मेरा शहर
मेरा शहर कुछ दिन पहले मेरे बेटे ने  मुझ से पूछा  ‘माँ तम्हारा शहर कैसा था?‘‘  कुछ सोचकर मैंने कहा- ‘‘बेटे तुम्हारे सपनों जैसा था।‘‘  फिर कुछ सोचकर उसने पूछा- ‘‘वो शहर तुम्हारा, जिसका नाम सुनते ही  तुम खुश हो जाती हो,  दूर कहीं खो जाती हो, क्या अब भी वो वैसा ही है?‘‘  ‘‘नहीं अब उसके मुँह पर  कुछ खरो…
तुम भी सोचो, हम भी सोचें
डाॅ. अंजना संधीर, अहमदाबाद, मो. 9099024995 बर्फ की चाँदी सी चादरें ओढ़े  दूर-दूर तक, हरी-हरी घास की साड़ियाँ पहने  केसर की क्यारियों में,  खुश्बूएँ बिखेरते कुदरती नज़ारे  आज भी मोह लेते हैं, मुसाफिरों को...मगर  ठण्डी हवा के खुश्बूदार झोंके  झन-झन बहते इधर-उधर झरने  धूप-छाँव सा खेल खेलते ये नज़ारे  अब…
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कश्मीर
(1) झील का पनी लाल हो गया है जब कभी तेज हवाएँ चलती हैं तो खाली शिकस्ता शिकारे के बोसीदा परदे फड़फड़ा उठते हैं नरगिस का इक्का-दुक्का फूल आँख में शबनम लिये झील में अपना चेहरा देखने के लिये झुकता है शबनम का रंग भी लाल हो गया है। (2) श्रीनगर के चैक का तो नाम ही लाल चैक है पता नहीं चैक के नाम के रूप में…
कुपवाड़े से भागे वे लोग
(1) कोई नहीं जानता उसे यहाँ उसके नाम से जो बैठी है गुमसुम लकड़ी के बोटे पर वहाँ , आरे-मशीन में काट-डाला गया बेटा जिसका उसकी पहचान बस इतनी ही है यहाँ। (2) उस रात जब वे छोड़ कर भागे थे अपना गाँव घर धुंधआते चूल्हे और अधपकी रोटियाँ कौन आये थे उस रात की पहली रात उनके घरों…
संपादकीय
देवेन्द्र कुमार बहल, बी-3/3223, बसंतकुँज, नई दिल्ली 110070,  मो. 9910497972 वर्ष 2012 में ‘अभिनव इमरोज़’ मेरे गुरुदेव डाॅ. त्रिलोक तुलसी को समर्पित प्रथम अंक का विमोचन कमला नेहरू काॅलेज, फ़गवाड़ा में डाॅ. हरमिन्दर सिंह बेदी द्वारा एवं श्रीमती स्वतन्त्र तुलसी और प्रिंसिपल किरण बालिया की उपस्थति में ह…
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भूतल-स्वर्ग-कश्मीर
कश्मीर के बारे में किसी कवि ने सही कहा था-  ‘‘धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है का तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।‘‘  फल-फूल और नैसर्गिक सुषमा से सुशोभित कश्मीर भूतल स्वर्ग माना जाता रहा है। कश्मीर की कल्पना मात्र से एक शोभायुक्त, भूखण्ड हमारी आँखों के सामने लहराने लगता है। भारत का ही नहीं, विश्व का प्रत…
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जंग तृतीया: पारंपरिक कश्मीरी महिला दिवस
अग्निशेखर,  -जम्मू (जे. के.), मो. 9697003775 चैत महीने की शुक्ल तृतीया पारंपरिक कश्मीरी संस्कृति में एक तरह से स्त्री दिवस है, इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्त्व है। इसे कश्मीरी में ‘जंग त्रैय’ कहते हैं, अर्थात् ‘जंग तीज’। मान्यता है कि नवरेह अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शिव ने ब्रह्माण्ड रचा और द्विती…
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