"मौन की गूँज किसे सुनाई देती है भला"


रश्मि सुमन, मनोवैज्ञानिक सलाहकार, पटना (बिहार)


आत्महत्या यूँ ही नहीं कोई करता होगा! कितनी दर्द कितनी पीड़ा, कितना कुछ अनकहा, अनसुना राह जाता होगा मन के भीतर....यह शब्दों की दुनियाँ है ज़नाब! मौन की गूँज किसे सुनाई देती भला!....जब दिल उदास होता है, आसपास कोई सुनने वाला नही होता न समझने वाला कोई होता तो उस मन की बेचैनी की परिणति आत्महत्या के रूप में होती है .....तब कोई झिंझोड़ के कहता है इतनी रौशनी तो है, इतना ढेर उजाला है, अब और क्या तुम्हें चाहिए? पर उसे तो उजाला नहीं दिखता अँधेरा ही अँधेरा दिखता है....गहन अँधेरा, एकदम स्याह मानो लील लेगा सब कुछ....और फिर वह शख्स एक दिन हमेशा के लिये खामोश हो जाता है.....जब अपने आँसुओं  से भिगोने की चाह में किसी माक़ूल कंधे की तलाश में वह शख्स भटक रहा होता है तब अंतस की छटपटाहट के सपने डायरी के पन्नों, इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक आदि तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर वह लिखता है पर वहाँ भी दुर्भाग्यवश उसकी हथेलियों से फिसलकर उसके शब्द अपने अर्थ समेत कहीं गुम हो जाते हैं, और भाव बिल्कुल चिपक जाते उसकी हथेलियों में अपनी तमाम खुशबू के साथ....पर साहब ! ऐसी पीड़ा भरी खुशबू कौन पढ़ना चाहता है  यहाँ? मैंने तो पहले ही कहा न कि ये शब्दों की दुनिया है.....इस छटपटाहट में वह बेचारा शब्दों को टटोलता है, पर शब्द उसे मिलते नही.... जिस भाषा में वह कुछ लिखता  वो शब्द विहीन हो जाते....लोगबाग भी अजीब ढंग से उसे देखते हैं..... 


इन्हें तो रात की तन्हाई भी घूरकर देखती है....तब शायद खुद को समेटकर एक कोने में रख सोने की असफल कोशिश करता है पूरी रात बेचारा.... सुबह की धूप जब उसे जगाती है तो काली चाय पीने की इच्छा को भी समेट लेता होगा .... तब कोई खूबसूरत सी प्रवासी चिड़िया उसकी मेज पर आकर सर टिकाती होगी और वह उसे अपने पास से उड़ा देना चाहता होगा ताकि कहीं ये अँधेरे का नश्तर उसे भी चुभ न जाये..... जबकि चिड़िया उस शख्स को खिड़की के बाहर देखने को कहती है.…उस चिड़िया के चहचहाने में रौशनी का सन्देश है..... उसके सन्देश से झरती हैं कुछ बूँदें..... उस शख्स की पलकों पर नमी महसूस होती है.....पर कमबख्त, उस शख्स के मन का मानसून है कि थमता नहीं और एक ये मौसम वाला मानसून है आने का नाम नहीं ले रहा.....सोचें जरा हम कि कितना दर्द और पीड़ा लिये जीते रहते हैं ऐसे बेबस लोग....सच है जिसका इंतज़ार करो बस वही नहीं आता बाकी सब मुंह उठाये चले आते हैं......


जब कभी थोड़ा खुश रहता है मन उसका तो उस  नन्ही चिड़िया का हाथ थाम लेता है.... तब उसके खो गए शब्दों में से कुछ एक का अंश हमारे आपके कानों से भी टकराते हैं, जो आवाज कानों में टपकती है वो इस बात का इशारा कि  'सुनो, तुम चली तो नहीं जाओगी न.... रहोगी न साथ हमेशा?' चिड़िया चुपचाप सिर हिला देती है....अब जब खिड़की के बाहर गुम गए शब्दों का ढेर है तो अब उसकी उनमे कोई दिलचस्पी नही......


अब उसे हल्का महसूस हो रहा है क्यूंकि इस बेदर्द बेरहम मतलबी दुनियाँ में कहने और सुनने से उसे  मुक्ति मिल गयी है.....


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