कब लोगे खबर मेरे राम ?
अन्नदा पाटनी, -मैरीलैंड, अमेरिका, ईमेल : Annada.patni@gmail.com कुछ तो गड़बड़ है भगवन् ! ऐसा कैसे कि सबको दिख रहा है, पर तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा । चारों ओर करुण चीत्कार है , ऐसा कैसे कि सब सुन पा रहे हैं  पर तुम्हें सुनाई नहीं दे रहा । कोरोना के झाँसे में आकर, तुम्हारे दूत जो उठा लाए हैं डॉक्टर ध…
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एक दिन तुम ही जीतोगे
डॉ. निशा नंदिनी भारतीय, तिनसुकिया, असम, email :   nishaguptavkv@gmail.com हार ना मानो लड़ते रहो  सावधान हो ध्यान से। एक दिन तुम ही जीतोगे  महामारी के वितान से। माना संकट का साया है  धरती की धरोहर पर। मंज़र उजड़ा-उजड़ा है  हर घर की चौखट पर। बादल खुशियों के छाएंगे  संस्कारों की छांव से। हार ना मा…
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तब (प्रेम में समर्पण)
डाॅ. उमा त्रिलोक, मोहाली, चण्डीगढ़, मो. 9811156310 धरती सजी थी रंग-बिरंगे परिधान में  बिदिंया भी चमकी थी चूड़ियाँ भी ख़नकी थीं नीला आसमान बहा था झरना बनकर देह में गन्ध भी महकी थी तब मैंने भी एक गीत गाया था उस नीली चिड़िया के लिए उड़ गई थी जो सारे बन्धन तोड़ कर उफ़न कर उमड़ कर तब  आया था मेरा मन मेरे …
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बदलता चैनल
अजित कुमार राय, कन्नौज, Mob. 9839611435 अपनी प्रेयसी को पत्र लिख रहा था कि श्रीमती जी टेबिल पर चाय रख गईं। बीच में उनकी छाया पड़ते ही कविता को ‘ग्रहण’ लग गया। फिर कविता शुरु हुई- प्रिये! चाय ‘रस’ हो गई है और बूँद-बूँद पी रहा हूँ मैं तुम्हें। इतने में सौ डिग्री सेल्सियस पर खौलती हुई श्रीमती जी आईं। म…
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प्रकृति व इन्साफ
अरुणा शर्मा, दिल्ली, मो. 9212452654 उसने देखा रहते हुए सुख से उनको     किया था फ्तवा जारी बेघर होने के लिए  हुआ था लहु जिगर का  सुनकर देखकर एक दूजे को था हक्का बक्का निशब्द चेहरा खुली थी बस पथराई आँखें  काले घनघोर अंधेरों को देख  धड़क रहा था दिल जोरों से सोच में था हर शक्श आने वाले कल को लेकर  क्यों…
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डॉ. राजेश लेखनपाल, मुकेरियां, मो. 9815270285
एक आदमी रात को झोपड़ी में बैठकर एक छोटे से दीये को जलाकर कोई शास्त्र पढ़ रहा था। आधी रात बीत गई जब वह थक गया तो फूंक मार कर उसने दीया बुझा दिया। लेकिन वह यह देख कर हैरान हो गया कि जब तक दीया जल रहा था, पूर्णिमा का चांद बाहर खड़ा रहा। लेकिन जैसे ही दीया बुझ गया तो चांद की किरणें उस कमरे में फैल गई। वह …
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"बुद्ध" तुम कहाँ हो
डॉ. प्रज्ञा शारदा, चंडीगढ़, Mob. 9815001468   एक गरीब, एक भूखा एक बीमार, एक लाचार और एक अर्थी  देख, कितने विचलित  हो गए थे तुम, कर गए थे पलायन, धन, वैभव, ऐश्वर्य, भंडार, परिवार, पत्नी, पुत्र छोड़  जंगल में, खुले आसमान में नीचे लिप्त हुए, समाधि में, की निर्वाण प्राप्ति और कहलाए "तथागत"। आज क…
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क्या अंधेरा भी सूरज होता है?
प्रि. सुरेश सेठ, जालंधर (पंजाब), मो. 9914527719 क्या अंधेरा भी सूरज होता है? तुम्हारा हठ है तुम मुझे पहचान नहीं दोगे जलावतन कर दोगे यहां से जहां तुम्हारी उपलब्धियों के नकली फानूस जलते हैं मुझे तड़ीपार कर दोगे हर उस अखाड़े से जहां के खिलाड़ी भी तुम और निर्णायक भी तुम! मैं तुम पर कोई महाभियोग चलाऊं ऐसी …
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उसका जाना
शैलेन्द्र शैल, दिल्ली, मो. 9811078880  वह इस तरह चली जाएगी  अचानक  उसकी आँखों के आगे  उसे गुमान भी न था  वह एक पल थी  अगले पल नहीं थी डाक्टर-मित्र ने आते ही नब्ज देखी  आँखों की पुतलियों पर टॉर्च की रोशनी फेंकी  और पलकें बंद करते हए बोला  आई.एम.सॉरी  तीन शब्दों में पूरा जीवन  कैसे सिमट जाता है  …
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शब्दों
ओमान, मो. 00968. 96103888, ईमेल: paramjitoberoi66@gmail.com शब्दों शब्दों आओ, कल्पनाएँ बिखरी हुईं हैं। विचार राह देखते हैं, बुद्धि चलने लगी है, कलम भी हाथ में आने को, आतुर है। पृष्ठ भी खाली हैं , जैसे सजे हैं तुम्हारे लिए। शब्दों आओ,  भावनाएं अंतर्मन में, हिलोरें ले रहीं हैं। कहीं ज्वालामुखी की तरह…
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क्या यही नियति है?
. मीनाक्षी सिंह ‘परी’ किसे पता था कि मेरे आनेवाले क्षणों का लेखनहारा खुद नसीब होगा, मैं नहीं। अरबों-खरबों की इस भीड़ में कभी आपने सोचा है कि इस भीड़ की भी कहानी होती है। भीड़ में खोए से, गुम, हर एक इन्सान की अपनी कहानी होती है। मुझे भी नहीं पता था। परंतु आज जब मैं खुद एक खास इन्सान से हटकर इस भीड़ में …
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मैं हूँ ताड़, तू वट वृक्ष
श्रीप्रकाश सिंह (उपनामः मनोज कुमार सिंह), मो. न. 9436193458 समय: साम के चार बजे: शीला (सौरभ की माँ) चेहरे पर पुलक लिये अति उमंग के साथ किचेन में लगी है: भाँति- भाँति के व्यंजन बना रही है, जो व्यंजन बन चुके हैं उसे चखकर यह निश्चित कर रही है कि कहीं दाल- सब्जी- पनीर में नमक ज्यादा तो नहीं- सब ठीक तो …
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