साहित्य नंदिनी आवरण पृष्ठ 2


बच्चे केंटेन्मेन्ट में, बैठे थे मन मार।
जन्म दिवस पर पुलिस ने, दिये केक, उपहार।।


सेवारत दिन रात हैं, वे भी हैं इन्सान।
इनको क्या आती नहीं, सोचो नींद थकान।।


कोरोना से घिर गये, डाॅक्टर, पुलिस, जवान।
उनके सेवाभाव को, देवें हम सम्मान।।


बेचा करते थे कभी, पटरी पर सामान।
बेकारी ने छीन ली, हँसी खुषी मुस्कान।।


हुये वन्य प्राणी निडर, घूम रहे स्वच्छन्द।
जंगल से बाहर निकल, लूट रहे आनन्द।।


नदियां निर्मल हो गई, स्वच्छ सरोवर झील।
किया लाॅकडाउन गया, जिस दिन से तामील।।


तीन लाख किट हो रही आज रोज तैयार।
कोविड से लड़ने हुई, सजग चुस्त सरकार।।


अगर स्वदेशी माल को, हम देंगे सम्मान।
आयें फेषन में पुनः, खादी के परिधान।।


आचार्य भगवत दुबे, जबलपुर (मध्य प्रदेश), मो. 9691784464


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