‘10 आफबीट रंग नाटक’ लेखक - डाॅ. कुमार संजय

 समीक्षा

राजेन्द्र नागदेव, -समीक्षक - राजेन्द्र नागदेव, दानिशकुंज, कोलार रोड, भोपाल, मो. 8989569036, 
ईमेल raj_nagdeve@hotmail.com 

पुस्तक - ‘10 आफबीट रंग नाटक 

लेखक - डाॅ. कुमार संजय, कुमार संजय स्पेनिन हेसल, रातू रोड, रांची - 834005
मो. 9939361988 

ईमेल  spenin@rediffmail.com

प्रकाशक - एक्सप्रेस पब्लिशिंग 

मूल्य - रु 250/-

किसी साहित्यिक कृति को मूल विधा से इतर विधा में ले जाना बहुत जोखिम भरा काम है। यदि कृति महत्वपूर्ण रचनाकार की महत्वपूर्ण कृति हो तो यह जोखिम और भी बढ़ जाता है। समीक्ष्य पुस्तक के लेखक डाॅ. कुमार संजय ने पठन हेतु सृजित रचनाओं को दृष्य-श्रव्य माध्यम में ढालने का ऐसा ही जोखिम उठाया है। पुस्तक में विभिन्न भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण दस रचनाकारों की ऐसी कहानियाँ इसके लिए चुनी गईं हैं जो लीक से हट कर हैं जैसा पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है। ये लेखक हैं दिनकर जोशी, किशोरीचरण दास, अमृता प्रीतम, कि. राजनारायण, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, शरदेन्दु बंद्योपाध्याय, इस्मत चुगताई, रस्किन बांड, विजयदान देथा और गोविंद पंजाबी। भाषाएँ हैं गुजराती, उड़िया, पंजाबी, तमिल, हिंदी, बांग्ला, उर्दू, अंग्रेजी, राजस्थानी तथा सिंधी। ऐसे किसी उपक्रम में यह आवश्यक हो जाता है कि एक विधा से दूसरी तक की यात्रा में रचना की मूल भावना क्षतिग्रस्त न हो। नाटक, वे मूल रूप में हों अथवा रूपांतरित उनमें कुछ तत्वों का होना नितांत जरूरी है। भाषा सहज बोलचाल वाली हो। ऐसी कि दर्शक बिना मानसिक कष्ट के उसे ग्रहण कर उसके साथ एकात्म हो सके। यदि नाटक अतिगंभीरता के कारण बोझिल हो गया हो तो कुछ हल्के फुल्के प्रसंग दर्शकों के मूड में बदलाव के लिए उपयुक्त स्थलों पर समाहित किये जाएँ। ऐसे ही यदि नाटक बहुत हल्के स्तर पर चला गया हो तो आवश्यकतानुसार उसमे कुछ गंभीर प्रसंग डाले जा सकते हैं। पात्रों की संख्या कम हो ताकि नाटक का मंचन व्यावहारिक रूप से सहज संभव हो। नाटक क्रिया प्रधान (मुखर) हो। कहानी में तो कोई पात्र मौन रह कर मन ही मन सोचता रह सकता है रंगमंच पर उसे उसी तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। नाटक में मौन पात्र को देर तक झेल पाना दर्शकों के लिए संभव नहीं होता। वे ऊब सकते हैं। इसके लिए स्वागत भाषण की परम्परा है किंतु वह स्वाभाविक नहीं लगता। किसी कथा में जितना कुछ पात्र के अंतर्मन में चल सकता है नाटक में नहीं। अतः ऐसी स्थितियों से नाटक को मुक्त रखा जाना उचित है। नाटकों की सीमा यह भी है कि उनमे छोटे-छोटे भिन्न दृष्य अधिक संख्या में नहीं डाले जा सकते। फिल्मों में एक दृश्य से दूसरे मे तुरंत पहुँच जाना संभव है, नाटकों में नहीं। वहाँ ऐसा करने के लिए अंधेरा कर मंच सज्जा में परिवर्तन करना होता है जिसका अर्थ है समय नष्ट करना। इन आवश्यक बिंदुओं के परिप्रेक्ष में समीक्ष्य पुस्तक को देखने पर प्रतीत होता है कि लेखक ने नाट्य रूपांतर में इन बिंदुओं पर पर्याप्त ध्यान दिया है। वे स्वयं रंगमंच से जुड़े हैं अतः नाटकों के प्रत्यक्ष मंचन की समस्याओं से परिचित हैं। वे पुस्तक में यथास्थान इनके संबंध में निदेशकों को आवश्यक निर्देश भी देते हैं।

कहानियाँ भिन्न-भिन्न भाषाओं से चुनी गईं हैं। इससे पुस्तक का अखिल भारतीय चरित्र निर्मित हुआ है। किंतु यहीं एक समस्या भी आती है। भाषाओं का संबंध भारत में अमूमन भौगोलिक क्षेत्रों से है। भौगोलिक ईकाइयों की अपनी विशिष्ट संस्कृतियाँ हैं। रीतिरिवाज, रहन सहन, वेशभूषा और आवासों का स्थापत्य सबका भिन्न है। एक भाषा से दूसरी भाषा में निर्गमन का अर्थ है एक संस्कृति से दूसरी में प्रवेश करना। इस समस्या का एक हल यह है कि भाषा को बदला ही न जाए विधा मात्र बदली जाए। किंतु इस पुस्तक का उद्देश्य ही अन्य भाषाओं की कथाओं से नाट्य रूप में हिंदी भाषी क्षेत्रों को परिचित कराना है। अतः यहाँ यह विकल्प अर्थहीन हो जाता है। दूसरा विकल्प है भाषा के साथ-साथ स्टेज पर परिवेश को भी बदल दिया जाए। यानी नाटक में मूल क्षेत्र के वातावरण को ही अन्य रूपांतरित भाषायी क्षेत्र के अनुरूप बदल दिया जाए। यह मूल रचना के साथ अन्याय होगा। लेखक को कहीं-कहीं इसी राह पर चलना पड़ा है। लेखक ने तमिल नाटक की अपनी टिप्पणी में इस विषय पर स्पष्ट कहा है- “ ... मैंने एक दूसरा नाट्य रूपांतर किया। मैंने कहानी जस की तस रख कर ट्रीटमेन्ट बिहारी एंगल से किया। कहानी मूल लेखक कि राजनारायण की है लेकिन पात्र और संवाद बिहार के हैं। इससे कथा के मूल स्वभाव में बहुत टूट फूट हो सकती है। वैसे यह प्रयोग ही है। इसके प्रत्यक्ष मंचन होने तक सफल-असफल होने संबंधी कोई अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। जैसा पूर्व में कहा जा चुका है नाटक की भाषा क्लिष्ट हुई तो नाटक दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर भार सा हो जाता है। अतः भाषा का सरल होना नाटक के ग्राह्य एवं जनप्रिय होने के लिए लगभग अनिवार्य सा है। पुस्तक में इस दिशा में नाटककार का प्रयत्न स्पष्ट दिखाई देता है विशेषतः विजयदान देथा की राजस्थानी कहानी ‘नरभक्षी‘ में। इसकी एक स्त्री पात्र कहती है‘‘अरे, हमको अकेला मत छोड़ दीजिएगा। दुइए लोग तो हमारी जिनगी में हैं, एक आप हैं और एक देवी मइया। दुन्नो के बिना हम कइसे जिएंगे?‘ पूरे नाटक में पति और पत्नी के संवाद ऐसी ही बोली में हैं। दिनकर जोशी की गुजराती कहानी ‘अनुभूति‘ को मंचित करना आसान होगा। यह कहानी मात्र दो पात्रों सीमा और केतन के ही ईर्द-गिर्द घूमती है। स्टेज सेटिंग में बदलाव भी बहुत कम हैं। किसी समय प्रेमी-प्रेमिका रहे ये दो पात्र एक दूसरे को लिखे गए पत्रों को कालांतर में नष्ट करने की इच्छा रखते हैं। वे ऐसा करने की पूरी कोशिश करते हैं पर कर नहीं पाते। संवेदनाओं से समृद्ध यह नाटक दर्शकों को भावनात्मक रूप से बाँधे रख सकता है। इन नाट्य रूपांतरों की सफलता-असफलता का पूर्वानुमान करना न तो संभव है न उचित। यह नाटकों के मंचित होने पर ही पता चल सकेगा। किंतु , इस रूपांतरित संग्रह को पढ़ कर यह प्रतीत होता है कि लेखक ने, जो स्वयं नाट्य विधा से जुड़े हुए हैं इन नाटकों के मंचन में आने वाली कठिनाइयों को गहराई से महसूस किया है और उनके निराकरण के यथासाध्य प्रयत्न किये हैं। अन्य भाषाओं की महत्वपूर्ण रचनाओं से हिन्दीभाषियों को परिचित कराने का लेखक का यह अभिनव प्रयास प्रशंसनीय है।