ग़ज़लें

हो चुका है सब


तू रचेगा अब


कुछ नहीं था तब


क्या नहीं तू अब


भूलना मुश्किल


वो अनोखी छब


है कहाँ तू अब


जानता है रब


तू मिलेगा तो


राम जाने कब


वो मेरा चेहरा न हुआ


मैं भी शर्मिंदा न हुआ


मैं उसका हिस्सा न हुआ


मुझको ये धोखा न हुआ


सब उसका सोचा न हुआ


वो मेरा रस्ता न हुआ


मैं उसकी भाषा न हुआ


तो मेरा चर्चा न हुआ


होने को क्या क्या न हुआ


मैं ही बस अपना न हुआ



Popular posts from this blog

भारतीय साहित्य में अन्तर्निहित जीवन-मूल्य

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

बाल स्वरूप राही