में है और पूरी कहानी का सूत्रधार भी आकाश ही है, जिसका प्रभाव अबोध बच्ची सिया पर भी पड़ता है । दूसरी बात, दिव्या स्पष्ट रूप से कहती है कि “मुझे उनके घर का लाइफस्टाइल बहुत पसंद था और मेरे माता-पिता ख़ास तौर पर माँ को भी उनके घर का लाइफ़ स्टाइल, गाड़ियों में घूमना, विदेशों की सैर करना, घर में नौकर होना, महँगे बाज़ारों से शॉपिंग बहुत पसंद था । माता-पिता और भाई ने इस बारे में बात की और मैंने धीरे धीरे अपने उस स्टूडेंट के पिता की तरफ़ क़दम बढ़ाया । 

चार-पाँच साल तक कोशिश करने के बाद भी वह आदमी टस से मस नहीं हुआ । उसे किसी बात का कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था” । 

इसका अर्थ है कि दिव्या को आकाश से प्रेम नहीं बल्कि उसे उसके लाइफ़ स्टाइल के प्रति आकर्षण अथवा लालच था। दिव्या की मंशा सिर्फ उसकी मंशा नहीं है बल्कि उसका पूरा परिवार इस षड़यंत्र में शामिल है । यह स्पष्ट हो जाने के बाद भी लेखिका ने उसे प्रेम का नाम दिया है ! जबकि प्रेम चालाक हृदय के लिए नहीं बल्कि सरल हृदय के लिए होता है । प्रेम में चालाकी कुछ समय तक चल सकती है पर पूरे जीवन नहीं । लाइफ़ स्टाइल पाया जा सकता है पर प्रेम नहीं । लेखिका स्वयं कहती हैं, “प्रेम पा लेने का नाम नहीं है । प्रेम को जीना ही असली प्रेम है” । 

इस उपन्यास की खास बात है कि लेखिका उपन्यास के माध्यम से स्त्रियों को आर्थिक और मानसिक रूप से सबल होने का संदेश देती हैं । प्रायः स्त्रियाँ घर-परिवार के चक्कर में सोचती हैं कि उन्हें पैसों की क्या जरूरत है ? और इसीलिए वे कभी भी आर्थिक सबलता के विषय में ध्यान ही नहीं देतीं । जो कि इस उपन्यास में नायिका भी यही करती है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि आकाश की कंपनी में जो भी वह सहायता करती है जिसकी सैलरी एम्प्लाइ की तरह मिलती है । उन पैसों से वह अपना घर बनाती है । यह प्रत्येक स्त्री को सीखना चाहिए । आर्थिक रूप से सबल स्त्री ही सही समय पर सही फैसला ले सकती है ।   

इस उपन्यास की भाषा सरल और शैली अभिधात्मक है । जो आसानी से पाठकों की समझ में जाता है । रिश्तों का तानाबाना त्रिकोणिय प्रेम, विश्वास, अविश्वास, षडयंत्र, द्वन्द, अंतर्द्वन्द तथा सब हार कर अपने को बचा ले पाने का उपन्यास अमीरन के लिए लेखिका एकता अमित व्यास तथा सभ्या प्रकाशन एवं देवेन्द्र कुमार बहल सर को बहुत बहुत बधाई । यह उपन्यास सफलता का सफ़र तय करे । मैं हृदय से आप दोनों को शुभकामनाएँ देती
हूँ ।

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सुश्री संतोष श्रीवास्तव

भोपाल, मो. 97690 23188


'कर्म से तपोवन तक'  परिचर्चा ने गर्मी को पछाड़ा...

अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच और उसकी संस्थापक सुश्री संतोष श्रीवास्तव जी सदा काल से नवोदित प्रतिभाओं को उभारने और मंच देने के उद्देश्य से कार्य करती रही हैं । इसी शृंखला में दो जून 2024 को मेरे पहले प्रयास ‘‘अमीरन” को संतोष जी ने ना सिर्फ़ मंच प्रदान किया बल्कि उपन्यास के विमोचन कि सारी व्यवस्था उन्होंने दिल्ली इकाई को सौंप दी । जब दल का मुखिया इतना शानदार हो तो इकाई का जानदार होना लाज़मी है । धन्यवाद कहने के सामर्थ्य मुझमें नहीं है बस इतना ही कह सकती हूँ अपना स्नेह बनाए रखियेगा आपकी अपनी, एकता अमित व्यास, कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच दिल्ली इकाई के द्वारा दिनाँक 2 जून 2024 की संध्या 4 बजे अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की संस्थापिका, अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार संतोष श्रीवास्तव की पुस्तक 'कर्म से तपोवन तक' पर परिचर्चा का आयोजन किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी अकादमी, दिल्ली के उप सचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने की । सुरुचि साहित्य कला परिवार के संस्थापक महासचिव, वरिष्ठ साहित्यकार मदन साहनी मुख्य अतिथि की भूमिका में थे और वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और प्रकाशक देवेन्द्र बहल एवं डॉ. वन्दना शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन थे । अतिथि वृन्द द्वारा माँ शारदे के समक्ष दीपदान से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ । 

नीलम दुग्गल 'नरगिस' ने सुमधुर गायन से सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की । मंचासीन अतिथियों का स्वागत सभी को श्रीफल और पुस्तक से किया गया । 

कार्यक्रम के प्रारम्भ में दिल्ली इकाई की निदेशक डॉ. दुर्गा सिन्हा ने संस्था का परिचय दिया । तत्पश्चात एकता अमित व्यास की पुस्तक अमीरन का विमोचन हुआ । 

सर्वप्रथम संतोष श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक 'कर्म से तपोवन तक'का परिचय देते हुए कहा कि महाभारत के उद्योग पर्व की एक संक्षिप्त पंक्ति को आधार बनाकर उन्होंने यह उपन्यास लिखा । 

कर्म से तपोवन तक' 'पुस्तक की समीक्षा डॉ. प्रमिला वर्मा एवं एकता अमित व्यास ने प्रस्तुत की । 

पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए एकता अमित व्यास ने लेखिका से कुछ अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब माँगा और एक जिज्ञासु पाठक एवं प्रखर आलोचक की भूमिका का बख़ूबी निर्वहन किया । डॉ. प्रमिला वर्मा ने पुस्तक की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की, जिसने उपस्थित सुधि साहित्यकारों को पुस्तक पढ़ने की लालसा से भर दिया । 

एकता अमित व्यास ने अपनी पुस्तक की भूमिका और उसके प्रकाशन से सम्बंधित जानकारी बहुत ही रोचक अंदाज में साझा की । उनकी पुस्तक ' अमीरन ' पर डॉ. रेणु ने अपनी बात कही । 

मुख्य अतिथि मदन साहनी ने अपने वक्तव्य में प्रेम का विशद स्वरूप बताते हुए उसे दैहिक आकर्षण से भिन्न बताया और कर्म से तपोवन के विषय में अपने विचार रख सभी श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर लिया । 

वरिष्ठ अतिथि देवेन्द्र बहल और डॉ. वंदना ने भी पुस्तक पर अपने विचार साझा किए । अध्यक्ष ऋषि कुमार शर्मा का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रेरक था,जिसमें उन्होंने नयी पीढ़ी को हिन्दी एवं हिन्दी साहित्य से जुड़ने का परामर्श भी दिया और बताया कि कर्म से तपोवन पढ़ने पर आप पाएंगे कि सूत्र वाक्य में प्रश्न करते हुए संतोष जी ने बहुत कुशलता से समाधान भी प्रस्तुत किया है । अतएव यह पुस्तक आज के परिप्रेक्ष्य में पढ़ी भी जाएगी और अपना स्थान भी बनाएगी । 

अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच दिल्ली इकाई की अध्यक्ष शकुंतला मित्तल के कुशल निर्देशन एवं सधे हुए संचालन ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए । कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ कवयित्री वीणाअग्रवाल ने सभी का आभार प्रकट किया । कार्यक्रम के बाद संतोष श्रीवास्तव ने युवा कवि हेमन्त की स्मृति में केक काट कर सभी को भाव-विभोर कर दिया । वन्दना रानी दयाल ने हेमन्त की कविता का गायन कर माहौल को भावपूर्ण बना दिया । 

इस कार्यक्रम की सफलता में दिल्ली इकाई की महासचिव अर्चना पांडेय और संरक्षक वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शुभ्रा, कार्नेलिया कौटिल्या एवं एकता अमित व्यास की पुत्री जिया का विशेष योगदान रहा । अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच, दिल्ली इकाई की सक्रियता, कार्यशैली और आयोजन की संतोष श्रीवास्तव ने प्रशंसा और सराहना की । 

इस अवसर पर डॉ. सविता चड्डा, डॉ. कल्पना पांडेय, शारदा मित्तल, वीणा अग्रवाल, रेणु मिश्रा, सविता स्याल, रानी श्रीवास्तव, संतोष संप्रीति, लता ठाकुर, अंजू दुआ जैमिनी,नीलम दुग्गल नरगिस, डॉ. वनिता शर्मा, डॉ. अंजना, अर्चना उपाध्याय, डॉ. जेनी शबनम,अमित व्यास सहित अनेक प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकारों ने दिल्ली, गाजियाबाद, मुरादाबाद नौएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और पालम, भोपाल, कच्छ से उपस्थिति दर्ज कराई । स्वादिष्ट जलपान सहित कार्यक्रम का अंत हुआ ।       

प्रस्तुति: शंकुतला मित्तल, दिल्ली, मो. 99108 09231

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श्री देवेन्द्र कुमार बहल

संपा., अभिनव इमरोज़ एवं साहित्य नंदिनी, मो. 9910497972


प्रकाशक की ओर से

मैं ‘अमीरन का प्रकाशक ही नहीं- मुरीद भी हूँ । ‘अमीरन’ एक ज़िदा किरदार है जो जिंदगी के इज़ाफे, मुनाफे और नुकसानात से बे-खबर सिर्फ सौहार्द, नैतिकता, और जीवन मूूल्यों की कद्र बढ़ाने में यकीन रखती है । अमीरन उस आदर्श समाज की नुमाइंदगी करती है जो बहसों मुबाहसों से परहेज और प्रेम, प्रोत्साहन और प्रतिभाओं के प्रति सम्मान जनक एवं साकारात्मक रवैया अख्तियार किए रहती है । परिवार के प्रति पूर्णरूपेण समर्पण उसके संस्कारों का प्रतिनिधित्व पूरी निष्ठा से करते हैं । परिवार के विज़नेस में भी अपनी कॉपपोरेट जिम्मेदारियाँ निभाती है, बिना किसी फिक्र के या जिक्र के कि इसके एवज़ में उसे कुछ वेतन/डिविडेन्ड मिल रहा है या नहीं । 

उपरोक्त - इबारत एक किस्म का अमीरन के पक्ष में लिखा शपथ पत्र ही है । मैं अमीरन की वकालत इस लिए कर रहा हूँ क्यों कि अमीरन का किरदार मेरी उपचेतना में बरसों से समाहित है । मैं स्वयं अपने अंतर्द्वद्वों और मानसिक समस्याओं के समाधान हेतु- बिना किसी को शरीक किए स्वयं मन्थनरत रहता था/हूँ । और निष्कर्ष, परिणाम और उत्तर खुद-ब-खुद मेरे दिमाग में कौंधने लगते थे ! ‘अमीरन’ करीबन ऐसी ही परिस्थितियों से गुज़र रही थी । देह तक की परवाह न करते हुए खुद ही दौड़ धूप करती रही - माईग्रेन भी हुआ और मानसिक रोग चिकत्सा भी करवानी पड़ी- दिव्या, उसके माता, पिता, भाई और भावी ने अमीरन के परिवार की हमदर्दी, सद्भाव और अपनत्व को खूब भुनाया ही नहीं सेंध लगा कर घूसपैंठ कर अपने दखल से फरमाईशों की लगामें भी ढीली कर दीं । 

दिव्या, अमीरन की बेटी सिया की टीचर है और इनके शहर के स्कूल में कार्यरत है । पेरेन्ट्स टीचर मिटिंग के माध्यम से पहचान स्थापित हुई है । गुरु का उच्च स्थान हमारे ग्रन्थों से होता हुआ हमारे संस्कारों से संलग्न है । 

दिव्या के अचानक बिमार पड़ने पर, अमीरन और आकाश ने तीमारदारी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और उसके माता-पिता को भी सूचित कर दिया । माता-पिता ने भी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आकाश को अपना बेटा घोषित कर दिया । (पृष्ठ 23) आकाश ने भी धर्म पुत्र बनने पर गौरव महसूस किया और फिराक़ दिली से अपनी श्रद्धा व्यक्त करनी आरम्भ कर दी और उनके अवांछनीय व्यवहार डिमांड और कमांड की हदों को पार करने के बावजूद सिया की पढ़ाई की खातिर तथा अपनी नैतिकता के मद्देनज़र अमीरन ने उनकी दखलअंदाजी और प्रत्याशाओं की उपेक्षा नहीं की हालांकि आकाश जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे थे लेकिन अमीरन ने अपने सहयोग में कोई कमी नहीं आने दी । दिव्या ने अपनी रणनिति का आभास तक नहीं होने दिया जब उसने सिया की ट्यूशन और आसपास के बच्चों को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा तो आकाश ने अपने घर की बैठक भी मुहैया करवा दी । और दिव्या का हौसला बढ़ते-बढ़ते डायनिंग टेबल से होता हुआ किचन तक पहुंच गया और टिफन का भी मुफ्त में बंदोबस्त हो गया और ‘मैं कब उनकी खनसामा बन गई, मुझे पता भी न चला’’ (अमीरन के शब्द) (पृष्ठ 29) यह है अमीरन का सद्भाव । न चाहते हुए भी, गुस्साए हुए भी, सिया की खातिर घर से दूर अहमदाबाद शिफ्ट होने पर भी कभी आपा नहीं खोया । 

कुछ हुआ यूँ कि ... दिव्या मैम ने घोषणा कि कि वह स्कूल छोड़ कर जा रही है । स्कूल के विचित्र माहौल में उनके तथाकथित ज्ञान और अनुभव का ठीक तरह से उपयोग नहीं हो पा रहा है, दरअसल स्कूल किन्हीं और ही कारणों से बिखर रखा था ।

मैं उनके मंतव्य को कुछ समझ पाती उससे पहले ही आकाश ने भी घोषणा कर दी कि सिया अगले साल से अहमदाबाद में पढ़ेगी । इस एक साल के समय में अमदाबाद में एक फ़्लैट ख़रीद लिया जाएगा और अच्छा-सा स्कूल भी देख लेंगे । वैसे भी सिया के अधिकतर मित्र बोर्डिंग स्कूल में जा रहे थे । मेरे पास कोई दूसरा बिकल्प नहीं था या तो मैं उसे बोर्डिंग स्कूल में भेजती या फिर ख़ुद ही उसे लेकर अहमदाबाद जाती । 

मेरे जीवन में अजीब-सा समय आ गया था । हर सुबह कोई नया फ़ैसला हो जाता । जिसमें मेरी रज़ामंदी हो या न हो किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता । मुझे आँख बंद करके उस फ़ैसले को मानना पड़ता । मेरे पास कोई ऐसा मित्र या रिश्तेदार नहीं था जिससे मैं कोई सलाह कर लेती या मन की बात कह देती । आकाश का हर फ़ैसला उनके स्वभाव से विपरीत होता दिखाई दे रहा था । 

खैर, अब फ़ैसला हो चुका था तो मानना था । पृष्ठ 31-32

अहमदावाद शिफ्ट होने का फैसला हो गया इसमें भी दिव्या के परिवार ने अपने गहरे स्वार्थपक्व दखल देने से परहेज नहीं किया । सुझाव पर सुझाव देना और अपने आप को अमीरन परिवार का परम हितैषी सिद्ध करना ही उनकी प्राथमिकता बनी रही- किस सोसाईटी में फ्लैट लेना है, किस बिल्डर से, किस स्कूल में सिया का प्रवेश करवाना है- यहां तक कि अगर आप शिफ्ट नहीं भी होते तो भी फ़्लैट ले लिया जाएगा और दिव्या की देख-रेख में सिया की पढ़ाई होती रहेगी- जो भी हुआ अहमदाबाद अमीरन को आना पड़ा और दिव्या परिवार का दखल कायम रहा । आकाश सप्ताहान्त आते जाते और सोमवार को चले जाते । आकाश के आने से पहले दिव्या परिवार का आर्डर पहुँच जाता कि इस बार आते हुए हमारे लिए यह लेते आएँ और वो लेते आएँ । यहाँ तक की सत्संग के लिए प्रसाद भी आकाश से कह कर अमीरन से मंगवाया गया । दिव्या परिवार की भूख बढ़ती ही जा रही थी उनके लालच को परिभाषित नहीं किया जा सकता- एकता ने इस  परिवार का चारित्रिक चित्रण करते हुए संकेत तो दिए हैं पर शब्दों में मितव्यता दिखाई है । 

दिव्या-परिवार की नीयत जो लालच की चाश्नी से लबरेज थी, का वर्णन मैं भी न कर पाऊँगा । सिवाए एक शब्द के- 'ढीठ' (निर्लज्जता, धृष्ट, संकोचहीनता) । अमीरन ने उन्हें कैसे झेला यह उसका चारित्रिक वड़प्पन है कि उसने अपनी सहनशीलता से विच्छेद नहीं किया । आखिरकार उसने सोसाईटी ही बदल ली । और स्कूल भी । नई सोसाइटी में शिफ्टिंग से पहले पड़ोसियों ने उसे खूब उक्साया की वह दिव्या के परिवार को सबक सिखाए । जो अमीरन ने नहीं किया- क्योंकि किसी को ज़लील करना उसके स्वाभाव में नहीं था । दिव्या की मौसी शकुन्तला अमीरन को खूब पसंद आई थी । उसने भी दिव्या की भाबी को खूब डाँटा, लेकिन बाद में उन्होंने अपना चरित्र दिखा ही दिया  और समझाने की कोशिश भी की । और उसने अमीरन से मुआफी भी मांग ली थी लेकिन रोज़-रोज़ की किच-किच से निजात पाने के लिए अमीरन ने किसी दूसरी जगह फ्लैट लेना ही पसंद किया । 

दूसरा फ्लैट लेने में भी कोई दिक्कत नहीं आई । अमीरन नया फ्लैट अपने नाम से लेना चाहती थी । उसने अपनी कम्पनी के सी.ए. से बात की तो उसको पता चला कि उसके अपने खाते में पर्याप्त राशि है । और शायद थोड़ा सा ही बैंक लोन लेना पड़े- अमीरन इस बात से बेखबर थी कि जो काम वह अपनी परिवारिक कम्पनी के लिए कर रही है उसके एवज में उसे वेतन/डिविडेंड भी मिल रहा है । फ्लैट खरीद लिया गया । फरनिश भी हो गया और सिया की पढ़ाई भी पूरी हो गई और - दिव्या की अपनी स्विकारोक्ति से दिव्या के परिवार के षड्यंत्र का भी पटाक्षेप हो गया, और अमीरन अपने डाक्टर की सलाह से सुबह की सैर को भी आदत बना कर खुश रहने लगी- अमीरन रोज़ सुबह ओडा पार्क में जाती और 5 कि.मी. की दौड़ लगाती जो सूत्रधार की जिज्ञासा का कारण बना और उसने जानना चाहा कि इस व्यायाम का कोई खास मक़सद तो होगा । उसे रोक कर पूछना चाहा- सूत्रधार ने कहा- "रूको", तो अमीरन ने कहा- ‘‘मैं रूक नहीं सकती । मेरा चैलेंज है । मेरी शर्त लगी है इस दुनिया के साथ और मुझे हार बर्दाश्त नहीं है । इस लिए मैं रूक नहीं सकती । ’’ पृष्ठ 13

यह था अमीरन का दृढ निश्चय । बगीचे में भी उसकी नजर कमल पर ही केंद्रित रहती । तालाब के कीचड़ और बदबू पर नहीं । यह था अमीरन के साकारात्कता का दर्पण ।  पृष्ठ 135

अब आते हैं अमीरन की कहानी पर...

आदरणीय पाठकों ! मेरे गुरु डॉ. त्रिलोक तुलसी डी.लिट. ने हिन्दी साहित्य को दो बड़े ग्रंथ दिए । मैं उनके बहुत करीब रहा, वो कॉलेज में मेरे हिंदी के शिक्षक भी रहे । मैंने एक बार उनसे पूछा था कि आप कहानी या उपन्यास क्यों नहीं लिखते । उन्होंने कहा था ‘‘कहानी लिखना बहुत मुश्किल है और उससे भी कठिन है उपन्यास लिखना । बहुत से उपन्यास और कहानियाँ लेखक अपने अस्तित्व को मात्र बचाने के लिए और लेखक बने रहने की औपचारिकता ही निभाते हैं । उनका सरोकार अपनी प्रकाशित पुस्तकों की गिनती से ही होता है । चाहे वह कॉपी पेस्ट ही क्यों न हों ।  मौलिक चिंतन का अभाव साहित्य को कमजोर कर देता है ।’’ 

मेरे एक और साहित्यकार मित्र सत्येन्द्र शरत जी ने एक बार किसी दूसरे लेखक का एक कहानी संग्रह भेजा उसमें एक कहानी के ऊपर एक चिट मार्क लगा हुआ था जिसमें लिखा हुआ था ‘‘यह होती है कहानी- अच्छी लगे तो अपनी पत्रिका में अवश्य स्थान देना । ’’ मैंने ऐसे ही किया । 4-6 महीनों के बाद उसी कहानी-संग्रह से मैंने एक दूसरी कहानी लेकर छाप दी । पत्रिका मिलते ही फोन आया ‘‘यह कहानी तुमने क्यों छापी ? ’’- संपादक तुम हो, तुम्हारा अपना डोमेन है । मैं इस पर कोई अतिक्रमरण नहीं करना चाहता लेकिन तुम्हें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि एक लेखक कि सारी कहानियाँ रोचक और स्तरीय होती हैं- जिस तरह एक ग़ज़ल के सारे शेर वज़नदार नहीं होते- कुछ कमज़ोर भी होते हैं वैसे कहानियाँ भी कमजोर होती हैं । ’’

बात मेरी समझ में आ गई । 

आज की शहरी ज़िन्दगी में ऐसे उलझाव पैदा हो गए हैं कि प्रतिद्वंद्विता और तकरारिता जन जीवन में व्याप्त
है । आज सोशलमिडिया के चलते कई सामाजिक परिवर्तन हो रहे हैं पहले हादसों की सीमाएँ सीमित होती थीं । पर अब कुछ किस्से आम हो गए हैं । जिससे मानसिक तनाव, अवसाद, दिल फरेबियां और रोगों की बाढ़ सी आ गई है । ‘‘इस दौर में ईसा तो नहीं कोई, मगर हाँ/जिस शख्स को देखो वही सूली पे टंगा है।’’ (डॉ. हरिन्द्र श्रीवास्तव) ऐसे तेजी से परिवर्तित होते परिवेश में मनोचिकित्सक, योग, आयुर्वेद, तांत्रिक विद्या इत्यादि ने भी सम्मान आसन ग्रहण कर लिया है । जो साहित्यकार साहित्य को संजीवनी समझते हैं उन्होंने भी कालानुकूल विषयों को लेकर अपनी कलम चलाई है । परिवेश परिवर्तनशील है । मन की प्रवृत्ति ग्रहण करने की है। मन की संकलित समग्री ही साहित्य में रूपांतरित होती है। परिणामस्वरूप ‘अमीरन’ का जन्म हुआ ।

उन चंद चुनिंदा लेखकों में अब एकता अमित व्यास का नाम भी शामिल हो गया है । कहानी, कविता, पोडकास्ट, व्यापार प्रबंधन, समाज सेवा के अतिरिक्त उपन्यास रचने की भी चुनौती स्वीकार कर ली है ।  उनका प्रथम उपन्यास अमीरन प्रकाशित हो चुका है जिसे पाठकों ने हाथों हाथ लिया और प्रकाशित होने के 18 दिन बाद ही दूसरे संस्करण को प्रेस भेजना पड़ा । 

साहित्य की सीमाएँ अपरंपार हैं । साहित्य अपने दायित्व से कभी भी च्युत नहीं होता । कोई तथाकथित साहित्यकार दुष्कृत्य करे सो करे वरन दैवी-प्रदत्त सम्यक् ज्ञानी साहित्यकार साहित्य के शिखर प्राप्त आदर्श ‘‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’’ से अपनी दृष्टि कभी ओझल नहीं होने देता और अपने साहित्य की सृष्टि भी संवेदनशीलता, शाश्वता और उच्च स्तरीय बना कर समाज को परोसता है । प्रेम प्रसार, नवोदित प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करता हुआ आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत सौंपता हुआ साहित्य को चिरंजीवी दर्शन (फलसफे) से समृद्ध करता है । 

इन्हीं आदर्शों को आत्मसात् किया स्नेहासक्त एकता अमित व्यास ने अब उपन्यास विधा में भी अपनी लेखनी की अज़माईश अपने प्रथम उपन्यास कृति ‘अमीरन’ से शुभारम्भ किया है । जिसने एकता में व्याप्त कई सशक्त संभावनाओं के संकेत दिए हैं । 

एकता में ज्वलंत विषय उठाने का साहस है, उसकी शैली कवितामय है- गद्य-पद्य में भेद पाना और समझना अच्छा लगता है । अभिव्यक्ति के अभिनव प्रयोग उसके लेखन रासायननिकी में सफल होकर ही निकलते हैं । शैली में शालीनता संस्कार जन्य है । शब्दों का चयन, विषय वस्तु प्रासंगिक एवं संप्रेषणीय है । शिल्पी तानाबाना भी कलात्मक है । ‘अमीरन’ एक जिन्दा दिल किरदार है । किरदार वह होता है जो अपने इन्सानी वुजूद की रक्षा कर सके । किदार की बुलंदी दौलत और शोहरत से नहीं होती- बल्कि आत्म विश्वास और गुरु आस्था की शक्ति से ही संभव है । सुसह अमीरन ने अविरल बहने वाली समय सरिता के साथ बहना सीखा है । जिसका संकेत उसकी कविता की अंतिम पंक्तियों में मिलता है ।

... मगर ज़िंदगी का घर सबसे प्यारा है

कश्मकश है

और बेहतर रास्ते की तलाश है

चलो ज़िंदगी के फ़लसफ़े में ढूँढते हैं

कोई लंबा व गोल रास्ता

जिनमें छुपे हों सच्चे संबंध

साथ निभाने के वादे

और प्यार की सौग़ातें

ये ज़िंदगी के रास्ते हमेशा से वहीं डटे खड़े हैं ।

राहें वहीं हैं राही बदल गए

दस्तूरे दुनिया और निज़ामें कुदरत

कबूल है, कबूल है, कबूल है ।

तथास्तु   (पृष्ठ सं. 148)

अमीरन जीवन के उहापोह से निजात पा सकी क्योंकि वह नितांत अकेली अपनी उलझनों को सुलझा सकी । उम्मीद है कि ‘अमीरन’ पाठकों की कसौटी पर भी 24 कैरेट गोल्ड की रचना साबित होगी । अगर 24 नहीं तो 18 ही सही....... प्रथम प्रयास प्रेरणा तो बना । अब फाईलों में छिपी सामग्री को बाहर आने में देर नहीं लगेगी । आशा है लेखन में निरंतरता बनी रहेगी। 

रही बात त्रुटियों की– त्रुटियाँ तो होंगी– अगर आप खोज पाएँ तो भूल सुधार फर्मा करें । शुभकामनाएँ

हज़ार बिजलियाँ गिरें

लाख आंधियाँ उठें

वो फूल खिल कर रहेंगे

जो खिलने वाले हैं ।        साहिर

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समीक्षा

डॉ. प्रणव भारती

अहमदाबाद, मो. 99045 16484


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

अमीरन : एकता अमित व्यास

उन आँखों में कुछ इतना अद्भुत है जो न चाहते हुए भी बार-बार पीछे घूमकर देखने के लिए बाध्य करता है । मुझे किसी को देखकर कुछ चीज़ें ऐसे याद आने लगती हैं जैसे कल की बात हो और चित्र ऐसे बनते चले जाते हैं जैसे दो बातें कहीं से भी जुड़ी हुई हों । कॉलेज के समय में एक लड़का था जो दिल्ली में पत्रकार था । जिस शहर में मैं रहती थी उसमें उसकी दीदी रहती थीं । वह अक्सर दिल्ली से आता-जाता रहता । अपने गले में एक बड़ा सा ज़ूम वाला कैमरा लटकाए वह साइकिल पर हमारे कॉलेज के चक्कर काटता रहता । उसकी बहन की बेटी मेरी दोस्त थी, जब हम मिलते वह अपने मामा की ली गई तस्वीरें मुझे दिखाती । वाकई, कमाल का हुनर था उसका । दूर से भी वह केवल आँखों की तस्वीर ले सकता था । 

वह ज़माना था जब लंबे बालों वाले लड़कों को कभी भी गुंडे की उपाधि से विभूषित कर दिया जाता । वह साइकिल पर अपने लंबे बालों को लहराकर चलता, गले में ज़ूम वाला कैमरा लटका नाच रहा होता और लड़कियाँ उसे देखकर अपने चेहरे छिपाने लगतीं । कहीं वह उनकी ही तस्वीर न ले ले । दरअसल वह अपनी पत्रिका के लिए खूबसूरत चेहरों और उससे भी अधिक खूबसूरत आँखों की तस्वीरें जमा करता रहता था । 

अमीरन की दृष्टि जैसे पीछा करते हुए मुझे अपने जमाने के पीले पृष्ठ पलटकर उन तस्वीरों को देखने के लिए बाध्य करने लगी जो मैंने उस लड़के के कलेक्शन में देखी थीं । अमीरन की आँखों की रहस्यमयी तस्वीर देखकर मुझे महसूस हुआ, कहीं ये उन्हीं आँखों में से कोई तस्वीर तो नहीं है जो उस समय मैंने देखी थीं । मेरा मन एक-एक करके उन फेडेड तस्वीरों को ऊपर-नीचे पलटने लगा । मुझे महसूस होने लगा कि अमीरन की आँखें बहुत कुछ बोल रही हैं इसीलिए उसके होंठों पर पर्दा है । 

छोटी सी आह और फिर लंबी सी वाह ! मेरे मन में न जाने कितने दिनों से अमीरन उमड़ती-घुमड़ती, भागती रही है । इसके जन्म के साथ ही या संभवत:लेखिका के गर्भ में आने के समय से ही यह अमीरन मेरे मन में चित्र बनाती रही है । उसके जन्म से पहले ही शायद मैं उसे बगीचे में दौड़ते हुए देखने लगी थी और एक उत्सुकता लेखिका के साथ मेरे मन में भी चलने लगी थी । हालाँकि जन्म उसे लेखिका एकता व्यास ने दिया है किन्तु कहीं न कहीं मेरे उदर में भी पीड़ा का गोला फूटा । 

कारण कि मैंने एकता से बहुत सी बातें इसके बारे में सुनी थीं और मैं उसको सोचते हुए नित नए कयास लगाने लगी थी । उन्हीं दिनों मैं कुछ अस्वस्थ हो गई, मुझे स्क्रीन देखना, लिखना मना हुआ तब चंचल मस्तिष्क बिना बात ही उन बातों को सोचने लगा जिनका ज़िक्र मेरे सामने हुआ था । उन दिनों आँखें बंद करने पर या तो मुझे अपने उपन्यास 'प्रेम गली अति साँकरी' के अधूरे पात्र या फिर अमीरन बगीचे में दौड़ती हुई दिखाई देने लगती और न चाहते हुए भी मैं अमीरन और उसके साथ जुड़े हुए सभी चरित्रों के बारे में सोचने लगी । 

एक भिन्न और सुंदर प्रभावी शैली में कुछ भी अचानक कह देने वाली एकता को अपने ऊपर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि वह लिख क्या रही है ? माँ उसके साथ थीं और जब शरीर से नहीं थीं तब मन से हर पल थीं जिन्होंने वीणापाणि की भाँति उसके हाथ में कलम पकड़ा दी थी । 

जब दो/दो माँओं का शुभाशीष हो तब अमीरन का जन्म कैसे न होता जो उसके दिलोदिमाग में कब से पसरी बैठी थी । अमीरन से उसका बहनापा जैसे अपने अस्तित्व से मुलाकात करने जैसा ही रहा होगा, ऐसा मुझे लगता है । उपन्यास के कुछ अजीबोगरीब चरित्र हमें अपने चारों ओर टहलते हुए दिखाई दे जाते हैं । जहाँ कोई झरोखा हल्का सा भी मिल गया कि वे ऐसे घुसपैठ करते हैं कि लज्जा और स्वाभिमान की चिंदी-चिंदी आसमान में उड़ती दिखाई देने लगती हैं । हम या तो मुँह बाए उन्हें देखते रह जाते हैं, कभी दौड़कर पकड़ने की चेष्टा करते भी हैं तो आधे-अधूरे भुरभुरी चिन्दियाँ मज़ाक उड़ाती सी जैसे ठेंगा दिखाकर पवन के वेग में न जाने कहाँ गुम हो जाती हैं । 

अपने किसी भी लेखन में लेखक स्वयं कहीं न कहीं होता ही है और जब पाठक चरित्रों के साथ यात्रा में शुमार हो जाता है तब एक पूरा नया संसार सामने आ खड़ा होता है । 

अमीरन बुद्धिमान थी, साहसी थी । अपने आपको, बच्ची को अपने संसार को बचाने के लिए सबसे युद्ध करती रही और अंत में उसने उस जंजाल से मुक्ति पा ही ली लेकिन सब अमीरन के जैसी ऊर्जा से भरी नहीं होतीं और ऊर्जा भी क्या ऐसे ही मिल जाती है ? इसके लिए न जाने कितनी रातें जागकर माइग्रेन की पीड़ा के साथ ही अनेक पीड़ाओं से युद्ध करना होता है तब कहीं जाकर अमीरन के हाथ में जीत का झंडा दिखाई दे पाता है । 

अमीरन की व्यथा किसी की भी व्यथा हो सकती है उसे महसूस करना स्वयं में सूरज को हथेली पर रखकर उसके ताप को सहना होता है । कथा इसलिए भी मस्तिष्क में टहोके मारती है कि जगाना चाहती है उन सोती हुई बेचारगियों को जो आँखें मूंदकर विश्वास कर बैठती 

हैं । जीवन के खेल में जीतकर अमीरन पाठकों को अपनी ओर खेंचती है और पुकारती है कि उसके साथ यात्रा
करें । 

आदरणीय बहल जी ने जिस खूबसूरती व अपनेपन से इस पुस्तक का प्रकाशन किया है उसके लिए उनको सादर 

प्रणाम । लेखिका सुश्री एकता व्यास को ढेरों बधाई व अभिनंदन । प्रिय बिटिया जिया को आवरण सज्जा के लिए ढेरों शुभाशीष ! 

लेखिका का यह पहला उपन्यास है, भविष्य में अनेकों भिन्न विषयों पर उनकी सहज कलम चलती रहे । यही शुभकामना है । 

हर रोज़ नज़र आता है यही रास्ता

जो है मेरा पसंददीदा रास्ता

इस रास्ते के लिए बगीचे को शुक्रिया

क्योंकि---यही राह है

जीत की राह ---- ! ! 

अनेकों शुभकामनाओं सहित


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समीक्षा

सुश्री मधु सोसि गुप्ता

अहमदाबाद, मो. 97243 03410

सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804


अमीरन : एकता अमित व्यास

समुंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दे हम को, 

हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए ।  बशीर.

नारी जीवन तेरी यही कहानी आँचल में है दूध और आँखों में पानी नारी, स्त्री, औरत जीवन प्रयत्न अपने आँचल में सुरक्षा कवच लिए अपने बालक को कड़ी धूप से बचाती रहती है और साथ- साथ अपने जीवन साथी के चेहरे पर आते जाते भावों को सागर की लहरों समान गिनती रहती है । 

कब वे लहरें लहरा कर उसकी ओर आऐ ? कब वो प्रियतम के संग अठखेलियाँ मनायें ! कब वो प्रेम सागर में डूबकी लगायें, एक प्यासी आस लिए वो स्त्री तट पर जब प्यासी रह जाती है । जब वो कुछ और ही देखती है कि उसकी सजी सजाई नौका में उसके फूलो से लदे शिकारा में कोई और चप्पू चला कर उसकी हाउस बोट से उसी के प्रियतम को आँखों के चंचल इशारे कर बैठा ले जाती है और यह मुँह बिसौरे बुझे मन से अपनी खिड़की का पर्दा डाल, उनका इंतज़ार करने लगती है, वे आते है, प्रसन्न चित, चहकते - चहकते मानो कुछ अनहोनी बात है ही
नही ! 

दिन गुजरते है, सप्ताह चले जाते हैं महीने और साल भी, और उस स्त्री का संसार उसके सामने खोखला होता जा रहा है, पति ही नहीं अपनी स्वयं की संतान उसकी ओर आसक्त होती है जिसने उसके परिवार में सेंध लगाई है । 

चोर, डकैत व आतंक वादी ईंट पत्थर के घरों में चुपचाप रात के अंधेरे में दीवार तोड़ कर चौकीदार की नज़रों से बच कर सेंध लगाते है, परंतु अमीरन (काल्पनिक नाम दे दिया लेखिका ने ) के घर में सेंध लगाने जो आई वो दिन दहाड़े पूरे समाज के सामने अपने को पाक साफ़ ज़ाहिर करती घुस बैठी, जिस सफ़ाई से उसने डाका डाला वो देख कर तो खोज करने वाली जासूस एजेंसी में भी दांतों तले अंगुली दबा ली । 

उस पर तुर्रा ये कि क़सूरवार आपको ही माना गया । 

स्त्री सबकुछ यह सकती है स्त्री सर्वस्व बलिदान कर सकती है वो अपने को स्वाह कर देती है वो मर जाती है वो आग में जल जाती है ! एक प्रेम के स्पर्श के लिए, एक प्यार भरी नज़र और ज़रा से प्रशंसा पाकर वो फूली नहीं समाती । परंतु जब वह तिरस्कृत होती है उसके स्वाभिमान को कोई टक्कर देता है तब वह टूट जाती है । बिखर जाती है । 

एकता की अमीरन पढ़ते समय मुख्य पृष्ठ पर बनी काली आँखें पीछा करने लगी, “ अपने ही घर में डर लगता है ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा सा काला भयानक धुऐं का बादल कमरे में घुस आया है और उसमें टुकड़े टुकड़े धुआँ, मुझ पर रिस रहा है और मेरी बेटी पर भी, धीरे धीरे सारे का सारा धुआँ मुझे ढक लेता है “

वह कौन सा धुआँ है जिसने उसका अमन चैन छीन लिया ? न वो सो पाती है न जाग पाती है । 

वो क्या “ वजह “ थी ? 

“ वजह बहुत चिपकू होती है । हमारे समाज में चारों तरफ़ बहुत ही मात्रा में विचरती है...कहीं यह ख़तरनाक वजह आपको आकर न चिपक जाए...“

एकता की नायिका गोल - गोल धूम रही है, किसी चक्रवाती भँवर में फँसी वह बिन पानी मछली की भाँति गोल गोल बदहाल सी धूम रही है । उसका दम घुट रहा है और संसार है कि उसी पर सारा तोष मढ़ रहा है । 

क्यों स्त्री ही स्त्री की दुश्मन बन जाती है । क्यों एक सुसंस्कृत शिक्षित स्त्री, पुरूष के लिए काफ़ी नही । क्यों पुरुष को केवल स्त्री की कमनीय काया ही रास आती है ? क्यों उसे शारीरिक सौंदर्य के भीतर का असुंदर व्यक्ति नहीं दिखता । क्या वजह है कि प्रेम में सराबोर एक शालीन मितभाषी स्त्री की उपेक्षा कर वह शारीरिक सौंदर्य बाह्य रूप से चमत्कृत हो जाता है ! 

झुकता है उस ओर जहां छिछौला त्रिया चरित्र में निपुण स्त्री उसे अपने विषैले घेरे में लपेट लेती है और वह उसकी ओर आसक्त हो अपनी सुसंस्कृत पत्नी का केवल, गज ईंच बेडौल शरीर देख कर उसे विरक्त होता है । “ इस संसार में किसी भी स्त्री को एक ही पैमाने से क्यों मापा जाता है ? गोरा या साँवले रंग का पैमाना, मोटे या पतले होने का पैमाना ? ” मानसिक रूप से रूपवती पत्नी को अक्सर तिरस्कृत किया जाता है और रूपवती संस्कार विहीन स्त्री विजयी होती है । शरीर की सुंदरता मन की सुंदरता पर भारी पड़ती है । तभी तो सिनेमा में सुंदर हीरोइन होना पहली शर्त है ! कौन अन्दर की सुंदरता को देखता है ? 

अमीरन की भाषा सहज सरल है, लेखिका ने क्लिष्ट भाषा से परहेज़ किया है, एक आध जगह कुछ खिंचाव महसूस होता है किंतु वह कहानी के प्रवाह में बह जाता । 

एक बात मुझे व्यक्तिगत रूप से खटकती है सातवें अध्याय के बाद अमीरन का औडा गार्डन में मिलना चीकू के पेड़ के नीचे प्रतीक्षारत नायिका का नित प्रतिदिन का प्रसंग यकायक ग़ायब हो जाता है और आठवें अध्याय के बाद उपन्यास निर्बाध तीव्र गति से ऐसे बहता है जैसे नदी में बाढ़ आ गई हो, और वे तट के किनारे को तोड़ती हुई उमड़ती घुमड़ती दरिया में परिवर्तित हो जाती है । वास्तव में कथा के प्रवाह में पाठक भी भूल जाता । 

वैसे तो कहने को बहुत कुछ है अगर कहने पे आऐ —“

परंतु आप स्वयं यह पुस्तक पढ़िए और निष्कर्ष निकालिए । बस मैं यह कह सकती हूँ कि कलेजा चीर कर रख दिया, रुला दिया और तुम्हारा रूदन, तुम्हारी घुटन को तुम्हारी लेखनी ने आंसू में डूबा कर लिखा है, पढते - पढ़ते दिल की धड़कन तेज होती गई, दिल डूबने लगता है । 

मैं एकता को असीम स्नेह व शुभकामनाएँ देती हूँ । जीना एक बात है जीने पर लिख पाना अलग । लेखक यदि उसे एकसार कर दें जैसे पानी में शककर, तो क़लम से निकला एक - एक शब्द ग्रंथ बन जाता है । 

“ अमीरन “ अवश्य ही यह गुल खिलायेगी । सभ्य प्रकाशन और आदरणीय देवेंद्र बहल जी ने अमीरन पर अपना बहुत सारा प्यार उँडेला है, और उसे प्रकाशित कर पाठकों को एक उभरती हुई कथाकार से रूबरू करवाया है । 

“ तुम सुंदर हो तुम सौंदर्य की प्रतिमान हो

मन तन से सुंदर हो, रूप का मतलब वो क्या जाने

जो समझते हैं काँच को हीरा

वे सोने के खरेपन को क्या जाने, 

सोना सोना ही रहता है चाहें उसे आग में जला लो

या खौलते तेल में डूबा दो । “

आमीन

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श्री ऋषि कुमार उप सचिव हिंदी अकादमी, दिल्ली 

सुश्री एकता अमित व्यास को उपहार भेंट करते हुए


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समीक्षा

सुश्री मंजु महिमा

अमदाबाद, मो. 9925220177


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804


अमीरन– नारी विमर्श की एक सिलवट

 ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन... डोर बेल घनघनाई और जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, पोस्टमेन ने एक पेकेट मेरे हाथ में थमा दिया । 

उलटते–पलटते हुए खोला तो देखा कि एक ‘अमीरन’ नाम की पुस्तक अभिनव इमरोज़ के संपादक एवं सभ्या प्रकाशन के प्रकाशक आदरणीय देवेन्द्र बहल जी ने भेजी है । लेखिका का नाम एकता अमित व्यास । वाह ! मैं खुशी से चीख पड़ी । काफी समय से इंतज़ार था, इस पुस्तक का । एकता को फोन पर जैसे ही बताया फौरन उसने आदेश दे दिया कि जल्दी से पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया भेजिए । अब मैं और मेरे हाथ में यह खाकी रंग की पुस्तक और उस पर बनी बस दो बड़ी बड़ी आँखें.. घूरती हुई.. जैसे कह रही हों, कि तुम पर मेरी नज़र है.. 

अब तक हम इस बात पर इतराते थे कि हम उन लोगों में से है जो ‘खत का मज़मून भांप लेते हैं, लिफ़ाफ़ा देखकर’ सो जैसे ही पुस्तक हाथ में आई उसके आवरण पृष्ठ को देख पढ़ने से पहले ही लगाने लगे अटकलें--

नाम भी कुछ अटपटा सा ‘अमीरन’ । इस नाम से कई बिम्ब ज़हन में टकराने लगे और चंचल मन अनुमान लगाने लगता है कि इस कहानी का विषय क्या होगा ? जैसे-‘अमीरन बाई का कोठा’ पहले के जमाने में बहुत मशहूर हुआ करता था, कहीं इसकी विषयवस्तु उसी पर आधारित तो नहीं ? इसी प्रकार एक बात यह भी दिमाग में आई कि ‘बहुत पैसे वाली सेठानी भी अमीरन कहलाती है’, सो हो सकता है कि कंजूस सेठ की पत्नी की कहानी हो.... । खैर इसी कारण मन में उत्सुकता जागी और पुस्तक पढ़ने का मन बना लिया पर यह क्या ? इसके मुखपृष्ठ पर बनी ये डरावनी सी आँखें तो मुझे ही घूरे जा रही हैं.. उफ्फ़ ! क्या सोचकर बनाई होंगी ? दिमाग फिर अटकले लगाने लगा... कभी लगता कि यह डरावनी नहीं, डरी हुई हैं जो खिड़की से झाँक कर सहायता की याचना कर रहीं हैं । इन केवल दो आँखों के नीचे एक छूटी हुई पेंसिल जैसे कोई बनाते बनाते अधूरी तस्वीर छोड़ कहीं चला गया है और रह गईं है केवल अब ये केवल आँखें...... इसके नीचे लिखा अमीरन शब्द तो बिल्कुल ही मेल नहीं खा रहा था, क्योंकि इन आँखों में तो कहीं भी अमीरों जैसा अहं भाव नहीं था । फिर लगा, इन आँखों में तो कोई रहस्य झाँक रहा है.. कहीं इसमें रहस्यमयी हत्याओं का वर्णन तो नहीं ? यह खतरनाक विचार आते ही मैंने उसे उठा कर रख दिया, सोचा इसे अभी रात में पढ़ना ठीक नहीं, कहीं रात में डरावने सपने आये तो ? बेहतर होगा कि इसे दिन के उजाले में ही पढ़ा जाए । समय पाकर मैं लेखिका से पूछूँगी, यह सोचते सोचते मैं नींद के आगोश में चली गई..

दूसरे दिन फिर वही सिरहाने रखी पुस्तक आँखों से टकराई, जैसे उसकी आँखें बोल रहीं हों कि एक बार अंदर झाँक तो लो.. मुझे आजाद कर दो सब गलतफहमियों से... 

मैंने हिम्मत कर पुस्तक खोली और पढ़ना शुरू किया ...... बड़े ही सुंदर हरे-भरे पार्क का वर्णन पढ़ मन भी कुछ हरा होगया....और मैं भी नायिका के साथ दौड़ लगाते लगाते आगे बढ़ने लगी । 

यह कथा आत्मकथ्य के रूप में प्रारंभ होती है । अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक इस उपन्यास की नायिका हर रोज़ पहले 5 किलोमीटर दौड़ती है और फिर अपने पार्क की दोस्त को अपनी थोड़ी-थोड़ी कहानी सुनाती है अपने निराले अंदाज़ में । इस स्टाइल से मुझे याद आगईं अपनी नानीजी, जो हमें कभी चकवा चकवी की कहानी सुनाया करती थीं और उसकी शुरुआत कुछ ऐसे होती थी, ‘ सुन चकवा ! कह चकवी, आज की कहानी ‘आप बीती’ सुनाऊँ या ‘पर बीती’ ? ’ चकवा कहता ‘पर बीती’ तो तू रोज़ ही सुनाती है, आज तो तू ‘आप बीती’ ही सुना.. ‘ और फिर चकवी अपनी कहानी सुनाना शुरू करती, एक दिन क्या हुआ मैं....... ‘ कुछ ऐसी ही अनुभूति हुई मुझे यह पढ़कर । लेखिका सुनती है और अमीरन अपनी आप बीती रोज़ थोड़ी-थोड़ी सुनाकर लेखिका को कशमकश में छोड़ चली जाती है । दूसरे दिन फिर जिज्ञासु लेखिका फिर वहीं आ बैठती है उसके आगे की कहानी सुनने के लिए .. इस तरह का शिल्प पाठकों के लिए रोचक तो होता ही है उनमें जिज्ञासा भी जागृत करता है । एकता ने इस प्रकार पुरातन और आधुनिक कथा शिल्प का मिश्रित स्वरूप अपनाया है, जो सराहनीय है । कहानी के माध्यम से अतिरिक्त वैवाहिक संबंधों का लेखिका ने न केवल वर्णन किया है वरन बड़ी चतुराई से समाधान भी प्रस्तुत किया है । उसने बड़ी मासूमियत से यह बताने की भी कोशिश की है कि कभी कभी बेवजह शक पति-पत्नी और परिवार को कैसे बर्बाद कर देता है, अत: इसमें कैसे धैर्य से काम लेना चाहिए और यदि सच ही पति का आकर्षण यदि किसी अन्य स्त्री पर हो तो किस तरह उसके क्षणिक/ अल्पसमय के आकर्षण को भेद अपने परिवार को बचाया जा सकता है और पति की आँखें खोली जा सकती है । आजकल हम देख रहे हैं कि एक दो बच्चे हो जाने के बाद अक्सर पति-पत्नी तलाक की स्थति में आ जाते हैं और अपने अहं को छोड़ने को तैयार नहीं होते । इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे अपने माँ-बाप में से किसी एक के प्यार से वंचित हो जाते हैं और उनके माता-पिता भी पारिवारिक सुख से वंचित हो अपने बुढ़ापे को कोसने लगते हैं । यहाँ लेखिका ने बड़े धैर्य और संयम से काम लेते हुए अपने पति को गलती का अहसास करवा फिर से परिवार से जोड़ दिया है और यही है वह ‘असली अमीरन’ जिसका दिल उदार है, बड़ा है, अमीर है । अब यह कैसे हुआ इसके लिए आपको इस उपन्यास की ओर रुख करना होगा और बड़े धैर्य से पढ़ना होगा । नारी विमर्श समकालीन वाङमय में महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रूप में उभरा है, एक जागरुक रचनाकार के रूप में एकता ने नारी-विमर्श पर अपने सुस्पष्ट, सुचिन्तित, मौलिक दर्शन तर्कों को अनायास ही शामिल कर लिया है । 

अज्ञेय ने शेखर एक जीवनी में लिखा है- ‘प्रत्येक रचनाकार दृष्टा होता है, क्योंकि वेदना की शक्ति दृष्टि देती है, जो यातना में होता है, वह दृष्टा हो सकता है । इस वेदना को अपनी सेंसिबलिटी से जितनी शिद्दत से महसूस किया जाएगा उतनी ही पारदर्शी और दूरदर्शी दृष्टि से सम्पन्न अभिव्यक्ति प्रस्फुटित होगी वह चाहे गद्य हो या पद्य में हो । ‘ यह सही भी है कि कोई भी रचना बेचैनी से उपजती है । जितनी घनीभूत बेचैनी होगी, एक संवेदनशील लेखक की अनुभूति तो सघन होगी ही लेकिन अभिव्यक्ति उतनी ही सहज-सरल होगी, उसके लिए बड़े बड़े क्लिष्ट शब्दों की आवश्यकता नहीं होती । उसकी रचना में गहन पीड़ादायक अनुभवों से गुजर रहे रचनाकार की सृजनात्मक चीत्कार होती है, जो हमें इस उपन्यास में सुनने को मिलती है । 

प्रकाशन की दृष्टि से इसका प्रिन्ट, कागज और सेटिंग बहुत स्तरीय है । अधिकांशत: हिन्दी वर्तनी त्रुटियाँ प्रकाशन में बहुत रह जाती हैं, पर इस पुस्तक में ये नगण्य हैं, जो द्वितीय संस्करण में लुप्त हो जाएंगी । सभ्या प्रकाशन के अनुभवी प्रकाशक और उनकी टीम को साधुवाद के पात्र हैं । इसके अलावा आवरण पृष्ठ का सशक्त चित्र, और उसमें भावों को निरूपित करने के लिए बिटिया जिया अमित व्यास को ढेर साधुवाद, बधाई और आशीर्वाद तो पुरस्कार रूप में बनता ही है । 

एकता व्यास के इस प्रथम लघु उपन्यास पर उनकी मातश्री और गुरुदेव का आशीर्वाद तो है ही लेकिन मेरी ओर से भी उनके लिए मेरी अशेष शुभकामनाएँ हैं और ईश्वर से प्रार्थना है कि वह इतने जुनून और मेहनत से तैयार की गई आपकी इस पुस्तक को बेहद कामयाब करे...और यह उपन्यास आपका बेस्ट सेलर बन साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित हो...तथा मेरी नज़र में यह उपन्यास नारी विमर्श की एक सिलवट जैसा है, जो परतों में दबी रहती है, लेकिन अभी भी कई ऐसी सिलवटें हैं जो कई लेखन के बावजूद भी सपाट नहीं हुई है । मैं आशा करती हूँ कि लेखिका एकता व्यास अपनी कलम से उन्हें भी उजागर करेंगी और भविष्य में भी वे अपने रोचक लेखन से विविध विषयों पर अपने उपन्यास साहित्य को समर्पित करती रहेंगी ...आमीन...तथास्तु ......सफल भव: ‘बहुत से राज़ औरत के, सिले हैं बखियों में, आओ हिम्मत तो करें एक धागा खींचने की । ’ 

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समीक्षा

श्री हरिशंकर राढ़ी


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

नारी-संत्रास की अनुभूति : ‘अमीरन’

इसमें संदेह नहीं कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को दोयम दर्जे का जीवन व्यतीत करते सदियाँ गुजर गईं । आज भी उसे अपमान, दुर्व्यवहार, हेयता और पक्षपात का दंश झेलना पड़ रहा है । दुखद बात यह है कि स्त्री की दुर्दशा के लिए पुरुष समाज का अहंकार, उच्चता की भावना और आर्थिक बल जिम्मेदार रहा ही है, स्त्रियाँ भी स्त्री की प्रताड़ना के लिए कम उत्तरदायी नहीं रही हैं । स्त्री और पुरुष जैसे दो-दो शत्रुओं से कई मोर्चों पर जूझती एक स्त्री किस-किस मनःस्थिति से जूझती है, किन-किन दुरावस्थाओं से गुजरती है, इसका भान सभी को नहीं हो पाता है । कमोबेश यह स्थिति हर देश और हर समाज में है, किंतु सबके पास वह जुबान नहीं होती कि पीड़ा को शब्द दे पाए । हाँ, कुछ लोग ऐसे जरूर होते हैं, जो सहानुभूति एवं तदनुभूति में धनी होते हैं, संवेदनशील होते हैं और अभिव्यक्ति में समृद्ध होते हैं । वे पूरे समाज की पीड़ा को अपनी कथा-कहानियों के माध्यम से व्यक्त कर देते हैं । इस प्रकार रचा जाने वाला साहित्य समाज के लिए हितकर होता है । 

स्त्री व्यथा को लेकर पिछले पाँच-छह दशकों का साहित्य बहुत सजग और मुखर हुआ है । इस क्षेत्र में पुरुषों के अतिरिक्त महिलाओं ने भी खूब लिखा है । जाहिर सी बात है, एक स्त्री अपनी पीड़ा एवं संत्रास को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकती है । अपने भोगे हुए क्षणों को, संवेदनाओं को एवं कोमल अनुभूतियों को जितना सजीव वह स्वयं बना देगी, उतना दूसरों के लिए मुश्किल होगा । नारी विमर्श, स्त्री-पुरुष समानता या नारी सशक्तीकरण को केंद्र में रखकर किया गया साहित्य सृजन केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, सामाजिक दृष्टि से बहुत उपादेय सिद्ध हुआ है । यह बात अलग है कि लेखन की प्रकृति एवं उसका व स्तर अलग-अलग प्रभाव छोड़ पाया है । इन्हीं प्रसंगों के इर्द-गिर्द घूमता हुआ एकता अमित व्यास का एक उपन्यास ‘अमीरन’ पढ़ने को मिला । एक वाक्य में कहें तो यह एक विवाहिता स्त्री, एक बेटी की माँ के जीवन में आए अप्रकट प्रेम त्रिकोण, संदेह, दिशाभ्रम, टूटन एवं जुड़ने की कथा है जो, एक लय में चलती रहती है । 

लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों के सामान्य छपाई वाले उपन्यास को प्रायः लघु उपन्यास कहना बेहतर होगा । उपन्यास में प्रत्यक्षतः सक्रिय चरित्र केवल दो ही हैं और दोनों ही महिलाएँ । यह भी कहना बेहतर होगा कि एक तो सिर्फ नैरेटर है, या नाटक होता तो उसे नटी ही कहा जाता । दूसरी महिला इसकी मुख्य चरित्र है, जो अपने हिसाब से अपने भोगे संत्रासों, संघर्षों एवं उनसे उबरने की कथा तफसील से बताती है और लगभग एक साँस में बताती है । कथा का आरंभ कुछ रोमांटिक, कुछ सनसनीखेज और कुछ वर्णनात्मक है, जिससे आगे बढ़ने की उत्सुकता जागृत होती है । नैरेटर नगर के एक उद्यान में प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान एक प्रौढ़ा-सी युवती को देखती है । वह न तो युवती है, और न उम्रदराज । अपनी एक विशेष शैली में वह उद्यान में लगभग दौड़ लगा रही है, बिना किसी की तरफ ध्यान दिए । भागते समय कुछ गुनगुना रही है, जिसे वाचिका ठीक से सुन नहीं पाती । न जाने उसे क्यों लगता है कि वह किसी से भाग रही है । वह उसका अतीत हो सकता है, घर-परिवार हो सकता, दोस्त हो सकते हैं या और भी कुछ । वाचिका की जिज्ञासा बढ़ती जाती है और अंततः वह उसे पकड़ लेती है और उससे भागने का, उसके अजीब तरीके का कारण पूछ बैठती है । 

भागने वाली युवती वाचिका कि लिए ‘वह’ है और अंत तक ‘वह’ ही रहती है । यह बात अलग है कि वाचिका अपनी सुविधा के लिए उसका नाम ‘अमीरन’ रख देती है क्योंकि वह अपनी ऑडी कार से आती है । वाचिका की जिज्ञासा और प्रयास को देखते हुए अमीरन उसे अपनी कहानी सुनाने को तैयार हो जाती है, लेकिन किश्तों में । लगता है कि अमीरन अपने समय और संकल्प के प्रति दृढ़ रहने वाली मजबूत इच्छाशक्ति की स्वामिनी है । अनुमान नहीं होता कि उसके जीवन में झंझावातों का गहरा प्रभाव रहा है और वह उन झंझावातों से उबर जाने के लिए इतनी कोशिश कर रही है । यहाँ के बाद वाचिका की भूमिका लगभग समाप्त हो जाती है और कभी-कभार ही दिखती है । 

यहाँ से कथानक में तीन प्रमुख पात्र और जुड़ते हैं - अमीरन की छोटी-सी बेटी सिया, उसकी शिक्षिका दिव्या और अमीरन का पति आकाश । इसके पहले लेखिका ने कथा में इतनी उत्सुकता भर दिया है कि पाठक बँधना शुरू हो जाता है । वाचिका यह भी बताती है कि अमीरन अपूर्व-अद्भुत सौंदर्य की स्वामिनी है । उसके आकर्षण से स्त्री बँध जाती है तो पुरुष की बात ही क्या है ! अपने प्रारंभिक आख्यान में अमीरन यह बता चुकी होती है कि वह कभी-कभी दो घंटे से भी कम सोकर काम चला लेती है, उसके जीवन में काम ही काम है, धुन है, वह बहुत सारी चीजों से भयभीत है और दुर्लभ भुक्तभोगिनी है । कथा को प्रवहमान बनाने के लिए इस प्रकार का माहौल पर्याप्त है । यह बात अलग है कि आगे जाकर वृत्तांत और वर्णन इतना अधिक हो जाता है कि पाठक ऊबने लगता है । 

कथानक से गुजरते हुए यही लगता है कि यह पति-पत्नी और ‘वह’ का प्रेम त्रिकोण है । त्रिकोण के तीसरे कोण पर सिया की अध्यापिका दिव्या है । किसी कारणवश एक दिन अमीरन के पति आकाश को बेटी की इस शिक्षिका से मिलने जाना होता है और वहीं से स्थितियाँ पलट जाती हैं । दिव्या आकाश के आकर्षण में बँध जाती है और धीरे-धीरे आकाश भी अपनी पत्नी की उपेक्षा करता हुआ दिव्या के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो जाता है । उसी की बातें मानना, उसी के इशारे पर निर्णय लेना, उसी के परिवार की खुशियों के लिए काम करना और अधिकांश समय उसे देना उसके जीवन का क्रम हो जाता है । यहाँ तक वह छोटी-सी बच्ची सिया को इतना प्रलोभन देती है कि वह उसी के साथ रहने लगती है । अमीरन को महसूस होता है कि वह दुनिया में अकेली रह गई है । उसका पति तो छिन ही गया है, उसकी बेटी भी उसकी अपनी नहीं रही । 

परिणाम वही होता है, जो अन्य स्थितियों में देखा जाता है । अमीरन पूरी तरह टूट जाती है और बिखर जाती है । उसके संस्कार उसे बोलने के बजाय सहने पर मजबूर करते हैं । यह स्थिति एक सामान्य भारतीय नारी में प्रायः पायी जाती है । अवसाद, अनिद्रा, उपेक्षा और अकेलेपन की शिकार वह स्त्री ऐसे चौराहे पर खड़ी है जिसे यह कतई भान नहीं कि कहाँ जाए और क्या करे । अपनी तरफ से पूरा प्रयास करने के बाद भी वह कुछ कर नहीं पाती । स्थिति बद से बदतर होती जाती है । लेकिन उसकी जिजीविषा है कि वह हिम्मत नहीं हारती । मकान बदलती है, संतुलित रहते हुए संघर्ष करती है और धीरे-धीरे परिस्थितियाँ अनुकूल होने लगती हैं । उसकी मेधावी बेटी कक्षा में पिछड़ती है और क्रमशः यह भेद खुल जाता है कि दिव्या और उसका परिवार एक योजना के तहत काम कर रहा था । सुखद यह है कि अंततः उसे यह ज्ञात होता है कि उसका पति दिव्या की सारी बातें मानने के बावजूद उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करता और न उसकी निष्ठा अमीरन के प्रति कम हुई थी । 

ऐसी कहानियाँ सामान्यतः हर समाज में मिल जाती हैं । प्रेम त्रिकोण कभी पारिवारिक बिखराव की ओर जाता है तो कभी समय के साथ समाप्त हो जाता है । इस कथानक में अंततः बाहरी तत्त्व दिव्या अपने उद्देश्य में असफल होती है और अमीरन को उसका संसार लगभग वापस मिल जाता है । प्रश्न यहाँ कहानी के ट्रीटमेंट का है । देखा जाए तो बहुत सारी कहानियों-उपन्यासों की विषयवस्तु, मुद्दे एक जैसे रहते हैं, किंतु यह लेखक की अपनी कुशलता, उसकी भाषा-शैली, मुद्दों की समझ, अनुभव एवं अनुभूतियाँ और अंततः कहानी का ट्रीटमेंट होता है, जो रचना को कालजयी, स्मरणीय, प्रभावी या असफल बना देता है । किसी भी घटना या पीड़ा को जैसे-तैसे लिख देना रचना को साहित्य नहीं बना देता । उसे कई कोणों से समाज पर असर छोड़ना पड़ता है । 

देखा जाए तो एकता अमित व्यास का यह उपन्यास एक प्रकार का एकालाप (monologue) है । बहुत छोटे से अंश को छोड़ दिया जाए तो अकेली अमीरन अपनी पीड़ाओं को बाँटती-बताती दिखती है । इसमें संदेह नहीं कि कथानक किसी का भोगा हुआ या अत्यंत नजदीक से देखा हुआ यथार्थ है, उसमें संवेदना है, मनोवैज्ञानिक निदान और उपचार है, किंतु कथा में जिस ठहराव, धैर्य की आवश्यकता थी, वह कम दिखती है । यह विडंबना ही है कि कथानायिका स्वयं धैर्य का प्रतिरूप है, किंतु किस्सागोई में वह धैर्य नहीं दिखता । वैसे लेखिका ने अपने तौर पर प्रकट-अप्रकट रूप से अमीरन द्वारा भोगी गई मानसिक पीड़ाओं के कुछ हल भी सुझाए हैं । उसमें सकारात्मकता यह है कि वह टूट जाने के बाद भी हार नहीं मानती, अपने आत्मीयों से सलाह लेती है, हर कदम बहुत सोच-समझकर उठाती है और इस प्रकार समस्या को हल करने का एक तरीका सुझाती है । बेटी का परीक्षा परिणाम खराब आने पर या विद्यालय से शिकायत आने पर वह आक्रामक नहीं होती, अपितु उसे खाना खिलाने बाहर ले जाती है । कुछ इस तरह का व्यवहार करती है मानो कुछ हुआ ही न हो । ऐसे उपचार मनोवैज्ञानिक असर डालते हैं और उससे सही-गलत के स्वनिर्णय की क्षमता विकसित होती है । 

लेखिका ने जो सामाजिक पारिवारिक चित्र खींचा है, जिन अंतर्द्वंद्वों को उभारा है, जिस प्रकार समाज में अच्छे-बुरे लोगों का प्रस्तुतीकरण किया है और नारी की जो स्थिति है, उससे एक बहुत अच्छा उपन्यास बन सकता था । ऐसा संभवतः इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि लेखिका से इसके लिए पूरी तैयारी, एक तकनीकी खाका और प्रस्तुतीकरण की योजना बनाने में कहीं-न-कहीं चूक हो गई । कथा के विस्तार में तमाम असंगत बातें, अनावश्यक बातें दे दी गईं । जीवन के फलसफे, निज की उक्तियाँ और प्राप्तियाँ दी गई हैं । अच्छी भी हैं, किंतु ये कहीं-कहीं असंगत हो गई हैं । मध्यभाग तक जाते-जाते अमीरन का दुख-संत्रास वर्णन उबाऊ होने लगता है । पाठक समझ जाता है कि वह एक सीमा से बाहर संत्रास झेल रही है, किंतु अब उसे कुछ बदलाव चाहिए, परिणाम चाहिए । वहाँ लेखिका चाहती तो प्रसंग बदलकर या कुछ अन्य पात्रों के माध्यम से कुछ मोड़ ला सकती थी । यदि ऐसा होता तो उपन्यास एकालाप (monologue) के आरोप से बच जाता । 

वैसे उपन्यास में एक चीज जो बहुत खटकती है, वह है भाषा और वर्तनी की समस्या । अपनी भूमिका में लेखिका ने स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया है कि उसके लिए वर्तनी और व्याकरण बहुत बड़ी समस्या है । दूसरे, अपने आत्मीयों की जिद एवं माँ की इच्छा पर उसने बीस साल के अंतराल के बाद लेखन प्रारंभ किया है । इस आधार पर उसे हम दोषमुक्त कर सकते हैं, लेकिन यह भी ध्यान रहे कि किसी संवेदनशील रचनाधर्मी के लिए भाषा-वर्तनी सीख लेना कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं हो सकती । इसमें संदेह नहीं कि किसी प्रकाशित पुस्तक में इतनी अधिक गलतियाँ होंगी तो वह पुस्तक साहित्यिक श्रेणी से तत्काल निचली श्रेणी में चली जाएगी । किसी भाषा का साहित्य समाज को दिशा ही नहीं देता, अपितु आने वाली पीढ़ियों को भाषा का संस्कार देता है । वैसे, प्रकाशक का पूरा उत्तरदायित्व था कि वह इस कृति के भाषायी पक्ष पर ध्यान देते और त्रुटिहीन संस्करण निकालते । 

जिस जमीन और परिवेश में यह कथा लिखी गई है, वह हमारा यथार्थ है । अपने तमाम आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक उन्नति के बावजूद स्त्रियों के मामले में हमारा समाज एक सीमा तक मध्यकाल की मानसिकता रखता है । समाधान की बात छोड़ भी दें तो यह कृति नायिका की पीड़ा और उसके साथ हो रहे अन्याय को जिस बारीकी से उभारती है, वह मानवमन को झकझोर देने में समर्थ है । यह भी अपने आप में एक समाधान है कि जनमानस में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान उभरे । यदि इतना भी हो जाता है तो हम सदियों पुराने पितृसत्तात्मक वातावरण से निकलकर एक अच्छे समाज का निर्माण कर पाएँगे । इतना तो कहा जा सकता है कि लेखिका में कहने के लिए बहुत कुछ है, अच्छे सृजन की संभावनाएँ हैं; बस वह अपने साहित्यिक कौशल को निखार ले । 

पुस्तक : अमीरन (उपन्यास)

लेखिका : एकता अमित व्यास

प्रकाशक : सभ्या प्रकाशन, बी-3/3223 वसंतकुंज, 

नई दिल्ली - 110070

पृष्ठ : 148 मूल्य : 400/

समीक्षक संपर्क : नई दिल्ली, मो. 09654030701

ईमेल : hsrarhi@gmail.com

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एकता व्यास जी की रचनाएँ

कल ही उनके व्यक्तित्व से परिचय हुआ और आज काव्य धारा में प्रवाहित उनके अंतर्मन की भावनाओं में डूबने का सुअवसर भी मिल गया । “तुम क्या सूरज हो ?’’

पहली ही रचना प्रश्न से प्रारम्भ, उत्तर भी साथ लिए । 

माटी के पुतले न कर इतना अभिमान !!!

सुन्दर !!

एक छत के नीचे पूरा परिवार एक ही कमरे में । अपार सुख और तनाव क्योंकि अलगाव न था, दूरी न थी । अकेले रह जाने का भय न था । रिश्ते में पक्के थे, दौलत से भले ही कुछ कच्चे थे । 

द्वापर जैसी भूल हुई । 

कभी-कभी तो लगता है कि पाश्चात्य का अनुकरण दोषी है कह कर अपना बचाव करने वाले भूल बैठे हैं कि हम अतीत में क्या थे । शून्य दिया गौरव की बात है किन्तु अंगूठा माँगने वाले गुरू, माधवी-गालव व उनके गुरू-पिता के चरित्र कौन से आदर्श और अनुकरणीय हैं । हम उन्हीं के वंशज ही तो हैं । उन्हीं से सीखी है 

दुश्चरित्रता । वेलेण्टाइन डे का सुन्दर नवीन दृष्टिकोण वाला दृश्य । 

सुनो जब तुम मकान बनाओ —-

महिला ही सोच सकती है कि आँगन हों ,पौधे हों सूरज-चाँद उगे, आँगन में । हँसने का कोना हो, विपरीत परिस्थितियों में भी । प्रशंसा के दो शब्द हों, झूठे ही सही । 

बहुत ख़ूब !!!!! 

बेहतरीन रचनाएँ !

बहुत-बहुत बधाई एकता जी आपकी सोच आपकी संकल्पना के लिए । बहुत-बहुत आभार!!

डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’

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पाठक प्रतिक्रिया

सुश्री पुष्पा श्रीवास्तव शैली

प्रयागराज, मो. 7007016612


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804


अमीरन (उपन्यास) : एकता अमित व्यास 

तुम प्रेम में सधे तो

एक बार मुझसे कहते,

अंजुरी का रेत फिर से

जाकर समंदर बनता । 

उपन्यास से ही चलो जिंदगी के फलसफे में ढूंढते हैं, कोई लंबा व गोल रास्ता, जिनमें छुपे हो सच्चे संबंध, साथ निभाने के वादे और प्यार की सौगातें । 

दौड़ती हुई अमीरन शायद ऐसी ही डोर को पकड़ने के लिए भागती है जिसमें उसकी खुशियों के कुछ फूल उलझ गए हैं । एक ऐसा उपन्यास जो मन के हर पड़ाव पर एक नई डोर पकड़ने को उद्धत होता रहा । 

पार्क में दौड़ती हुई अमीरन से जब लेखिका की मुलाकात होती है तो बेपरवाह सी अमीरन अपने जीवन का एक एक पृष्ठ खोलती है । लेखिका के साथ साथ पाठक का भी मन उसकी अगली कहानी को सुनने का जिज्ञासु बनता जाता है । अमीरन एक शांत समझदार गृहिणी और साथ साथ पति के कारोबार में सहयोग करने वाली जागरूक महिला है । स्कूल टीचर दिव्या का उसके पति के जीवन में बच्ची सिया के माध्यम से प्रवेश उसे ठीक नहीं लगता, लेकिन वह सब देखते हुए शांत रहती है । पति की इस नई मित्रता को न तो वह नकार पाती है और न ही स्वीकार कर पाती है । गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने लगती है । बेटी सिया का भविष्य भी अंधेरे में जान पड़ता है । 

स्वार्थ पूर्ण प्रेम के वशीभूत दिव्या और उसके माता पिता भी परोक्ष रूप से दिव्या का ही साथ देते हैं । 

किसी की बसी बसाई गृहस्थी को उजाड़ना उन्हें कहीं से गलत नहीं लगता । पति आकाश स्कूल टीचर की भोली बातों में बंधते जाते हैं । अमीरन को बिना बताए सिया की पढ़ाई को लेकर कुछ अहम फैसले भी ले लिए जाते हैं । फिर भी अमीरन कुछ नहीं बोलती । पति की इज्जत को ध्यान में रखकर वह सब समझते हुए भी शांत रहती है । 

दिव्या और पति आकाश को लेकर ढेर सारे संशय के सर्प मन को चोटिल करते हैं, लेकिन पति पर अटूट विश्वास सर्पों के दंश को महसूस नहीं होने देते । लेखिका ने बड़े करीने से स्वार्थ पूर्ण प्रेम और समर्पित प्रेम के बीच की यात्रा को परिभाषित किया है । उपन्यास की बुनावट में कहीं भी शिथिलता नजर नहीं आती । अनावश्यक रूप से पाठक को रोकने या उलझाने का कोई प्रयास नहीं किया गया । पूरी यात्रा में पाठक की जिज्ञासा की प्यास शांत नहीं होती । यह उपन्यास की सफलता है । 

अवनी के माध्यम से दिव्या के मन में महत्वकांक्षा के साथ उपजा प्रेम जो अंत में मानसिक बीमारी और अवसाद के रूप में परिलक्षित होता है । उपन्यास से ही* पृष्ठ संख्या*138

"मैम आपका शादी करने का मन नहीं हुआ?

आपने अभी तक शादी के बारे में नहीं सोचा । 

थोड़ी देर के लिए दिव्या मैम शांत रहीं । 

फिर पता नहीं उन्हें क्या हुआ वे जोर जोर से रोने लगी । "

थोड़ी देर बाद मैम ने बोलना शुरू किया । कुछ साल पहले अपनी एक स्टूडेंट के पिता से मैं शादी करना चाहती
थी । 

पृष्ठ संख्या 139

चार पांच साल तक कोशिश करने के बाद भी वह आदमी टस से मस न हुआ । पता नहीं कैसे संस्कार दिए थे उसकी मां ने "मोबाइल पर फोटो दिखाने के बाद मोबाइल दीवार पर फेंक देती है दिव्या । " बहुत देर तक रोते चिल्लाते आस पास की वस्तुओं को फेंकना ,दिव्या के अवसाद की बिगड़ी स्थिति का बयां करते हैं । 

उपन्यास की इस यात्रा में अगला किरदार जो आकाश के रूप में है । आकाश का चरित्र बहुत साफ सुथरा तो नज़र नहीं आता । पत्नी और बच्ची से बेपनाह मुहब्बत करने वाला कैसे किसी के आकर्षण पाश में बंध जाता है,नागवार गुजरने वाली बात पर विरोध न जता पाना कौन सी समझदारी का परिचय है । यहां पर चुप रहने का खामियाजा आकाश को अपनी गृहस्थी की नींव को हिला देने जैसे संत्रास के रूप में झेलना पड़ता है । 

अमीरन बीमार रहने लगती है,बच्ची सिया खुद को अपनी उम्र से बड़ा समझकर कुछ जिम्मेदारियां उठाने लगती है । स्वयं आकाश भी अपनी मानसिक स्थिति को संयत नहीं कर पाते । अमीरन आज भी पति से बेपनाह प्यार करती है, क्योंकि उसके प्यार में स्वार्थ नहीं है । वह अपने प्यार के लिए प्यार को भी छोड़ देने का जज्बा रखती है । 

लेकिन टूट जरूर जाती है । 

"किसी के प्यार में ही

टूट कर यूं ही बिखर जाना । 

करोगे टूट कर जब प्यार तो,

आ जाएगा समझ में । "

उपन्यास की यात्रा अपने आखिरी छोर पर है । लेखिका ने टूटती हुई अमीरन में दुबारा आत्मविश्वास की लौ को जलाने का कार्य किया । अमीरन की कहानी कहने को तो समाज में घटित होने वाली कुछ कहानियों में से एक अवश्य होगी, लेकिन ऐसी कहानी के दर्द को जीना आसान नहीं होता । अमीरन की वह अवस्था जब पति बिना कुछ पूछे बिना कुछ बताए स्कूल टीचर के घर वालो के लिए ढेरों खरीददारी करते हैं,अमीरन को तब पता चलता है जब दिव्या के घर जाकर एक एक को गिफ्ट बांटते हैं । आश्चर्य के साथ अमीरन के मन में अनेकों अंतरद्वंद छिड़ जाते हैं । 

मन अनमना है लेकिन मन को मनाना है । ऐसी स्थिति को अमीरन जी रही है । इस स्थिति को लेखिका ने बड़ी बारीकी से स्पष्ट करने का प्रयास किया । अमीरन को आज भी अपने पति से पहले की तरह ही प्यार है । लेकिन वह व्यथित भी है । "अगर कोई प्रेम संबंध नहीं था तो कम से कम जब इतनी विकट परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई थी तो सामने से कहते, ये क्या कोई कुछ भीआकर कहता रहेगा और हम सुनते रहेंगे । कम से कम कोई तो कदम उठाते । जिससे मेरे मन को तसल्ली हो जाती कि तुम्हारी तरफ से अगर कुछ नहीं था तो हमारे रिश्ते में ये दूरी और औपचारिकताएं तो न आती । " पृष्ठ 141

अंत में उपन्यास एक सामाजिक उपन्यास होते हुए ढ़ेर सारे अंतरद्वंद्व के साथ प्रेम के उस द्वार पर आवाज देता है जहाँ पर एक चीत्कार की ध्वनि सुनाई पड़ती है । एक प्रेम जो स्वार्थ के रथ पर सवार है लेकिन अधूरे सफर की तपिश में जल गया । दूसरा प्रेम जो समर्पण का बहाव है,लेकिन दूसरे के द्वारा फेंके गए पत्थरों ने मार्ग अवरूद्ध कर दिया । दोनों में यहीअंतर है कि समर्पण का बहाव थमता नहीं , अनवरत जारी है । 

निश्चित ही अमीरन अपनी कसावट के साथ सफलता के चरम की ओर है । लेखिका एकता अमित व्यास जी को असीम शुभकामनाएं एवं ढेरों बधाइयां । 

शुभेच्छु

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आज मंच पर आदरणीया एकता अमित व्यास जी की रचनाएं 

लगी हैं । बहुत प्रभावशाली परिचय और विनम्र शिष्ट मृदुभाषी व्यक्तित्व की स्वामिनी एकता जी की सभी रचनाएं भाव और शिल्प की दृष्टि से अत्युत्तम हैं । 

भाषा सीधी सहज सरल और दिल को छूती हुई है । 

सुनो जब तुम मकान बनाओ उसमें एक कमरा मेरा भी बनवा देना रचना हम सब के मन की गहरी छिपी आशा है, जिसे आपने खूबसूरती से अभिव्यक्ति दी । 

हार्दिक बधाई आदरणीया एकता अमित व्यास जी 

शकुंतला मित्तल

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आज पटल पर बहुत ही विनम्र, मिलनसार एवं सौम्य व्यवहार वाली आ. एकता अमित व्यास जी की रचनाएं लगी हैं । 

सभी रचनाए एक से बढ़कर एक है ।

सभी विषयों को चाहे वेलेंटाइन डे का तोहफा या सुनो जब तुम मकान बनाओ प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा को बहुत ही सरल और सहज भावों से पंक्तियों में पिरोया है वही दूसरी ओर तनया तार -तार हुई में इतिहास में हुए नारी पर अत्याचार को वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में बखूबी से पिरोया है ,जो सीधे पाठकों के हृदय को छूती है । 

हार्दिक बधाई आ. एकता अमित व्यास जी.....

रेणु मिश्रा

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समीक्षा

श्री विजय कुमार तिवारी



सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

''अमीरन'' उपन्यास में एकता अमित व्यास की उलझने और उड़ान

उपन्यास ''अमीरन'' के वाचन व समीक्षा लेखन में मेरा पुरोवाक्.......

अभी-अभी सभ्या प्रकाशन, नई दिल्ली के उम्रदराज प्रकाशक देवेन्द्र कुमार बहल जी के फोन ने चिन्तन-मनन की अर्ध-निद्रा से मुझे जगा दिया है । 80 वर्षों से अधिक उम्र वाले प्रकाशक का, अपने यहाँ से प्रकाशित पुस्तक और उसकी लेखिका एकता अमित व्यास के प्रति स्नेह व प्रेम के भाव ने मुझे प्रभावित किया है । संवाद करते समय लगा, वह विह्वल हो रहे हैं, उनकी आवाज में कंपन है और उन्होंने अपना सब कुछ मानो समर्पित कर दिया है । आज की निष्ठुर और व्यावसायिक दुनिया में ऐसे भाव, विरले ही देखने को मिलते हैं । हृदय पूर्वक उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए, मैंने पढ़ डालने व कुछ लिखने के विचार से ''अमीरन'' उपन्यास को अपने हाथों में उठा लिया है । आवरण पृष्ठ पर एक पेंसिल है और उसके उपर रेखाचित्र के बीच दो गहरी आँखें हैं । मेरे लिए तनिक मुश्किल है, उन की भाव-भंगिमा या चिंतन को समझना । बस इतना ही समझ पा रहा हूँ, ये आँखें कुछ कहना चाहती हैं । जो कहना चाहती हैं, वह शायद इस उपन्यास में होगा, इसलिए पढ़ना शुरु कर रहा हूँ । दरअसल महीनों पहले किसी दिन उनका फोन आया था, हमारी लम्बी बातचीत हुई और हम एक-दूसरे से परिचित हुए थे । उनके विचारों ने आकर्षित किया था । यह दुनिया अपने लिए बेचैन रहती है, स्वार्थ में लगी रहती है और नाना तरह के प्रपंच करती रहती है । उन्होंने मुझसे दूसरों के लिए संपर्क किया और विस्तार से बहुत कुछ बताया । वह जिस महिला उपन्यासकार की बात कर रहे थे, वह एकता व्यास जी ही हैं । 

8 जून को सुबह-सुबह तीन साहित्यिक पुस्तकें मुझे प्राप्त हुई, इन्हें बहल जी ने ही प्रेषित किया था । वह प्रकाशक भी हैं और संपादक भी । उनकी पत्रिका लगातार निकल रही है । पहली पुस्तक ''परिवेश मन और साहित्य'' त्रिलोक चन्द तुलसी द्वारा लिखा हुआ कोई शोध ग्रन्थ है । सभ्या प्रकाशन से निकलने वाली शायद यह प्रथम पुस्तक है, हार्ड कवर में लगभग 385 पृष्ठों की है और सुरुचिपूर्ण साज-सज्जा के साथ सुन्दर ढंग से प्रकाशित हुई है । निश्चित ही विषय दुरुह और सामयिक होगा । दूसरी पुस्तक उमा त्रिलोक जी के द्वारा लिखी 'एक कतआ अमृता के नाम' है । अमृता प्रीतम को अपने शुरुआती दौर में मैंने भी थोड़ा-बहुत पढ़ा है । फिर से पढ़ते हुए यादें ताजी हो जाएंगी । तीसरी पुस्तक जो उन्होंने भेजी है, वह एकता अमित व्यास जी का उपन्यास 'अमीरन' है जो आजकल खूब चर्चा में है । 

अपने स्वभाव के अनुसार मैंने इन तीनों पुस्तकों के प्राप्ति की सूचना अपने फेसबुक में डाला है और पुस्तक में उपलब्ध फोन नंबर द्वारा युवा महिला उपन्यासकार को सूचित कर दिया है । हमारी बातचीत के आधार पर एकता व्यास ने अपने फेसबुक पर मुझे टैग करते हुए लिखा- ''2024 की 04 जून देश में राजनीतिक उथल पुथल थी, पूरा देश टकटकी लगाए दूरदर्शन और सोशल मीडिया की शरण में था, शाम होते-होते इस उथल पुथल का परिणाम घोषित हो गया । 

पिछले कुछ महीनों से मेरे मन को अवसाद के कोहरे ने ढक रखा था, धीमा किंतु लगातार चलने वाला दर्द-सा महसूस होता रहता था । अनेकों बार मन में विचार आता था, काश़, मैंने ये साहित्य में हो रही राजनीति को देखा और सुना ही ना होता । इसी उधेड़बुन के बीच कल रात कच्ची पक्की सी नींद में सोई और सुबह आलस और थकान के बीच उठी । 

गुजराती मसाला चाय की एक गर्म प्याली और दो ग्लूकोस के बिस्कुट मेरा पहला प्यार है, वैसे भी गुजरातियों का दख़ल मेरे जीवन में बहुत है चाहे वो गुजराती मसाला चाय हो या, पारले जी बिस्कुट और । ख़ैर चाय के कप से उठती भाप और मन के उदास सन्नाटे के बीच फ़ोन की घंटी घन-घना उठी...

एक अनजान नंबर स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पर चमक रहा था, बेमन से ही सही फ़ोन उठाया । सामने से स्नेहिल-सी आवाज़ आयी, आपकी अमीरन मिली……, बड़ी उत्सुकता से इंतज़ार था । 'अमीरन' को जल्द ही पढ़कर कुछ लिख बैठूँगा इस पर, और बातों का सिलसिला शुरू हो गया । 

बातों की गरमाई का असर था या चाय का, नहीं पता, मैंने उस अनजान शख़्स से साहित्य में चल रही राजनीति से उत्पन्न मन के डर को साझा कर लिया और उन्होंने अपने अनुभव से मेरे उस डर को नयी डगर में बदल दिया । 

किसी ने सच ही कहा है साहित्य जीवन का मार्गदर्शन है और साहित्यकार GPS । 

प्रणाम करती हूँ मैं आज के अपने उस GPS को । विजय कुमार जी को किए हुए वादे को मैं पूरी तरह से निभाने की कोशिश करूँगी और अपनी साहित्य साधना में संलग्न रहूंगी, कमल की तरह । 

॥ आपकी अमीरन आपको मुबारक ॥''

एकता व्यास के इन्हीं भावों को दुहराते हुए बहल जी का गला रुँध गया और मुझे भी उनकी जज्बाती भावनाओं ने अपने दायरे में समेट लिया । उन्होंने यह भी सूचित किया कि उनकी पत्रिका का विशेषांक मेरी समीक्षा की प्रतीक्षा में है । 

अब मैं उसी दायित्व निर्वहन में संलग्न होने जा रहा हूँ । 

ऐसा नहीं होता कि केवल अभाव में, संघर्ष में, धोखा खाने या धोखा देने के चलते या मन की पीड़ा में किसी कला का आश्रय लिया जाता है और लोग डूब जाते हैं । तुलसीदास जी 'स्वान्तःसुखाय रघुनाथ गाथा' का आश्रय लेते हैं । अक्सर अपने अनुभवों को लोगों तक पहुँचाने का उद्देश्य जगत-हित ही होता है और विद्वानों ने इस विषय को लेकर बहुत कुछ लिखा है । इस तरह हर लेखन के पीछे लेखक-लेखिका की अपनी परिस्थितियाँ, अपनी भाव-संवेदनाएं, अपना भाव-चिन्तन, अपनी रुझान-उड़ान और अपना संघर्ष होता है । रचनाकार तात्कालिक कथ्य-कथानक व अपनी भाव-संवेदनाओं के अनुसार साहित्य की विधा का चयन करता है और लेखन में लग जाता है । इसमें उसकी स्वायतता है, स्वतंत्रता और अधिकार भी है । व्यापक फलक के कथ्य-कथानक के लिए उपन्यास से बढ़कर कोई और विधा नहीं होती । इसमें जटिलता, दुरूहता, सहजता के साथ-साथ मनोवैज्ञानिकता खूब सार्थक तरीके से उभरती है और लेखक विस्तार से वह सब कुछ कह पाता है जो कहना चाहता है, आसमान में अपनी पूरी उड़ान के लिए पंख पसार लेता है । 

गुजरात में रह रही एकता अमित व्यास ने ऐसी ही उड़ान को शब्द देते हुए ''अमीरन'' जैसा उपन्यास पाठकों को समर्पित किया है । 'मां की जिद-- ' शीर्षक से उपन्यास की भूमिका में उनकी पंक्तियाँ देखिए, उन्होंने लिखा है-''लेखन एक ऐसा कीड़ा है जो थोड़े दिन या साल के लिए कहीं छुपकर, दबकर तो बैठ सकता है, पर मर नहीं सकता । '' यह भी सही है, जब हम कलम पकड़ लेते हैं, हमें सहयोग व मार्गदर्शन मिलता है, भीतर का उत्साह उमड़ने-घूमड़ने लगता है और सृजन-लेखन शुरु हो जाता है । अपने उपन्यास 'अमीरन' को लेकर उन्होंने महत्वपूर्ण बात कही है-''ये कहानी दरअसल काल्पनिक होते हुए भी हम सबकी कहानी है । इस कहानी का एक-एक पात्र हमारे जीवन का पात्र है । '' उनका यह संकेत भी समझने योग्य है, ''ये अलग बात है कि जीवन में कुछ पात्रों की उँगली पकड़कर हमें ताउम्र चलना होता है और कुछ पात्रों की समय रहते तिलांजलि देनी होती है । अगर ये ठीक समय पर समझ में आ जाए तो शायद संसार में किसी अमीरन का जन्म ही न हो । ''

'अमीरन' में अमीरन की कथा सुनाई जा रही है, कहन शैली में और लेखिका अपना दार्शनिक चिन्तन समझाने में देर नहीं करती, कोई सहमत हो या न हो, वह लिखती हैं, ''अंततः हम सब अपने आप में कहीं न कहीं अधूरे हैं और यही अधूरापन हमें भाता है, परिपूर्णता की तलाश करते-करते हम अपने अधूरेपन को पूरे मन से स्वीकार कर लेते हैं । '' कोई पूछे, अधूरापन किसको भाता है? पूछने और स्वयं उत्तर देने की यह शैली ध्यान देने योग्य है-वह दौड़ रही थी, नहीं-नहीं, भाग रही थी । एकता व्यास को चिन्ता होती है, लिखती हैं, किससे भाग रही है-अपने अतीत से, अपने घर से, अपने दोस्तों से या अपने पागलपन से । अरे, वह गुनगुना रही है, वह भी पूरी की पूरी कविता । उनको महसूस होता है, उसका तिलस्म से भरा चरित्र है । अमीरन सीधा-सपाट उत्तर देती है-''मेरी शर्त लगी है इस दुनिया के साथ और मुझे हार बर्दाश्त नहीं । '' अमीरन बताती है, मैं स्वयं को थका देना चाहती हूँ ताकि सो सकूँ, अपने ही घर में मुझे डर लगता है, मेरी कार कई बार दुर्घटनाग्रस्त हो चुकी है और मैं जिंदा हूँ । एकता व्यास का दार्शनिक चिन्तन फिर जोर मारता है, लिखती हैं, ''जब आप अकेले, कमजोर और डरे हुए होते हैं तब आपका साया भी साथ छोड़ देता है । '' उसकी एक और समस्या है, ''मां एवं बहनों को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है । उनके लिए तो मैं बस एक मौका हूँ जिसे वे पूरी तरह भुना लेना चाहते हैं । '' अब तक पाठकों को समझ जाना चाहिए, एकता व्यास स्त्री-विमर्श में उलझे बिना स्त्री-मनोविज्ञान की कड़ियों को जोड़ने और किसी गहन सामाजिक गुत्थी को सुलझाने वाली हैं । 

एकता व्यास का अपना अंदाज कम रुमानी नहीं है, उन्होंने उद्यान के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन तो किया ही है, उसके सम्मोहन को लेकर लिखती हैं, ''ऐसे सम्मोहन से तो मेरे जैसी अनुभवी कामकाजी महिला भी नहीं बच सकी तो पुरुषों का क्या हाल करती होगी ये अमीरन!'' उन्होंने उसके सौन्दर्य वर्णन में बहुत कुछ लिखा है, अवश्य ही उनके भीतर कोई पुरुष मन की चाह जाग रही होगी । पूछने पर अमीरन कहती है, ''मेरे डर की वजह है । यह वजह हमारे समाज में चारों ओर विचरती रहती है । '' वह सलाह देती है, ''बड़ी बारीकी से अपने घर का हर कोना देखना, घर में रहने वाले लोगों के मन में झाँकना । '' वजह के विस्तार और प्रभाव का दृश्य चित्रित करना, उसका अनुभव और ज्ञान दर्शाता है । वजहों का हर किसी के जीवन में प्रवेश की पूरी प्रक्रिया समझाते हुए उसने कहा, ''ये मुसीबत मेरे घर में भी आयी थी, मेरे सुखी संसार को मुझसे छीनने । '' एकता व्यास कहानी विस्तार करते हुए हास्य, व्यंग्य व रुमानी अंदाज का सहारा लेती हैं और कहानी के भीतर कहानियाँ बुनते चलती हैं । यहाँ से बेटी की स्कूल शिक्षिका दिव्या मैम व उनके घर वालों का उसके जीवन में प्रवेश होता है । 

एकता अमित व्यास ने अमीरन के जैसे सम्भ्रान्त परिवार में दिव्या मैम जैसी स्कूल टीचर के घुल-मिल जाने और सहजता से जगह बना लेने को बारीकी से बुना है । पति आकाश व परिवार के लोगों के आगे बहू का मौन रह जाना, आकाश का बिना सलाह लिए सारा निर्णय लेना और स्वभाव के विपरीत परेशानी झेलते हुए दिव्या के परिवार से जुड़ते जाना, खूब उपहार आदि देना किसी को भी सावधान हो जाना चाहिए । ऐसे में संयोग भी बनते हैं जो स्थितियों को बिगाड़ने में सहायक होते जाते हैं । हर-एक प्रसंग को स्वाभाविकता के साथ उन्होंने चित्रित किया है । पारिवारिक मनोविज्ञान का उनका ज्ञान और ऐसे पात्रों का चरित्र-चित्रण उनकी समझ का प्रमाण है । अमीरन का यह कहना भावुक करने वाला है-''मैं कब उनकी खानसामा बन गई, मुझे तो पता ही नहीं चला । '' आगे कहती है- ''दिन पर दिन मैं अपना आत्मविश्वास खोती जा रही थी । ''

अमीरन बताती है, ''वापसी के बाद पति का ठंडा व्यवहार और खिंचे-खिंचे रहना मुझे समझ नहीं आता था । उनका पचासवाँ जन्मदिन मनाने को लेकर भी वही ठंडा रवैया था । बेटी सिया की इच्छा थी, हम दोनों अहमदाबाद जाकर दिव्या मैम के घर में जन्मदिन मनायें । 

वैसे तो उपन्यास का आँगन बड़ा व विशाल होता है जिसमें बहुत से प्रसंग, घटनाएं, विविध चरित्र, जीवन की व्याप्तियाँ समाहित होती हैं परन्तु 'अमीरन' की शैली ऐसी है जो उत्सुकता बढ़ाती जाती है । इसमें खास तरह का प्रवाह है । यहाँ विशेष तरह की उत्सुकता है, प्रश्न हैं और उनके उत्तर रोचक तरीके से बाँधे रहते हैं । वक्ता-श्रोता के बीच कहानी चल रही है । श्रोता का मन तनिक खिलंदड़ है, वह हास्य, व्यंग्य, रूमानियत व चिन्ता के साथ जुड़ी हुई है, हँसती-हँसाती है और कभी-कभी डराती भी है । 

यहाँ लेखिका का देखने-समझने का अंदाज तनिक एकपक्षीय लगता है, उसे समस्याओं के लिए दिव्या, उसका परिवार या उनके विचार लगते हैं, वह आकाश को लेकर कम सोचती है । अमीरन के शांत व सहज चरित्र का चित्रण अच्छा हुआ है । ऐसे हालात में जो संभव होता है, लेखिका ने खूब लिखा है । अमीरन को आश्चर्य होता था, दिव्या आकाश से कभी सीधी बात न करती थी, उसके भाई या माता-पिता करते थे, परन्तु होता वही था, जो वो चाहते थे । एकता व्यास स्त्री के स्वभाव को लेकर प्रश्न करती हैं और दिव्या के घर के वातावरण पर प्रकाश डालती है-कैसा परिवार है जिसके अपने कोई आदर्श नहीं है? बतौर श्रोता उनकी यह सोच समझने योग्य है, वह कहती है-''हम कितने भी पढ़-लिख जाएं, माडर्न हो जाएं, हमारे अंदर व्यावहारिक समझ क्यों नहीं जन्म ले पाती । '' उलझन भरे प्रसंगों का जीवन्त चित्रण उनकी समझ का परिचायक है । ऐसा भी हो सकता है, उन्होंने इन पात्रों को अपने आसपास देखा हो या उन आँचों से थोड़ा-बहुत स्वयं झुलसी हों । वह इंसानी फितरत को सहजता से स्वीकार करती हैं । 

यदि कोई स्वयं आग की ओर जाना चाहे, उसे उस आँच से कोई कैसे बचा सकता है । हमारी अपनी भी कोई कमजोरी होती है, वरना दूसरा कैसे हमारे जीवन में घुसपैठ कर सकता है । कभी-कभी हमारी अति-उदारता, हमारा अति-विश्वास भी हमारी परेशानियों के कारण बनते हैं । एकता व्यास जीवन की खुली आँखों दिखाई दे रही परिस्थितियों को खींच-खांच कर विस्तार देती हैं । महत्वपूर्ण यह भी है, अमीरन लगातार समझौता करती हैं और दूसरा पक्ष हावी होता जाता है । आकाश भी कुछ नहीं कहते । परिस्थितियाँ साथ नहीं देती और सोचा हुआ कुछ भी नहीं हो पाता है । एकता व्यास बार-बार लिखती हैं, जब सब कुछ व्यवस्थित होता दिखाई देने लगता है, कोई नई समस्या खड़ी हो जाती है । सिया का चरित्र, व्यवहार, पसंद-नापसंद, उसका पिछड़ना-सम्हलना आदि को लेकर उन्होंने बाल-मनोविज्ञान का सुन्दर चित्रण किया है । पंडित रविशंकर के 'आर्ट आफ लिविंग' वाला प्रसंग बहुत ही रोचक और ज्ञान बढ़ाने वाला है । अमीरन को जडेजा भाभी का संदेश विचलित करने वाला है-''अपना घर सँभालो बहन, कई बार मैंने दिव्या को तुम्हारी बेटी और उसके पापा के साथ देखा है । बाकी तुम खुद समझदार
हो । '' कहानी टुकड़ों-टुकड़ों में आगे बढ़ रही है, वह माईग्रेन से पीड़ित रहने लगी है और बताती है-हजारों मनमुटाव और दूरियों के बीच समय गुजर रहा था । 

एकता व्यास का यह उपन्यास समाज की आँखें खोलने वाला है, आज हमारी सभ्यता-संस्कृति दूषित होती जा रही है क्योंकि भोगवादी प्रवृत्तियाँ घुसपैठ कर रही हैं । इस उपन्यास का कथानक कोई क्रान्तिकारी नहीं है, परन्तु विषय का क्रमवार निरुपण चकित करता है और चकित करता है उनका शान्त होना, मौन रहकर परिस्थितियों को झेलना । अमीरन बार-बार सोचती है-ऐसे में आखिर क्या करूँ?

एकता व्यास प्रकृति, मौसम, हरियाली से भरे उद्यान और फूलों से प्रेम करने वाली हैं । वह अपने आसपास को बड़ी बारीकी से निहारती हैं, चित्रित करती हैं और सुकून पाती हैं । संभवतया यह उपन्यास सत्य घटनाओं की प्रतिक्रिया स्वरुप लिखा गया है । अमीरन जैसा चरित्र और उसका मौन, संकेत दे रहा है, कोई ज्वालामुखी फूटने वाला है और प्रतिक्रिया स्वरुप निकल रही भड़ास स्वाभाविक और यथार्थ है । वह अपने पति से सीधे पूछती है-''क्या आप सचमुच दिव्या को पसंद करते हैं?'' वह प्रेम हो जाने को स्वाभाविक मानती है परन्तु ऐसा नहीं हो सकता कि घर में पत्नी भी रहे और बाहर गर्लफ्रेंड भी । एकता व्यास ऐसे हालात में लिपा-पोती के उपदेशों की चर्चा करती हैं और कोई समझौता करना नहीं चाहती । वह सलाह लेती हैं परन्तु समझ जाती हैं कि इस मुसीबत से मुझे अकेले ही निपटना पड़ेगा, कोई मेरा साथ नहीं दे सकता । वह तय करती है-‘’खुद को मजबूत बनाना है, अब रोना नहीं है और नए सिरे से सब कुछ शुरु करना है । ‘’ एकता व्यास लिखती हैं-''इस दौरान सिया में कई परिवर्तन आ रहे थे । बारह साल की बच्ची अचानक ही बहुत बड़ी हो गई थी । सच में बेटियाँ बहुत जल्दी अपनी मां की भी मां बन जाती हैं । ‘’

इस उपन्यास में अति वैयक्तिकता है, लाचार व कमजोर परिस्थितियाँ हैं जो अमीरन के व्यक्तित्व को समय रहते उभरने नहीं देती । आकाश के प्रति उसका विश्वास या गहरा प्रेम आड़े आ जाता है और वह खुलकर विरोध या रौद्र रुप धारण नहीं कर पाती । वह संस्कारी स्त्री के आवरण से मुक्त नहीं हो पाती और शायद इस विश्वास में जीती है-''सब कुछ ठीक हो जायेगा । '' साथ ही वह महसूस भी करती है-''कहीं न कहीं हमारा वैवाहिक रिश्ता दरकने लगा है । विश्वास की डोर पतली व कमजोर होने लगी है । '' उसने तय कर लिया, ''अब यहाँ नहीं रहना है । ' वह ईश्वरीय शक्ति में विश्वास करती है, 'आर्ट आफ लिविंग' संस्था और गुरु रविशंकर से जुड़ी हुई है । आस्थावान के आस्था की रक्षा ईश्वर करता ही है । आकाश के दोस्त मदद करते हैं और मदद का विश्वास देते हैं । यह भी सही है, यदि आपका कोई एक विरोधी है तो वहीं आपके चार सहयोगी भी मिलते हैं । एकता व्यास देश की महिलाओं को लेकर लिखती हैं-''महिलाएं जी-तोड़ मेहनत करती हैं, पर आर्थिक जागरूकता के मामले में कमजोर होती हैं, फिर बाद में धोखा खाती हैं । '' अमीरन को यह भी समझाया जाता है--''कीचड़ में पत्थर फेंकोगी तो कीचड़ तुम्हारे उपर ही उछलेगा । '' कदम-कदम पर उसे अच्छे लोग मिलते हैं और सहायता करते हैं । गुरुदेव रविशंकर के आगे वह रो पड़ती है-''गुरुदेव एक परिवार है जो मुझे परेशान कर रहा है । '' उनका आशीर्वाद मिलता है-''तुम्हें कोई परेशान नहीं कर सकता । '' एकता व्यास विश्वास पूर्वक लिखती हैं-''सद्गुरु अगर जीवन में हैं तो किसी भी तरह की तकलीफ आपको लम्बे समय तक परेशान नहीं कर सकती । '' लेखिका का सद्गुरु को लेकर विचार समझने योग्य हैं । 

एकता व्यास हर कदम पर नैतिकता को लेकर प्रश्न उठाती हैं और लोगों के जीवन में नैतिकता की तलाश करती है । हमारे समाज में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व को बढ़ा- चढ़ाकर दिखाया जाता है । वह लिखती हैं-''हमारे देश में अंग्रेजी को कभी भी भाषा के रुप में तो स्वीकार किया ही नहीं गया । इसे हमेशा एक स्किल के रुप में स्वीकार किया गया है । '' अंग्रेजी बोलने वाले को श्रेष्ठ समझने की भावना से वह सहमत नहीं हैं । उनका जोर जीवन की गुत्थियों को सुलझाने में लगा रहता है, लिखती हैं-''हालात जितने संभलते जाते थे, मन उतना ही बिखरता चला जाता था । '' ऐसी अभिव्यक्तियाँ कोई परिपक्व मन ही कर सकता है । उपन्यास यह भी संदेश देता है, जीवन में सफलता है, सुख है तो असफलता, दुख व हानि भी है । रिश्तों में सबसे अच्छा रिश्ता दोस्ती का है । 

सब कुछ के बावजूद अमीरन के भीतर अवसाद गहरे तौर पर जड़ें जमा चुका है, वह लिखती है-''मेरे अंदर कुछ मर गया था जो मुझे खुश नहीं होने देता था । '' एकता जी सामाजिक अनुभव की सच्चाई बताती हैं-''जब सम्बन्धों में दूरी आने लगती है तो मजाक भी चुभने लगता है । '' अमीरन को नींद नहीं आती । वह बैठे-बैठे रोने लगती है । उसके साथ दुख बाँटने वाला कोई नहीं है । एकता व्यास संदेश देना चाहती हैं और कहती हैं, डाक्टर के प्रश्न को सभी को समझना चाहिए, वह पूछता है-''आप अपने लिए क्या करती हैं?'' अमीरन और डाक्टर के बीच का सारा संवाद हर किसी के जीवन में सहायक हो सकता है । 

हमारा समाज ऐसा ही है, दुख या अवसाद में पड़े हुए व्यक्ति से दूरी बनाने लगता है । कुछ साथ भी देते हैं और सहायता करते हैं । उन्होंने अपने पूरे उपन्यास में समाज को लेकर, लोगों के व्यवहार-विचार को लेकर खूब लिखा है और उसके सुधार पर भी चर्चा की हैं । उनके चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है, लिखती हैं-''ये बात मेरे डाक्टर मुझे अच्छी तरह समझा चुके थे कि जिन्दगी में लौटने का रास्ता सिर्फ मैं जानती हूँ । उस रास्ते पर मुझे अकेले चलना होगा । ‘’ अमीरन डाक्टर की सलाह मानती है, जीवन में सक्रिय होती है । एकता व्यास सारा रहस्य, सारी सच्चाई उजागर करती हैं और यह संदेश देती हैं कि हर व्यक्ति को सावधान होना चाहिए, आत्मविश्वास रखना चाहिए और प्रयास करना चाहिए । बच्ची को लेकर उनकी चिन्ता सशक्त तरीके से उभरी है और मां-बेटी के बीच के रिश्ते का मनोविज्ञान भी । इसकी विषय-वस्तु, इसका कथानक आदि सब कुछ समझने के लिए हम सभी को ‘अमीरन’ पढ़ना चाहिए । इसकी भाषा-शैली प्रभावित करने वाली है, पात्रों का चरित्र चमत्कृत करता है, दृश्य बाँधते हैं और पाठक कहीं खोया व उलझा हुआ है अमीरन के संकल्पों में । 

समीक्षित कृति अमीरन (उपन्यास)

उपन्यासकार : एकता अमित व्यास

मूल्य रु 400/-

प्रकाशक सभ्या प्रकाशन, दिल्ली

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समीक्षा

सुश्री मंदाकिनी रामेश्वर कमला

एडवोकेट, प्रकाशित लेख –कच्छ मित्र दैनिक समाचारपत्र, अखंड आनंद मासिक पत्रिका, प्रबुद्ध जीवन, 

Email : mandakini4rk@gmail.com, मो. 9978001919


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804


अमीरन (उपन्यास) 


एकता व्यास का यह उपन्यास अमीरन एक अनाम महिला की कहानी है । लेखिका ने इसका नाम अमीरन रखा और अपने पहले उपन्यास को भी यही नाम दिया । लेखिका ने प्रस्तावना में ठीक ही कहा है कि जब आप इस उपन्यास को पढ़ोगे तो इन पात्रों की उपस्थिति आप अपने जीवन में पाओगे । तो यह हमारी या हमारे आस-पास की स्त्रीओं की कहानी है । 

कहानी की शुरुआत एक खूबसूरत सुबह के साथ ओडा उद्यान के सजीव वर्णन से होती है । इसे पढ़ते ही आपको प्रकृति की सुंदरता, ऊंचे-ऊचे  पेड़, चंपा की खुशबू, गुलाबी फूलों की सजावट और पैदल पथ के दोनों ओर दो छोटे-छोटे मैदान दिखाई देने लगते हैं । पेज 10 पर बहुत सुंदर उपमा दी गई है कि “ जैसे जंगलोकों गिफ्ट रेप करके शहर के बीचोंबीच लाकर रख दिया हो । “ 

बगीचे का विश्रामपद अनुभव के साथ अमीरन को देखा वो दौड़ रही थी । पेज 10 नं पर ही लेखिका सोचती है कि ” वो दौड़ रही है या भाग रही है? “ खुद ही जवाब देती है “ भाग रही थी शायद अपने अतीत से या अपने घर से या अपने दोस्तो से या अपने पागलपन से । “ हालांकि सुबह के बगीचे में उम्र और शारीरिक क्षमता के अनुसार धीमी या तेज दौड़ना, चलना जैसे कई व्यायाम होते हैं । जो बिल्कुल सामान्य हैं । किसी ऐसे व्यक्ति से उसकी गति के बारे में सवाल करना असामान्य है, जिसे आप नहीं जानते । मुझे इसका जवाब मिला उपन्यास के अंत में पेज न. 148 पर । “ उसे दौड़ते हुए देखने पर उसका उत्साह और सेहत के प्रति ईमान के मद्देनजर मेरी जिज्ञासाएँ मुझे उकसाने लगी, मेरा जीवनके प्रति दृष्टिकोण और मनोविज्ञान में दखल मुझे झिंझोड़ रहा था कि अमीरन की सैर और संवाद की मैं हिस्सेदार बनूँ और उसकी सैर और दौड़ के उन्माद से वाक़िफ हो सकूँ । “ जो की अमीरन की लेखिका एक पढ़ी-लिखी कामकाजी महिला है, फिर भी एक बिल्कुल अजनबी उससे खुले दिल से बात करे ये उत्सुकता से ही प्रेरित है । लेकिन कभी कभार ऐसा भी होता है । 

इसके अलावा, पहली बार जिसको देखा वो अमीरन क्यों अपनी ऑडी कार को पार्किंग से दूर लगाकर वो यहाँ भागने चली आती है? पाठक को यह पता नहीं चल सका कि उसने इसे पहले दिन कैसे दूर पार्क हुई गाड़ी को देखा और उसे कैसे पता चला कि यह ऑडी की स्वामिनी है ? और इतनी जल्दी पहले ही दिन अमीरन नाम रखा वो समझ के बाहर है । 

कोई भी अंजान व्यक्ति कौन सा गाना गा रहा है, इसके बारे में उत्सुक होना और शब्दों को पकड़ने के लिए पीछे जाना वो बात कुछ हज़म नहीं होती है और यह गीत के शब्दों से सोचना कि अमीरन परेशान है, मेरी समझ से परे है । आम तौर पर बगीचे  में कोई बात कर रहा है, कोई मोबाइल सुन रहा है, गाना गुनगुना रहा है, यह हर जगह देखा जाने वाला एक आम दृश्य है । 

हालाँकि, लेखिका के इस पहले प्रयास पर विचार करें तो जिस तरह से कहानी न केवल कहानी के रूप में है बल्कि दो पात्रों के बीच संवाद और कहानी के वर्णन में भी एक अनूठी अंतर्दृष्टि दर्शाती है जो वास्तव में सराहनीय है । तो ये था अध्याय एक । 

अध्याय 2 कहानी की नींव रखने का काम करता है जो दोनों के बीच संवाद जिसके माध्यम से कहानी आगे बढ़ती है । जिसमें अमीरन अपना दिल खोलकर अपने दर्द, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करती है, भले ही वह पहली बार मिली हो । जो मुझे गीता के अर्जुन कृष्ण की याद दिलाता है. जिसकी शुरुआत अर्जुन की उलझन से होती है । 

अध्याय 3 से वास्तविक रूपसे कहानी शुरू होती है । जिसमें अमीरन को बिल्कुल भोली, डरपोक और नासमझ दिखाई गई है । इसके अलावा वह बेहद धैर्यवान, शांत और बिना किसी को अपने मन की बात बताए खुद को डिप्रेशन में धकेलने वाली महिला हैं । अमीरन ज्यादातर भारतीय महिलाओं का प्रतिबिंब हैं । जिसकी दुनिया, घर, पति, बच्चों में समाहित है । इससे कम कुछ नहीं चलता । जब किसी की कालिख उसकी बसी हुई दुनिया पर पड़ती है ऐसी शंका से भी वह बहुत परेशान हो जाती है जो स्त्रीओं के लिए बहुत गंभीर बात होती है । मानो उसकी दुनिया पर कोई कब्ज़ा कर रहा हो । अमीरन एक ऐसी महिला है जो अपनी भावनाओं या भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कुछ भी किए बिना चुप रहकर खुद पर अत्याचार करती है । 

पेज नंबर 22 की शुरुआत में सिया की क्लास टीचर दिव्या कहानी में प्रवेश करती है । इसका वर्णन करते हुए अमीरन कहती हैं कि “ बातचीत से पढ़ी लिखी संस्कारी महिला लगती थी । उसके चहेरे पर कोई आकर्षण नहीं था पर घमंड की एक अजीब सी छाया उसके चारों तरफ मंडराती रहती थी । चहेरे पर मुहासों के निशान, मोटे-मोटे होंठ उसके स्वभाव मे षड्यंत्र की रूपरेखा खींचते हुए लगते थे । इसमे जल्द से जल्द सब कुछ पा लेने की अजीब सी भूख नज़र आती थी । वो ऐसा हीरा थी जिसकी चमक से आंखे चौंधिया जाएँ और बस उसे देखकर आँखें बंद कर ले । “ ये पूरी कहानी इसी के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग तरह से प्रकट होता है, लेखिका जिस चरित्र-चित्रण को चित्रित करना चाहती है, वह बखूबी गढ़ा गया है । 

दिव्या के घर पर हर बार ठहरना, पति द्वारा सिया को दिव्या के घर भेजना एक के बाद एक होने वाली घटनाएं और अमीरन की खामोशी के आगे पाठक मुखर हो जाते हैं और कहते हैं, 'अरे मुर्ख न बन कुछ तो बोलना सीख । " अपने पति से खुले दिल से चर्चा कर, जो सबसे ज्यादा जरूरी है । ऐसे अनेक अवसरों पर पाठक को भी अमीरन के प्रति यही संवेदनशील अनुभूति होती है, वही लेखिका की सफलता है । 

घटना चाहे प्राकृतिक हो या अप्राकृतिक, कहानी में सबसे महत्वपूर्ण तत्व पाठक का कहानी से तादात्म्य है जो कहानी से जोड़े रखता है । सबकी यह उत्सुकता बढ़ जाती है कि अगला अध्याय क्या होगा । यहां तक ​​कि तीसरे अध्याय के बाद से कहानी ने मेरी भी उत्सुकता बढ़ा दी थी । यह कहानी की कलात्मकता ही है । लेखिका प्रत्येक अध्याय में आगे क्या होगा यह पढ़ने की तलब पैदा करने में सफल रही है । 

लेखिका ने यह बिल्कुल सही कहा है कि “ ये कहानी काल्पनिक होते हुए भी हम सबकी कहनी है या इन पात्रोकी उपस्थिति आपको अपने जीवन में महसूस होगी । 

सबसे प्रभावशाली चरित्र-चित्रण अमीरन के पति का है । अमीरनके आस-पास घटित घटनाएँ ये निश्चित करती हैं कि पति बहुत केयरिंग हैं, अमीरन की सेहत को लेकर चिंतित हैं । पूरी कहानी में अकेले दिव्या के साथ कभी भी कोई व्यवहार या घटना नहीं दिखाई गई है. वह एक चरित्रवान पति की भूमिका निभाते हैं जो अपनी पत्नी से प्यार करता है । हालाँकि, वह अमीरन जितना भावुक नहीं है । अपने प्यार के बावजूद, खलनायिका उस व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाती है और ऐसा कुछ हद तक हर किसी के साथ होता है क्योंकि यह एक सच्ची कहानी है जिसे हम हर दिन अनुभव करते हैं क्योंकि हम अमीरन के साथ भावनात्मक एकजुटता महसूस करते हैं । 

पूरी कहानी में लेखिका ने अमीरन के पति का दिव्या के साथ कभी भी कोई व्यवहार या घटना नहीं दिखाई गई है । अमीरन के पति के चरित्र को थोड़ा रहस्यमय रखकर और अंत में उसे क्लीन चीट देकर लेखिका ने जिस तरह कहानी को सुखद अंत की ओर मोड़ दिया है, उससे हर पाठक ने भी राहत की सांस महसूस की है । कहानी का अंत जिस ढंग से किया गया है, उसने इसे दिग्गज लेखिका की श्रेणी में पक्की जगह दिला दी है. यह आज के युग की मांग है. जहां जिंदगी की कहानी में अचानक मोड़ आता है, चाहे वह प्यार में हो या कुछ और, महिला की हालत बेहद निराशा में डूब जाती है । घर, परिवार और बच्चों का जीवन नष्ट हो जाता है । इसलिए अमीरन एक ऐसा उपन्यास है जो रेगिस्तान में मरुद्विप या खिलता हुआ गुलाब है । 

अमीरन उपन्यास देकर एकता जी ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है । कई बहनों की समस्या के समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है । प्रोत्साहित किया है, मेरी नजर ने जो पाया और मैं समझती हूँ कि लेखिका को भी इस उपन्यास से वो ही अभिप्रेत है जो नीचे दी है । 

हर मातापिता बेटी की शादी से पहले मानसिक रूपसे इतना सजग करें कि कोई भी आपत्ति का सामना वो कुशलता और आत्मविश्वास से करे । 

हरेक महिला आर्थिक स्वावलंबी हो या वो सक्षम हो जिससे मुश्किलों का सामना दृढ़ विश्वास से कर सकें। 

जीवन में कोई भी संबंध में वफ़ादारी की शंका हो तो सावधानी और धीरज से काम लें और सत्य तक पहुचे । 

हर मुश्किल का उपाय होता ही है । कभी जिंदगी जो हमने सोची थी ऐसी ना हो या जीवनसाथी साथ छोड़ना चाहता हो तो भी खुद को हताशा, शारीरिक, मानसिक रूप से बीमार ना होकर इस समस्या से बाहर निकलना ही बहुत जरूरी है । अपने लिए और बच्चों के लिए भी । किसी की भी जिंदगी कोई एक के बिना रुकती नहीं है वो हमेशा याद रखना चाहिए । खुद को इतना बुलंद बनाना ही पड़ेगा । 

बच्चों को पूरा समय देना चाहिए । उसको कहानी सुनाएँ, स्कूल की बातें, मित्रों की बातें ऐसे कई तरह से उनको आपके ही आदि हो जाएँ ये देखना होगा । खास करके सोते के समय कहानी, बातें इत्यादि से साथ बिताने से बच्चे को माँ ही चाहिए । 

कभी दूसरे लोग माँ का नीचा दिखाने के लिए, माँ से दूर करने के लिए माँ की बुराई करके, मेगी, वेफ़र, चौकलेट, गिफ्ट इत्यादि देकर, मीठा-मीठा बोल के बच्चे को माँ से दूर करने की जब कोशिश हो रही हो तब बच्चे को इतनी समझदारी सीखाओ की सही गलत को समझ सके और कोई भी उसको भड़का ना सके । 

ये उपन्यास यही मकसद लेकर आई है । अब कोई अमीरन की तरह दुखी ना रहे । 

“जीवन चलनेका नाम “

अमीरन का उपन्यास एक अमर कहानी है, जो हर उम्र की, हर समय की महिलाओं की कहानी है । इन कई महिलाओंकी सच्ची कहानी को शब्द देकर एकता जी ने अनूठा कार्य किया है । अब आगे भी पाठक इंतज़ार करेंगे आपकी नई उपन्यास की । आशा और अपेक्षा जरूर पूरी होगी । सही बात है ना एकता जी ? 

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समीक्षा

 सुश्री निशा चंद्रा

अहमदाबाद, मो. 96620 95464


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

अमीरन (उपन्यास) : एकता अमित व्यास 

अमीरन (उपन्यास)

लेखिका - एकता व्यास

प्रकाशन-सभ्या प्रकाशन

मूल्य-चार सौ रुपए

एक ऐसा उपन्यास, जो जब तक मेरे हाथ में नहीं आ गया मैं इसके नाम से दिग्भ्रमित होती रही । मुझे यही लग रहा था कि यह उपन्यास किसी अमीरन नाम की मुस्लिम महिला पर लिखा गया होगा । जब मैंने एक दो पृष्ठ पढ़े और और मुझे पता चला कि अमीरन किस चिड़िया का नाम है, मैं विस्मित रह गयी । अमीरन मतलब एक अमीर महिला जिसे हमारी लेखिका ने अमीर दिल वाली महिला होने की वजह से अमीरन नाम दिया । 

यह एकता व्यास जी का पहला उपन्यास है और पहले उपन्यास में ही उन्होंने अपनी रिसती टीसती भावनाओं को पन्नों पर बिखेर दिया है । मॉर्निंग वाॅक पर जाते हुए एक अमीर महिला का गुनगुनाते हुए वाॅक करना, उपन्यास की नायिका का उसका यूँ रोज का भागना-दौड़ना देखना और सोचना कि क्या है उसमें ऐसा जो उसे ,उसकी ओर खींचता है क्या उसका धीरे चलने की जगह भागना ?  या कुछ गुनगुनाते हुए भागते जाना ?  या उसकी सुन्दर मंत्रमुग्ध करती काया ?  कुछ तो था जो उसे मजबूर कर रहा था बात करने को । 

 और वह एक दिन पूछ बैठती है / 'तुम क्या गुनगुना रही थीं और क्यों' / 'तुम इतना तेज क्यों भागती हो  ? ' / 'धीरे नहीं चल सकती क्या  ? '

'सारे सवाल एक साथ ही पूछ लोगी क्या,' वह मुस्कराई । 

' तेज चलती हूँ, ताकि थक जाऊं और सो जाऊँ । सोई नहीं हूँ डेढ़ साल से । '

क्या ?   विस्फारित सी वह उसे देखती रही । 

बस उसके बाद की कहानी सिर्फ और सिर्फ चमत्कृत करती है । एक के बाद एक नए कोष्ठ प्रकोष्ठ खुलते हैं और उस में से कभी झांकता है आकाश, कभी नन्ही सिया और कभी कहानी की मुख्य पात्र दिव्या । कभी कहानी सुनाती अमीरन कभी कहानी सुनती वह । 

सिया की टीचर दिव्या का , उसके पापा के साथ आकर्षण और इस बात में दिव्या के माता पिता का सहयोग । कई बार माता पिता भी इन सब बातों के लिए दोषी होते हैं । बेटी की बढ़ती हुई उम्र और व्याह ना हो पाने की व्यथा में ,उसकी छात्रा के पिता के साथ संबंध बनाने को प्रेरित करना और अपने जाल में फंसा कर उस पर शादी करने के लिए उकसाना । यह बात उपन्यास में बड़ी सहजता से दर्शाई गई है । 

इस उपन्यास के केंद्र में एक नारी है, जिसके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को, लेखिका ने बड़ी बारीकी से छुआ है । अपनी पहचान के लिए लड़ती अमीरन, एक मुक्कमल वजूद की तलाश में,अपनी जिन्दगी के सुनहरे दिनों में निराशा का शिकार हो जाती है । 

अमीरन, सुनो एक बात कहूँ ?  / उसे फ़ुरसत नहीं थी मेरी कोई बात सुनने की ।  / ' मोटा होना गुनाह है क्या ?  / अमीरन की आंखों में मोटे मोटे आंसू थे । / कितनी व्यथा है , इस कथन में । 

 अवसाद से घिरे मन का स्व-उपचार ,जैसे पेड़ लगाना,संगीत सुनना ,योग और ध्यान में डूब जाना,फूलों से बातें करना ,इतने सुन्दर भाव से लिखा गया है कि मुझे लगता है यह पंक्तियां किसी भी नैराश्य में डूबे मन को सुकून देने में समर्थ हैं । बहुत से किरदार हैं । उनके अलग अलग चरित्र हैं, जो कभी कड़ियों को उलझाते से लगते हैं, कभी सुलझाते से । मन की असंख्य गुत्थियों को सुलझाने के लिए गुरुदेव का आगमन, जैसे तपते जेठ में आषाढ के बादल । अंत आते आते मुझे कहानी कुछ कुछ रहस्यमयी सी लगी । अंत ऐसा होगा, सोचा ही ना था । दिल कह रहा है, बता दो । दिमाग डपट रहा है, बिल्कुल ना बताना । कुछ तो पाठकों के लिये छोड़ दो । पढ़ने दो उन्हें यह वास्तविकता में डूबी कहानी । 

कहानी सीधी सरल है पर एकता ने उसे जिस खूबसूरती के साथ पन्नों पर उतारा है, वह काबिले-तारीफ़ है । कहीं भी कहानी किताब छोड़ने को मजबूर नहीं करती । स्त्री के यथार्थ को उजागर करता एक उत्कृष्ट उपन्यास । 

वेदना की ओर दौड़ते हुए शब्द कितना समर्पण मांगते हैं । उपन्यास में स्पष्ट दिखता है । सब कुछ सुन्दर हो जाने का विश्वास लिये, प्रतीक्षा में खड़ी है अमीरन । स्त्री की वैश्विक पीड़ा का चित्र,संवेदनाओं की कूची में डुबो कर बहुत सुंदरता से लेखिका ने अक्षर दर अक्षर उकेरा है । वास्तविकता पर आधारित, अमीरन की कहानी हमारे समक्ष लाने के लिये एकता बधाई की पात्र हैं । 

टुकड़ों में अमीरन अपनी पूरी कहानी सुना चुकी थी । मैं कहानी सुन चुकी थी । उस दिन जाते हुए उसने मुझ से कहा था,

' मुझे भूल तो ना जाओगी दीदी '

' पगली है क्या '

और वह भागती दौड़ती सी अपनी कार में बैठकर हवा हो गई । 

वह शायद मार्च 2020 की एक खूबसूरत सुबह थी । दिन अपनी अलस चाल से चल रहे थे कि एक दिन अचानक पाया कि कोरोना ने अपने भयावह पंख चारों ओर फैला दिये हैं । सब अपने अपने घरों में कैद होकर रह गये । जब कहीं भी नहीं निकल सकते थे तो गार्डन में जाने का प्रश्न ही नहीं था । 

कोरोना खत्म हुआ और जब गार्डन में जाना हुआ तो सब से पहले मैंने अमीरन को ढूँढा । 

कितने आश्चर्य की बात है, जो मेरे सामने अपने जीवन की किताब के सारे पन्ने खोल गई, उस से ना मैंने उसका नाम पूछा, ना पता । 

संसार के इस महासागर में उसे मैं कहाँ ढूँढू और कैसे ?   और ढूँढने पर अब मिलेगी भी या नहीं ?  

इसलिए उसकी किताब के पन्नों में से ढूंढ कर कुछ तिलिस्म आप लोगों के समक्ष रख रही हूँ । शायद आप में से कोई उसे पहचान ले...

"तेज चलती हूँ, ताकि थक जाऊँ और पसीना पसीना हो जाऊँ । फिर गिरकर सो जाऊँ । लगभग पिछले डेढ़ साल से सोई नहीं हूँ । अधिकतम दो घंटे और कम से कम दस मिनट । ऐसा लगता है बड़ा सा काला भयानक धुंए का बादल कमरे में घुस आया है । मेरा दम घुटने लगता है । ना जाने कितनी रातें मैंने जागकर काटी हैं ।" 

आत्मा और मानसिक समृद्धि की खोज में हम हमेशा अपनी आत्मा की अनन्यता की ओर ध्यान केंद्रित करते हैं । इसी पायदान में एक और कड़ी है, वासद गांव में कल कल करती महानदी के किनारे बना 'आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम 'जो वास्तव में धरती पर स्वर्ग का एहसास कराता है । 

दिव्या मैम हमेशा कहती थी, तुम्हारी मम्मा मूर्ख है, अक्ल से मोटी है । वह इंग्लिश में बात करना नहीं जानती । जो कुछ मैं तुम्हें सिखा रही हूँ, वह सीखो । तभी स्मार्ट बन पाओगी । मोटी और मूर्ख ल़डकियों के बॉयफ्रेंड नहीं बनते । 

मोटी होना गुनाह है क्या ?  

अमीरन की आँखों में मोटे मोटे आंसू थे । 

जब भी कलम उठाती हूँ, ना जाने क्यों अमीरन उसकी स्याही बनकर कागज पर उतरती चली आती है । मैं सोचती हूँ आखिर अमीरन की कहानी दर्ज कर ही दूं । ना जाने कितनी अमीरन होंगी जो जिंदगी जीते-जीते गरीब हो गई होंगी । 

अंत में इतना ही .........   'एहसासों से भी लिखी जाती हैं  /   कुछ दास्तानें .....  /  हर कहानी को मंजिल  / नसीब नहीं होती....

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समीक्षा


सुश्री अरुणा शर्मा 


सुश्री एकता अमित व्यास

कच्छ गुजरात, मो. 9825205804

अमीरन (उपन्यास) : एकता अमित व्यास 

एकता अमित व्यास द्वारा लिखित 'अमीरन 'उपन्यास एक ऐसी कहानी है जो आजकल के परिवेश को दर्शाती है कहानी पूर्ण रूप से अमिरन (लेखिका द्वारा दिया गया काल्पनिक नाम जो उसके स्वभाव की अमीरी की वजह से है) और एक अध्यापिका जो उसकी बेटी की शिक्षिका है पर लिखा गया है । अध्यापिका ने अमीरन के वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर लिया है ऐसा आभास रोज़ मर्रा की घटनाओं के कारण अमीरन को हो रहा है । वो परेशान है किंतु मुखर रूप से वह कुछ कह न पाती है एक सभ्यता की दीवार और झिझक उसे रोक देती है इधर अध्यापिका उसकी बच्ची को प्राइवेट ट्यूशन भी पढ़ाती है और उसे अपनी बेटी जैसे प्यार करती है इसी बीच बच्ची अध्यापिका के घर छुट्टियाँ बिताने जाती है और उसके ज्यादा ही समीप आ जाती है । अमीरन की चिंता बढ़ती जाती है किंतु वह कुछ नहीं कर पाती है । बात आगे बढ़ती है शिक्षिका का परिवार भी इस रिश्ते को सपोर्ट करता |हैं । वे कुछ लालची भी है । अमिरन के परिवार का रहन- सहन और शान शौकत उन्हें आकर्षित करता है । 

उपन्यास में हुई घटनाएँ परिवार के संस्कारों पर उंगली उठाता दिखाई देता है और दिव्या के पड़ोसी भी इस बात की पुष्टि करते हैं । बस एक बात समझ में नहीं आती की इतना परेशान होकर भी अपने पति से मुखर होकर कुछ कह क्यों नहीं पाती है अमीरन, उपन्यास में एक चित्र बहुत स्वाभाविक और दिल को छू देने वाला है जब ऊपर कमरे में आमरण मोबाइल कर चार्जर खोजने जाती है, कमरे में पर्दा लगा है उसका पति और वह शिक्षिका कमरे में है वह चाह कर भी पर्दे को हटाकर नहीं देख पाती । जीवन में बहुत बार ऐसा होता है हम सत्य से दूर भागते हैं पर कब तक? 

उपन्यास शुरू से अंत तक पाठकों को बांधे रखता है भाषा बहुत सुंदर है । प्रकृति का वर्णन अनुपम है, सजीव है । कहानी गुजरात के परिवेश में लिखी हुई है तो बीच-बीच में कहीं-कहीं गुजराती में संवाद भाषा को सुंदर बनाता है ।

किंतु एक बात कई बार मन में आती है की अमीरन अपने पति को झिंझोड कर क्यों नहीं पूछ पाती । पति की भूमिका बस इतनी ही है कि वह अपनी पत्नी का ख्याल तो रखता है । किंतु वह उसकी मानसिक स्थिती के विषय में ज़रा भी विचार नहीं करता है । मैं कहना चाहूंगी कि वह भी आजकल के पुरुषों जैसा मौका परस्त तो है क्योंकि कहा जाता है जहां धुआं होगा वहाँ आग तो होगी ही । उपन्यास इस समस्या को भी मुखर करता है की जो बेटियां कमाऊ हो जाती है उनके माता-पिता उनके विवाह के प्रति उदासीन क्यों हो जाते हैं । उपन्यास का अंत सुखद है पाठकों को खुश कर जाता है । इस प्रकार लेखिका एकता अमित व्यास जी का यह उपन्यास एक सशक्त कृति है ।

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“संस्था परिचय “

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच, संस्थापिका एवं अध्यक्ष, संतोष श्रीवास्तव 

सुश्री एकता अमित व्यास ‘कर्म से तपोवन तक’ पर चर्चा करते हुए

डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार, संरक्षक- अंतर्राष्ट्रीय, विश्व मैत्री मंच 


सुश्री दुर्गा सिन्हा

निदेशक - दिल्ली विश्व, मैत्री मंच –फरीदाबाद, मो. 9910408884


“हिन्दी की बढ़ायी शान, मंच ने दिलाया मान 

हिन्दी अपनी पूरे विश्व में है छा रही 

हिन्दी मय जगत हुआ, हिन्दी का सम्मान हुआ

हिन्दी पाठ्यक्रम में, विश्व में भी आ रही 

हिन्दी का साहित्य अब लोकप्रिय हुआ इतना 

चहुँ ओर चर्चा में प्यारी हिन्दी भा रही 

हिन्दी मातृभाषा, राष्ट्र भाषा, विश्व भाषा बन 

पूरे विश्व में अपना राग है सुना रही । । ”

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच ( रजिस्टर्ड ),हिन्दी की सेवा में अनवरत क्रियाशील है । भारत में इस संस्था की स्थापना, संस्थापक अध्यक्ष, श्रीमती संतोष श्रीवास्तव जी के द्वारा 8 मार्च, 2014 के शुभ दिन मुम्बई में हुआ । आज भारत से निकल कर अब विदेशों में भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है । संतोष श्रीवास्तव जी की लेखनी पाठकों के सिर चढ़ कर बोलती है । आप स्वयं ही नए-नए और अनछुए विषयों पर लिखती हैं । अभी हाल में ही नागाओं के जीवन पर विस्तार से लिखा उपन्यास बहुचर्चित है । कठिन से कठिनतम विषयों पर शोध कर लेखनी चलाना और समृद्ध लेखन, समाज को समर्पित करना, आपके लिए बांए हाथ का कमाल है । इन विषयों को छूने की आम आदमी कल्पना भी नहीं कर पाता और आपने उनके साथ समय बिताया जानकारी हासिल की और उसे बहुत ही सुरुचि पूर्ण ढंग से पिरोया और परोसा है कि उपन्यास बेहद लोकप्रिय हो गया है । आप सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं । 

संस्था के उद्देश्यः

  1. साहित्य, चित्रकला और नाटक के क्षेत्र में छुपी हुई प्रतिभाओं को पर्यटन द्वारा खोजकर मंच प्रदान
    करना । 
  2. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमीनार आयोजित कर हिंदी के साथ अन्य भाषाओं पर परिचर्चा तथा साहित्य की अन्य विधाओं पर विचार विमर्श करना । 
  3. विभिन्न विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित करना । 

निर्धारित उद्देश्यों पर अब तक —-

  1. राष्ट्रीय सेमिनार धर्मशाला,खजियार, डलहौजी,भंडारदरा, कान्हा, किसली, अमरकंटक, बांदवगढ़, घाटघर अहमदाबाद, केरल, भोपाल,आगरा रायपुर, कश्मीर, भोपाल,मेघालय, त्रिपुरा में संपन्न हो चुके हैं ।
  2.  अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भूटान, दुबई, रूस, इजिप्ट (मिस्र) उज्बेकिस्तान में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुए । 
  3. पुस्तक प्रकाशन कन्या भ्रूण हत्या पर केंद्रित संकलित कविता संग्रह "बाबुल हम तोरे अंगना की चिड़िया" प्रकाशित 

  • संकलित यात्रा संस्मरण "खुशहाली का देश भूटान" प्रकाशित
  • सांझा लघुकथा संग्रह "सीप में समुद्र" प्रकाशित
  • सांझा लघुकथा संग्रह "क्षितिज और भी हैं “ प्रकाशित । 
  • सांझा काव्य संकलन "चिंगारियां" प्रकाशित
  • सांप्रदायिक दंगों पर आधारित कहानियों का संकलन "नहीं अब और नहीं ", प्रकाशित

पुरस्कार—-

साहित्य की विधाएं 

  • कविता, कहानी, ग़ज़ल, गीत,संस्मरण,उपन्यास, खंडकाव्य, निबंध संग्रह, लघुकथा विधाओं पर 14 पुरस्कार समारोह पूर्वक 
  • प्रदान किए जाते हैं । सभी पुरस्कारों के अंतर्गत पुरस्कार राशि, शॉल एवं स्मृति चिन्ह पुरस्कृत रचनाकार को भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय
  • सम्मेलन में दिये जाते हैं । पुरस्कार में केवल आजीवन सदस्य ही प्रविष्टि भेज सकते हैं । संस्था की मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कच्छ गुजरात, दिल्ली, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शाखाएं खुल चुकी हैं । 
  • सभी प्रदेशों के व्हाट्सएप ग्रुप है जहां प्रतिदिन साहित्यिक चर्चाएं होती हैं । 
  • 26 जनवरी को "कहानी संवाद " का उद्घाटन हुआ जिसके अंतर्गत कहानियों पर समीक्षा एवं चर्चा प्रतिमास ऑनलाइन की जा रही है । इनमें से चयनित कहानियों पर प्रतिवर्ष दो संग्रह प्रकाशित किए जाएंगे । 
  • संस्था का आजीवन सदस्यता शुल्क Rs. 1500 । यदि संरक्षक होना चाहते हैं तो संरक्षक शुल्क Rs. 3000 है । 
  • मुख्यतः साहित्य को समर्पित है यह संस्था, किन्तु अद्भुत और अनोखे प्रयोगों के साथ । साहित्य सृजन एवं काव्य पाठ के साथ-साथ कहानी संवाद, साक्षात्कार, युवा लेखनी को प्रखर करती पुरस्कार एवं सम्मान योजनाएँ, विविधतापूर्ण परिदृश्य का सृजन करती हैं । प्रशिक्षण एवं ज्ञानवर्धन हेतु कार्यशाला
  • परिचर्चा, विचार मंथन और पर्यटन, मंच की गतिविधियों के रोचक आयाम हैं जो नित नए नूतन होने का एहसास भरते हैं । अभी हमारे कुछ सदस्य संतोष जी के साथ स्कैण्डीनेवियन देशों की यात्रा से लौटे हैं । आनंद -उल्लास नित कौतूहल सभी कुछ तो ऊर्जस्वित रहने के लिए निहायत ज़रूरी और बेहद सराहनीय घटक हैं । ये सब हमें यहाँ सदैव मिलते रहते हैं । 
  • भारत में लगभग सभी राज्यों में स्वतंत्र इकाइयाँ कार्यरत हैं । 
  • संस्था के महत्वपूर्ण आयोजन जैसे पुस्तक लोकार्पण आदि इकाइयाँ स्वयं निभाती हैं । इस वर्ष 2 जून 2024, संतोष जी के उपन्यास’कर्म से तपोवन तक’ तथा एकता व्यास जी की पुस्तक ’अमीरन‘ के लोकार्पण का भव्य आयोजन दिल्ली की इकाई “ दिल्ली विश्व मैत्री मंच “ द्वारा किया गया । दिल्ली की अध्यक्ष बहुत ही सक्रिय और सक्षम शकुन्तला मित्तल जी हैं जिनके मार्गदर्शन में विविधता पूर्ण कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं । 
  • प्रतिदिन पटल पर सभी सदस्यों को सक्रिय बनाए रखने के लिए तरह-तरह के साहित्यिक गतिविधियों का संचालन सभी की दुलारी प्रिय अर्चना पंड्या जी जो संस्था की महासचिव हैं, बहुत ही अच्छी तरह सँभाल रही हैं । अतीत के विस्मृत खजाने से ढूँढ कर साहित्यकार ही नहीं, देशभक्त, कलाकार और अन्य विधाओं में ख्यातनाम लोगों से परिचित कराती हैं । कभी नए कभी पुराने कभी अपने साथियों की रचनाएँ तो कभी पद्मश्री, पद्मविभूषण प्राप्त साहित्यकारों की रचनाओं से रूबरू कराती हैं । कभी किसी नए छंद की जानकारी देती कार्यशाला का आयोजन कभी भरपूर मौज मस्ती की छूट देती अन्त्याक्षरी का आयोजन । हाँ उसमें भी विविधता, नवीनता और कसौटी तो रहती ही है । 
  • मुझे यह बताते हुए हर्ष का अनुभव हो रहा है कि सभी सदस्य सक्रिय रह कर प्रतिभागिता करते हैं । सभी संयोजक,
  • आयोजक और लीडर के निर्देशों का निर्विरोध स्वीकार और पालन करते हैं । क्या और नया किया जा सकता है, सोचा जा सकता है इसके सुझाव भी सभी से समय-समय पर प्राप्त होते रहते हैं । ऑन लाइन, ऑफ़ लाइन कार्यक्रमों का आयोजन भी सतत चलता रहता है । फलस्वरूप जीवंतता बनी रहती है । यहाँ नवीनता है, सर्जनशीलता का व्यापक अवकाश और आकाश है । मार्गदर्शन हेतु छंद मर्मज्ञ पुष्पा शर्मा जी जैसी विदुषी हैं जो सुधारात्मक संदेश दे कर लेखनी समृद्ध बनाती हैं । 
  • अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच और हेमंत फ़ाउण्डेशन के सम्मिलित उपक्रम से विविध क्षेत्रों में सशक्त लेखनी के हक़दार को पुरस्कृत व सम्मानित कर उनका मान बढ़ाया जाता है । प्रोत्साहन पा कर लेखनी और निखर उठती
  • है । 
  • इतना ही नहीं आगे और भी बहुत कुछ है करने के लिए । समय-समय पर सभी कुछ अपने आप आकार लेता जाएगा और हम सभी को समृद्ध करता जाएगा । 
  • यह मंच आप सभी के सहयोग से आगे बढ़ रहा है । सक्रियता और सहयोग ही सफलता का आधार है । साथ बने रहिए, आगे बढ़ाते रहिए नवीनता आती रहे । विस्तार हो ताकि हमारी हिन्दी व्यापक बने । समृद्ध बने । विश्व भाषा बने । 

शुभकामनाएँ !!





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