विद्रोही कवि : कवि नज़रूल इस्लाम


डॉ० रानू मुखर्जी, कलकता, मो. 9825788781



विद्रोही कवि : कवि नज़रूल इस्लाम


अपनी कलम में आग लेकर नज़रूल ईस्लाम ने जन्म लिया था। कविता में आग भरकर अन्याय, धर्माअंधता, अनाचार के साथ साथ अंग्रेजों के विरुद्ध उन्होंने जंग का ऐलान किया। लोगों के मन में विद्रोह की आग भर दी और " विद्रोही कवि " के नाम से जाने जाने लगे। राष्ट्र भक्ति, अंग्रेजों के प्रति आक्रोश की भावना धार्मिक एकता और कटुक्तियों को आधार बनाकर अनेक कविताएं, लेख, उपन्यास, नाटक, कहानियाँ आदि लिखे लेकिन कविताओं से ही उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति विशेष रूप से हुई और उन्हें प्रसिद्धि मिली। नज़रूल एक स्पष्टवादी लेखक थे। लेखक की प्रतिबद्धता व्यक्ति और जीवन से तथा उसके विचारों से जुडी होती है। जो समय-समय पर उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त होती है। देशभक्ति मुलक रचनाओं की प्रधानता और आमजन के दुख को वांचा देना उनके लेखन का मुख्य ध्येय रहा। विपुल परिमाण मे कविताओं की रचना करने के कारण उन्हें बांगला देश का "राष्ट्र कवि " मान जाता है। बांगाल में गजल लिखने की प्रथा आरंभ करने का श्रेय कवि नज़रूल को ही जाता है। 25 मई 1899 को उनका जन्म आसानसोल के चुरूलिया गाँव में हुआ था। उनकी शिक्षा मदरसे में हुई जो कि दरगाह के द्वारा संचालित थे। वहीं उन्हें कुरान, हादिय और ईस्लामिक विचारधारा की शिक्षा मिली। छोटी उम्र में ही पिता का निधन हो जाने के कारण उन्होंने मस्का का काम संभाला तथा पूरे परिवार के भरण-पोषण के आधार बने।


अंग्रेजों के प्रति आक्रोश से भरकर उन्होंने अनेक विद्रोहात्मक कविताएँ लिखीं। " विद्रोह" और "भांगार गान" (ध्वंस गीत) के लिए उन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली। अपने विद्रोहात्मक विचारों के लिए, रचनाओं द्वारा लोगो के मन में राष्ट्रवादी भावनाओं को जगाने के कारण उन्हें बहुत बार जेल जाना पड़ा। जेल में रह कर "राजबंदिर जबानवंदी" जैसी कविताओं की रचना की। उनके गीत बांगला देश के स्वतंत्रता संग्राम के अश्त्र बने। उनके मर्म भेदी गीत मन मे जोश और अन्याय के प्रति विद्रोह की भावना को जगाते हैं। धार्मिक भेद भाव को मिटाने के लिए उन्होंने भरसक कोशिश की। "हओ धरमेते धीर, हओ करमेते वीर, हओ उन्नत सीर नाही भय। भूली भेदा भेद ज्ञान , हओ सबे आगुवान साथे आछे भगवान, हबे जय।"


(कवि कर्म में वीरता और धर्म में धीरज रखे , सदा सर उठाकर चलने से डरें नहीं। आपसी भेदभाव को भुला कर आगे बढते जाएँ। हमारे साथ भगवान हैं। जय हमारी ही होगी। )


उनकी रचनाएँ स्वतंत्रता, मानवीयता, देशप्रेम और विद्रोह की भावना से समृद्ध हैं जो लोगों के मन में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। अरबी, परशियन, संस्कृत शब्दों का प्रयोग अपनी कविता को लयबद्ध रूप से लिखने लिए करते थे। उन्होंने लगभग 4,000 गीत लिखे और उनका संगीतबद्ध किया जिसे "नजरूल गिती" के नाम से जाना जाता है।


"लोक नाट्य" के प्रति रूचि होने के कारण अपने चाचा फज़ली करीम द्वारा संचालित घुमन्तू नाट्य दल से जुड़ गए। दल के साथ घुमते हुए नाटक के साथ साथ नजरूल ने गीत भी लिखे। यहाँ उन्होंने बांगला और संस्कृत सीखा और महाभारत के पात्रों का मंचन भी किया। 1910 में उस नाटक के दल को छोड़कर रानीगंज के हाई स्कूल में दाखिला लिया और राजनैतिक भावधारा से प्रभावित हुए। नजरूल रवीन्द्रनाथ और शरतचन्द्र के साहित्य से काफी प्रभावित थे साथ ही साथ परशियन कवि हफिज, ओमरख्याम और रूमी के साहित्य का भी उनपर विशेष प्रभाव पड़ा। सेना दल के एक पंजाबी मौलवी से उन्होंने परशियन कविताएँ सीखी, संगीत साधना और अपनी साहित्य यात्रा की शुरुआत की।उनकी पहली गद्य रचना "बाउन्डूलेर आत्मकाहिनी" ( घुमन्तू की आत्मकथा) जो 1919 में प्रकाशित हुआ। उनकी प्रसिद्ध कविता "मुक्ति" भी इन दिनों प्रकाशित हुई। 1920 में उन्होंने ब्रिटिश इन्डियन आर्मी छोड़ दिया और कोलकाता में आकर बस गए। यहाँ पर आकर वे "बंगीय मुसलमान साहित्य समिति" से जुड़ गए। इसी वर्ष उनका पहला उपन्यास " बन्धनहारा " प्रकाशित हुआ जिस पर उन्होंने लगभग सात वर्ष तक काम किया।


1922 में " बिजली " नामक पत्रिका में प्रकाशित उनकी "विद्रोही" कविता के लिए बहुत ख्याति मिली जो । इसमें उनके विद्रोह के स्वर इतने मुखर है कि भाषा और भाव की ज्वाला से लोगों में उत्तेजना भर गई। इसने असहयोग आंदोलन को वांचा प्रदान किया। इसके साथ ही उन्होंने "प्रलयोल्लास" नामक कविता की भी रचना की जो उनकी प्रथम कविता संग्रह "अग्निविणा " (1922) में प्रकाशित हई। अग्निवीणा की कविताएँ राष्ट्रीयता की भावना से पूर्ण होने के साथ साथ आम जनता के संघर्ष, अधिकार, धार्मिक एकता से भरी हैं। इसके साथ ही कहानी संग्रह "व्यथार दान" (दर्द का दान) और "युगवाणी "(लेख संग्रह) प्रकाशित हुई।


12 अगस्त 1922 में नज़रूल ने "धूमकेतु " नामक एक पत्रिका प्रकाशित की जिसमें अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की आलोचना होती थी। "आनंदमईर आगमनी" के प्रकाशन के पश्चात उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पत्रिका पर आक्षेप किया गया। अदालत में अपनी सफाई देते हुए उन्होंने कहा, "मुझे देशद्रोही मानकर गिरफ्तार कर लिया गया। मुझे देशद्रोही की संज्ञा दी गई है पर मुझे पर यहाँ ईश्वर ने भेजा है जो कि सामान्यजन से भिन्न है, जो अनकहे को कह सकता है, अनदेखी को देख सकता है, वह कवि है, ईश्वर कवि के स्वर को सुनते हैं। मैं ईश्वर का दूत हूँ। ईश्वर को कौन आमान्य कर सकता है ?"


कारावास के दिनों में नज़रूल ने अनेक कविताएँ और गीत लिखे। जिनमें से अनेक कविताओं को अंग्रेजों ने निषिद्ध घोषित कर दिया है। 1923 में कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपना "बसंत" नाटक नज़रूल को समर्पित किया। विश्व कवि ने नज़रूल की भावनाओं को , राष्ट्र प्रेम को समझा और उसका सम्मान किया। नज़रूल ने "आज श्रृष्टिर सुखेर उल्लासे" कविता लिखकर कवि को धन्यवाद ज्ञापन किया। 1924 में प्रकाशित नज़रूल की पुस्तक "बिसेर बांशी" को अंग्रेजों ने निषिद्ध घोषित कर दिया। इससे जनता मे असहयोग का माहौल फैल गया।लोग नज़रूल का पक्ष लेकर उनका जयगान करने लगे और अंग्रेजों को धिक्कारने लगे। पुस्तक छुप छिपाकर पढा जाने लगा, वितरित किया जाने लगा। इसमें अंग्रेजी शासन की कटु आलोचना तथा विद्रोह का स्वर था, अपने हक की बात थी जिसे जनता समझने बुझने लगी थी।उनकी रचनाओं में असहयोग आन्दोलन की और युद्ध की भयावहता का स्पष्ट चित्रण दिखाई देता है -- " आमी प्रलएर नटराज, आमी साईक्लोन आमी ध्वंस " (मै प्रलय का नटराज हूँ, मै साईक्लोन हूँ, ध्वंस हूँ )


विरोधात्मक धार्मिक उग्र पंथियो के करण नज़रूल "खिलाफत आन्दोलन" के विरुद्ध हो गए। धर्म और राजनीति के नाम पर कट्टरता का उन्होंने डटकर विरोध किया। पूर्ण स्वराज्य की मांग न करने के कारण उन्होंने "ईन्डिअन नेशनल काग्रेस" का विरोध किया। अंग्रेजी शासन व्यवस्था के प्रति लोगों को सजग करने के लिए नज़रूल प्रयासरत हुए। 1925 में "लांगल" (हल) नामक पत्रिका के मुख्य संपादक के रूप में नज़रूल काम करने लगे। लोगों के मन में चेतना का ज्वार उठाने लगा। लोग सजग होते गए।


1921 में कोमिला जाते समय उनकी मुलाकात एक बंगाली हिन्दू महिला से हुई जिनसे वे प्रभावित हुए। 24 अप्रैल 1924 को नज़रूल ने उनसे विवाह किया जिससे कि उनको अनेक विरोधों का सामना पड़ा । ब्राह्म समाज ने, एक मुसलमान युवक से विवाह करने के लिए प्रमिला की भी निन्दा की। (जो कि उसी समाज की सदस्य थी) विरोधों और अपवादों के बावजूद नज़रूल की ख्याति और प्रतिष्ठा दिन व दिन एक "विद्रोही कवि" के रूप में बढती ही गई। उनकी रचनाएँ हिन्दू मुसलमान की एकता की भावना से समृद्ध हैं।


अपनी पत्नी और पुत्र बुलबुल के साथ 1926 में नज़रूल कृष्णनगर में आकर बस गए ।इन दिनों उनकी कविता और गीत लेखन में एक परिवर्तन आया जिसमें उन्होंने साधारण जन के आश आकांक्षाओं और उनके अधिकारों के महत्व को प्रधानताद दी। विपुल परिमाण में बांगला गजल लिखे। उनके लेखन का महत्वपूर्ण प्रभाव बंगाल पर यह पड़ा कि इसने बंगाली मुसलमानों को बंगाल की कला को समझने में मदद की जिनपर हिन्दूओं का प्रभुत्व था।


नज़रूल नारी को सम्मान देते थे। नारी और पुरुष के समान अधिकारों की बात करते थे। " नारी " नामक कविता में उन्होंने इस तथ्य को विस्तार दिया। नारी जाति के प्रति सम्मान की भावना को जताते हुए " बारंगना " (वेश्या) नामक कविता लिखी। इसमें उन्होंने इस तबके के लोगों को भी समान दर्जे का इनसान माना है और उन्हें " माता" कहकर पुकारा है। समाज के वक्र दृष्टि का भोग बनने वाले इन लोगों के प्रति स्नेह और श्रद्धा का स्वर उनकी कविता का मूल स्वर है। "नारी" साम्येर गान गाई, मानुषेर चेये बडो किछू नाई (समानता का गीत गाता हूँ , मनुष्य से बड़ा कुछ भी नहीं है।)


उस समय के प्रतिष्ठित विद्वानों ने नज़रूल की रचनाओं का भावों का सम्मान किया। उनकी रचनाओं से सभी प्रभावित थे। रवीन्द्रनाथ, चितरंजन दास, नेताजी जैसे लोगों ने उनकी कविताओं को भावो का सम्मान किया--" दुलितेछे तोरी, फुलितेछे जल, कांडारी (नेता) तुमी हुशियार। (विद्रोह का समय आ गया है हे दल के नेता तुम होशियार रहो)


कर्मरत लोगों के बारे में उनके शोषण को "दरिद्र" नामक कविता में चित्रित किया है। उनके लगभग 2,266 से भी अधिक गीत हैं। जो की "नजरूल गीती" में पाया जाता है। कुछ संगीतज्ञों का कहना है कि इनके गीतों की संख्या 4, 000 के आसपास है। इसके साथ ही उन्होंने अनेक राग - रागनी पर आधारित गीतों की रचना की। उनके गीत मूलतः बाउल, झूमुर, संथाली लोकगीत, भाटियाली की धुन पर मिलती हैं। जिनमें लोक गीतों के सुर की प्रधानता होती है।


8 अगस्त 1941 पर रवीन्द्रनाथ की मृत्यु पर आधारित उनकी कविता "रवीहारा" अत्यंत मार्मिक और गुरूदेव को श्रद्धांजलि स्वरुप है।


मानसिक रोग से पीड़ित होने के कारण उनकी सेहत लगातार गीरती रही और 1972 में ढाका चले गए। वहाँ पर 29 अगस्त 1976 में उनका देहान्त हो गया। ढाका विश्वविद्यालय के आहते में स्थित मोस्क में उनको दफनाया गया। लाखों लोग अपने प्रिय कवि के अंतिम दर्शन के लिए वहाँ उपस्थित थे।


उनके विद्रोही स्वभाव और मानसिकता के कारण लोग उन्हें अहंकारी समझते थे। परन्तु यह उनके दृढ मनोबल, समाजिक दमन के प्रति आक्रोश की भावना और अन्याय के प्रति असहयोग के कारण ही स्वतंत्रता सेनानी और कवि नज़रूल की रचनाओं में विद्रोह झलकता है।


अपनी कृतियों के लिए उन्हें अनेक सम्मानों से नवाजा गया-



  1. 1960 में पद्मविभूषण।

  2. 1976 में एकुशे पदक।

  3. 1977 में इन्डिपेडेन्ट डे अवार्ड दिया गया।


विद्रोही कवि नज़रूल इस्लाम के जैसा व्यक्तित्व विरल ही हैं। उनकी कलम की आग आज भी लोगों के मन मस्तिष्क पर धधक रही है । मेरा यह लेख उनके जन्मदिन पर श्रद्धा सुमन रूप हैं।


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