Posts

कविता

Image
डाॅ. उमा त्रिलोक, मोहाली, पंजाब, मो. 9811156310   लहर हूँ उमड़ती, उचकती, हिलोरती,  किलोलती सागर में लहर हूँ तिलस्मी रूप-रंग बदल-बदल इठलाती, इतराती, लहराती, सागर मंे लहर हूँ ‘‘तुम स्वयं तो कुछ भी नहीं’’ बोला था कोई ‘‘और, सागर है वह हो गया शान्त जो तब क्या करोगी?’’ ‘‘भूलते हो तुम’’ बोली थी मैं ‘‘मैं न उमड़ी, मैं न उभरी मैं न उसरी तो विशालता उसकी सिमट जायेगी एक ताल में’’ ‘‘मैं न गाई, मैं न नाची नृत्यांगना इस रास में तो भव्यता, उसकी सिमट जायेगी एक ताल में मैं ही हूँ उसकी भव्यता मैं ही हूँ उसकी विशालता मैं ही हूँ गति उसकी उल्लास में’’ मैं ही हूँ सागर सागर में लहर हूँ

कविता

Image
डाॅ. उमा त्रिलोक, मोहाली, पंजाब, मो. 9811156310   क्या वही हो तुम ? शक्ति की साँसों में बसे शिव को क्या ? रुक्मणि के प्यार में रमे माधव को क्या ? राधा के पाष में बँधे कान्हा हो क्या ? मन नूपुर के स्वर गीतों के गान  श्वासों के प्राण क्या वही हो तुम ? मरु से आए हो पुन्नू बन क्या सस्सी के घर ? या अब के राँझा बन हीर को ले जाओगे वर ? थाम के पकड़ोगे कच्चा घड़ा जिससे सोहनी जायेगी तर, क्या वही हो तुम ? मेरी साधना के प्रासाद, मेरी प्रतीक्षा के फल, मेरे प्रश्नों के उत्तर, मेरी प्यास के जल, क्या वही हो तुम ?

कविता

Image
डाॅ. उमा त्रिलोक, मोहाली, पंजाब, मो. 9811156310 वह शाम वह शाम जो हुआ करती थी सेहन के छिड़काव के साथ, जो अंगड़ाई लिया करती थी हवा, पहले धीमे धीमे फिर ठुमक ठुमक कर चला करती थी तल्ख़ी मौसम की या हालात की मन की खीज या आँख भरी उदासी झटक कर हाथ छुड़ा लेती थी वह शाम गुज़्ारती थी इंतज़्ाार में किसी के आने की या किसी को साथ ले जाने की हाथों में हाथ लिये साथ ले जाने की बिना बात किये बतियाने की कुछ कहने की कुछ सुनने की वह शाम जो हुआ करती थी

कविता

Image
डाॅ. उमा त्रिलोक, मोहाली, पंजाब, मो. 9811156310   तलाक ‘‘तलाक, तलाक, तलाक कह कर नहीं दिया जाएगा तलाक’’ संविधान ने रोक लगा दी दंभ खड़ा कोने में लेकिन सब कुछ देख रहा था चुपके चुपके लगा उधेड़ने ताना बाना जोड़ों के जीवन का वे सब भूल गए थे, कि जब जब अनुभव के गंदले पानी को खंगाला जाता है तब तब कुछ कुछ मीठा, खट्टा, खारा, कड़वा सामने आ जाता है मिले हमेशा मीठा मीठा यह कब कहाँ होता है रूप बदल कर दंभ यह बोला ‘‘मैं नहीं आता बीच तुम्हारे गर कड़वे को तुम विष समझ कर देते त्याग, और चख लेते खट्टे खारे को बदल लेने को स्वाद मीठे को तुम प्रेम से तब बांट बांट कर पी लेते सच मानो बच जाता तुम्हारा ताना बाना और जीवन का छप्पर बच जाती बढ़ती फसलें और बना रहता परिवार सह जाते गर इक दूजे के छोटे मोटे अवगुण नहीं होता तब कभी यह अभिशप्त तलाक

Abhinav Imroz January 2023

Image
*********************************************************************************** कविताएँ सुश्री संगीता कुजारा टाक,  राँची, मो. 92346 77837 फ्लर्ट जब मुझे पढ़नी चाहिए थीं कोर्स की किताबें तब मैं पढ़ रही थी ओशो को जब मुझे पढ़ना चाहिए था ओशो को, तब मैं बना रही थी परिवार के लिए खाना मुझे बनाना चाहिए था जब परिवार के लिए खाना, तब मैंने बनाया एनजीओ और की अजनबियों की सेवा और अब जब मुझे देनी चाहिए उन बुजुर्गों के होठों को मुस्कान जिनके पास नहीं है कोई लाठी, उन बच्चों को उम्मीद जिनके ऊपर नहीं है साया उनके मां-बाप का, करनी चाहिए समाज सेवा.... तब, मैं हो जाना चाहती हूं मौन!!! मैंने वक्त के साथ फ्लर्ट किया है। फना किनारों को आकर छूना और फिर चले जाना वजूद अपना बताना और समन्दर में मिल जाना लहरों से सीखा मैंने इश्क में यूं फना हो जाना!! पुरखिनें रात भर सोने के बावजूद उसे लगता था किसी ने खोल रखे हैं उसकी पुतलियों के फाटक  पूरे दिन आराम करने के बाद भी उसे लगता था चूर -चूर है उसका बदन मेहनतकशी से बहुत सारी डिग्रियाँ लेने के बावजूद उसे लगता था आधी-अधूरी है उसकी पढ़ाई-लिखाई बैंकों की प्रीमियम कस्टमर होने के