मैं स्त्री हूँ
दहेज में मिला है मुझे एक बड़ा संदूक हिदायतों का आसमानी साड़ी में लिपटा हुआ संतोष सतरंगी ओढ़नी में बंधी सहनशीलता गांठ में बांध दिया था मां ने आशीष,  ‘‘अपने घर  बसना और.... विदा होना वहीं से’’ फिर चलते चलते रोक कर कहा था ‘‘सुनो,  किसी महत्वाकांक्षा को मत पालना जो मिले स्वीकारना जो ना मिले उसे अपनी नियति…
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अपनी वेदना व्यक्त करती कविता : धरती माँ की पुकार
एक दिवस प्रात भ्रमण को ज्यों ही मैं घर से निकली शीत ऋतु की शीतल बयार ने आकर मुझे झकझोरा, सहकर उसका आघात मैं आगे बढ़ने लगी नम धरती ने बीच में ही मेरे पग रोके आवाक मैं ठिठकी तो देखा मेरे गतिशील पग के साथ स्वयं जुड़ी धरा मेरे संग-संग पग से पग मिला चली आ रही है, तन से तरबतर आँखें भी नम वाहनों और राहगीरों…
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2021
2021 गुजर रहा है  थरथराते पुल पर धड़धड़ाती  बेतहाशा भागती बेकाबू रेलगाड़ी की तरह माहौल में भर गया है  दहशत का भयानक स्वर।  लाखों बरसों से संचित  मनुष्य के अकूत ज्ञान ने प्रयोगशाला में जन्म दिया है  घातक विष और  आदमखोर वायरस को कराह रहा है सारा संसार  लहूलुहान है संवेदनाऐं शर्मसार मानवता।  अरक्षित समपा…
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संपादकीय
एक चिंतक शापेनहावर ने खूब कहा है: ‘‘जीवन के पहले चालीस साल मूल पाठ है और अगले चालीस साल इस पर व्याख्या’’ इस फलसफे का अभ्यास, अनुकरण एवं निर्वाहन करते हुए भाई साहब धनसिंह खोबा ‘सुधाकर’ जी स्वतः प्रमाण हैं। भारतीय राजस्व सेवा (I.R.S.) आयकर विभाग, दिल्ली में संयुक्त आयकर आयुक्त के पद से सेवानिवृत्ति उ…
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अतीत की धार के साथ बहते हुए
शख़्सियत     डाॅ. अवध बिहारी पाठक, सेवढ़ा, जिला दतिया, म. प्र., मो. 9826546665     जगजीत सूद, लुधियाणा मानव जीवन; हाँ जिन्दगी एक बड़ी अजीब शै है कुदरत की, जो इसे विराट मात्रा में जाने कितना कुछ बिना मांगे दे जाती है, और फिर उतनी ही बेरहमी से छीन ले जाती है और हम बकौल गीत कार नीरज, हताश ख…
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खुद एक लोकगीत बन गए सत्यार्थी जी
शख़्सियत अमृता प्रीतम ने लिखा है कि लोकगीतों की खोज करते-करते देवेंद्र सत्यार्थी खुद एक लोकगीत बन गए। मैं समझता हूँ कि विलक्षण लोकयात्री सत्यार्थी जी की बीहड़ लोकयात्राओं और उसके पीछे छिपे उनके बेहिसाब दुख-तकलीफों और फकीरी को बयान करने के लिए इससे खूबसरत अल्फाज कुछ और नहीं हो सकते। सच तो यह है कि लो…
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दुर्घटना
आज की डाक में शोक संदेश आया है। एक कोने से फटे पोस्ट कार्ड साइज सफेद कार्ड में छपे काले अक्षर। इबारत पढ़ते हुये रामजसी सोच रही है- ऐसे संदेश छपे हुये काले अक्षर मात्र नहीं होते, किसी का शेष हो गया जीवन होते हैं। शिथिल भाव में बोली- ‘’इरावान इस तरह चला गया। सत्ताईस-अट्ठाइस साल का रहा होगा।‘’ पति रहीस…
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दूधिया आलोक
मेरे दादा इलाके के नामी गाँधीवादी नेता थे। आजादी के लिए संघर्ष के दिनों में वे सुपौल, सहर्षा, मधेपुरा, विहपुर से लेकर भागलपुर तक अंग्रेजों के विरोध का प्रतिनिधित्व करते थे। राजेन्द्र बाबू, अनुग्रह बाबू से लेकर श्री बाबू तक उन को जानते थे, मगर आजादी के बाद उन्हें टिकट नहीं मिला, तो वे नेपथ्य में चले…
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रक्तबीज दानव
‘‘हैलो‘‘, हैलो ओओ! रजत। ‘‘घबराई आवाज.. ‘‘जी, पापा आप घबरा क्यों रहे हैं? क्या बात है?‘‘ लेकिन पापा की आवाज की टोन पर स्वयं उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं। पापा का फोन हो या मम्मी का, वह बिना देर किए उठाता था क्योंकि वह उन दोनों को अकेला इंडिया में छोड़ कर सिडनी (आस्ट्रेलिया) आ गया था। ‘‘बेटा, तु…
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टूटते मोह
“जतिन तुमको सैकड़ों बार बोल चुका हूँ ... साठ पार मेरी भी उम्र हो चुकी है। मेरे ऑफिस पहुंचने से पहले ऑफिस जाने का रूटीन बनाओ।.....अपनी वकालत शुरू करो....वकालत जमाने में भी काफी समय लगता है.....अभी तो मैं हूँ....काम सिखाने व समझाने वाला......आता-जाता वक्त किसने देखा है?”  कामता प्रसाद के बढ़ती उम्र के …
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