सफेद कब्रिस्तान

चन्द्रकान्ता, गुरुग्राम, मो. 9810629950


कहानी, वादी ए कश्मीर से


एक हफ्ते से बराबर गिरती रही है बर्फ, थक्कों के थक्के ! 'रजौरी' अछोर कफन से ढकी कब्रों में रूपान्तरित हो गई है। बाजार की बात तो दूर, गली आँगन में निकलना नहीं होता। वह तो खिड़कियाँ-दरवाजे मूंद दिन-भर रजाई में घुसी रहती है। अँगीठी में सुलगती आग राख की ढेरी लगा देती है। माँ तसले में राख निकाल नए कोयले डालती जाती है। कभी-कभी अधजले कोयलों को भी राख के साथ फेंक आती है।


तब उसका मन होता है मुँह खोलने का। अपने भीतर उष्णता संजोये उन अधजले कोयलों के प्रति कुछ वैसा ही मोह उपजता है जैसा एक कच्ची उम्र के मुर्दे को देखकर। पर वह मुँह खोल नहीं पाती। माँ अब माँ नहीं लगती, बिजली की स्वचालित और स्वनियत्रित मशीन लगती है, जिसके आगे गैरजरूरी भावुकता अर्थहीन है। वक्त की बरबादी।


वक्त की बरबादी। अपने ही सोचे हुए शब्दों पर वह विद्रूप से हँस देती है। गर्म रजाई मुँह तक लाकर। मगर तब गली में भारी बूटों से बर्फ फोड़ते-मसलते, वक्त के पाबंद गुप्ताजी की आवाज दरवाजे पर रुक जाती है


"नेहीऽऽऽ!" ठंडी हवा को चीरता स्वर उसे झिंझोड़ देता है। बेमन से लिहाफ छोड़ खिड़की तक आ जाती है। अधखुले पल्ले से मुँह का अग्रभाग निकाल पूछती है


"इतनी बर्फ में साहब?"


"छह दिन से स्कूल नहीं खुला। आज तो खोलना ही पड़ेगा।"


"पड़ेगा?"


"हाँ, हाजिरी तो देनी पड़ेगी।"


"ठीक है।" आवाज के साथ पल्ला बंद करती वह जूते-मोजे पहनने लगती है। खूटी पर लटकता ओवरकोट उसे अपने आकार से दुगुना दिखाई पड़ता है। पर.... सभी कुछ तो उसके लिए दुःसाध्य ही है।


वह कंधों पर कोट डालती सीढ़ियाँ उतरने लगती है। दरवाजे के पास जूठे बर्तन मलती माँ घुटनों पर हाथ देकर पास आ जाती है।


"कुछ खाकर जाओ।"


बिना संबोधन के शब्दों को निगलती, कन्धों के ऊपर नजरें घुमाती वह भीतर के उबाल को जबरन रोक लेती है। कल से माँ-बेटी के बीच तनाव कुछ अधिक ही बढ़ गया है। अच्छा हुआ कि नेही का बचा-खुचा मोह भी भंग हो गया। कम बोलने वाली माँ से उसने कहीं और चलकर नयी जिन्दगी शुरू करने की दरख्वास्त की थी। भूषण का आग्रह था। फिर उसके भीतर भी किसी से जुड़ने की ललक हिलोरें ले रही थीं। मगर माँ खामोश नकार से उसे बेहद संतप्त कर गई। वैसे उसकी भावशून्य आवाज, घड़ी की टिक-टिक सी उसके भीतर जगाती है। खासकर जब वह आवाज, घड़ी की टिक-टिक दस की सुइयों के आस-पास मंडरा रही हो। तब उसकी थोड़ी-सी सुस्ती पर माँ कमरे में झाँक जाती है और गुप्ताजी स्कूल के कम्पाउण्ड से गुजरती अध्यापिकाओं के कदमों की आहट भाँपते रहते हैं। नाराज़गी, क्रोध, क्षोभ, दुराग्रह... कुछ भी। माँ की आवाज कुछ नहीं जगाती, सिर्फ एक बोझिल-सी असमर्थता से ढक देती है।


कद्दावर पहाड़ के नीचे दबी चुहिया-सी वह छिप जाती है या काठ की पुतली-सी नि:संज्ञ घूमती रहती है। माँ को अपने भीतर रेंगती उष्णता, विद्रोह, असंतोष, किसी भी चीज का अहसास वह कभी दिला भी पाएगी? जब भी कभी साहस का परिचय देना चाहती है, माँ का असहाय अस्तित्व तीखे कर्तव्य-बोध से कुरेदने लगता है और उसके बढ़े हुए कदमों में सीसा भर जाता है।


"भूख नहीं है माँ !"


वह एक कदम आगे बढ़ जाती है। तब तक माँ रसोई से गर्म चाय का गिलास और शहद लगी मक्की की रोटी थमा देती है। वह हिम्मत के साथ माँ से दृष्टि विनिमय करती है। पर नजरें कभी शून्य में भी टिक सकी हैं? साहस की पतली डोर निःशब्द टूट जाती है। वह अकबकाकर गिलास ले लेती है। दो घूट गर्म चाय पेट में डाल सीढ़ियाँ उतरने लगती है। कुछ क्षण माँ उसकी पीठ देखती है, फिर हाथ की रोटी में से आधे भाग के गोले बनाकर सर्दी से काँपती अबाबीलों को खिलाने लगती है।


घुटनों तक बर्फ में धंसी वह बर्फ के सिवा कुछ भी नहीं देख पाती। उसके आगे की बर्फ, पीछे की बर्फ....। इसी बर्फ में दबी एक दिन वह संज्ञा-शून्य होकर अकड़ जाएगी या माँ की तरह घड़ी की भावशून्य टिक-टिक बनकर जीती रहेगी।


धप्प-धप्प! बर्फ की छाती फोड़ती वह दूर तक चली जाती है.... बहुत दूर। वहाँ, जहाँ बर्फ नहीं थी पर इसमें भी ज्यादा हड्डियाँ चीरने वाली ठंड....! पेड़ों की झुरमुटों, घने जंगलों के बहशी सायों में जहाँ इंसानों में हलचल थी, पर इंसानियत जम गई थी। भागो.... भागो... साँस की धौंकनी में फूटकर खौलता भय..... असंख्य किर्चें फैलाता हुआ। भागो.... रुको नहीं... थको नहीं.... बीमार! छोड़ दो, जख्मी? मरने दो.. एक के साथ पूरे काफिले रुक नहीं सकते.... चलो, मुड़कर मत देखो..... पीछे मौत है.. आगे? प्रश्न मत पूछो.... आगे साँस रोककर.. ... शी ऽऽऽ.... आवाज नहीं.... मुँह बंद कर दो... गला घोंट दो....।


भूखी माँ के सूखे स्तन खींचती अधमरी बच्ची की आवाज भी दुश्मन को संकेत दे सकती थी। आवाज बंद करनी ही थी। दो उठे हए हाथ काँप गए तो क्या?


नहींऽऽऽ...... हाँ ऽऽऽ! उत्तर में सम्मिलित ध्वनियों के बघनखे।


और तब! अपने हाथों सहलाई-दुलराई-नन्हीं दूधिया गर्दन, जिबह हुई मुर्गी की गर्दन बन लटक आई थी। रुककर सोचने का समय किसे था...। ओढ़नी फाड़कर आधा हिस्सा बच्ची के ऊपर डाल माँ ने अपनी नंगी कोख को ढकने की कोशिश की थी.... एक लावारिस कोशिश! पर गड़गड़ाती तोपों से त्रस्त धुआँधार हवा ने कपड़े का टुकड़ा दस गज दूर उड़ाकर उसे फिर से नंगा कर दिया था।


हाँफते-काँपते, गिरते-पड़ते, वे मौत से भाग रहे थे। सूखी हड्डियों के ढाँचों में भूख और प्यास की कसमसाती खनक सहते.... भागते ही जा रहे थे।


"बहन जी!"


स्कूल में दरवाजे पर जमुना अधमैली प्रेतदूत-सी लग रही थी।


उसने ओवरकोट उतारकर जमुना को थमा दिया। काँपती अँगुलियों से कॉलर का भाग पकड़ जमुना उसे झटकने लगी। रुई के नन्हें गोले जमीन पर छितराकर अदृश्य हो गए। कोट की ऊपरी तह भी भीग गई थी, भीतरी भाग काफी गरम था। नेही उसे दुबारा पहनने लगी।


अलाव के पास गुप्ताजी और कृष्णा शरीर सेंक रहे थे। वह कुर्सी खींचकर पास सरक आई। गीले जूते उतारकर मोजे सूखने के लिए डाल दिए। ठंडे गीले पैरों पर गर्म आँच से तिलमिलाहट भरी खुजली सहती वह आग को घूरने लगी।


"नेही! तुम्हारा यह बर्फ का देवता कब संतुष्ट होगा?"


"देवता क्या संतुष्ट होता है?" उसने कहना चाहा, पर हल्की-सी 'अँह' में उसकी व्यंग्य भरी तिक्तता छलक आई।


बर्फ का देवता, पहाड़ों में भटकती प्रेतात्माएँ। कृष्णा को इनसे डर लगता है, गुप्ताजी को भी शायद। कृष्णा कहती है- "रात नदी पार वाले जंगल से लगातार कराहने की आवाज आ रही थी। कौन हो सकता है नेही?"


वह हाथों को मसलती आग के नजदीक खिसक आती है।


"रात पहाड़ी के दामन में मैंने लंबी बाहों वाली सफेद छाया घूमती देखी, हाथ में दीपक लिए....। सच नेही, तू हँसी समझ रही है, मेरा तो पसीना छूट गया!"


"बस, कृष्णा बस!" वह कानों पर हाथ देकर अलाव में जलती लकड़ियों की चिटचिटाती आवाज बंद कर देती है। कृष्णा का भय उसे सहमाता नहीं, नोंच-नोंचकर काटता जाता है।


दादी माँ की गोद में सिमटी कृष्णा ने बचपन में परियों और भूत-प्रेतों की ही कहानियाँ सुनी हैं, तभी उसे पहाड़ पर की प्रेतनी और बर्फ का देवता ही नजर आता है। केले वाले बाग में पेट्रोल छिड़की लपटों में सूखी लकड़ियों की तरह चिटमिटाते गट्ठर-के-गट्ठर आदमी नहीं पानी में बहते हुए सडाँध देते शरीर, पहाड़ी के दामन में बिखरी भुनी हुई खोपड़ियाँ, वह सब कृष्णा ने देखा नहीं न, केवल अखबारों में पढ़ा था और बासी खबरों में जोड़कर जेहन में उतार भी दिया।


तहसील के खुले आँगन में बैठी कृष्णा जब कहानियाँ सुनती है, नेही के सामने पक्तिबद्ध परिवार खड़े हो जाते हैं, एक ही गोली के शिकार होने को तैयार। ट्रकों में भरी नंगी जवान औरतें, सड़कों पर लुढ़कते धड़ों में अपने पिता, पुत्र और पतियों को खोजती बदहवास औरतें, बमबारी..... मारकाट....।


कल 'इवनिंग न्यूज' सुनते कृष्णा वियतनामवासियों के लिए आर्द्र हो उठी थी। नेही ने वियतनाम नहीं देखा पर अपने ही आँगन में वह सब घटते देखा है।


रजौरी पुंछ कित्ता सुन्दर है। पत्थरों के ऊपर फिसलती नदी चाँदनी में पारे की तरह चमकती है। नदी के पार हरे जंगलों से घिरी पहाड़ियाँ.... बिल्कुल पहलगाम जैसा नजारा लगता है।


और नदी किनारे ऊँचाई पर बसे, कृष्णा को किसी परी-देश की याद दिलाने वाले इस शहर में नेही की नजरें सिकुड़कर टूटी हुई छतों, अधगिरी दीवारों और मलबों के ढेरों पर टिक जाती हैं, सालों बीतने पर भी जिनका मातम खत्म नहीं हो रहा। बचे-खुचे घरों में सूखी बासी औरतों के रक्तहीन चेहरे झाँक आते हैं, कुछेक बच्चे, मुट्ठी भर बूढ़े, जहरीले अनुभव को पचाकर नीलकंठ बने हुए। गर्मियों में खुले छत पर धूप तापती और सर्दियों में कमरे के एक ठंडे कोने में ठिठुरती मशीन.... गुड़िया के सुनहरी छींटवाले अधसिले फ्रॉक के टुकड़े, जिनके चमकीलेपन पर सालों की मटमैली परत जम आई है। दूधिया गर्दन वाली गुड़िया, जिसकी नसों पर माँ की अंगुलियों के निशान....।


नहीं ! यह सब सोचना नहीं है, उसे तो फिर धुंधली याद है!


धुंधली यादें भुलानी आसान होती हैं- भूषण भी तो यही कहता है।


कृष्णा माँ के पास भी दास्ताने सुनने आती है, आक्रमणकारियों के जुल्म की दहशतभरी दास्तानें ! जुल्म-जुल्म ही है, वह किसी ने भी किसी पर किए हों।


माँ की नज़र तब बहुत दूर तक जाती है या पूरी दुनिया उसके इर्द-गिर्द सिमट आती है। माँ के होंठ सिल जाते हैं। तब पड़ोस की जानकी ही बात कर पाती है।


पर माँ का दर्शन नेही समझ नहीं पाती। उसे वह किसी भी तरह अपने साथ जोड़ नहीं पाती। तभी शायद दिन-ब-दिन वह माँ के प्रति शंकालु हो उठती है।


देह की सिकडी नसों को घरती माँ की नजर स्कूल कंपाउंड में खेलते बच्चों पर अटक जाती है। पर नहीं. रजौरी के ये मुट्ठी भर अवशेष, इन्हें छूने की हिम्मत वह कैसे करे? रक्त से सने हाथ, कालिख से भरा शरीर। चार बच्चों को लेकर जिन्दा निकलने वाली जानकी, उसने तो अपना शरीर बिछावन बनाया था।


जानकी आहे भरती भी 'कालिख' शब्द को नहीं भूल पाती, हालाँकि उनके लिए यह शब्द अपना अर्थ अरसा हुए खो चुका है। और नेही! तब दस साल की, सूरत की मरी-मरी। नहीं तो उनके सामने दस साल क्या कम होते थे?


नेही क्रोध से भभक उठती है, पर माँ शांत है, चुप्प!


कृष्णा को बर्फ बड़ी पसन्द है। अपने प्रेमी बिनू को लेकर रजौरी की बर्फ देखने आई है। बसंत में दोनों की शादी होगी, हनीमून मनाने कश्मीर जाएगी। गुप्ताजी बड़ा लाड़ करते हैं, अकेली लड़की है न!


गुप्ताजी उसका भी कितना ध्यान रखते हैं। पर कमरे में बिछी उनकी चारपाई से वह जाने क्यों डरने लगी है। एक बार स्नेह से कन्धे पर हाथ रखते उसे जरा-सा तो पास खींचा था। नेही पगली है न! वहमी! नहीं तो अधपके बालों वाले गुप्ताजी क्या पचास से कम होंगे?


"उम्र का क्या, गुप्ताजी तेरा खास ख्याल रखते हैं।" माँ की आवाज कितनी सपाट लगती है। तब वह चाहते हुए भी हम उम्र कृष्णा को अपने समानांतर नहीं देख सकती। घुटकर रह जाती है।"


"मुझे किसी के ख्याल रखने की जरूरत नहीं।"


"सहारा तो चाहिए ही।" माँ की आवाज में विवश फैसले की ध्वनि है।


"सहारा।" उसे कितने ही बिच्छू एक साथ डंक मारने लगते हैं।


"सहारा तुझे चाहिए माँ, मुझे नहीं।" माँ ठहाका लगाकर उन्माद बिखेर देती है। नेही सहम जाती है।


स्याह कागज को रंगीन पेंसिलों की चाह नहीं होती, वहाँ सब बराबर है। लकीरें उजले पन्नों पर ही अर्थ ग्रहण करती हैं, नेही क्या समझती नहीं?


अगर कुछ समझती नहीं तो अपनी माँ के अस्तित्व को, पैंतीस-छत्तीस की माँ भोग और योग की रेखा को गड्ड-मड्ड कर गई है। दैनिक कार्यों में व्यस्त फुरसत के समय वह सुनहरी छींट की लीरें जोड़ती रहती है, कोयले से फर्श पर आकृतियाँ बनाती रहती है, नहीं तो धूप में पड़ी चटाई पर बदन सुखाती रहती है। गुप्ताजी आते हैं, उन्हें चाय पिलाती है, कभी-कभी सोने वाले कमरे में बिस्तर भी लगा देती है।


नेही कुढ़ती रहती है, एक बार माँ को 'गंदी' कहकर क्षोभ जाहिर किया था। माँ पल भर सीधी आँखों से देखती कडुवी मुस्कराहट दे गई थी। धूल में लिपटे मकोड़ों को गंदा कहने का क्या मकसद हो सकता है? धूल, मिट्टी जिनके जीने की अनिवार्य शर्त हो, बरसाती नालियों में कुलबुलाते लारवे-केंचुवे आसमान में उड़ने वाले रंगीन पंखों के बारे में क्या सोच सकते हैं।


हालाँकि नेही के पैर ठोस धरती पर थे, उसे जमीन खिसकती मालूम पड़ रही थी। आसपास की धुंईंली हवा आँखें कडुवा रही थी। माँ का मूक स्वीकार उसे बेहद सुस्त व संकल्पहीन बना रहा था। लाश की तरह अपना अस्तित्व ढोना उसे मंजूर नहीं था- द्वन्द्व यहीं से शुरू हुआ था। बंधी हुई एकरस जिन्दगी से वह बेहद ऊब उठी थी, ऊपर से माँ की ठहरी हुई जिन्दगी। दिन, महीने, वर्षों को काटती हुई। वह प्रश्न पूछती, बार-बार माँ चुप थी। शरीर के साथ क्या माँ के भीतर भी सब कुछ भर गया है? पड़ोसिनें नेही की उम्र याद दिलाती हैं।


"उम्र का क्या? कमाती है, खाती है। जब तक कोई पंजा गला दबोच न ले, साँस रुक थोड़ी जाएगी?"


माँ के सामने एक 'साँस' के अलावा सब झूठ है।


"जिस्म कौन अपना रहा है, जिसका मूल्य आँके? घिसते साबुन-सा घिसता शरीर!"


"माँ तुम्हारी तो मुर्दा है, तुम्हारी जरूरतें क्या समझे!"


गुप्ताजी उसके बारे में परेशान हैं, पर वह उस परेशानी को सह नहीं पाती।


"कल भूषण मिला था। तुझे याद कर रहा था।" सूखे गर्म मोजों का स्पर्श नेही को भला लगता है।


"कल जा रहा है।"


"कल ही?"


"हाँ, कल ही! पठानकोट में लेक्चरर का ऑफर आया है न!"


"हूँ।" नेही के आगे लम्बा रेगिस्तान फैल जाता है।


"तेरी बड़ी याद करता था।" यह भी क्या गुप्ताजी का कोई अस्त्र है?


"मेरी क्या याद, गुप्ताजी....?" रजिस्टर पर हस्ताक्षर करते उसके भीतर कुछ सुबक उठता है।


'अँगीठी के पास माँ घुटनों में सिर दिए गुमसुम बैठी है। कमरे की मद्धिम रोशनी में लम्बे साए मनहूस लग रहे हैं।


जल्दी में खाना निगलकर वह सोने जाती है, रजाई में दुबककर आँखें बंद करना चाहती है। दिमाग में कीड़े रेंगते रहते हैं। वह उस अपरिहार्य-सी इच्छा को पकड़ने की कोशिश करती है, जो उसके भीतर बार-बार सिसक उठती है। जुड़कर कटने का दर्द पीप पड़े फोड़े-सा सालता है।


दरवाजे पर हल्की-सी थाप के साथ भूषण का स्वर उसे चौंकाता है।


"इतनी रात?"


"कल जा रहा हूँ न, सोचा मिलकर जाऊँ।"


लिहाफ का एक कोना उसे पकड़ाती वह झिझक उठती है।


"कम्बल हमारे पास एक ही है, माँ ओढ़े हुए है।"


"तुम्हें लिहाफ में भी सर्दी लगती है क्या?"


"सर्दी..... सर्दी....।" वह चाहती है कहे, कुछ भी। पर शायद वह जो भी कहे, बचकाना लगे।


"तुझे अकेला नहीं लगता?" सुनसान लगते कोने-अँतरों को घूरता वह पूछ लेता है।


इस ठण्डे कब्रिस्तान की रखवाली के लिए तैनात वह अकेली गर्म साँस है, जिसकी उष्णता आस-पास की ठण्ड में धीमे-धीमे भाप बनकर उड़ने लगी है। एक दिन जमकर ठण्डी कब्र बन जाना, यही शायद उसकी नियति है। पर भूषण खासे मूड में है। वह इतना ही कह पाती है


"माँ है न।"


"माँ दुःखी है नेही।"


"माँ जम गई है भूषण, उसे कुछ भी महसूस नहीं होता।'


कुछ दिन पहले किए गए प्रश्न का उत्तर से मिल जाता है। पर वह नेही को उदास नहीं देखना चाहता।


"तुझे कुछ महसूस होता है?"


"मुझे...। क्या महसूस होगा?"


शायद महसूस करने के लिए कुछ भी नहीं है।


या शायद इतना ज्यादा है कि वह उसमें डूबकर उसका एक हिस्सा मात्र बनकर रह गई है।


"कभी इधर आओगे?" वह यूँ ही पूछ लेती है।


"तुम कहो तो।"


"मैं?"


"हाँ, तुम!"


मुट्ठियाँ भींचते उसका शरीर काँप उठता है। आँखों में आँसू भरभरा उठते हैं।


"क्या हुआ?" वह बाहें थामकर सहारा देता है।


"कुछ नहीं।"


"फिर?"


"यूँ ही!"


"माँ चलने को तैयार नहीं हो, शायद....?"


"उसे बाँधने के लिए आसपास के शमशान की धुआँ उगलती यादों के सिवा और क्या है?"


पर माँ से ज़िद बेकार है। यह भूषण भी जानता है।


"तुम सोचती बहुत हो। कहो तो मैं कह दूँ?"


"तुम?.... नहीं, मैं ही कह दूँगी!" उसकी आँखों में निश्चय की चिनगारी पलभर कौंधकर बुझ जाती है।


दरवाजे तक भूषण को छोड़कर लौटती वह बेहद ठंड महसूस करती है और हाथ मसलकर गर्मी लाने की कोशिश करती है। पेट के साथ घुटने मोड़ दुहरी हो दुबक जाती है।


कमरे में सन्नाटा है। भीतर-बाहर बर्फ! सन्नाटे बीच, माँ के हल्के खर्राटों के स्वर मंद-मंद उभर आते हैं। वह अनजाने ही कटु हो उठती है।


इस माँ के साथ उसका एक सम्बन्ध है। वह कमाकर लाती है, माँ पकाकर खिलाती है। दोनों एक-दूसरे पर आश्रित, एक-दूसरे से जुड़े। इसके सिवा एक अवश-सी निरीहता के सिवा उन्हें कुछ नहीं बाँधता। वह भूषण के साथ चली जाए तो माँ...? शायद वह तब भी ऐसे ही आग को घूरती, सुनहरी लीरें जोड़ती, खर्राटे भरती रहेगी। गुप्ता जी के लिए चाय-नाश्ता बनाने से लेकर बिस्तर बिछाने तक, बिना शिकवे-शिकायत व्यस्त रहेगी।


तब शायद यह सब और भी जरूरी हो जाएगा।


और वह?


दिमाग में हजारों कुलबुलाते कीड़े लेकर सुख की नींद सो सकेगी?


लाइलाज-सी इस स्थिति से भाग निकलने पर भी, क्या उसे इस कैद से छुटकारा मिलेगा, किसी मुक्ति का एहसास हो पाएगा?


नेही जानती है, इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है। फिर? फिर कुछ नहीं? माँ के बुझते अस्तित्व से चिपकी जिद जब तक जिंदा है, तब तक वह मुक्ति की साँस नहीं ले पाएगी।


अपने ही सोच पर वह अपराधबोध से भर जाती है। कुछ अच्छा सोचने की कोशिश में पूरी शक्ति बटोरती है। सामने फैली बर्फ की कब्र फोड़कर भूषण की आकृति जेहन में भरने लगती है। तपती आग के पास गीला बदन सुखाती वह मीठी खुजली भरी पीर महसूस करती है। विचित्र से सुख की फुरहरी रोओं को सहलाने लगती है।


मन में उम्मीद सिर उठाती है, हो सकता है..... हो सकता है, माँ अपनी जिद छोड़ दे। हो सकता है....।


सिर से पाँव तक सफेद लिहाफ में ढकी माँ को देखकर, न जाने क्यों उसके सामने कफन ओढ़े मुर्दे की तस्वीर खिंच आती है। कमरे में अचानक ही, एक बेहद ठंडा कब्रिस्तान उग आता है और वह गर्म रजाई में दुबककर भी ठंड से काँपने लगती है।