संस्मरणात्मक लेख


अशोक कुमार श्रीवास्तव, स्वतंत्र पत्रकार, नई दिल्ली, मो. 08587856637


                                                            
यादों के झरोखों से -जिन्हें याद कर जारवा भी कभी रो पड़े थे


पोर्ट ब्लेयर की लिंक रोड जो गोलघर और सचिवालय जंक्शन को जोड़ती है उससे मेरा अटूट सम्बन्ध रहा है। राजधानी पोर्ट ब्लेयर की इस सड़क के इर्द गिर्द रहते हुय इसके निर्माण से लेकर अपने बचपन और स्कूली जीवन की अनगिनत यादें जुड़ी हुई हैं। सन् 1962-63 के दौरान हमारे परिवार ने इस सड़क पर बने एक नवनिर्मित सरकारी मकान में शिफ्ट किया था। हमारे घर के पास ही एक सरकारी टाइप थ्री क्वार्टर था जिसमें अंडमान निकोबार पुलिस के एक अधिकारी सरदार बख्तावर सिंह जी सपरिवार रहते थे। उनके सुपुत्र सर्वजीत सिंह पड़ोस के ब्वायज़ स्कूल में मेरे सहपाठी थे। मुझे  सर्वजीत के पापा जी की रायल एनफील्ड मोटर साइकिल और रात के सन्नाटे को चीरते हुई इस मोटर साइकिल की विशेष आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंजती है। यह आवाज़ मेरे लिये उनके कर्मठ व ईमानदार जीवन की परिचायक रही है। सारा द्वीप समूह उन्हें यानी सरदार बख्तावर सिंह जी को एक मेहनती और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में जानता था। अंडमान निकोबार पुलिस में बतौर एक सिपाही के रूप में उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत की थी। और फिर अपने सद्गुणों के बलबूते वे उप पुलिस अधीक्षक के पद से रिटायर हुये थे।


सरदार बख्तावर सिंह जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है खूख्वार जारवा जनजाति से मैत्री सम्बन्ध की स्थापना। जीवन की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ी अंडमान द्वीपसमूह के जंगलों में रहने वाले पाषाण युग में ज़िन्दगी बसर करने वाले जारवा भाई-बहनों से  मैत्री अभियान का सफल कार्यान्वयन करने का श्रेय आप को ही प्राप्त है। आप के इस सतप्रयास की चर्चा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी। आकाशवाणी पोर्ट ब्लेयर की ओर से एक भेंटवार्ता की रिकार्डिंग करते हुये एक बार मैनें उनसे पूछा था कि जारवाओं से सम्पर्क स्थापित करते हुये क्या आप कभी भयभीत हुये थे ? उनका सीधा सादा उत्तर था कि जारवाओं से मिलते हुये उनके मन में हमेशा यही भाव रहा कि वे जारवाओं के हित की भावना से उनसे मिल रहे हैं इसलिये जारवा उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुॅचायेगें। सरदार बख्तावर सिंह जी के मन में यह विचार सम्भवतः उनके आध्यात्मिक जीवन शैली के कारण उत्पन्न हुआ। वे एक सच्चे सिख थे। मुझे याद है काम करते हुये वे अक्सर गुरूवाणी गुनगुनाया करते थे। शारीरिक श्रम के प्रति उन्हें गहरा लगाव था। कई बार आधी रात को डयूटी से लौट कर अपने किचन गार्डन में वे फावड़ा चलाते थे। मैंने  यह अनुभव किया कि उनका जीवन एक सच्चे कर्मयोगी का जीवन था जो प्रत्येक पुलिस अधिकारी के लिये एक आदर्श है।


द्वीप समूह के जारवा जनजाति के लोगों के प्रति उनका गहरा लगाव था। जारवा जनजाति के लोग भी उन्हें बहुत प्यार करते थे। अंडमान निकोबार प्रशासन की ओर से आयोजित कई एक जारवा मैत्री अभियानों मेें उन्होंने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी। ऐसी सूचना प्राप्त हुई थी कि आप के देहान्त का समाचार सुन कर जारवा रो पड़े थे। जारवाओं के हृदय में ऐसी मानवीय भावना को जागृत होना सरदार बख्तावर सिंह जी के कर्मयोगी जीवन को प्रमाणित करता है। आज भी  द्वीपवासियों के दिलों दिमाग में स्वर्गीय सरदार बख्तावर सिंह जी के  प्रति अनोखा आदर भाव है - एक कर्मठ, सच्चे और ईमानदार पुलिस अधिकारी  के रूप में और सबसे बढ़ कर एक सच्चे  इंसान के रूप में। 


564 शब्द- दो चित्रों के साथ- पहला चित्र सरदार बख्तावर सिंह का पासपोर्ट आकार का चित्र है। दूसरे चित्र में एक जारवा सम्पर्क अभियान के दौरान सरदार बख्तावर सिंह  बोट पर जारवाओं के एक दल के साथ दिखाई दे रहे हैं। चित्र सौजन्यः स्वर्गीय सरदार बख्तावर सिंह के सुपुत्र सरदार सर्वजीत सिंह।


 



सरदार बख्तावर सिंह जी



PHOTOGRAPH of SARDAR ... SINGH with JARWAS.jpg


 


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