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साहित्य नंदिनी सितंबर 2022

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समीक्षा समीक्षक: डाॅ. चूड़ामणी लेखक: डाॅ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी सोखी हुई स्याही (स्मृतियों की तलछट) भुवन से यदि गुबार उठे और ऊपर अंतरिक्ष से जा टकराए तो क्या हो? अंतरिक्ष-नियंता यदि उस गुबार से आँख-मिचैली करने लगे तो क्या हो? जीव यदि परम-जीव के नयनों में झाकें, परम-जीव निस्तब्ध रहे तो क्या हो? उत्तरित, अनुत्तरित का ये खेला जिस भंवर में जीव को हिचकोले के लिए छोड़ देता है वो जीव जिजीविषा से यदि अनुत्तरित्त कर दे तो क्या हो? जीव और परम-जीव का ये झोला पाठकों को तब स्तब्ध, हत्प्रभ कर देता है जब सृजक और सृजित का अदृश्य संवाद सोखी हुई स्याही (स्मृतियों की तलछट) में मुखरित होता है। कोई इतना गहरा कैसे पैठ सकता है, शायद तब जब उसका विधि और विधाता से तारतम्य जुड़ जाता है। तब सृष्टि में बदलाव अवश्यंभावी है। सृजन बेशक सृष्टा द्वारा होता है, तो क्या सृजित में इतनी भी कूवत नहीं कि वो सृजक से संवाद कर सके? उससे प्रश्नोत्तर कर सके? उसे पूरा अधिकार है, वो सृजक से पूछे उसने क्यूं उसे सृजा? यदि सृजना ही था तो उसके जीवन में अवरोध क्यों? प्रश्नचिन्ह क्यों? क्यों नहीं वो बिना उपालम्भ के, बिना उपेक्षा, बिना अपेक्ष