उपसंहार



रमेश दवे, भोपाल, मो. 9406523071


 


जीवन


जिया था


बचपन में


मां की लौरी की तरह


खिलौनों से खेलने की


खुशी की तरह


यौवन के साहस की तरह


जीविका के संघर्ष की तरह


कसा था जिसे


अपनी भाषा में


सुगठित निबंध के


प्रत्येक वाक्य की तरह


कविताएं, कथाएं उतरी थीं जिसमें


विषमताओं के पर्वतों से बहकर


उमड़ती नदियों की तरह


बना लिया था अपना घर


जैसे प्यार का महासिंधु लहरा उठा हो


घर की खुशी के साथ;


जीवन का यह निबंध


अपनी प्रस्तावना


अपनी विषयवस्तु से भटका-भटका


आ पहुॅंचा


अपने उपसंहार पर


जिसमें प्रत्येक वाक्य


अपमान रचता है


अशक्त उम्र की यंत्रणा से ग्रस्त


उपेक्षाओं की ठोकर खाता है


प्रार्थना करता है


प्रतिदिन


प्रतिक्षण


शब्द, वाक्य, व्याकरण सब


मुक्त कर दें मुझे


लीजिए हो गया उपसंहार


आत्म-सर के साथ!



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