सुख-दुख की पताकाएँ


जो सदा एक जगह नहीं रहते, उनका नाम है सुख-दुख। आप


सुख के पीछे दौड़ते हैं तो दुख आपके पीछे। दौड़ में तो दौड़ना ही


पड़ता है क्योंकि वहाँ खड़े रहने की जगह नहीं है। सुख-दुख की


रेखाओं का बनते और मिटते रहना आसान है। उस आसान को


हम मुश्किल मानकर जीना तो जानते हैं, पर उन रेखाओं को


आसानी से समेटना नहीं जानते।


 


दुख को सहन कर पाने से सुख मिलता है, और सुख में डूबे रहने


पर दुख आक्रमण करता है। जो इस तथ्य को समझ लेते हैं उनके


पास उदासी नहीं, आनंद की जलवायु होती है। यह जलवायु


किसी पहाड़ पर नहीं होती, उसको तो मैदान में उतरना होता है...


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