कविता


योगेश, दिल्ली, मो. 9711252888


 


साँझ


सूरज है अब थकने लगा
और आया है तपन को आराम
बुझा-बुझा सा दिन है जैसे
हुई संघर्ष की है अब शाम
          है परियाँ गायन से सराबोर
          और बादल बरसने को बेकरार
          है ओस हरे दरख्तों पर
          और पर्वत पर गीत मल्हार।
केसर का कण-कण हो
और सागर में शीतल तरंग
उड़े पुरर्वाह हौले से
लेकर मेरे प्रिय के रंग
          रसीले फल जैसे शहद की गगरी
          झरने की धीमी पुकार है
          प्रेम-प्रण्य बहे हवा में
          सुगंधित सारा संसार है।
दे जलते हर दिल को ठंडक
लाई शीतलता की हो बहार
पक्षी तरस रहे हैं तुमको
और तरस रहा है जब-संसार
          है गगन आँचल तुम्हारा
          बादल जैसे परिधान हो
          चाँद तारो से भूषित गहने
          सुर्ख तुम्हारी पहचान हो।
है क्षितिज पर घर तुम्हारा
करती प्रकृति में निवास
कभी अंत, कभी आरंभ बनकर
हर कल्पना में भरती मिठास
          हर उत्सव का मौसम हो तुम
          हर ऋतु की बहार हो तुम
          प्राण बिखेरती हर जश्न में जैसे
          हर मेले मिलन का उपहार हो तुम
पुलकित नयनों का सपना हो तुम
कभी हँसी कभी संगीत हो
निखारती मेरे हर दिन को ऐसे
जीवन की मनमीत हो।
          सांझ को हर नजर खोजती
          हर क्षण को रहता इंतज़ार
          नित वरदान सा लगता है मुझको
          जब तपकर मिलती है बहार।


 


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