संपादकीय

संपादकीय


मोहब्बत कायनात की उस क्यारी का नाम है जिसमें ऐसे फूल खिलते हैं जो कभी मुरझाते नहीं। कभी प्यास बन कर तो कभी आस बनकर और कभी हौसला-ए-दोस्त बनकर एक अहसास को ताज़िदगी मुसलसल जिंदा रखते हैं और इनसानी बुजुद की शमां रोशन रहती है।


              यह मोहब्बत के फूल एक कुदरती सम्मोहन के तहत फलते फूलते रहते हैं और अपने सौंदर्य और सुगंध से प्रेम, प्रेरणा और करूणा की ऊर्जा से आप के व्यक्तित्व को उत्कर्षित करते हैं।


               जिस कुदरती मोहब्बत का ज़िक्र हो रहा है उसका सफर इश्के मिजाजी से शुरु होता है और इश्के हकीकी में ब्याँ होता रहता है, कभी अतल पर और तो कभी धरातल पर। अंतश्चेतना के हिम शिखर से हकीकी में ब्याँ होता रहता है, कभी अतल पर और तो कभी धरातल पर। अंतश्चेतना के हिम शिखर से बहती आ रही निर्मल, अविरल गंगधार का नाम ही प्रेम है। जिसकी लहर लहर केवल जीवन को ही नहीं बल्कि पूरे परिवेश को भी स्पंदित कर देती है। प्रेम के लिए जड़ और चेतन एक समान हैं। याद आ गया एक दोस्त की वसीयत का अंश :


             ... बेटा! जीवन की आखिरी शाम कहां और कब ढलेगी, आखिरी साँस कहाँ और कैसे निकलेगी? कह नहीं सकता। लेकिन जो भी जैसे भी हो कबूल है। अंत्येष्टि भी जैसे चाहो कर देना लेकिन मेरी आखिरी ख्वाहिश है कि मेरे देहावशेष (राख/भस्म) गाँव पहुँचा देना जहाँ मेरी नाभिनाल दबी हुई है। ख़ाकेजिस्म पीर पहाड़ी पर लगे पीपल के पेड़ के नीचे दबा देना जिसके साए में मैंने ज़िन्दगी के फलसफे को आत्मसात् किया था। और इसी के साये में बैठकर नसीमे सहर से मेरी सांसों ने गुनगुनाना सीखा था। इस पीपल ने हर परिन्दे को पनाह दी, हर बटोही को अपनी छाया का सुख दिया। इस पीर पहाड़ी की बगल में पूर्व की ओर शिवमंदिर है और पश्चिम की ओर मस्जिद- जिस की आरती और अज़ान ने मेरे संस्कार पुष्ट किए- यह गाँव और यह पीर पहाड़ी मेरे रूहे सकुँ के लिए ही अहम मुकाम होगा.....


“यह ज़िदगी उसी की है जो किसी का हो गया ये कुदरती मोहब्बत का पैगाम है और लुत्फे जिदगी का जाम....