ग़ज़ल

उद्भव महाजन ‘बिस्मिल’ पूणे, मो. 9423205196


 


दिल के गुलशन को ख़िज़ाओं1 से बचाए रखना,
फूल हर हाल में चाहत के खिलाए रखना।


इम्तेहाँ लेती है दुनिया ये जिगरवालों का,
खुद को हर हाल में बेबाक2 बनाए रखना


जाने वाला पलट के आएगा, दिल कहता है,
अपनी आँखों को सरे-राह3 बिछाए रखना


एक ही पल में उसे लोग अयाँ4 कर देंगे
राजे़-दिल5 सब से बहरहाल छुपाए रखना।


दोस्तो! शम्मा के परवाने से इब्रत6 लेकर,
आतिशें-इश्क7 से दामन को बचाए रखना।


फिर मसीहा8 कोई आ जाएगा मरहम लेकर
दिल के जख्मों को सलीके़ से बचाए रखना


बाद मुद्दत के जो ग़म आया है ‘बिस्मिल’ साहब,
अपने घर में उसे कुछ देर बिठाए रखना।


शब्दार्थ: 1. पतझड़, 2. ऋणमुक्त, 3. राह में, 4. प्रकट, 5. दिल का राज़, 6. मानसिक खेद, 7. इश्क़ की आग, 8. दुःख दूर करने वाला। 


 


 


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