समीक्षा


गीता डोगरा, जालंधर, पंजाब, मो. 9876800379



पुस्तक: पारो - उत्तरकथा, लेखक: सुदर्शन प्रियदर्शिनी, मूल्य: 450/-, पृष्ठ: 330, प्रकाशक: सभ्या प्रकाशन, बी-3/3223, वसंतकुंज, नई दिल्ली 110070


 


पारो उत्तरकथा- प्रणय, प्राण और प्रारब्ध के मंत्र प्रतिमान


बहुत सी कथायों से गुजरते हएु जब सदुर्शन प्रियदर्शिनी का वृहद उपन्यास ‘पारो’ (उत्तर कथा) पढ़ा तो सचमुच एक अद्भुत कथा यात्रा को तय किया। हिंदी साहित्य में तो यह अपनी तरह का पहला ही उपन्यास है जो सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचन्द्र के उपन्यास देवदास से प्रभावित दिखाई पड़ता है लेकिन कई वर्जनाओं को तोड़ता हुआ एक नाजुक गंभीर चिंतनशील विषय लेखक ने बिना कोई भूमिका बांधे यह उपन्यास पाठकों के समक्ष परोसा। हमारे व्यक्तित्व में कितने ही विरोधाभास रहते हैं किन्तु प्रश्न और उनके उत्तर अपने अपने तरीकों से सभी देते हैं, पर इस उपन्यास से जो प्रश्न उठते हैं उनके प्रति भं्रांतियों तो बनी रहती हैं।
मनुष्य मन की दो अवस्थाएं तो होनी ही हैं, चेतन और अवचेतन! यह उपन्यास उसी धूरी के आसपास ही तो घूमता है। मन की इस अवस्थायों की थाह कोई नहीं पा सका। देवदास और पारो की वर्षों पहले के संशयों व मूल्यों को स्पष्ट करता कई प्रश्न करता भी है। लेखक ने निश्चय ही इस उपन्यास को नई दृष्टि से देखा परखा है, यह सब बेशक उनके मन का एक ऐसी अवस्था है जो सिद्धांत जुटाने न जुटाने की पैरवी करने का प्रयास करता नज़र आता है।?
उपन्यास के प्रारंभ मे ंही पारो देवदास को पुकारती है। यह पारो का अवचेतन मन है, उसका मन स्वीकार ही कहां करती है कि देवदास मर चुका। उसका चेतन मन जानता है पर अवचेतन मन मानने को तैयार नहीं तभी तो पारो हर समय उसके करीब जाना चाहती है। जब कि पारो पंछियों की आवाजों में भी वह देव की स्मृतियों में रहती है।
वीरेन से ब्याही पारो पतिधर्म निभाते हुए भी देवदास को स्मृतियों में बसाए हुए है। वह जानता है कि स्वप्न में वह देवदास को ही पुकारती है, यही शब्द रायसाहब को आहत करता जाता है। लेकिन वह खुद भी राधा (पहली पत्नी) को स्मृतियों में संजोये है। देवदास की माँ समय पर चेताती रहती है कि पारो उसकी कानूनन पत्नी है। वह सोचती है कि पारो ने अपने बेमेल विवाह का विरोध क्यों नहीं किया। फिर भी वह जान गई कि पारो की माँ का हठ था कि पडौसी भुवनशोम की हवेली से बड़ी हवेली वाले से पारो का ब्याह होगा यह सब शरत चन्द्र के उपन्यास और फिल्म देवदास में घटता है लेकिन कहीं कहीं ऐसे बिन्दू भी है जो नारी को पूर्ण नारी होने का श्रेय दिलाने की कोशिश करता दिखाई देता है। पारो की विवशता और समाज की प्रताड़ना उसे आहत तो करता ही है पर फिर भी धर्म निभाती अपनी दिनचर्या पूरी करती हैं। लीलामयी कहीं खुद को असुरक्षित महसूस करती है। उसे लगता है वीरेन के आगे उसका कद छोटा होता जा रहा है। उसके भीतर जैसे कोलाहल मच गया लीलामयी की दुनिया तो वीरान थी ही उसके पति कभी कोठेवालियों के समक्ष, उसे नीचा दिखाते, वह दो बच्चे पालती दूर होती गई। वीरेन भी अकेलेपन में जिया।
न दोस्त, न बाहर जाना वह एकाकी, उसे राधा और रोहणी ही दिखतीं जो प्रोफेसर थीं।
लीलामयी के मन की पीड़ा समूची औरत जात की पीड़ा है, जिसे कोई अपना नज़र नहीं आता। न वह बच्चों के संग हंसी न उनकी हो पाई। वह वीरेन को अपना दुख या राधा भी सुखी कहाँ थी, वीरेन से दुःखी हो उसने आत्महत्या कर ली, उससे शादी करना राधा के लिए साबुन की टिकिया की तरह घुलना था बस! वीरेन उस पर अधिपत्य स्थापित करने के प्रयास में लगा रहा और राधा आहत होती गई। इसका अंत राधा की आत्महत्या से हुआ।
कहानी पलटी और पारो उना गई उस हवेली में पर देव की परछाई ने उसका दामन न छोड़ा, वह हर पल उसकी समृतियों में रहा। एक दिशाहीन अंधेरे में जीती पारो सोचती है कि वह राय साहब के जीवन में आ कर क्या कमाया, देव ने उसके पांव में जो सांकल बांधी उसकी गांठ खुलती नहीं।
पारो के मन मंे चलती कशमकश उसे रायसाहब के अन्तर्मन में जाने नहीं देता, पर कभी वह पीड़ा से और कभी करुणा में आ जाती। वह अब भी रंग देव की पंसद के पहनती। 
देव की उपस्थिति कभी-कभी पारो को विचलित कर जाती है- देव कहता है- पारो, जानती हो मैंने उस रात की बारिश को गुल्लक में सम्हाल कर रखा है, मैं उन्हीं बूदों से नहाता हूँ....। ऐसे संवाद पाठक के मन में उतरते हैं और पाठक भी पारो और देव को साक्षात् देखने को मजबूर हो जाते हैं, वे अपने खो चुके प्रेम को कहां स्वीकारते हैं। देव की उपस्थिति उसे भाती भी है,  उसका अंतर्मन देव के साथ धूप में जलाता है, बारिशों मंे भीगता है, फूल खिलते हैं तो वे खिलते हैं।
इस उपन्यास का कथानक पुर्नपाठ ही है जो देवदास के इर्द गिर्द ही घूमता है उपन्यास के सारे पात्र राधा को भी गिरफ्त में बांधे हैं वीरेन भी अतीत को याद कर पश्चाताप करता है कि वह नए ढंग से जी पाता। आप वह स्वयं में दयनीय हो गया है। पारो को लगता है कि वह देवदास के साथ ही मर गई थी। उसने अपनी माँ के साथ देते हुए राय साहब से शादी की, उसकी मां ने बेशक देव की माँ का दम्भ तोड़ना था। वीरेन का पारो को न स्वीकारना उसके लिए उपकार बना।
देवदास लौकिक रूप से मात्र नाम रह गया पर पारो के लिए एक जीवंत भावना है। वह ब्याही हुई भी अनछुई, पारो की उम्र की ही वीरेन की बेटी कंचन विधवा हुई तो भी उतना ही टूटी जितना वीरेन! पारो अपना धर्म निभाती उस परिवार के साथ रही, उसने कभी शिकायत का मौका न दिया।
देवदास पारो के अवचेतन मन में फिर से उतरा जब पारो ने वीरेन का हाथ अपने कंधे पर महसूस करते ही अलग हुई देव की इच्छा थी कि वह पति के आगे नतमस्त हो जाए ताकि देव हमेशा के लिए विदा हो जाए। पर पारो की तपस्या भंग नहीं होती। रानी माँ सब जानती है, वह सोचती है- कैसी बिडम्बना है, जीवन में पास रहते भी कितनी दूरियां बनाए हैं?
इस उपन्यास में पारो देव और वीरेन राधा की दोनों कहानियां साथ ही चलती है, अपने अपने मापदण्ड हैं। दोनों की अपनी अपनी परिस्थितियां बहुत ही सुन्दर ढंग से परिभाषित हुई- पारो और वीरेन की अकेली अकेली दुनिया।
और जिन परिस्थितियों में मोड़ लेता है वह अद्भुत है। कहानी कंचन के इर्द गिर्द सिमट आती है, पारो धूरी- लेखक अन्त काल मंे पारो को चन्द्रमुखी के कोठे पर ले जाती है, पारो की माँ और वीरेन समझते हैं पर वह कहां माने? उसे तो कुछ न सूझता था पारो और चन्द्रमुखी के मध्य/महज़ भावनाओं की नदी बही।
पारो चन्द्रमुखी के व्यक्तित्व और उसके भीतर के सौन्दर्य से अभिभूत है। यही सच्चाई है। 
लेखक की कल्पना शक्ति, भाषा सरल, सटीक, सुंदर, संवाद और प्रस्तुतिकरण उम्दा। पार्वती रायसाहब की रानी तो बनी पत्नी नहीं, नारी ही रही प्रेयसी न बन सकी।
उपन्यास कथा शिल्प की दृष्टि से बेहद दिलचस्पी लिए यह उपन्यास कल्पना शक्ति से भरपूर कथानक पूर्व कथ्य पर आधारित पर कथानक को आगे ले जाने में लेखक सुदर्शन प्रियदर्शिनी सफल रहे हैं। इस उपन्यास को प्रबुद्ध पाठक मिलें, ऐसी मेरी ख़्वाहिश है।



सुदर्शन प्रियदर्शिनी, email : sudarshansuneja@yahoo.com