संपादकीय

   Devender Kumar Bahl


 


डा. अवध बिहारी पाठक को मैं राजी सेठ की मारफत मिला (फोन पर) और पहली ही बातचीत में मैं उनका मुरीद हो गया। साहित्य नंदिनी में उन द्वारा की गई समीक्षाएँ लगातार छपने लगीं। आत्मीयता का आदान-प्रदान होने लगा। दो दिन फोन न आए तो तिलमिलाहट होती है। अभी उनके कुछ दोहे मिले तो मैंने उन दोहों को अपने संपादकीय का हिस्सा बना कर उन 10 दोहों के उत्तर लिख रहा हूँ।


दोहे/भावार्थ


खुद को देखूं या उन्हें, उलझ गई मन बात / मैं उनको ढूंढूं उधर, वे कहते बदज़ात


कहते बदज़ात — नाब! यह तो हुस्न वालों की एक खास अदा-ए तस्लीम है। आप भी शइराना अंदाज में ज़बाव दें, ‘‘तूने यह क्या सितम किया/ज़ब्त से काम ले लिया/तर्के बफा के बाद भी मेरा सलाम ले लिया।’’1


 


अपनों ने वंचित रखा, मेरे आंगन ठौर / मैं बस बेबस तकता रहा, पड़ा पराई पौर


अपनों ने वंचित रखा— कौन अपने ? इस ग़लतफहमी में मत रहिए। ‘‘हर एक गाम पे बदनामियों का जमघट है/ हर एक मोड़ पर रूसवाईयों के मेले हैं/ न दोस्ती, न तकल्लुफ़, न दिलबरी, न खुलूस/किसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं।’’2


 


घुले घुले रिश्ते अजब, उलझन भीगे आज / ज्यों रसाल पर गिरी हो, चटक अचानक गाज


घुले घुले रिश्ते अजब— ऐसे मुकाम, ऐसे हादसे खूब आते और होते रहते हैं ‘‘जिन्दगी में कैसे बच सकता था मैं/पीछे ठग थे आगे यार!’’3


 


मेरा अपनापन हुआ, रोज-रोज बदनाम / जब जब सपने में लिखी, चिट्ठी तेरे नाम


चिट्ठी तेरे नाम– सपनों में हुई बदनामी रोमांस और शोहरत की पहली सीढ़ी है। किसी दूसरे सपने में चिट्ठी का जवाब भी आना लाज़िम है, इंतज़ार करें।


 


तार तार सपने हुए, टूटे सब संकल्प / टूक-टूक हुई जिन्दगी, दिखता नहीं विकल्प


टूटे सब संकल्प– बिल्कुल ग़लत। संकल्प कभी टूटते नहीं, संकल्प संक्रमण काल से गुज़रते हुए ख़ुद विकल्प बन जाते हैं। शे’र पेश है:- ‘‘ग़ौहरे मक्सूद ख़ुद मिलता है/ हिम्मत शर्त है/मुन्तज़िर रहता है हर मोती उभरने के लिए।’’4


 


एक किनारे पर खड़ा, देखूं ढलती शाम / कहा अनकहा जो रहा, लिख दूं किसके नाम


लिख दूं किसके नाम— कहा, अनकहा लिखकर लिफाफे में बंदकर तैयार रखें। सरनामा भेज रहा हूँ। ‘इंसानेखास’ को मिले/ मारफत रूहे खुदाई / मोहल्ला मोहब्बतां / गाँव डाकखाना कोहेनूर / जिला हमदर्द पुर/ 110070


 


जन चोटिल होता रहा, तंत्र हुआ बेजान / न्याय कचहरी में दिखे बिलकुल लहूलुहान


दिखे बिलकुल लहूलुहान– यह शिकायत फ़जूल है। किसी विचारक ने कहा है: ‘‘तंत्र वही मिलता है- अवाम जिसके काबिल होता है / ‘‘दिल का पक्षी लहुलूहान रहा / रोज़ भरता मगर उड़ान रहा।’’5


 


बेनूरी पर जिन्दगी, रोई थी कल रात / रब ने क्यों कर? दी मुझे जलने की सौगात


जलने की सौगात– भाई साहब! बिन तपे कैसे होगा कुंदन, सोचो और विचरो नूरानी नंदन। क़सूर रब का नहीं, हमें नियामतों और रहमतों को गिनना ही नहीं आता।


 


सब की सब सुनता रहा, अपनी कही न और / चोटें भी चुपचुप सही, लगी ठौर बे ठौर


चोटें भी चुपचुप सही– यह दस्तूरे-दुनिया है कि ‘‘पहले सता के मारिए इंसान को ऋषि/फिर धूम से उसी का जनाज़ा निकालिये’’।6


 


वे प्रसन्न हैं रात दिन, करते खोटे काम / नहीं सोचते अंत में, क्या होगा अंजाम


क्या होगा अंजाम– भला ‘भाई’ तुम्हें क्या लेना देना, भाड़ में जाए ‘कोई’- ‘‘जो करन गे सो भरन गे तू क्यों भये उदास’’ माकूल फलसफा यही है- कबीरा खड़ा बाजार में माँगे सब की खैर, न काहु से दोस्ती न काहु से बैर।


 



  1. शकील वदायुँनवी, 2. साहिर, 3. हस्तीमल ‘हस्ती’ 4. अज्ञात, 5-6. ऋषिपाल धीमान ‘ऋषि’


 


नकारात्मकता को निकालिए जे़हन से, सकारात्मकता की क्यारी दुरुस्त कीजिए, सींचिए खूब; फूल खिलेंगे, बहार आएगी यकीनन......


             तमन्ना मौत की क्यों करते हो ज़िंदगी से तंग आकर।


             नतीजा मौत का भी जिंदगी निकला तो क्या होगा ?


             शबे तारीख़ कटने की दुआएं मांगने वालो


             गर दिन भी फरेबे रौशनी निकला तो क्या होगा ?    बर्क होश्यापुर


 


अवध बिहारी पाठक