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अभिनव इमरोज़, मई 2022

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कविता श्रीमति मंजू महिमा,  -अहमदाबाद, मो. 9925220177 शान्त-कपोतःअग्नि-युद्ध मेरी मुंडेर पर बैठा, कपोत का टोला, एकाएक सुनकर, धमाके की आवाज, फड़फड़ा उठा.... उड़ने लगे रेत के बादल, उठने लगे अग्नि-पुंज, और छिड़ गया देखते-देखते एक अग्नि-युद्ध. सहमे से कपोत, कभी इस मुंडेर पर तो कभी उस मुंडेर पर, बैठने लगे, शोर मचा चहुँ ओर, रोको-रोको इस संहार को, पर, जंग का जुनून, चढ़ा हुआ था उस पर, वह तो हठ की होड़ में, बढ़ा जा रहा था आगे और आगे, रोंदते हुए अहसासों को सबके, बम के धमाकों से, हड़बड़ाए कपोत, आखिर जाएँ तो कहाँ जाएँ? दिग्भ्रमित से समझ नहीं पा रहे थे.. यह कैसा युद्ध है? शांति के लिए या अशांति के लिए? न्याय के लिए अथवा अन्याय के लिए? साहस कर एक कपोत बोल ही उठा, ‘क्यों तुम ये लाशों के ढेर लगा, न्योता दे रहे गिद्धों को? वे तुम्हे भी न छोड़ेंगे. अपनी विजय के एलान में, तुम्हारे हाथों क्या आएगा? सिवा रेत के और चंद मुट्ठी राख के, कहाँ सहेज कर रखोगे इन्हें? धर्म और इंसानियत के नाम पर ले लेना जान निर्दोषों की, भला इंसानियत है कौन-सी? क्यों तुम्हें हमारा उड़ना नहीं भाता?” और कुछ कहता तभी, फड़फड़ाया शांतिदूत अशांत हो, हो