कलम का रूदन

अब तो अपने देश की दुर्दशा देख कर मन के साथ कलम भी विद्रोह करने लगी है। उत्कृष्ट भारतीय संस्कृति का अद्यःपतन सहन की सीमा पार कर गया। कोई क्षेत्र न बचा जो पावन, शान्तिप्रद हो। आडम्बर, बनावट को ही देशभक्ति का आवरण पहना भ्रमजाल फैला रहे हैं। हम भारतीय हैं। महान भव्य देश के नागरिक यह बात विस्मृति हो गई। -खैर रहेंगे तो भारतीय ही - कान्ति अय्यर


कलम का रूदन


हमारी कलम विद्रोही,


हठीली हो गई।


मेरे शब्द बसंत बहार,


फूलों का खिलौना


भंवरों की गुनगुनाहट,


तितलियों की उड़ान


रोमांच होना, प्रेमगीत


ऊब गई हूँ।


 


कलम अखबारों में पढ़ती


टी.बी. में देखती


लोगों के शर्म से


झुके चेहरे पढ़ती,


रो उठती है।


 


यह क्या हो रहा है?


मानव-मानवता का निकंदन


अनैतिक आचरण,


भ्रष्टाचार-अनाचार


विस्तृत स्खलन!


 


क्या यह नई दुनिया है?


क्या यही इक्कीसवीं सदी की


प्रगतिशील संस्कृति?


 


मैं, कलम कहती/स्याही नहीं


फौलादी अक्षर लिखना चाहती


चिन्गारी फूँकना चाहती।


 


जो नवजान गुमराह हो रहे,


युवतियों को जो


स्वतंत्रता के नाम,


स्वच्छंदता का घूंट पिला रहे।


 


प्रगति को भ्रमित करती जाहरातें।


वेदना के स्वर, पीड़ा की पराकाष्ठा


बलात्कार का राक्षसी व्याप्त


नहीं सह सकती।


कलम आग उगलना चाहती।



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