Posts

साहित्य नंदिनी अक्टूबर 2021

Image
  डाॅ. अवध विहारी पाठक, सेवढ़ा, दतिया, मध्य प्रदेश, मो. 9826546665 समीक्षा कथाकार मंटों के अंतद्र्वन्द्व ‘हम उन मोरियों और बंद रोंओं का ज़िक्र क्यों नहीं करते जो हमारे बदन का मैल पीती हैं। -मंटो  कामू ने अपनी अमर कृति ‘द रिबेल‘ में लिखा है कि ‘सम्वेदनशील कथाकार ईश्वर की विफल सृष्टि से असंतुष्ट होकर उसे अपने नियंत्रण में लाकर आदर्श सम्भावनाओं के क्षेत्र में लागू करना चाहता है।‘ कथाकार मंटों एक ऐसे ही विचारक थे, जो इंसानियत के दमन से दुखी थे। आदमी अपने काइयांपन से खुद की सारी गंदगी नालियों-नाबदानों मोरियों की ओर बहा देता है। मंटों ने जिन नालियों का प्रतीक दिया है वे समाज के दबे-कुचले, अभावग्रस्त इंसान हैं, जो आभिजात्य वर्ग की मज़हबी, सियासी, समाजी, बदग़्ाुमानियों का खामियाज़ा भुगतने को विवश हैं, जबकि वे खुद इन चालाकियों से बहुत दूर रहते हैं। इन चालों में हमेशा पिसता है निर्दोष ही, आखिर क्यों?           एक रचना में नहीं, मंटों की सारी रचनाओं में खो गयी इंसानियत को स्थापित करने की बेचैनी है। ऊपर लिखित मंटों का कथन साहित्यकारों के लिए एक संदेश है, कि साहित्य का लक्ष्य केवल उजला-उजला बखान या कल्