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अभिनव इमरोज़ अक्टूबर 2022

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 कविताएँ अमरावती, महाराष्ट, मो. 09422917252, Email :  ashapandey286@gmail.com चाबी  तब होता था  हमारे घर में एक ही बक्सा  एक ही ताला  एक ही चाबी  घर से कहीं जाने पर सबके  निकाल लिया जाता था बक्से से ताला  बंद कर दिया जाता था  घर के किवाड़ में हम आश्वस्त रहते थे  घर की सुरक्षा के प्रति एक ही ताले में थी वह शक्ति  कि गायब नहीं होता था कुछ भी अब हैं हमारे घर में कई बक्से  कई आलमारियां  कई किवाड़  कई-कई ताले  और चाबियाँ भी हैं  हमारे पास कई-कई हम चटकाते हैं सब बक्सों  और सब कमरों में ताले  चाबियाँ रखते हैं संभाल के  पर न जाने कैसे  सेंध पड़ गई है  हमारे घर में  लूट लिया गया है प्रेम  जो मुख्य दौलत थी हमारे घर की अब प्रेम के लुट जाने के बाद  बचा ही क्या है हमारे घर में  जो चाबियों को  रखा जाये संभाल कर।                                   मैं एक नदी  मैं एक नदी  तटों - बांधों का नियंत्रण सहती  दुःख को समेटती  सुख को बिखेरती सींचती, उगाती  अनवरत श्रमरत हूँ  मुझे डुबोने का प्रयास सतत जारी है  किंतु मैं स्थिर हूँ आता है उफान अंतस में मेरे भी  किंतु संयम रख लेती हूँ  ताकि कल-कल की स्वर-लहरी का  संगी