धर्म का मर्म

एक बीज धरती में


जब भी गिरता है


पहले माटी में


मिलकर / मिटता है


ऐसे ही जीवन में


झुकना


धरती सा होना


क्षमा और अहं


गला कर


सबसे मिलना


मृदुता है


 


उगा अंकुर


सीधा होकर


जैसे ऊपर उठता है


तन-मन प्राणों का


सीधा होना


ऊँचे उठना


ऋजुता है


 


फिर जो माटी


शेष रही अंकुर पर


उसे हटा कर


नन्हीं कोंपल


प्रकाश में आकर


जैसे खिलती है


ऐसे ही जीवन में


लोभ-विकार हटा कर


निज प्रकाश में आना


खिलना


सत्य और शुचिता को


पाना है


 


अब नन्हे पौधे को


जैसे बाड़ लगा कर


हम बचा लिया करते हैं


ऐसे ही


अपने जीवन को


मन को


हर एक बुराई से


हमें बचाना


संयम से रहना है


 


फिर जैसे पौधा


गर्मी, सर्दी, वर्षा


सह कर


बड़ा वृक्ष बनता है 


ऐसे ही जीवन में


सब कुछ सहना


और जीतना मन को


उत्तम तप करना है


और वृक्ष से सूखे पत्ते


पतझर आने पर


जैसे झरते हैं


वृक्ष प्रतीक्षा में


वसंत की


जैसे मौन


खड़े रहते हैं


ऐसे ही जीवन में


अविनश्वर को पाने


जो भी नश्वर है


उसे सहज


चुपचाप छोड़ना


त्याग धर्म पाना है


 


अपने सुरभित


पुष्प लुटा कर


जैसे वृक्ष


अडिग, अकेले


आनंदित रहते हैं


ऐसे ही जीवन में


सबके बीच


स्वयं को


एकाकी पाना


मैं और मेरेपन की


मन में बात नहीं लाना


आकिंचन्य होना है


घने वृक्ष की छाया


जैसे सबको मिलती है


उसमें जैसे


अपने-दूजे का


भेद नहीं है


ऐसे ही जीवन में


सब में पाना ब्रह्म


सभी को अपनाना है


और वासना में जाती


जीवन की धारा


बड़े जतन से


अपनी ओर


बहा लाना है


यही ब्रह्म में रमना


ब्रह्मचर्य पाना है


अंतर


 


ये मंदिर इसलिए कि हम


आ सकें


बाहर से भीतर


 


ये मूर्तियाँ अनुपम सुंदर


इसलिए कि हम पा सकें


कोई रूप अपने में अनुत्तर


 


और श्रद्धा से झुक कर


गलाते जाएँ


अपना मान-मद


पर्त-दर-पर्त निरंतर


 


ताकि कम होता जाए


हमारे और प्रभु के


बीच का अंतर


 


सबूत


 


ये लोग


पूरा जीना


नहीं चाहते...


परस्पर


एक दूसरे से


ज़्यादा विख्यात


होना चाहते हैं...


जो इनके


अधूरेपन का


सबूत है


 


साकार और निराकार


 


साकार


जहाँ सब कुछ


दिन की रोशनी  सा


साफ दिखता है


देखो....


 


निराकार


जहाँ कुछ


होते हुये भी


नहीं दिख पाता


सोचो....


 


कौन साकार


कौन निराकार


किसमें किससे ज़्यादा


‘मैं’ का आधार


 


 


हर वक्त


 


पुराने को


न चाहते हुए भी


बीत जाना है...


और नये को अनायास


पुराना होकर


मर जाना है...


पर हमें तो


हर वक्त


दोनों का साथ


निभाना है


 


हमारा मन


 


किसे/किसने


पकड़ा है...


कौन/किससे


बँधा है...


ये तो बंधने की


बांधने की


वासना से


साफ ज़ाहिर है...


 


पर हम, हमारा मन


जिसे अपने


खुलेपन पर नाज़ है...


दुनिया की


हर चीज़ से


बंधकर भी


स्वयं को


अलिप्त/अबद्ध मानता है...


 


पहली बार रोका था


 


मैं अपने को


खोजने निकला था


लोगों के मन


ये पलायन था........


 


मेरा सड़कों पर


निरावृत घूमना


औरों के मन


निरा पागलपन था...


 


मेरे मित्रता के लिये फैले


दो हाथों को


लोगों ने सरासर


वासना कहा था...


 


मेरा मौन


औरों के लेखे


सिर्फ अहंकार था...


 


मेरी ऋजुता


मेरा सीधापन


औरों के मन


कायरता था...


 


मेरी मृदुता


मेरा मीठापन


कमज़ोरी था...


 


मेरे जीवन का


सब शुभ सुंदर


औरों को


बस आत्म हनन था...


 


ये सब मैंने


चुपचाप सहा था


 


पर जब


किसी ने मुझे


ऊँचे आसन पर बिठा


देव कहा था


और मेरे


आदमी होने को नकारा था


तब मैंने


पहली बार उन्हें


ऐसा करने से रोका था...


 


 


वृक्ष और मानव


 


बीज गिरा


अंकुर फूटा


पौधा उगा


पेड़ हुआ,


वो पेड़ ही था


छायादार


फल-फूलदार


भरा-पूरा


सबका शुक्रगुज़ार,


उसमें रूप था


रंग था


यौवन था


वो सृजन को आतुर


बेमिसाल फनकार था...


 


उसकी जड़ें


ज़मीन में


और फूल


आकाश में था,


तब आकाश


ज़मीन के


इतने करीब आया था


ज़मीन ने


उसी रोज़


आकाश को


अपना सब सौंपा था.


 


फल लगे


पेड़ झुका


ये पेड़ का


ज़मीन को नमन था.


 


अजीब हो


मैं पेड़ लिख रहा हूँ


तुम कविता समझ रहे हो....


 


जिसका था


उसी को अर्पण था.


 


जड़ें धरती की


शेष सब


आकाश का/सबका था.


 


पेड़ का निजी


कुछ भी नहीं था,


ये ही उसका


जीवन था...    


 


बीज गिरा


अंकुर फूटा


पौधा उगा,


बड़ा हुआ


ये मनुष्य था


 


बलात्


औरों के सृजन का दावेदार


रूपदार, रसदार


पर आधा-अधूरा


और मक्कार.


 


किसी को क्या देता,


औरों को लूटकर/हटाकर


अपने लिये


जगह बनाता था...


इसकी जड़ें  नहीं थी


आकाश नहीं था


टिकता कहाँ


आवारा बना घूमता था...


 


इसे पद का मद था


अकड़ थी


झुकता कैसे


टूटने का डर था...


 


ये पैसे में फूला


और फूलता ही रहा...


 


फूलना रूकता


तो फल लगते,


फल लगते, तो झुकता


(बेचारा आदमी


इसलिये नहीं झुका)...


औरों का छीनकर


घर भरा था, ये बढ़ा था.


 


इसका निजी


कुछ भी नहीं था...


 


वो पेड़ था


और ज़िंदा था


ये मनुष्य था


पर मुर्दा था...


 


Core of Righteousness


      


Whenever a seed


Falls into the earth


First it gets intermingled


And assimilated


Into the soil


Similarly to bow down in life


To be like the earth


To meet everyone


Adopting forgiveness


Dissolving ego


Is tenderness


 


As the offshoot


Gets straightened


And rise


Likewise


The rising of


Mind-body and soul


Is pureness


 


Then the way


Removing the leftover soil


On the seed


Tiny blossom


Comes into the light


Similarly, removal of


Greed and corruption


From the life


To come out


Into the self-light


Is to achieve


Truth and chastity


 


Now the way


We secure the young plant


By raising up


The fence


Likewise


To secure


Our life and mind


From each immorality is


To live with sobriety


 


Then the way


Plant becomes a huge tree


By enduring


Heat, cold and rain


Similarly


To endure everything in life


And to win over one’s own mind


Is the best perseverance


 


And the way


Dry leaves


Fall down from the tree


On arrival of autumn


And the way


Trees stand still


Waiting for the spring


Likewise


To leave whatever is mortal


Simply, silently…


To acquire


The immortal


Is renunciation


 


The way giving away


All their fragrant flowers


Trees live


Alone


Immovable


Joyful


Likewise


To live in solitude


Amongst all


And not to ponder over


Me and mine


Is mendicity (aakinchanya)


 The way everyone


Gets the shade


Of a dense tree


Without being partial


To anyone dear or not


Likewise to see the almighty


In everyone


Is to accept all


And to divert the tide of life


That was moving to the lust


Through sheer hard work


Towards the self


This is to comprehend


The formless


To attain self-mastery


 


This is the core of righteousness


 


 


 


 


 


 


 


Gap


      


These temples…


So that we can enter


Within from without


 


These unique, marvelous idols…


For we can find


An unanswered form


Into the self


 


And by bowing down in respect


Coat by coat, ceaselessly


We may melt away


Our pride-arrogance


 


In order to


Dilute the difference


Between the divine and us


 


Evidence


      


These people


Do not want to


Exist entirely…


Mutually


They want to be


More renowned


Than each other


Which is the proof


Of their


Incompleteness


 


 


Corporeal And Incorporeal


      


Corporeal


Where everything


Is clearly visible


Like daylight


Look…


 


Incorporeal


Where


Something is there


But still invisible


Contemplate…


 


Who is corporeal


Who is incorporeal


Who has the more


Base of ‘I’


 


Our Mind


      


Who is trapped


By whom…


Who is confined


With whom…


This is clear


From the desire


Of tying


Of getting bind


 


But we, our mind


That is proud


Of its openness…


Acknowledges itself


As unattached/unbound


Despite being


Attached with everything


In the world…


 


 


Prevented For the First Time


      


I got away


To seek myself


In people’s mind


It was escape…


 


My wandering


On the streets


Bare


In people’s mind


It was sheer madness…


 


People called


My spread arms


For friendship


Stark desire…


 


My silence


Was mere egotism


For them…


 


My innocence


Mt straightness


Was cowardice


In their minds…


 


My tenderness


My sweetness


Was frailty…


 


Everything auspicious


Cheerful of my life


Was only self-harm


For them…


 


I endured all that


Quietly


 


But when someone


Made me sat


On a throne


Called me God


And negated


My being human


Then for the first time


I prevented them


From doing so…


 


 


Tree And Human


      


The seed fell


Got germinated


The plant grew


Became a tree


That was the tree only


Shady


Fruitful-flowery


Complete


Grateful to all,


It had beauty


Color


Youth


It was an incomparable artist


Eager for creation…


 


Its roots


Were in the ground


And flower


Was in the sky


When the sky


Came that closer


To the earth


That day only


The earth devoted


All that she had


To the sky


 


Fruits appeared


The tree bowed


That was tree’s homage


To the earth


 


You are strange


I am writing a tree


You are taking it as poetry


 


Whose it was


Offered to him only


 


The roots were of the earth


The rest


Was of the sky/of all


 


Nothing was


Tree's personal


This was


It's life…


 


The seed fell


Got germinated


The plant


Grew up


This was human


 


The claimant of others’ creation


Forcefully


Beautiful, delightful


But incomplete


And deceitful


 


How could he give


Something to someone


He used to rob/expel others


To make way for himself


He neither had roots


Nor sky


Where could he abide


He used to wander


Like stroller…


 


He had arrogance of rank


Had stiffness


How could have he bend


There was a fear of getting broken…


He got bloated in money


And continued to bloat


 


If bloating would have stopped


The fruits would have appeared


Then he could have bowed


 


(Poor man that’s why


he couldn’t bend)…


He snatched from others


To fill his house


To grow


 


He had


Nothing personal…


 


That was a tree


And was alive


This was a man


But dead…