क्या अंधेरा भी सूरज होता है?
प्रि. सुरेश सेठ, जालंधर (पंजाब), मो. 9914527719 क्या अंधेरा भी सूरज होता है? तुम्हारा हठ है तुम मुझे पहचान नहीं दोगे जलावतन कर दोगे यहां से जहां तुम्हारी उपलब्धियों के नकली फानूस जलते हैं मुझे तड़ीपार कर दोगे हर उस अखाड़े से जहां के खिलाड़ी भी तुम और निर्णायक भी तुम! मैं तुम पर कोई महाभियोग चलाऊं ऐसी …
Image
उसका जाना
शैलेन्द्र शैल, दिल्ली, मो. 9811078880  वह इस तरह चली जाएगी  अचानक  उसकी आँखों के आगे  उसे गुमान भी न था  वह एक पल थी  अगले पल नहीं थी डाक्टर-मित्र ने आते ही नब्ज देखी  आँखों की पुतलियों पर टॉर्च की रोशनी फेंकी  और पलकें बंद करते हए बोला  आई.एम.सॉरी  तीन शब्दों में पूरा जीवन  कैसे सिमट जाता है  …
Image
शब्दों
ओमान, मो. 00968. 96103888, ईमेल: paramjitoberoi66@gmail.com शब्दों शब्दों आओ, कल्पनाएँ बिखरी हुईं हैं। विचार राह देखते हैं, बुद्धि चलने लगी है, कलम भी हाथ में आने को, आतुर है। पृष्ठ भी खाली हैं , जैसे सजे हैं तुम्हारे लिए। शब्दों आओ,  भावनाएं अंतर्मन में, हिलोरें ले रहीं हैं। कहीं ज्वालामुखी की तरह…
Image
क्या यही नियति है?
. मीनाक्षी सिंह ‘परी’ किसे पता था कि मेरे आनेवाले क्षणों का लेखनहारा खुद नसीब होगा, मैं नहीं। अरबों-खरबों की इस भीड़ में कभी आपने सोचा है कि इस भीड़ की भी कहानी होती है। भीड़ में खोए से, गुम, हर एक इन्सान की अपनी कहानी होती है। मुझे भी नहीं पता था। परंतु आज जब मैं खुद एक खास इन्सान से हटकर इस भीड़ में …
Image
मैं हूँ ताड़, तू वट वृक्ष
श्रीप्रकाश सिंह (उपनामः मनोज कुमार सिंह), मो. न. 9436193458 समय: साम के चार बजे: शीला (सौरभ की माँ) चेहरे पर पुलक लिये अति उमंग के साथ किचेन में लगी है: भाँति- भाँति के व्यंजन बना रही है, जो व्यंजन बन चुके हैं उसे चखकर यह निश्चित कर रही है कि कहीं दाल- सब्जी- पनीर में नमक ज्यादा तो नहीं- सब ठीक तो …
Image
डाॅ. मीनाक्षी सिंह ‘परी’
कोलकाता,  Email - minihope123@gmail.com नहीं बन सकती मंजिल, तो सीढ़ी ही बन जाऊँ,  गुज़रे हुए वक्त की एक पीढ़ी ही बन जाऊँ। कोई मुझे पाना चाहे क्यों, मैं राह भटकी हुई  मौत ही अंजाम अब, मैं साँस हूँ अटकी हुई  सृजन ही था अंत मेरा, अंत में होगा सृजन- अब तो छा गई मैं बदरी बरसना ही है धरम  दीप की बाती की तरह…
Image
चंदर, मैं नवाँ चखाँ...?
प्रकाश मनु, फरीदाबाद (हरियाणा), मो. 09810602327, ईमेल : prakashmanu333@gmail.com आत्मकथा-अंश बचपन को याद करूँ तो वे तिथि-त्यौहार जरूर याद आते हैं, जिनमें माँ को नित नए रूपों में देखने का अवसर मिलता था। इनमें एक ‘नवान्न’ का पर्व था, जिसमें नए अन्न की रोटी या शायद पराँठा बनता था। उसमें घी डालकर च…
Image