कविता


सूर्य प्रकाश मिश्र, वाराणसी, मो. 09839888743


 


प्रेम  


         
सच्चिदानन्द की अभिलाषा 
अनुभूति सुखद अन्तर्मन की 
आकांक्षा छूने की अनन्त 
आतुरता नव अन्वेषण की 



कामना विलय हो जाने की 
शाश्वत सरिता की लहरों में 
साधना मुखर हो जाने की 
संकल्पित मौन ककहरों में 



खो देने की हर स्वतन्त्रता 
व्याकुलता निर्मल बन्धन की 



अपना लेना वो अमिट रंग 
जो रंग देता हर स्पन्दन 
उस धुन को आत्मसात करना 
जो गाते हैं पर्वत कानन 



घुल जाना भक्ति विमल बनकर 
भाषा में अर्चन वन्दन की



सानिध्य कल्पना का लेकर 
आभास उमड़ते भावों का 
अनजाने ही अनुभव करना 
मन की असीम क्षमताओं का 



विचरण करना मृग के समान 
मुद्रा बन जाना चिन्तन की 



लिख देना नाम सुरभि बनकर 
आँचल पर स्निग्ध हवाओं के 
पढ़ लेना नैनों के जल में 
संसार उमड़ते भावों के 



हर क्षण में विद्यमान रहना 
चिन्ता बन जाना कण-कण की 



मस्ती बन जाना टहनी की
जो झिझक लिये झूमा करती 



ऊर्जा उस चील के पंखों की 
जो नील गगन चूमा करती 



सब कुछ समेट लेने की जिद 
इच्छा सर्वस्व समर्पण की 



बस जाना कल-कल स्वर बनकर 
पानी की निर्मल धारा  में 
पूजा, नमाज, कीर्तन बनना 
मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा में 



बनना जयघोष तुमुल स्वर में 
जय हो दरिद्र नारायण की