कविता

कविता


काया अस्तित्व की


पंचतत्व मयी,


काया अस्तित्व की,


असत्य में खोयी


झूटा कल बीत गया,


झूटे वर्तमान में।


झूट आगे आगे चले,


कल की उड़ान में।


अपनी सोच, अपनी पहचान,


कहाँ खोयी।


भाषा से खिलबाड़,


संस्कृति को बिगाड़,


बिखरी बिखरी सुधियाँ


मानस पर पड़ी भार।


गुमसुम है सुगना सी,


उम्र भी रोयी।


समय की दहलीज,


लांघ गया सपना।


धंुबे मे घुट रहा,


अपनापन अपना।


बहकाये आन बान,


मन सुने न कोई


 


टेढी पगडंडी पर,


बहके बहके कदम।


नन्हें हाथ बाहों में,


बड़े-बड़े आश्वासन।


बिसराया भोलापन,


आँख पानी धोयी।


 


खोजी को ढूंढे कौन?


मोती तलाश करे।


सागर में उतरे कौन?


लहर लहर घात चले।


जिन्दगानी डूब रही,


उबरे न कोई।



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