आस का दामन’, सेदोका छंद

प्यार से भरा


हृदय न तोड़ना


नेह चाहूं जोड़ना


तुम्हारे संग


 


सांझ ढ़लते


हृदय का दीपक


बुझने है लगते


कभी तो आओ


 


आकर देखो


आकुल तुम बिन


तरसे मेरा मन


घायल पड़ा


 


जीवन सांझ


ढ़लने को है अब


छलकते नयन


चली न जाऊं


 


एकाकी सोचे


मैं नितांत अकेली


जैसे एक पहेली


कोई बुझाये


 


मीत ये प्रीत


अधूरी ना रह जाये


कहीं छुट न जाये


आस का दामन



Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

एक बनिया-पंजाबी लड़की की जैन स्कॉलर बनने की यात्रा

अभिनव इमरोज़ सितंबर अंक 2021