ग़ज़ल

ग़ज़ल


परदे पर मंजर दिखता है


अंदर में बाहर दिखता है


मेरे शहर में बसने वाला


हर इन्सां बेसर दिखता है


फूल बदन बातों में सख़्ती


मोम यहां पत्थर दिखता है


आँखों में नफरत की ज्वाला


हाथों में खंजर दिखता है


कब आता है मयखाने में


जाम में जिसको घर दिखता है


उजली चादर पलटो तो


क्या गंदा बिस्तर दिखता है


आप ‘कुमार’ उस पर मरते हैं


दूर से जो दिलवर दिखता है



आ धूप तू यहां बिखर


ठिठर रहा है हर बशर


चुप न बैठ खोल पर


उड़के छू ले सब शिखर


रोशनी तू फैल जा


जुल्मतें हों बेअसर


घटायें घिर के आयेंगी


तिश्नगी ज़रा ठहर


क्या मिलेगा फूल-फल


काटता है तू शज़र


उससे सवाल क्या किया


आता नहीं है अब नज़र


ठोकरें हैं राह में


चल ‘कुमार’ देखकर



तूझसे मिलके छूट गया हूँ,


अपने आपसे रूठ गया हूँ


टूट के तुझको चाह रहा था


चाह के तुझको टूट गया हूँ


मुजरिम हूं ये जुर्म है मेरा


दर्द की दौलत लूट गया हूँ


तंज का पत्थर किसने मारा


एक घड़ा-सा फूट गया हूँ


जो दुश्मन था उसे ग़म में


अपना सीना कूट गया हूँ


आज ‘कुमार’ इस तप्ती रूत में


धर से पहने बूट गया हूँ



दिल उसको चाहता है


वो मेरा आसरा है


क़रीब उसके बहुत हूँ


मगर इक फासला है


ज़माने को न चाहो


ज़माना बेवफा है


करे जो बात हंसकर


समझ लेना ख़फा है


रखे है बन्द पलकें


मगर जागा हुआ है


नया कुछ हो ग़ज़ल में


वो लिखता-फाड़ता है


‘कुमार’ अब तक हवस का


न थमता सिलसिला है


 



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