दिव्य दृष्टि

जीवन का मध्याह्न मानो


व्यक्ति को एक दिव्य दृष्टि दे देता है


जहाँ से वह पीछे मुड़ कर देखे


तो वह वक़्त दिखता है


जो चाहकर भी पुनः नहीं जिया जा सकता है


एवं आगे वह भविष्य बाट जोहता है


जो चाहे जो हो आकर रहेगा


जीवन उस गाड़ी का सफर है


जो एकतरफा जाती है


बीच में किसी स्टेशन पर उतरकर


वापसी की गाड़ी नहीं पकड़ी जा सकती


ठीक उसी प्रकार जैसे तेज़ गति का वाहन पकड़


शीघ्र ही आगे नहीं जाया जा सकता


स्वीकार भाव मन को शांत रखता है


यात्री के साथ जो कुछ भी घटित होता रहे


यह गाड़ी सदैव एक निश्चित गति से चलती है


हाँ, मन के भावों द्वारा अवश्य ही यात्रा


धीरे अथवा शीघ्र तय की जा सकती है