ग़ज़ल


सतीश शुक्ला ‘रक़ीब’ मुम्बई, मो. 9892165892


 


आँखों ने कह दिया जो कभी कह न पाए लब
हालाँकि उस ने बारहा अपने हिलाए लब



चेहरे से जब नकाब हवा ने उलट दिया
देखा मुझे तो दाँत से उसने दबाए लब



मेरी तलाश पूरी हुई देखकर उसे
आँखों से आँखें चार हुईं मुस्कुराए लब



रूदादे-गम सुनाऊँ तो किसको सुनाऊँ मैं
इज़हारे गम को यूँ तो बहुत तिलमिलाए लब



सहरा में आँसुओं के समन्दर को देखकर
संजीदगी की धुन पे बहुत गुनगुनाए लब



लाली लगा के होंठ पे चमकी लगाई जो
तारों भरे गगन की तरह झिलमिलाए लब



दिल में ‘रक़ीब’ खोट थी शायद इसीलिए
इजहारे इश्क़ करते हुए थरथराए लब



लामकाँ मकीनों की, सूफियों की पीरों की
आज होंगी बातें बस इल्म के जख़ीरों की



हर ख़ुशी कदम चूमे कायनात की उसके
रास आ गईं जिसको सुह्बतें फक़ीरों की



सूर, जायसी, तुलसी और कबीर, ख़ुसरो को
बेबसी से तकती हैं दौलतें अमीरों की



जिस्म की सजावट में रह गए उलझकर जो
रूह तक नहीं पहुँची फिक्ऱ उन हक़ीरों की



हाथ ही में कातिब ने लिख दिया है मुस्तकबिल
इल्म हो जिसे पढ़ ले ये जबां लकीरों की



राहे हक़ पे चलकर ही मंजिलें मिलेंगी अब
है नहीं जगह कोई बेसबब नजीरों की



देख ले ‘रक़ीब’ आकर गर नहीं यकीं तुझको
इक गुनाह से पहले जिंदगी असीरों की


 


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