लेख

मनोहर पर्रिकर का आत्मचिंतन



'(स्वादुपिंड के) कैंसर से पीड़ि़त अस्पताल में जीवन के लिए जूझ रहे मनोहर पर्रिकर का आत्मचिंतन...'


मूल मराठी - अनुवाद पुखराज सावंतवाडी' द्वारा 'कुमार निखिल'


 


जब पूर्व रक्षा मंत्री और गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर जी कैंसर से जूझ रहे थे, तब अस्पताल के बिस्तर से लिखा गया उनका यह संदेश सारस्वत सत्य होते हुए बहुत मार्मिक है....


'कृपया समय निकाल कर आप भी अवश्य पढ़ें...'


''मैंने राजनैतिक क्षेत्र में सफलता के अनेक शिखरों को छुआ...


दूसरों के नजरिए में मेरा जीवन और यश एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं...


फिर भी मेरे काम के अतिरिक्त अगर किसी आनंद की बात हो तो शायद ही मुझे कभी प्राप्त हुआ...


आखिर क्यो ?


तो जिस चवसपजपबंस ेजंजने जिसमें मैं आदतन रम रहा था... आदी हो गया था वही मेरे जीवन की हकीकत बन कर रह गई...


'इस समय जब मैं बीमारी के कारण बिस्तर पर सिमटा हुआ हूं, मेरा अतीत स्मृतिपटल पर तैर रहा है... जिस ख्याति प्रसिद्धि और धन संपत्ति को मैंने सर्वस्व माना और उसी के व्यर्थ अहंकार में पलता रहा... आज जब खुद को मौत के दरवाजे पर खड़ा देख रहा हूँ तो वो सब धूमिल होता दिखाई दे रहा है साथ ही उसकी निर्थकता बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूं...'


आज जब मृत्यु पल पल मेरे निकट आ रही है, मेरे आस पास चारों तरफ हरे प्रकाश से टिमटिमाते जीवन ज्योति बढ़ाने वाले अनेक मेडिकल उपकरण देख रहा हूँ । उन यंत्रों से निकलती ध्वनियां भी सुन रहा हूं... इसके साथ साथ अपने आगोश में लपेटने के लिए निकट आ रही मृत्यु की पदचाप भी सुनाई दे रही है...


अब ध्यान में आ रहा है कि भविष्य के लिए आवश्यक पूंजी जमा होने के पश्चात दौलत संपत्ति से जो अधिक महत्वपूर्ण है वो करना चाहिए। वो शायद रिश्ते नाते संभालना सहेजना या समाजसेवा करना हो सकता है।


निरंतर केवल राजनीति के पीछे भागते रहने से व्यक्ति अंदर से सिर्फ और सिर्फ पिसता... खोखला बनता जाता है...


बिल्कुल मेरी तरह।


उम्र भर मैंने जो संपत्ति और राजनैतिक मान सम्मान कमाया वो मैं कदापि साथ नहीं ले जा सकूंगा...


दुनिया का सबसे महंगा बिछौना कौन सा है, पता है ?...


''बीमारी का बिछौना''...


'गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर रख सकते हैं... पैसे कमा कर देने वाले मैनेजर मिनिस्टर रखे जा सकते हैं परंतु अपनी बीमारी को सहने के लिए हम दूसरे किसी अन्य को कभी नियुक्त नहीं कर सकते हैं...'


खोई हुई वस्तु मिल सकती है । मगर एक ही चीज ऐसी है जो एक बार हाथ से छूटने के बाद किसी भी उपाय से वापस नहीं मिल सकती है।


वो है... अपना ''आयुष्य''... ''काल''... ''समय''


ऑपरेशन टेबल पर लेटे व्यक्ति को एक बात जरूर ध्यान में आती है कि उससे केवल एक ही पुस्तक पढ़नी शेष रह गई थी और वो पुस्तक है ''निरोगी जीवन जीने की पुस्तक''...


फिलहाल आप जीवन की किसी भी स्थिति- उमर के दौर से गुजर रहे हों तो भी एक न एक दिन काल एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है कि सामने नाटक का अंतिम भाग स्पष्ट दिखने लगता है...


'स्वयं की उपेक्षा मत कीजिए... स्वयं ही स्वयं का आदर कीजिए...दूसरों के साथ भी प्रेमपूर्ण बर्ताव कीजिए...'


लोग मनुष्यों को इस्तेमाल (नेम) करना सीखते हैं और पैसा संभालना सीखते हैं। वास्तव में पैसा इस्तेमाल करना सीखना चाहिए व मनुष्यों को संभालना सीखना चाहिए... अपने जीवन की शुरुआत हमारे रोने से होती है और जीवन का समापन दूसरो के रोने से होता है... इन दोनों के बीच में जीवन का जो भाग है वह भरपूर हंस कर बिताएं और उसके लिए सदैव आनंदित रहिए व औरों को भी आनंदित रखिए...''