ख़ामोश आतिशक़दा


नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, मो. 9811119489


जीवन के महज़ अनुभव ही नहीं बल्कि एक परिपक्व जीवन दृष्टिकोण, एक अलग ज़वीए के साथ बात कहने के सलीक़े को अपने अंदर रखना,जो मंज़रे-आम पर आए तो एक रूदाद बनकर ज़ेहन में महफूज़ हो जाए,महज़ समस्याएं ही नहीं, वरन उनसे कैसे सामना करना है लड़ना है, देश के साथ विश्व का मंज़र, घरेलू जीवन से लेकर बाहरी जीवन और प्रवासी जीवन, ये सब बातें और भी न जाने कितनी ही बातें और आदर्शों को नासिरा शर्मा जी ने अपने लेखन में अपनाया हैं।


इलाहाबाद में पैदा हुई नासिरा शर्मा जी के मैं बतौर उदाहरण कई वाक्यों को पेश कर सकता हूँ, जो सोचने के लिए हमें विवश कर देते हैं। ख़ामोश आतिशकदा से लिया ये वाक्य जो ऊपर दिया गया है, ये मानो कोई सूत्र बन पड़ा है, ये महज़ एक वाक्य नहीं रहा, दार्शनिक चिंतन हो गया है। एक वाक्य जो मस्तिष्क में क्रांति लाकर, असल में जीवन क्या है? वक़्त क्या है? वक़्त की मार क्या है? वक़्त की गति किसे कहते है? जैसे प्रश्नों को उठाता हैं और उत्तर भी देता है कि फिर समय जो गुज़र गया वो लौट कर नहीं आता।


मैंने उनकी दो किताबें 'मेरी प्रिय कहानियां' और 'जब समय दोहरा रहा हो इतिहास' पढ़ी हैं। नासिरा जी को पढ़ने के पीछे दो बड़ी वजह हैं, पहली कि उन्हें पढ़कर जो भाव जो संवेदनाएं पैदा होती हैं वे ताज़ा हैं मेरे लिए और दूसरी,उनका लेखन विश्व-स्तर तक जाता है और कई मुल्कों को समझने का मौका देता है।


'सरहद के इस पार' और 'यहूदी सरगर्दान' पढ़ते वक़्त आँखें नम हो उठती हैं। ख़ामोश आतिशक़दा में- 'किसी नए देश की तलाश में' जो दर्द दर्द छुपा है,वो सोचने के लिए मजबूर कर ही देता है। नैसर्गिक सौंदर्य एवं मानवीय कलाओं का नगर:पेरिस (डायरी) पढ़ते वक़्त आँखों के सामने चित्र उभर आते हैं।


हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी,पश्तो, फ़ारसी भाषा पर अच्छी पकड़ रखने वाली,ईरानी समाज और राजनीति पर लेखनी भी की, पत्रकारिकता भी की, कई कहानियों पर अब तक टी.वी. सीरियल और दूरदर्शन पर छह फिल्में बन चुकी हैं। दस उपन्यास, नो कहानी संग्रह, तीन लेख संग्रह, सात पुस्तकें फ़ारसी से अनुवाद, नाटक, आलोचना, बाल साहित्य और कई विशेषांक आप पर प्रकाशित हो चुके हैं। आप पर शोध कार्य भी हो चुके हैं।


 व्यास सम्माम से सम्मानित नासिरा शर्मा जी को उनके जन्मदिन पर बधाइयाँ।


Shivansh Bhardwaj, Mob. 88023 58838


 


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