पुस्तक समीक्षा : 'तस्वीर लिख रहा हूं'

दुष्यंत के बाद हिंदी भाषा साहित्य में ग़ज़ल लेखन परंपरा या एक रूढ़ि से दो हाथ आगे बढ़कर मान्य विधा का रूप ले चुकी है देशभर के हजारों गजलकार इस यज्ञ में निरंतर यथासंभव अपनी आहुतियां दे रहे हैं और इस परंपरा में अपनी पहचान बनाने का प्रयास कर रहे हैं डा. ऋषिपाल धीमान भी इसी परंपरा का ज्ञात और विख्यात चेहरा हैं रसायन शास्त्र में पीएचडी धारी वैज्ञानिक का ग़ज़ल लेखन हिंदी साहित्य के लिए ठंडी हवा के झोंके जैसा है .'तस्वीर लिख रहा हूं 'उनका सद्य प्रकाशित गजल संग्रह है। इससे पूर्व उनके तीन गजल संग्रह-'शबनमी एहसास' ,'हवा के कांधे पे' और 'जो छूना चाह तो' प्रकाशित व प्रशंसित हो चुके हैं।


इस संग्रह में 100 गजलें संकलित हं जो अपने समय की समस्याओं और संवेदनाओं को कालजयी पहचान देने का पुरजोर प्रयास करती हैं.


रोज मर कर तलाश करता हूं


जिंदगी पर तलाश करता हूं


तेरे ख्वाबों की भीड़ में खोया


खुद को शब भर तलाश करता हूं


रोजमर्रा की जिंदगी की थकान हो या उस पर हावी भविष्य की आशंका का कोहरा दो तीन प्रतिशत लोगों को छोड़कर यह आज हर किसी के हिस्से में है गजल व्यष्टि से समष्टि की दिशा में अग्रसर होने के लिए उठाया गया चरण है जिसकी पुष्टि इस संग्रह में संकलित गजलों से भलीभांति होती है।


रस हवाओं में घोलता सा


उसका हर लफ्ज बोलता लगे


जाने क्यों हर सवाल उसका ऋषि


मेरे दिल को टटोलता सा लगे ।


यह गजलें एक ओर प्रेमानुभूतियों से पगी हैं तो दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं से सराबोर भी हैं: -


जीवन का संगीत यही


बच्चे की किलकारी सुन


राख बना देगी सब कुछ


नफरत की चिंगारी सुन


या काला चश्मा दूर उठाकर खुली आंख से देखो तो


इतनी भी बेरंग नहीं है, दुनिया रंग रंगीली है


यह गजलें कथ्य की दृष्टि से नवीनता और शिल्प के स्तर पर परिपक्वता का परिचय देती हैं और यही विशेषता उन्हें समसामयिक गजलकारों की भीड़ से अलग नई पहचान देती है पुस्तक पठनीय है जिसका हिंदी गजल संसार में निश्चय ही स्वागत होगा।


तस्वीर लिख रहा हूं /डा. ऋषिपाल धीमान/प्र.सं.2019/मूल्य 150 रुपये/पृ.132 /बोधि प्रकाशन जयपुर) डा.महेन्द्र अग्रवाल


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