Abhinav Imroz, July 2012


सम्पादकीय



          अभिनव इमरोज़ के अंक 2 में हमने अपनी एक खास जरुरत का इजहार किया था कि नए सफर, नई राहों और नई मंजिलों की ओर हमारे कदम तो उठ चुके हैं और अब अभिनव इमरोज़ को जरुरत होगी, सुधी पाठकों, प्रबुद्ध लेखकों, साहित्य में रुची रखने वाले बुद्धिजीवी सरंक्षकों और कारवां की रहनुमाई के लिए ऐसी हस्तियों की जो जिन्दगी और अदब की बारीकियों और नज़दीकियों से बा-खूबी वाकिफ और समाजी सलाहीयतों से भरपूर हों। हमारी यह ख्वाहिश एक ऐसे मक्कस वक्त पर दर्ज हो गई कि 'अभिनव इमरोज' को प्रो० डॉ० सादिक का आशीर्वाद हासिल हो गया। यह अभिनव इमरोज़ कीखुश किस्मती है कि अगाजे सफर से ही अदबी रहनुमाई मुकर्र हो गई। ऐसे सजग, अग्रणी और दार्शनिक बहुमुखी साहित्यकार का साथ दरकार हो जाने से साहित्य सेवा की चाहत में रुहे यकीन तहलील हो गया। हौसलों में साबित कदमी का अहसास महसूस होने लग गया है। यकीनन हम अपने आदर्शों की कसौटी पर खरे उतरेंगे। किसी "गुट" और "वाद से जुड़े बिना साहित्य के बुनियादी असूलों और इनसानी कद्रों से भरपूर साहित्य का सृजन एवम् प्रकाशन कर पाएंगे।


        प्रस्तुत अंक में आज की हिंदी गजल पर विशेष सामग्री प्रस्तुत की जा रही है, इसका चयन गज़लकार श्री नरेश शांडिल्य द्वारा किया गया है। आशा है पाठक इन गज़लों का आनंद उठाएंगे। हमारा प्रयास है कि हिंदी गज़ल तथा गज़लकारों की सही तस्वीर उभर कर सामने आये। इस अंक की तैयारी के दौरान हमें हिन्दी गजलकारों से और अलोचक डॉ. गुरचरण सिंह से रु-व-रु होने का मौका मिला। पिछले पचास सालों में हिन्दी । गज़ल ने जो नए अयाम हासिल किए हैं उससे हमारी वाकूफियत बढ़ी है। हिन्दी गजल पूर्णरुपेण विधा का रुप लेने की ओर अग्रसर हो रही है। उसी से उत्साहित हो कर हिन्दी गज़ल, आलोचना, समीक्षा और हिन्दी गज़लकारों से समय-समय पर साक्षात्कार को 'अभिनव इमरोज़' में स्थाई स्तंभ बनाने की योजना पर विचार हो रहा है। उम्मीद है इससे हमारे अदबी दायरे को विस्तार मिलेगा और हम पाठकों को उच्चस्तरीय साहित्य मुहैय्या कर पाएंगे।


               इस अंक के कवर पृष्ठ के लिए जो कहना चाहता हूं वह डॉ. रमेश सोनी की ये पंक्तियां कह सकने में पूर्ण रुप से सक्षम हैं। "नदी! याद है तुम्हें? तुमने उसी दिन कहा था-क्या मैं समुद्र नहीं हो सकता? बस वह दिन था, कि मैंने समुद्र बनने की शुरुआत की थी। तुम तो अच्छी तरह से जानती हो नदी । मैं चट्टान था। तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए चूर-चूर होकर बालू होता गया। और उधर तुम चुप-चुप होकर समुद्र की अंधी तलाश में जुटी रहीं। मैं तो तुम्हें अनायास रास्ते में एक चट्टान की तरह मिल गया था? इसलिए समुद्र बनने की धुन में चूर-चूर होकर बालू बनता चला गया। तुम्हारे जल पर अपना प्रतिबिम्ब देखते हुए आश्वस्त था, कि मैं आहिस्ता-आहिस्ता बालू की तरह तुम्हारी गहराई में पहुँच रहा हूँ।........जब की सच्चाई इसके एकदम विपरीत निकली....मैं नहीं जानता तुम कहाँ हो...नदी। नदी, तुम नहीं जानती “मैं तुम्हारा समुद्र कहाँ हूँ...


                    " शशिकांत का यह शेर "अभिनव इमरोज़” के सफ़र का प्रतीक है


                                        हमराह मेरे और भी राही हैं दोस्तो!


                                        ऐसा नहीं कि मैं ही अकेला सफर में हैं।