माँ गाँव में है

माँ गाँव में है


 


चाहता था


आ बसे माँ भी


यहाँ, इस शहर में।


 


पर माँ चाहती थी


आए गाँव भी थोड़ा साथ में


जो न शहर को मंजूर था न मुझे ही।


 


न आ सका गाँव


न आ सकी माँ ही


शहर में।


और गाँव


मैं क्या करता जाकर!


 


पर देखता हूँ


कुछ गाँव तो आज भी जरूर है


देह के किसी भीतरी भाग में


इधर उधर छिटका, थोड़ा थोड़ा चिपका।


 


माँ आती


बिना किए घोषणा


तो थोड़ा बहुत ही सही


गाँव तो आता ही न


शहर में।


 


पर कैसे आता वह खुला खुला दालान, आंगन


जहाँ बैठ चारपाई पर


माँ बतियाती है


भीत के उस ओर खड़ी चाची से, बहुओं से।


करवाती है मालिश


पड़ोस की रामवती से।


सुस्ता लेती हैं जहाँ


धूप का सबसे खूबसूरत रूप ओढ़कर


किसी लोक गीत की ओट में।


आने को तो


कहाँ आ पाती हैं वे चर्चाएँ भी


जिनमें आज भी मौजूद हैं खेत, पैर1, कुएँ और धान्ने2।


बावजूद कट जाने के कॉलोनियाँ


खड़ी हैं जो कतार में अगले चुनाव की


नियमित होने को।


 


और वे तमाम पेड़ भी


जिनके पास


आज भी इतिहास है


अपनी छायाओं के।



  1. जहाँ फसल काट कर लाई जाती है ताकि दाने निकाले जा सकें।

  2. धान्ने: नहर से खेत तक लाने के लिए बनाई बई बड़ी नालियाँ


 माँ


रोज सुबह, मुँह-अँधेरे


दूध बिलोने से पहले


माँ चक्की पीसती,


और में


घुमेड़े में


आराम से


सोता।


 


तारीफों में बँधी


माँ


जिसे मैंने कभी


सोते


नहीं देखा।


 


आज


जवान होने पर


एक प्रश्न घुमड़ आया है-


 


’पिसती


चक्की थी


या माँ?’


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