बच्चा बन कर ही बाल साहित्य रचें

बाल साहित्य एवं बाल साहित्यकार - श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माता...



वरिष्ठ बाल साहित्यकार, गीतकार एवं बहुआयामी रचनाकार, विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित, अनेक पुस्तकों के प्रणेता।


डा. रमेश मिलन


पुणे, मो. संपर्क:- 9029784346


 


समाज और राष्ट्र को उन्नतिशील बनाने के लिए बच्चों को सुसंस्कार एवं उचित शिक्षा-दीक्षा देकर योग्य एवं निष्ठावान बनाना बहुत आवश्यक है। कौतूहल एवं जिज्ञासा से परिपूर्ण बच्चों का निर्मल मन रंग-रूपों, भावनाओं, कल्पना तथा सहज खेलों के माध्यम से विकसित होता चला जाता है और उनके जीवन का स्थायी अंग बन जाता है। बच्चों में संस्कार ग्रहण करने की क्षमता अत्याधिक प्रबल होती है। इस उम्र में उनके चतुर्दिक विकास के लिए उत्तम संसाधनों की आवश्यकता होती है।


बच्चों की नई पीढ़ी को अनुशासन, सदाचार एवं अध्ययन तथा प्रेम, सहयोग आदि मानवीय मूल्यों, सद्गुणों से परिचित कराने के लिए सतत प्रयास की महती जरूरत है। इसके लिए आवश्यकता होती है सुंदर श्रेष्ठ बाल साहित्य की, जो उन्हें संस्कारपूर्ण परिवेश प्रदान कर सके। बाल मनोविज्ञान तथा मनोरंजन से भरपूर बाल साहित्य उनके अंतरंग में रच-बस जाता है।


प्रसन्नता का विषय है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी में बाल साहित्य के संवर्द्धन, उन्नयन के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन हो रहा है। बच्चों को सुरुचिपूर्ण बाल साहित्य सरलता से उपलब्ध हो सके, इसके लिए बाल साहित्यकारों के समुचित प्रोत्साहन के लिए अखिल भारतीय स्तर पर व्यापक प्रयास की आवश्यकता है।


सच्चाई तो यही है कि बाल साहित्यकार भी शिक्षकों की भाँति श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माता की भूमिका का निर्वहन करते हैं। समाज का दर्पण कहा जाने वाला साहित्य, जीवन के खट्टे-मीठे-मोहक अनुभवों तथा कल्पनाओं का सम्मिश्रण होता है एवं जीवन के विविध पहलुओं से प्रभावित भी। ऐसे श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ कर, सुन कर, अनुशरण कर समाज और बच्चे नवीन सोपानों पर चढ़ते हुए उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ जीवन की दिशा में अग्रसर होते हैं।


बाल मन को पढ़ना-समझना-स्वीकारना तदनुसार रसानुभूति से परिपूर्ण बाल साहित्य सृजन करना एक श्रमसाध्य उपक्रम तो है किंतु असंभव नहीं। बाल मन निर्मल, पवित्र एवं द्वंद्व रहित होता है इसीलिए उस पर अंकित होने वाले आचरण, आदर्श, संदेश, सुविचार आदि जीवनपर्य॔त रहते हैं और यही है बाल साहित्यकार का राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान।


बाल साहित्यकार की कल्पना लोक की उड़ान सहज, सरल एवं रससिक्त रचनाओं से अलिखित श्यामपट की भाँति बाल मन पर चित्रवत अंकित हो जाती है। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, कामिक्स, कार्टून फिल्मों आदि के माध्यम से बच्चों के अंतस में प्रवेश करके बाल साहित्यकार का परिश्रम सार्थक हो जाता है।


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