ग़ज़लें

जा रही है न आँख की आदत


पड़ गयी ताक-झांक की आदत


 


नाचते मोर, बाज़ उड़ते हैं


जो कराये न पांख की आदत


 


अब न कोई विशेष पैमाना


मानती है छटांक की आदत


 


तुच्छ इंसान को बना जाती


उच्च को निम्न आंक की आदत


 


ख़्वाब क्या भेड़ बकरी हैं


छोड़ दे यार हांक की आदत


 


एक नाली न पार होती है


याद दीवार डांक आदत


 


ख़ूब ये ओस-चाट लिप्सा है


और है धूल-फांक की आदत


 


 


 


भूलकर एतबार मत करना


अब भी इंतज़ार मत करना


 


दुश्मनी, दोस्ती, दग़ाबाज़ी


कुछ करे यार-यार मत करना


 


मांगना एक बार काफ़ी था


याचना बार-बार मत करना


 


आख़िरी बार ये रफ़ू होगा


स्वप्न-पट तार-तार मत करना


 


ख़ूब फैली हुई रवानी हैं


अब नदी आर-पार मत करना


 


जा रहे हो जहां पिटे, रुस्वा


अब वहां प्यार-वार मत करना


 


चाल बाज़ार की समझ लेना


एकदम रोज़गार मत करना



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