सर्दी (बाल कविता)
डॉ. दलजीत कौर, चण्डीगढ़, मो. 9463743144 खरगोश भाई ने जुगत लगाई बचना था उसे ठंड से भाई माँ को अपनी बात बताई ला दो माँ ! मुझे रजाई माँ! एक टोपी भी बना दो बाजार से कोट मँगा दो मौजें ,मफलर और स्वेटर मेरी सर्दी दूर भगा दो खाने में हलवा बनाना गर्म-गर्म सूप पिलाना गर्म पानी से मुझे नहाना घर से बाहर नहीं…
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संवेदनहीन आत्मा
डाॅ. शुभदर्शन, अमृतसर (पंजाब), मो. 9417290544 दरीचों से चुपचाप सरक गया कोई सोचा, हवा की ही कोई करामात होगी पर, कोलाहल बढ़ता गया आवाज़ कानों के छेदों को चीर करीब आने लगी तो जाना अंदर से ही टूट रहा है कुछ बिना कोई गिला-शिकवा किए ऐसा तो कभी न था कि बिना कोई बात किए दुख-सुख सांझा करने की आदत छोड़ चुपचाप…
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दोहे
सत्येन्द्र सिंह सत्य, दर्बी चाय बगान, सिल्चर (असम), मो. 9435898557 प्रिय की प्रीत पिरोय हिय, नित्य निहारूँ राह ! नैनो मे मेरे पले, पिया दरश की चाह!! हिय पर मेरे छाय जब, यादों का मधुमास! अधरों पर है नाचती, चुंबन की तब आस !! आँखों को तुम दे गये, बूँदों की सौगात ! साजन सेज सजाय मैं, सिसकूँ सारी रात…
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कविता
सूर्य प्रकाश मिश्र, वाराणसी, मो. 9839888743 तितली ने फूलों के रस से  लिख डाली उपवन पर कविता  गुड़हल, कनेर, बेला, जूही  चम्पा के जीवन पर कविता  झूमती नीम, हँसती चिलबिल  गुलमोहर का सोने सा दिल  गेंदा गुलाब में द्वितीय कौन  निर्णय कर पाना है मुश्किल  क्या अनुभव करती नागफनी  उसके अन्तर्मन पर कविता  …
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प्रहरी
हे आँसू! तुम बने रहना निरंतर मेरी आँखों में ताकि ये आँखें न उठ सके किसी की ओर बुरी दृष्टि से न ही ये आँखें देख सकें किसी दूसरे की आँखों की व्यथा। हे पीड़ा! तुम भी मत साथ छोड़ना मेरे मन का ताकि मेरा मन समझ सके दूसरे मन की पीड़ा को और न कर सके विचार किसी दूसरे को पीड़ा पहुँचाने का। हे मौन! तुम बसे रहना स…
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अश्रु
श्याम बाबू शर्मा, शिलोंग, असम, मो. 9863531572  मॉल में बिके रिश्तों के पैबंद  लगे भावों के भाव  आई सेल सहिष्णुता की  बोली सम्मान स्वाभिमान की  नीलाम हए  उतारे गए अश्रु  कभी उस्ताद पर  यकायक माँ की याद पर  कभी रोकड़ पर  नहीं मिले  महरूम पर  महंगाई पर औरत की तपिश में आंच पर  मजहबी खेल पर  अश्रु नद…
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संपादकीय
देवेन्द्र कुमार बहल  दिनांक - 23-11-2021 आदरणीय गिरीश पंकज जी और प्रो. संजय द्विवेदी जी,                                          सादर सप्रेम नमस्ते ! आपके बदौलत- कामयाबी-ए-तक़्दीर में एक और अहम इजाफ़ा-तहेदिल से शुक्र गुज़ार हूँ। मेरे लिए यह सम्मान महज़ निशाने इम्तियाज़ी ही नहीं बल्कि मेरी …
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ख़ामोशी का रिश्ता
‘एक क़तअ़ा अमृता के नाम’ उपन्यास के कुछ अंश जहाँ साहिर लुधियानवी का ज़िक्र आया है।   डाॅ. उमा त्रिलोक, मोहाली, चण्डीगढ़, मो. 9811156310 साहिर लुधियानवी के नाम के साथ, सहज ही अमृता का नाम जुड़ा हुआ है। साहिर और अमृता दोनों ने अपने अच्छे- बुरे और सुख दुख के दिन खुद मुख़तियार होकर जिये । वह ज़िंदगी की पगड…
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कविता
अरविंद अवस्थी,  मिर्जापुर (उ.प्र.), मो. 9648388889, 9161686444  ज़िद ज़िद्दी होती है वह हवा जो निर्दोष दीये को बुझा देती है एक झोंके में ज़िद्दी होती है वह नदी जो उफनती है बरसात में और लील जाती है कई मासूम बस्तियाँ ज़िद्दी होती है वह आग  जो एक चिंगारी से  भड़कती है और जलाकर खाक कर देती है भूखी- प्…
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साहिर के गीतों में राग
के. एल. पाण्डेय, लखनऊ, मो. 9129506111 यद्यपि राग का चयन संगीतकार का कार्य है, फिर भी यह गीतकार की रचना के ऊपर निर्भर करता है की वह किस मूड की है तथा फ़िल्म के किस प्रकार के दृश्य या परिस्थिति पर फ़िल्माई गई है. यहाँ यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है की गीत पहले लिखा गया है अथवा धुन पहले बनाई गई है । …
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साहिर लुधियानवी और उनकी शायरी
प्रकाश पंडित  शायर की हैसियत से ‘साहिर‘ ने उस समय आँख खोली जब ‘इकबाल‘ और ‘जोश‘ के बाद फिराक़‘, ‘फैज‘, ‘मजाज‘ आदि के नामों से न केवल लोग परिचित हो चुके थे बल्कि शायरी के मैदान में इनकी तूती बोलती थी। ऐसे काल में, जाहिर है, कोई भी नया शायर अपने इन सिद्धहस्त समकालीनों से प्रभावित हुए बिना न रह सकता…
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फिर उग आया हूँ
सुजाता काले, पंचगनी, मो. 9975577684 कट गया पर उग आया हूँ, देख तेरे सहर में फिर आया हूँ। रात ही तो बीती थी कटने के बाद मैं जिंदा हरा भरा दिल लाया हूँ। जड़ से उखाड़ दिया, धड़ से गिरा दिया बाजू कटी है मेरी पर मैं खिल आया हूँ।  देख तेरे सहर में फिर आया हूँ। तनिक गम नहीं है कट जाने का पर जिंदा हूँ इसलि…
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उस महल की सरगोशियाँ
लघुउपन्यासिका     नीलम कुलश्रेष्ठ, अहमदाबाद (गुजरात), मो. 09925534694 उस छोटी क्यूट सी सफ़ेद फ़िएट कार का दरवाज़़ा खोलते हुये मीना देवी की बगल में बैठते हुये उसे रोमांच हो आया था। ये किसी राजपूती रजवाड़े की भूतपूर्व राजकुमारी एक लोकल चैनल की पी आर ओ थी। दिल्ली दूरदर्शन कम था जो शहर में ये दूसरा चैनल खु…
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