डॉ. अहिल्या मिश्र का रचना संसार (प्रकाशित पुस्तकों में से चुनीं कविताएँ, निबंध, लेख, कहानियाँ एवं समीक्षाएँ)

 साँची कहूँ (2018)

विश्व में हिन्दी भाषा की भूमिका

विश्व मानचित्र के निर्माण से पृथ्वी बनने का इतिहास पुराना है। सुना है जलप्लावन के पश्चात पृथ्वी पर जीवों का निर्माण हुआ। विकास की कहानी इसके परंपरागत विकास से जुड़ी है। दशावतार मानव विकास की कथा गाथा है। हिंदी का निर्माण भी हिन्दुस्तान के साथ हिंद नाम के महासागर के साथ हुआ है। यह सिद्ध हो चुका है। सभी धार्मिक ग्रंथों में पृथ्वी के लय एवं पुर्ननिर्माण की कहानी मिलती है। अन्य महाद्वीपों के साथ एशिया महाद्वीप का नामकरण संपन्न हुआ। इसमें विशाल सीमा एवं तीन ओर से महासागरों से घिरी आर्यावर्त, भारत या हिन्दुस्तान भी आया। चीन, तिब्बत, बर्मा आदि देश के विभिन्न खंड के नामाकरण किए गए। इसी समय कुछ और देश भी अस्तित्व में आए। ये नदी पहाड़ एवं समुद्र के खंडन से निर्मित हुए और सुविधानुसार इनका अलग-अलग नाम रखा गया। एशिया के देशों में भारत उपमहाद्वीप चीन, तिब्बत, ब्रम्हदेश आदि को नामांकित किए गए।

आज का तिब्बत हजारों वर्ष पूर्व पहले का सुमेरू पर्वत है। माना जाता है कि प्राचीनतम सभ्यता सुमेरू पर्वत के नीचे ही जन्मी, पनपी और फैलती गई। इसका विस्तार प्राचीन रोम और मेसोपोटामियाँ से लेकर सिंधु घाटी तक था। संपूर्ण विश्व की प्राचीन सभ्यता के क्षेत्रों में यही स्थल रहे हैं। वास्तव में सुमेरू का अर्थ होता है मेरूदंड यानी आधारशिला। मानव शरीर का मेरूदंड रीढ़ की हड्डी है। इसी के सहारे पूरा शरीर टिका हुआ है। सुमेरू पर्वत के नीचे जो सभ्यता जन्मी वही विश्व बन्धुत्व का केन्द्र बनी। रोम एवं मेसोपोटामियाँ में यदि सिंह और सूर्य-चक्र के अवशेष मिले हैं तो यही सिंधु घाटी में भी है। यहाँ के निवासियों का रहन-सहन एवं धर्म लगभग एक समान ही है।

मेरे मन में विचार उठा कि सुमेरू पर्वत को बांध रखने का वर्षों एक तारतम्य बना होगा, जिसमें संपूर्ण मानव जाति का रहन-सहन-खान-पान एवं विकास के तौर तरीके भी समाए होंगे। उसी समय से इनकी भाषा भी शायद आपस में बहुत मिलती जुलती रही होगी या यों कहें कि इन्हीं स्थानों के शिलालेखों में अंकित इतिहास में व्यक्त भाषा इसके प्रमाण है। भाषा एवं बोली के संबंध में यह कहा जाता है कि हर दो कोस यानी चार मील में बोली बदल जाती है एवं पांच कोस यानी दस मील पर प्रयुक्त होने वाली भाषा में अंतर आ जाता है। इन क्षेत्रों से प्राप्त अवशेषों से इस तरह की कई जानकारी प्राप्त होती है एवं कई तथ्य स्पष्ट होते हैं जैसे बोली और भाषा भी इसके प्रभाव में रहे आज की देवनागरी का शिलालेखों में प्रयुक्त भाषा की लिपि प्रारंभिक स्वरूप है। मैंने इन प्रसंगों का उल्लेख इसलिए किया है क्योंकि भाषा के इतिहास में कई परिवर्तन अवलोकित होते रहे हैं। अतः यह आवश्यक है कि राजनीति और भूगोल की सीमा इसके अंतर में सामयिक इतिहास पर पलीता लगाने से नहीं चूकती और अपनी सुविधा के अनुसार हम नए इतिहास का निर्माण करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं।

सुमेरू सभ्यता का संपूर्ण क्षेत्र देवनागरी लिपि का विस्तार रहा है एवं उसी देवनागरी से क्रमशः हिंदी भी विकसित हुई है। अतः मैं विश्वास के साथ आपके समक्ष यह रख सकती हूँ हिंदी भाषा की भूमिका इसी क्षेत्र में लिखी गई थी या लिखी गई होगी।

आगे चलकर यह सिमट गई होगी और आक्रमणकारियों तथा लुटेरों का कोप भाजन बनकर कई भाषाओं में बँट गई होगी। इसी क्रम एवं चलन के साथ देश एवं मनुष्य भी बदलते गए होंगे और सभ्यता की रीढ़ को हम भूलते चले गए होंगे। फलाफल इतिहास अपने वर्तमान को अंकित करता हुआ कोई और कहानी भी इन घटनाओं के साथ चित्रित करता चला गया। देश एवं मनुष्य के रीढ़ के रूप में अवस्थित भाषा एवं लिपि बंटने की यही प्रक्रिया घटी होगी।

बात यहीं समाप्त नहीं होती है। मैं दुनिया के कई भागों के लोगों से मिलती रहती हूँ। एशिया, यूरोप, अफ्रीका तथा माॅरीशस आदि कई देशों में जाने और वहाँ के निवासियों से मिलने का अवसर भी मिला है। इस प्रकार अपने समय के लोगों को देखने जानने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ है। आज की यह दुनिया हजारों सालों की दुनिया से बिल्कुल भिन्न स्वरूप में विकसित हो गई है। विकास के इतिहास को देखें तो कई हिस्से महासागरों के गर्त में चले गए हैं और कई भूभाग इससे निकल कर उभरते हुए बाहर आ चुके हैं। उदाहरण हेतु भारत वर्ष हेतु ही यह प्रमाण मिलता है कि इसका हिमालयीन भाग थेसिस समुद्र से निकला है। अमेरिका जैसे महान एवं विकसित देश का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। आदमी जितना नया है उतना ही उसका संघर्ष कम होता है। पुराने आदमी ने आज के आदमी से कहीं अधिकाधिक संघर्ष किया था। अपने समय में बदलते समय के साथ मौसमों के बदलने का उसे सामना करना पड़ता था। इसके साथ ही उसने इसमें अपनी ही सभ्यता को डूबते उतरते देखा था। इस संघर्ष में अभिव्यक्ति की प्रमुख भूमिका रहती है। इसी अभिव्यक्ति के माध्यम की हमें खोज रहा करती है।

सुमेरू क्षेत्र को छोड़कर बाहर भी निकलें और देखें तो दृष्टि कुछ बदलने लगती है। घने हरे वनों के बीच उभरे हुए नए-नए शहर। उन शहरों की चकाचैंध झिलमिलाती हुई दुकानें। यूरोप महाद्वीप के विभिन्न शहरों से होते हुए लंदन में भी कई हिंदी भाषी से मेरी मुलाकात हुई। वैसे तो संपूर्ण यूरोप ही भारत, पाकिस्तान एवं बंगलादेश के प्रवासियों से भरे पड़े हैं। यहाँ वर्मा के निवासी भी भरपूर हैं। हाँ तो बात अफ्रीका उपमहाद्वीप, इसके देशों एवं टापूओं की हो वहाँ जब मैं घूमने निकली तो एक दुकान में जा घुसी। कपड़े से लेकर आधुनिक कही जाने वाली हर वस्तु उस दुकान में उपलब्ध थी। हमने उन्हें देखना शुरू किया। दुकानदार पास आकर हिंदी में पूछने लगा- आपको क्या पसंद आया? हम चैंक उठे। मैंने पूछा- आप भारत से आए हैं? इस पर उसने कहा हाँ गुजरात में मेरा घर था। अब पता नहीं है या नहीं। मुझे लगा हमारे देश का एक टुकड़ा टूटकर यहाँ आ गिरा है। मुझसे न रहा गया। मैंने प्रश्न सूचक ढंग से वाक्य दिया- आप अच्छी हिंदी बोल लेते हैं। उसने इसका श्रेय अपने परिजनों को देते हुए कहा कि घर में हिंदी का प्रयोग होता है और पूर्ण भारतीयता से हाथ जोड़ दिए। यह अफ्रीका के स्वतंत्रगण राज्यों में बसे लोगों की बात है।

अफ्रीका के मोमबासा ही नहीं संपूर्ण पूर्वीतट एवं मध्य अफ्रीका यानी काइरा, पश्चिमी तट एवं नाइजीरिया आदि स्थानों में आपका सामना भाषा के आधार पर हिंदी से अवश्य होगा। हालांकि इनकी कई पीढ़ियाँ यहाँ बहुत समय से बसी हुई है। सश्रम लोग यहाँ आगे बढ़े और उन्होंने अपना आशियां बनाया।

माॅरीशस, भारत एवं अफ्रीका के बीच एक छोटा सा द्वीप या टापू है। सर्वप्रथम यहाँ अफ्रीकी गुलाम लाकर बसाए गए। कोरे मारकर उनसे पत्थर उठवाया गया। यहाँ भारत के भी मजदूर एग्रीमेंट के माध्यम से इन देशों में गुलामी के समय ले जाए गए। आज भी यहाँ भारतीय भरे पड़े हैं। जिनके कई-कई पुश्तों ने यहाँ अपने इतिहास लिखे हैं। अब तो वे शासन-प्रशासन में भी अपना दखल रखते हैं।

पुर्तगाली एवं फ्रांसीसी शासक कोरों के बल पर भी इसे पूर्ण करवाने में सफल नहीं हुए। तब पानी के जहाजों में बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों को एग्रीमेंट के सहारे ले जाया गया। जिन्हें गिरमीटिया कहा जाने लगा। इन्होंने तो कोरे खाए और मेहनत की। इनके श्रम ने रंग दिखाया और धीरे धीरे इन्होंने पूरे द्वीप को उपजाऊ मिट्टी में बदल दिया। आज भी माॅरीशस के खेतों के बीच छुटफुट पड़े पत्थर इसके प्रमाण है। भारतीय गिरमीटिया मजदूरों ने इतने भारी-भारी पत्थर जमीन के ऊपर नीचे से पूरी तरह से उठाए थे। उसे तोड़ा और मिट्टी को समतल बनाए। भारत अब भी उनकी महतारी भूमि है और क्रियोल के सिवाए जिस भाषा को बोलने में उन्हें आनन्द आता है, वह है- भोजपुरी अथवा पूर्वी अवधी मिली हिंदी।

भारत के प्रति उनके लगाव को देखकर लगता है कि आज भी जैसे भारत उनकी ही भूमि है। हाँ दूसरे विश्व हिन्दी सम्मलेन के समय माॅरीशस के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री शिवसागर राम गुलाम ने घोषणा की थी कि भारत के बाहर यदि कोई हिन्दी प्रधान मंत्री है तो वह मैं हूँ। इस पर सभी प्रतिनिधियों ने हिन्दी के उनके जयघोष के स्वर में स्वर मिलाया था। आज 10वें हिन्दी विश्व सम्मेलन के अवसर पर आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी में अकेले माॅरीशस के 1500 लेखकों की पुस्तकें रखी गई थीं। वहाँ की हिंदी की स्थिति इससे स्पष्ट हो जाती है। इस पुस्तक प्रकाशन तक सन् 2018 में ग्यारहवीं विश्व हिंदी सम्मेलन भी माॅरीशस में सम्पन्न हो चुका है और हिंदी यहाँ अपना संपूर्ण प्रभुत्व दर्शाते हुए विश्व भाषा होने का उद्घोष कर चुकी है।

अफ्रीकी तटों के सारे द्वीपों में समान स्थितियाँ हैं। आज वहाँ चले जाएँ तो आप को अजनबीपन नहीं लगेगा। लंदन शहर की ओर बढ़ें तो आपको कई बार आभास होगा कि आप बंबई के अंदर घूम रहे हैं या आप यह सोच सकते हैं कि बंबई लंदन का छोटा सा हिस्सा है। वहाँ का साउथ हाल पूरी तरह हिंदी की ध्वनि से गुंजित होता रहता है। हाल में ही एक स्काॅटलैंड के विद्वान से बात हुई तो उन्होंने हिंदी में बताया कि उनकी भाषा का अंगे्रजी से दूर तक का संबंध नहीं है। वह संस्कृत, जर्मल एवं पालि का अपभ्रंश है। अगर आप यूरोप की यात्रा पर निकलना चाहते हैं तो आपके मन में भाषा को लेकर एक संशय होती है कि हम कैसे काम चलाएँगे। किन्तु आप फ्रांस चले जाइए वहाँ हर शहर में आपको हिंदी भाषी मिल जाएँगे। एक भारतीय जो पीढ़ियों से स्पेन में रह रहे हैं, उन्होंने बताया कि स्पेन हिन्दी वालों का घर है। यूरोप की यात्रा करने वाले उत्तर भारतीयों को प्रायः स्पेनवासी समझा जाता है। रोम में रहने वाली मेरी सखी ने बताया कि इटली में बहुत से लोगों ने हिंदी सीख ली है। यहाँ अधिकतर विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। उसने वहाँ के निवासियों की शिकायत सुनाया कि वहाँ से भारत आने पर बिना हिंदी बोले ही उनका काम चल जाता है क्योंकि यहाँ अंग्रेजी का प्रभुत्व अत्याधिक है। यह हमारे लिए शर्मनाक स्थिति है। हाँ अभी सन् 2018 के मई-जून माह में यूरोप भ्रमण के अवसर पर लगभग वहाँ के दस देशों की मैंने सपरिवार यात्रा की। यह हमारी निजी एवं मनोरंजन तथा शिक्षाप्रद यात्रा थी। इस यात्रा में मुझे हिंदी जानने वाले भारत से यहाँ आकर बसने वाले लोगों की बड़ी संख्या मिली और उन लोगों ने सगर्व हिंदी में संभाषण किया।

हालैंड में सूरीनाम निवासियों की संख्या अत्याधिक है। सूरीनाम दक्षिण अफ्रीका के उत्तरी भाग में है और पूरे देश में हिंदी भाषा का प्रचलन है। यह उनकी सुविधामयी हिंदी है। किन्तु अंग्रेजी कतई नहीं। माॅरीशस वासी के समान ये गिरमिटिया लोग भी गंगा दर्शन के लिए बेहद उत्सुक रहते हैं। सन् 1990 के समय माॅरीशस गई थी उसी समय में एक सूरीनाम के दम्पति से मुकाकात हुई। वे घूमने जाने वाली हमारी बस में आ गए। एक भारतीय प्रवासी सुरेश उन्हें छेड़ रहे थे। इस पर महिला ने तमतमा कर कहा- तू क्या बूझता है, हम नानी दादी दोनों हैं। उसके पति राजगोपाल ग्रोवर मुस्कुरा कर चुप रह गए। मैंने उससे नाम पूछा तो उसने बताया उषा ग्रोवर राजपाल।

इस महिला से मुखातिब होते हुए मैंने कहा कि आप कहाँ की हैं? उसने अंगुली से इशारा करते हुए बताया कि ऊ दूर भारत से जाकर हम सूरीनाम में रहते है। हमारी नानी बताई कि हम पानी के जहाज से वहाँ ले जाए गए उनका पहनावा यानी रहन-सहन बदल गया था किन्तु उनके अंदर बोली जीवित थी। वैसे सच तो यह है सूरीनाम के अधिकांश लोगों का रहनसहन, खान-पान सभी भारतीय स्वरूप लिए हुए है। सूरीनाम में पूर्व में डच शासन था। डच यानी हालैंड। यही डच जर्मनी तक फैले थे। इसलिए जर्मनी को डचैजलैंड भी कहा जाता है। हालैंड में लाखों हिन्दी भाषी परिवार बसे हुए हैं। इन्होंने बड़े शहरों में एकता भवन बना रखे है। जिसमें वे यज्ञ, हवन और मंत्रों का उच्चारण करते हैं। इसके आगे हम डेनमार्क, ओसलो, पोलेंड, स्वीडन, ग्रीनलैंड, फिनलैंड, स्कॉउटलैंड, फ्रांस, जर्मनी कहीं भी जाएँ, हमें हर स्थान पर हिंदी भाषा सुनने को मिल जाती है। सड़क के विभिन्न मोड़ों पर भारतीयों से मुलाकात हो जाएगी जिन्हें हम नमस्ते या नमस्कार कर सकते हैं। हमारे नमस्कार या हिंदी अभिवादन से उनके चेहरों पर मुस्कुराहट खिल उठती हैं। बदले में हमें भी मुस्कान युक्त नमस्कार सुनने को मिलता है।

यूरोप के नजदीकी क्षेत्रों में यूगोस्लाविया चेकोस्लाविया या हंगरी, बुडापेस्ट, बलगारिया, पोलैंड और रूस का हिस्सा भी है यहाँ बसे हुए बहुत से हिन्दी परिवार है और वे लोग शुद्ध हिन्दी बोलते हैं। इन देशों में कई बार अंग्रेजी के कारण कठिनाईयाँ आ सकती है, हिंदी भाषी कोई न कोई कहीं न कहीं अवश्य ही मिल जाएंगे।

दक्षिण अफ्रीका में सूरीनाम के अलावे आपको गुयाना फीजी और महान सांस्कृतिक देश मेक्सिको तक हिन्दू देवी-देवताओं एवं हिन्दी भाषा तथा देवनागरी लिपि का विस्तार मिलता ही रहता है। जहाँ भी प्राचीनता है वहाँ हिन्दी का प्रभाव अवश्य रहता है। मेक्सिको के सारे हिंदू देवी देवताओं की जानकारियाँ करने पर लगता है कि कभी भारतीय सभ्यता का विकास अवश्य दूर तक रहा होगा। यही स्थिति दक्षिण पूर्वी देशों की है। वही देवी-देवता वहाँ भी हैं। सूर्य एक महान शक्ति के रूप में एवं अति साहसी स्वरूप में प्रचालित रहे हैं। वे विश्व के कोने-कोने में अपनी भाषा एवं सभ्यता लेकर पहुंचे हैं। हिन्दी भाषा चाहे किसी रूप में कहीं भी पहुंची हो उसने अपने सहज संबंधों की तलाश की है और एक विश्व बंधुत्व को जन्म दिया है। भाषा का संबंध मानव के भीतरी तत्वों से होता है। यह विवाद का विषय नहीं फैलाव का विषय है, पावन गंगा के समान प्रवाहित होते हुए बहता है।

आज विश्व के कई देशों में हिन्दी पठन-पाठन एवं विश्वविद्यालयीन स्तर पर शोध कार्य संपन्न हो रहे हैं। मैं आपके समक्ष उदाहरण हेतु विश्व के देशों से प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं की सूची प्रस्तुत कर रही हूँ।

इस सूची में आप देखेंगे कि हिन्दी भाषा की पत्र-पत्रिकाओं की भरमार आज संपूर्ण विश्व पटल पर छाए हुए है। इसकी जानकारी बताती है कि हिंदी भाषा का विश्व पटल पर क्या स्थान है। हाँ कुछ पत्रिकाओं की प्रतियाँ 3000 हुआ करती है। कुछ की 600 से 1000 तक। 

इंग्लैंड: हिंदुस्तान विदेशों में पहला हिंदी पत्र था। इंग्लैंड देश को यह गौरव प्राप्त होता है कि सन् 1883 में विदेशों में हिंदुस्तान शीर्षक से सर्वप्रथम हिन्दी पत्र के प्रकाशन का सूत्रपात हुआ था। कालांतर में नरेश के संपादन में अन्य पत्र का प्रकाशन होता था। आज भी इंगलैंड के कुछ शहरों से हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाशित होती है। 

दक्षिण अफ्रीका: ओरियंटल ओपिनियन विदेशों में दूसरा हिंदी पत्र था जो दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के सहयोग से सन 1903 में श्री मनसुखलाल नागर के संपादन में निकलता था। 

माॅरीशस: सर्वाधिक हिंदी पत्र प्रकाशन में मॉरीशस अग्रणी है। कुल 52 हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन यहाँ से हुआ है। मॉरीशस में हिन्दुस्तानी साप्ताहिक फिर दैनिक। आरंभ में अंग्रेजी-गुजराती। फिर अंग्रेजी-हिंदी। संस्थापक संपादक मणिलाल डाक्टर। प्रकाशन वर्ष 15 मार्च 1909। 

फीजी: सर्वोत्कृष्ट हिंदी पत्र-पत्रिकाएं फीजी देश में ही निकली है। सेटलर प्रथम हिंदी पत्र। संस्थापक मणिलाल डॉक्टर थे। उनके ही संपादन में पत्र सन 1913 में निकला। फीजी समाचार साप्ताहिका प्रथम संपादक श्री बाबूराम सिंह तथा अंतिम संपादक श्री चंद्रदेव सिंह थे। प्रकाशन वर्ष 1923। सन् 1975 तक पत्र चला। 

सूरीनाम: आर्य दिवाकर आर्य समाज द्वारा सूरीनाम में प्रथम हिंदी पत्र का प्रकाशन। सन 1964 से अब तक यानी कि पिछले 48 सालों से निरंतर निकलता आ रहा है। 

गुयाना: आर्गोसी अंग्रेजी दैनिक पत्र के एक रविवारीय परिशिष्ट के अंक में एक पृष्ठ हिंदी का रहता था। इसी को गुयाना का सर्वप्रथम हिन्दी पत्र प्रकाशन माना जा सकता है। आर्य ज्योति, अमर ज्योति एवं ज्ञानदा उत्कृष्ठ पत्र है। 

त्रिनिडाड - टुबैगो: कोहेनूर - अखबार, अज्ञात द्वारा संपादित स्व. काशी प्रसाद मिश्र के त्रिनिडाड के एक मात्र हिंदी प्रेस से प्रकाशित होता था। ज्योति मासिक हिंदी जीवन ज्योति प्रकाशन के अंतर्गत प्रकाशित होता है। हिंदीनिधि, हिंदी परिचय, भारत समाचार आदि अन्य पत्रिकाएँ है।

दक्षिण अफ्रीका: इंडियन ओपीनियन विदेशों में पूर्व काल की दृष्टि से दूसरा हिंदी पत्र था। सर्वप्रथम 1903 में हिंदी संस्करण प्रकाशित हुआ। यह एक हिंदी साप्ताहिक पत्र था। 

बर्मा: बर्मा समाचार, प्राची कलश, प्राची प्रकाशन - प्रकाशन काल 1934, प्रवासी, नवजीवन - 1951, जागृति, ब्रह्मभूमि- 1953, आर्य युवक जागृति। 

नेपाल: नेपाली प्रकाशन वर्ष 1956, साहित्य लोक 1980, आरोहन। 

हालैंड: हालैंड की हिन्दी पत्र-पत्रिका लल्ला रूख है। 

नोर्वे: शांतिदूत हिंदी, अंग्रेज तनोर्वेजियन द्विमासिक पत्रिका है। 

इंग्लैंड: हिंदोस्थान विदेशों में पहला हिंदी पत्र। प्रकाशन 1883 वैदिक पब्लिकेशन, अमरदीप, प्रवासिनी- प्रकाशन 1964 में। 

कनाडा: भारती हिंदी और अंग्रेजी में, विश्व भारती, जीवन-ज्योति प्रकाशन वर्ष 1982 में। 

रूस: सोवियत संघ, सोवियत नारी 

चीन: चीन सचित्र 

जापान: अंक, सर्वोदय, ज्वालामुखी 

अमेरिका यानी यूनाइटेड स्टेट से अमेरिका सौरभ मासिक भी निकलती है। 

अमेरिका: भारत समाचार प्रकाशन 26 जनवरी 1985, भारत-भारती 1984 में। 

यूनेस्को: यूनेस्को कूरियर 

हमने संपूर्ण विश्व पटल पर हिंदी भाषा की स्थिति आपसे समक्ष रखी है। इसका एक प्रमाण दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का विषय भाषा और तकनीकी आधृत होना है। वायदे पूरे हो यह भी आवश्यक है। बातें तो दसो विश्व हिंदी सम्मेलन में बहुत हो चुके हैं। इसमें कई प्रस्ताव भी पारित किए जा चुके हैं। इसे सम्मेलन के प्रतिभागियों के समक्ष सामूहिक रूप से उच्चारित भी किया जा चुका है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पूर्व कुछ वर्षों में देश में हिंदी भाषा का सकारात्मक वातावरण बनने लगा था। विदेशी नौकर शाह एवं देश के अहिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों ने हिंदी पढ़ना-सीखना आरंभ कर दिया था। केंद्रीय शासन के शौथिल्य के प्रभाव ने हिंदी भाषा के प्रति यह रूचि स्थगित हो गई। हिंदी भाषा में इसके अनाभूत सभी बोलियों को भी रखना होगा जिनमें साहित्य रची गई है। मेरे विचार से भाषा बोलियों की बात से हटकर हिंदी के विश्व पटल के स्वरूप को प्रचार प्रसार से जोड़े तो इसके वैश्विक स्वरूप और द्वंद होंगे। सरकार एवं इसके माध्यमों की आर देखते रहने से इसका राजनैतिक रूप या राजनैतिकरण ही तो हो पाएगा। पसंद ना पसंद भी इसमें सम्मिलित होगा। इसके लिए दृढ़ निश्चयी एवं समर्पित हिन्दी कार्यकर्ताओं की आवश्यकता सदा बनी रहेगी जो हिंदी भाषा को विश्व भाषा बनाने में अपना पूर्ण समर्पण दें। कानून बनाने एवं इसकी उपेक्षा उन्हीं कानूनचियों द्वारा करने की प्रथा हमें बदलनी होगी।

हिंदी के वैश्विक परिदृश्य पर तो कई सकारात्मकता दृश्य हैं किंतु अपने देश में इसके प्रति इस भाव का सर्वथा अभाव ही दिखाई देता है। सन् 1949 के 14 सितंबर के दिन संविधान सभा द्वारा देवनागरी में लिखी गई। हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकृति दी गई। परंतु अद्यपर्यंत यह राष्ट्रभाषा या राज्य भाषा नहीं बन पायी है। कुछ विरोधों के कारण सन् 1963 में देश के सभी राज्यों से 

स्वीकृति मिलने पर ही इसे राजभाषा बनाने की बात कह दी गई। इससे हिंदी पर संकट के बादल छा गए। यह भारतीयता एवं सांस्कृतिक अस्मिता पर गहराता संकट है। साहित्य की भाषा हिंदी तो है किन्तु राजभाषा की गद्दी पर बिठाकर इसे विज्ञान एवं तकनीकी की भाषा बनाना आवश्यक है।

आज समूचे विश्व में हिंदी का महत्व बढ़ रहा है। 139 देशों के प्रतिनिधि का 10वें सम्मेलन पर उपस्थित होना सकारात्मकता का सूचक है किन्तु हमारी हिंदी अपने ही घर में परायी बन बैठी है। हिंदी की रोटी खाने वाले ही वफादार नहीं है। राष्ट्रभाषा के रूप में इसे हम अपने जीवन में सम्मान और स्थान दें। इस हेतु आवश्यक है कि देश के राजनेता, शिक्षाविद्, कलाकार, वैज्ञानिक, विधिवेत्ता समाजशास्त्री आदि हिंदी को हृदय से अपनाएँ। वैसे तो हिंदी में कोई कमी नहीं है किन्तु इन लोगों को यदि कुछ खलती हो तो उसे 

सम्पूर्ण रूप से पूरा करने का सार्थक यत्न करें। न कि हिंदी क्षेत्र से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचने वाले लोग प्रभाव पैदा करने की बात सोच कर अंग्रेजी में बोलना अपनी शान माने। जब ये लोग एवं आम जनता का सोया हुआ स्वाभिमान जाग जाएगा और एक समवेत प्रयास होगा तभी हिंदी सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा की गद्दी पर आरुढ़ होकर प्रतिष्ठित होगी।

हमारे देश में अन्य स्वतंत्र देश की तरह एक राष्ट्रध्वज है, राष्ट्रीय चिह्न है, राष्ट्रीय पक्षी है और अन्य कई राष्ट्रीय वस्तु हैं किन्तु अन्य स्वतंत्र देशों की तरह हमारे पास 86 वर्षों के बाद भी राष्ट्रभाषा या राजभाषा नहीं है। यह हमारे लिए ग्लानि की बात है। इसके पीछे अन्य कई कारणों के साथ एक कारण यह भी है कि हमारे राजनेता एवं नौकरशाह नहीं चाहते हैं कि उनकी चहेती अंग्रेजी हमारे देश से हटे। इसी के बल पर तो उनकी अफसरशाही चलती है। वे अपने को उच्च मानते हैं। जबतक सरकारी कामकाज, उच्चतम न्यायालय, संसद और संपूर्ण शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी में चलेगी तब तक हिंदी का पनपना एवं पूर्ण विकसित होना संभव नहीं है। जब तक इसे शिक्षा रोजगार, प्रोद्योगिकी एवं तकनीकी शिक्षा से नहीं जोड़ेंगे तब तक इसका विकास संभव नहीं। इस हेतु हमें अपने गुलामी मानसिकता का परित्याग करना होगा। अपना स्वाभिमान जागृत करना होगा। आप कहेंगे यह संभव नहीं हो सकता तो मैं अनुरोध करती हूँ कि कृपया नजर उठाकर देखें कि चीन, जापान, जर्मनी आदि देशों ने अपनी मातृभाषा को देश की उन्नति हेतु प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तथा शोध का भी माध्यम बना रखा है। इन्होंने अपनी भाषा को मात्र साहित्य तक ही सीमित नहीं रहने दिया बल्कि इसे इतिहास, कानून, न्याय, चिकित्सा एवं विज्ञान की सभी शाखाओं के साथ सभी जीवनोपयोगी क्षेत्र के विषयों से जोड़ दिया जिससे उस देश के निवासी अपनी भाषा में काम करके अपना और देश का विकास करने में सक्षम हुए। हमारे देश में भी ऐसे ही यत्न की आज परम आवश्यकता है।

पहले से नवमें विश्व हिंदी सम्मेलन तक इसके विषय साहित्य से गहरे जुड़े रहे हैं। साहित्य के उत्थान में हिंदी के योगदान को महत्वपूर्ण ढंग से चिन्हित किया जाता रहा है। निरंतर प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर से लेकर नवें विश्व हिंदी सम्मेलन हेतु अफ्रीका के सन सीटी तक इस विषय विमर्श की बैठकें एवं संगोष्ठियाँ संपन्न हुई है। इसमें हिंदी के उत्थान एवं राष्ट्रभाषा बनाने की ध्वनि भी उल्लेखित एवं परिचित होता रहा है।

बात हमने विश्व के परिदृश्य में हिंदी से आरंभ की थी अंत भी इसी ओर मुड़ते हुए करना चाहूँगी। 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रस्तुत हुए दृश्य जहाँ हिंदी भाषा की दुनिया में प्रोद्यौगिकी के बढ़ते एवं मजबूत कदमों से हमें आश्वस्ति मिलती है वैसे ही इसकी लोकप्रियता की विश्वास भी दृढ़ होता है। प्रधानमंत्री मोदी का भाषण एक सकारात्मक कदम है। विदेश मंत्री का स्पष्ट करना है कि नौ सम्मेलनों की तरह यह मात्र साहित्यिक आदान-प्रदान एवं उत्थान नहीं भाषा एवं तकनीकी तक पहुंचने का सायत्न कार्य है। सच्चे अर्थों में जन-जन तक पहुंचाने का एवं हिंदी को भारत की प्यारी बेटी एवं देश के भाषा की राजगद्दी पर बिठाने तथा देश की सभी भाषा की सहोदरा बनाने एवं विश्व भाषा के परिदृश्य में संपर्क भाषा के रूप में दृढ़ करने का सार्थक कार्य करें। हम सब मिलकर हिंदी के साथ ही आगे बढ़ते हुए अपनी भाषा के विश्व की भाषा प्रयाण में कदम मिलाएँ।


हिंदी: जन मन से राजभाषा तक

हिंदी साहित्य आम जनता की सोच का प्रखर आईना है। हिंदी की उपेक्षा के पश्चात हम भारतीय जनमानस को जानने या समझने की धृष्टता नहीं कर सकते हैं। हिंदी का विकास क्रम जानने या समझने हेतु हमें हिंदी के साहित्येतिहास में झाँकना होगा। इसी के आधार पर हम भारतीय विचारधारा का सपर्क एवं परिचय प्राप्त कर पाएँगे।

हिंदी का विकास क्रमानुसार अपभ्रंश से माना जाता है। इसे जानने के लिए आठवीं शताब्दी तक या इससे भी पीछे जाना होगा। वहाँ साहित्य के इतिहास में डुबकी लगाने पर पाते हैं कि यहाँ साहित्य में हिंदी का भास देने वाली अपभ्रंश या ‘पुरानी हिंदी विद्यमान है। इसे मान्यता भी प्राप्त है। हिंदी साहित्येहास के अंदर झाँके तो पाते हैं कि हिंदी साहित्य के प्रारंभ काल को एक हजार वर्षों की मान्यता दी गई है। हिंदी साहित्य के परंपरागत काल के इन हजार वर्षों को चार भागों में विभाजित किया गया है- आदिकाल (800 से 1400 ई.), भक्तिकाल (1400 से 1700 ई.), रीतिकाल (1700 से 1850 ई.) तथा आधुनिक काल (1800 से वर्तमान तक) दक्षिण भारत में इसी समय प्रचलित हिंदी भाषा को ‘दक्खिनी हिंदी‘ के नाम से जाना गया।

हिंदी का नामकरण ‘हिंदी‘ कब, क्यों और कैसे हुआ? यह प्रश्न हमारे सामने उत्तर तलाशता खड़ा हो जाता है। इस नाम की आधारशिला रखने वाले बहुभाषाविद् आदिकालीन कवि अमीर खुसरो का उल्लेख हिंदी शब्द से गहरे जुड़ा है। सन् 1253 ई. में तुर्की परिवार में जन्में अमीर खुसरो जिनका बाल्यावस्था का नाम अब्दुल हसन था। इनका परिवार उत्तर प्रदेश के पटियाली में बसा हुआ था। इन्हें बचपन से ही कविता से गहरा लगाव था। अमीर खुसरो हिंदी तथा फारसी दोनों भाषाओं में काव्य रचना करते थे। डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है कि खड़ी बोली में प्रथम लिखने वाले अमीर खुसरो हुए। इन्होंने अपनी पहेलियों, मुकरियों आदि की रचना में हिंदी भाषा का प्रयोग किया। वैसे तो अमीर खुसरो ने ब्रज भाषा को अपनी रचनाओं में प्रमुखता से रखा किन्तु इन्होंने खड़ी बोली को भी महत्व प्रदान किया।

13वीं शताब्दी में सर्वप्रथम ‘हिंदी‘ का नामकरण हिन्दवी के नाम से अमीर खुसरो ने ही किया। यह प्रचलन में अपभ्रंश होकर हिंदी नाम से चर्चित हो गया। उस समय फारसी की रचनाओं का वर्चस्व था। खुसरों तत्कालीन फारसी प्रेम पद्धति के विपरीत भारतीय कमाल की भूमिका में लिखते हैं कि ‘मैंने अपनी हिंदी कविताएँ अपने मित्रों में बिखेर दी हैं परंतु इन कविताओं में कुछ सूफी विचार से सराबोर है। खुसरो की दृष्टि में ‘सूफी‘ शब्द का तात्पर्य है कि वह व्यक्ति जो पवित्र जीवन व्यतीत करते हुए धर्माचरण में लीन रहते थे, सूफी कहलाए।‘

अमीर खुसरो पर बात रखते हुए मुझे उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ याद आ रही हैं जिसे आपके सामने रखना चाहती हूँ, देखिए रहस्यवादी सूफी शैली का उनका यह दोहा

‘गोरी सोबे सेज पर मुख पर डारे केश। 
चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँदेशा’

अमीर खुसरो ने साहित्य में अनेक पहेलियाँ, दोहे, गीत, मुकरियाँ, कव्वाली आदि लिखीं, जो आज भी प्रचलित हैं। उनकी रचनाओं में हिंदी भाव एवं आत्मीयता निम्न पंक्तियों में देखें

तुर्क हिंदुस्तानियम मन हिंदी गोयम् जवाब।
शक्र मिस्त्री न दारम् कज अरब गोयम् सुखन।

अमीर खुसरो ने हिंदी को फारसी से कम मान्यता नहीं प्रदान की। उन्होंने अपनी हिंदी की निष्ठा व्यक्त की है- चूं मन तुती एक हिंदम अज रासत पुर्सी जमन हिंदी पुसता नज्म गायन। हिंदी अन्वेषक गोपीचंद नारंग ने हिंदी काव्य विषयक अपनी कृति में ‘अमीर खुसरो का हिंदवी काव्य‘ में लिखा है-अमीर खुसरो का हिंदवी काव्य अपनी लोक प्रियता के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है और इन सात शताब्दियों में वह हमारी लोक परंपरा या लोक साहित्य का अंग बन गया है। लाखों करोड़ों की जुबानों पर चढ़ने से उसमें संशोधन परिवर्तन अवश्य हुआ होगा, संभव है, अमीर खुसरो से संबंद्ध काव्य में कुछ अंश मौलिक हो किन्तु कई अंश निश्चित ही ऐसे भी हैं जिन्हें कालान्तर में बढ़ाया जाता रहा है।

हिंदी तो सारे देश में जन-भाषा के रूप में सिद्धों, नाथों संतो-दासों, कबीर, तुलसीदास, सूरदास, रविदास, मलूकदास, जैन मुनियों आदि की भाषा है। यह देश के कोने-कोने में प्रचारित होने वाली प्रेम-स्नेह-औदार्य की भाषा है। इसके लिए थोपी जाने वाली भाषा का अनर्गल प्रचार किया जाता है। यातायात और संचार माध्यमों के अविकसित युग में संपूर्ण देश वासियों के बीच सांस्कृतिक एकता एवं राष्ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार कैसे संभव हुआ। संपर्क भाषा के रूप में मध्य देश में फैली संस्कृत, पाली, प्राकृत एवं अपभ्रंश आदि को अपने-अपने काल में संपर्क भाषा के रूप में गौरव प्राप्त हुआ है। यह किसी राज्याश्रय से या किसी की कृपा से नहीं मिला। देश वासियों ने स्वतः ही उसे प्रदान किया। मुस्लिम शासन काल में सर्वप्रथम खड़ी बोली हिंदी दक्षिण में ही साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। दिल्ली और उसके आस-पास की भाषा को ही संपर्क भाषा के रूप में मुसलमान शासकों ने अपनाया। फिर हिंदी उन्हीं के द्वारा दक्षिण भारत पहुँची जिसे फारसी 

विद्वान ‘फरिश्ता‘ के अनुसार बहमनी राज्य (14 वीं शताब्दी) के कार्यालयों में हिंदी जुबान दक्खिनी हिंदी के नाम से विख्यात हुई। इसी समय हिंदी संज्ञा भी ग्रहण की। सल्तनत ने इसे सरकारी जुबान का दर्जा दिया था।

तत्पश्चात उर्दू शायर सौदा के गुरू ‘शाह आलम की किताब दीवनजादे‘ (1750 ई.) में लिखा है कि मैंने हिंदुस्तान के तमाम सुबों की जुबान (भाषा) हिंदवी‘ को ही अपनी भाषण के लिए चुना है। इससे पूर्व अंग्रेज यात्री एडवर्ड टेरी की रिपोर्ट (1615 ई.) में संपर्क भाषा के रूप में स्वतः विकास के प्रमाण में हमें ‘फरिश्ता‘ के बाद लिखा निम्न वाक्य अवलोकनीय है- हिंदोस्तानी इंडिया की लैंग्वेज है। अंग्रेज लेफ्टीनेन्ट टामस रोबके ने सन् 1807 ई. में जनभाषा हिंदी में अपने शिक्षक को लिखा ‘भारत के जिस भाग में मुझे काम के लिए जाना पड़ा वहाँ मैंने अपनी सिखाई भाषा हिन्दुस्तानी भाषा का ही व्यवहार देखा है। कलकत्ता से कुमायूँ तक अटक से कटक तक लाहौर से नर्मदा घाटी मध्यप्रदेश तक यह भाषा सभी जातियों और कबीलों द्वारा समझी जाती है।‘ दक्खिनी हिंदी का जो प्रवाह चला उसमें अनवरत हिंदू मुसलमान कवियों ने रचना करके साहित्य को समृद्ध किया। जिन्हें शासकों ने भी संरक्षण दिया। इनमें इब्राहिम आदिल शाह, अली आदिल शाह, कुली कुतुब शाह आदि का उल्लेखनीय योगदान रहा। अपार साहित्य लेखन हिंदी में भरा पड़ा है। यहाँ उदाहरण हेतु एक कविता प्रस्तुत है

ऐ सब बोल, हिंदी बोल, पण तू अनुभव सेनी बोल,
ऐब न राखे हिंदी बोल, मानो तो चख देखे बोल।

भारत वर्ष के स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिंदी के शंखनादी नारों और राष्ट्रीय गीतों ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। उस संक्रमण काल में भी हिंदी अपनी विकास यात्रा की ओर अग्रसर रही। विदेशियों के हिंदी प्रेम की ओर भी ध्यान आकर्षित होता है। जिसमें स्वाधीनता आंदोलन को गति देने वाली एनीबेसेन्ट का नाम सर्वप्रथम है। उनके कथनानुसार मैं आशा करती हूँ, हिंदी जगत की जनभाषा बनेगी और मैं सोचती हूँ कि सभी भारतीय विद्यालयों में अनिवार्य अंग्रेजी के बदले हिंदी का अनिवार्य भाषा के रूप में अध्यापन होना चाहिए, यदि दोनों का नहीं हो सकता है तो यहाँ उल्लेखनीय है कि हिंदी के बढ़ते चरण देखकर लार्ड मैकाले ने सन् 1835 में अंग्रेजी का हमारे देश में अनिवार्य कर दिया था। हिंदी के पहले लेखक जान जोशुआन कटलर ने इसका अनुवाद ‘हिंदुस्तानी भाषा‘ शीर्षक से डच भाषा एवं लैटिन में किया। यह 1695 तथा 1698 ई. में दो बार प्रकाशित हुआ। इससे हटकर देवनागरी लिपि में हिंदी का पहला व्याकरण सन् 1771 ई. में ईसाई पादरी वेंजामिन शुल्ज ने ग्रेमेटिक हिन्दुस्तान नाम से तैयार किया।

हिंदी भाषा के उद्भव एवं विकास पर कई धारणाएँ हैं। अक्षरब्रह्म की परिभाषा में ब्रह्मा विष्णु, महेश आदि त्रिदेव संयुक्त सूचक ‘ऊँ’ शब्दाक्षर को ही ब्रह्माण्ड के मूल में अवस्थित कहा गया है। अक्षर शून्य निराकार से साकार रूप में सतत् विद्यमान है। ऊँ को ब्रह्माण्ड की प्रथम ध्वनि माना गया है। यह ओ, ऊ और म् का संयुक्ताक्षर है। ‘अ‘ से सृष्टि का सृजन ‘ऊ‘ से सृष्टि का पालन और ‘म‘ से सृष्टि का संहार ये तीनों कारक महानतम उद्देश्यों की पूर्णता दर्शित करते हैं। यही त्रिगुणात्मक सत्व, रज और तम के द्योतक हैं। ये सांसरिक रचना (सृष्टि) में निरंतर बने रहते हैं। शंकर के डमरू से निकले शब्द, ध्वनि पाणिनि के संस्कृत व्याकरणीय महासूत्रों का मूल श्रोत बना। 

देववाणी संस्कृत का निर्माण आधार यहीं से माना गया है। वैसे भाषा ही वह तत्व है जो मानव की पहचान व्यक्त करता है। वह व्यक्ति अमुक देश, प्रदेश, क्षेत्र विशेष का है यह उसकी भाषा में ही हम जान पाते हैं। आदिकाल में भाषा का स्वरूप प्राकृत था। इसे प्राकृत संस्कृत भाषा कहा जाता था। इससे ही परिमार्जित भाषा संस्कृत की उत्पत्ति हुई। यह हमारे पूर्वजों की वैदिक भाषा रही है। लिपि की क्रमबद्धता हेतु वर्णमाला का निर्माण हुआ। इसके स्वर और व्यंजन दो अंग रखे गए। इन्हीं के मेल से लेखन का आरंभ हुआ।

देववाणी संस्कृत से परिष्कृत होकर विभिन्न भाषाएँ अस्तित्व में आई। इनके बीच हिंदी सर्वश्रेष्ठ भाषा के रूप में भाषा जगत में अनवरत प्रवाहमान है। हिंदी विश्वभर में महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है। भाषा और बोली मूलतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। किन्तु जहाँ भाषा वाणी द्वारा कहे जाने के साथ-साथ लिपि के रूप में लिपिबद्ध भी होती हैं। भाषा की दृष्टि से समृद्ध हमारे देश के संविधान में अधिकृत रूप से 23 भाषाएँ सम्मिलित की गई हैं। विश्व के लगभग 132 देशों में किसी न किसी रूप में हिंदी अपना अहम स्थान बना चुकी है। विश्व में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में हिंदी तृतीय स्थान पर स्थित है। संसार के लगभग 100 देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन कराया जाता है।

विश्व भाषा समुदाय में तीसरा स्थान रखने वाली हिंदी के लिए संसद ने राजभाषा अधिनियम पारित किया। आज की गलत शिक्षा नीति हमें गलत रास्ते पर ले जा रही है।

हिंदी की रोटी खाने वाले भी हिंदी के प्रति वफादार नहीं हैं। विद्यालयों में हिंदी को बेकार के विषय जैसा समझने की प्रक्रिया भी छिपे रूप से श्वास लेने लगी है। विद्यालयों के प्राचार्य द्वारा इसका नकारात्मक प्रभाव डाला जाने लगा है, अंग्रेजी नहीं बोल पाने वाले व्यक्ति का आत्मविश्वास तोड़ दिया जाता है। देखा जाए तो पाते हैं कि मैकाले की दी हुई योजना पूर्णतया फलित और सफल रही है। वैसे यह बात चुभती हुई है किंतु एक साजिश तो चल रही है कि कुछ संस्था प्रधान हिंदी विषय को गौण कर इसे अपनी संस्था से दूर करने की सतत् कोशिश करते रहते हैं। अंग्रेजों के चले जाने के पश्चात भी अंग्रेजी की हुकूमत जारी है। गुलाम मानसिकता के लोग उच्च पदों पर बैठे हुए हैं। वे अंग्रेजी के वर्चस्व को जारी रख कर भारत की जनसंख्या के बड़े भाग को हाशिए पर धकेलने की साजिश या षडयंत्र कर रहे हैं। भारतीय संसद के कामकाज एवं भाषणों पर गौर किया जाए तो पाते हैं कि वहाँ व्याप्त अंग्रेजी के वातावरण में हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं को भी पीछे धकेला जा रहा है। इस संदर्भ में पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की यह उक्ति दर्शनीय है- ‘भारत की अपेक्षा न्यूयार्क में हिंदी बोलना अधिक सुरक्षित है।‘ भारतीय मानसिकता को स्पष्ट करने में यह अधिक सहायक है।

हमारे अधिनियम, अध्यादेश, नियम, उपनियम आदि हिंदी में बनने लगे हैं। वैसे अंग्रेजी और हिंदी रूपान्तरण में विरोधाभास हो तो अंग्रेजी ही मान्य होगी। हिंदी को संवैधानिक रूप से राजभाषा का स्थान दिया है। संविधान लागू होने की तिथि यानी 26 जनवरी 1950 से हिंदी भारत की राजभाषा तो बन गई परंतु संवैधानिक रूप पर इसका अपेक्षाकृत विकास आजतक भी नहीं हो पाया है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। इस संबंध में हिंदी की विकास यात्रा पर हम नजर डालें तो इसे अच्छी तरह समझ पाने की स्थिति बन पाएगी।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सन् 1803 ई. में अपनी सुविधा हेतु जनता से संबंधित कानूनों को हिंदी में तैयार करके उनके प्रयोग का शुभारंभ किया। किन्तु न्यायालयों में देवनागरी लिपि का प्रयोग सन् 1901 ई. में सर्वप्रथम किया गया। हिंदी मदरसों की स्थापना बारेन होस्टिंग्स ने कलकत्ता में की। इधर स्वतंत्रता आन्दोलन का मूल स्वर हिंदी बन गई। इसके राष्ट्रीय गाने, तराने और नारे सारे देश में एक स्वर से गूंजने लगे। अहिंदी भाषी राष्ट्रीय नेताओं एवं समाज सुधारकों के शीर्षस्थ लोकमान्य तिलक, स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय, बंकिमचंद्र चटर्जी आदि ने हिंदी भाषा को अंगीकृत किया एवं सन् 1875 ई. में केशवसेन ने कहा था, ‘हिंदी को अगर भारत की राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया जाए तो सहज में राष्ट्रीय एकता स्थापित हो सकती है। इस भावना को अनवरत महात्मा गांधी, नेता सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर, अमर शहीद भगत सिंह, संत विनोबा भावे, काका कालेलकर आदि अग्रसर करते रहे। इस भावना को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा एवं हिंदी प्रचार सभा हैदराबाद ने अंगीकृत किया। हिंदी का वातावरण तैयार किया गया। तमिल भाषा के साधक कवि गुरुनगर की ये पंक्तियाँ जिनका अनुवाद रामधारी सिंह दिनकर ने किया है, प्रेरणादायी और हृदयग्राही हैं।

‘जिस दिन भारत के सभी लोग 

अपनी पसंद से चुनी हुई सबकी बोली 

हिंदी को अपना जानेंगे। 

जानेंगे केवल नहीं वरन आसानी से 

हिंदी में अपना करके काम-काज सुख मानेंगे। 

बस उसी दिवस दासत्व न रहने पाएगा। 

बस उसी रोज सच्चा स्वराज आ जाएगा। 

सच्चा स्वराज आ जाएगा।‘

भारत वर्ष की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का प्रतीक है- हिंदी। हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आन्दोलन तथा अभिव्यक्ति की भाषा है- हिंदी। समस्त भारत की सदियों से संपर्क भाषा, धर्म और भक्ति की भाषा तीर्थों की भाषा और छावनियों की भाषा हिंदी रही है। हिंदी भारत के सभी हिस्सों में बोली समझी एवं पढ़ी जाती है, सहज बोधगम्य होने के साथ ही राष्ट्र की संस्कृति की संवाहक भी है।

डॉ. कामिल बुल्के ने कई हिंदी पुस्तकें लिखीं तथा हिंदी अंग्रेजी शब्दकोष बनाया जिसे भारत सरकार ने मान्यता दी है। विश्व में सर्वप्रथम हिंदी कृति- रामचरितमानस पर तुलनात्मक अध्ययन इटली के फ्लोरेंस विश्वविद्यालय में शुभारंभ डॉ. यल.पी.तैस्तीदार ने इतावली भाषा में किया था। भारत में सन् 1965-1966 में सर्वप्रथम हिंदी में लिखकर शोधप्रबंध लिखने का शुभारंभ एवं स्वीकृत कराने हेतु दिल्ली से डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने संघर्ष करके प्रशासन एवं 

अधिनियम में परिवर्तन कराया। वस्तुतः हिंदी किसी बैशाखी के सहारे गद्दी पर नहीं बैठी है। वह अपनी लोकप्रियता के कारण ही राजभाषा बनने की ओर सदैव अग्रसर रही। राजभाषा को प्रदेशों की तीन श्रेणी क, ख, ग, में विभाजित की गई- प्रथम हिंदी भाषी प्रान्त, द्वितीय मिली जुली भाषाएँ तथा तृतीय ‘ग‘ श्रेणी के वो प्रांत थे जहाँ के लोग पूर्ण रूप से हिंदी नहीं जानते थे।

पूरे भारत में सर्वाधिक फिल्में हिंदी में बनने एवं रिलीज होने का सबसे बड़ा कारण देश की अधिकांश जनता हिंदी बोलती एवं समझती है। विश्व में हालीवुड के बाद फिल्म निर्माताओं में भारत के बालीवुड का दूसरा स्थान माना जा रहा है। विदेशों में भी हिंदी की फिल्मों का व्यवसायिक दृष्टि से काफी बड़ा क्षेत्र है। विशेषकर इस्लाम देशों में हिंदी फिल्मों का बड़ा क्षेत्र निर्मित हो चुका है। इसी प्रकार हिंदी जनभाषा के विस्तारित क्षेत्र के कारण ही विदेशी मीडिया के सबसे बड़े व्यवसायी रूपर्ट मडोंक यहाँ ‘स्टार चैनल‘ लेकर आए। इस अंग्रेजी चैनल का बड़ी बिगबैंग से शुभारंभ किया गया। इसी आधार पर ‘सोनी डिस्कवरी आदि भी अन्य अंग्रेजी चैनल आरंभ कर अपनी भाषा में कार्यक्रम लेकर आए। किन्तु बदलते परिवेश को अनुभव करते हुए सभी चैनलों ने अंग्रेजी से हिंदी में परिवर्तित कर दर्शकों की अपार संख्या बढ़ाने के साथ ही अपने आर्थिक व्यापार की अभिवृद्धि से धन भी खूब कमाने लगे। हिंदी विज्ञापनों से भी मनोरंजन के टी.वी. चैनल अपार अर्थ कमाने लगे।

वैश्वीकरण के इस युग में हिंदी की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ रही है। हिंदी आज विदेशियों के लिए भी आयवृद्धि अथवा नोट छापने की मशीन बनने लगी है। यह बात निरंतर सत्य सिद्ध हो रही है। अब कम्प्यूटर की भाषा में हिंदी भी सम्मिलित या प्रयुक्त है। बिल गेट्स के सुपुत्र का भाषण विगत दिनों प्रकाशित हुआ था कि अंग्रेजी को थोड़ा सजग रहने की आवश्यकता है। यह बात बर्किंघम में कही गई थीं। चीनी, हिंदी और स्पेनिश इन तीनों भाषाओं का दबाव बढ़ने वाला है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश ने हिंदी को 21वीं सदी की भाषा बताते हुए इसके विकास के लिए दस करोड़ डॉलर की राशि भी प्रदान की थी। हमारे तमिल भाषी विज्ञानवेत्ता एवं पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जी. अब्दुल कलाम ने अनुभव करते हुए स्पष्ट कहा, ‘मेरी अपनी राय है कि सभी राज्यों में 12वीं कक्षा तक हिंदी बोलना, अनिवार्य कर दिया जाए ताकि सारे लोग हिंदी पढ़ना लिखना सीख सकें। स्टार प्लस के ‘कौन बनेगा करोड़पति‘ ने हिंदी में झंडे गाड़ दिए। भारत के सभी प्रान्तों के विभिन्न भाषा-भाषी लोग अमिताभ बच्चन से सीधे संवाद कर रहे थे। इसी प्रकार ‘आस्था‘ संस्कार आदि धार्मिक-अध्यात्मिक चैनल से सारी दुनियाँ के करोड़ों लोग हिंदी में प्रसारण को सुन भी रहे हैं और देख भी रहे हैं। हिंदी की यही देन पूर्व में हजारों वर्षों से पाया जाता है। भक्तों, संतों, साधकों और उपदेशकों ने मध्यदेश की इस भाषा के माध्यम से सारे देश को सांस्कृतिक स्तर पर भी संबंद्ध रखा है।

हिंदी में शिक्षण एवं शोध प्रचुर मात्रा में लगभग सभी विषयों एवं विद्यालयों विश्वविद्यालयों में विगत वर्षों में हो चुका है। विज्ञान, न्यायपालिका, मेडिसिन, भूगोल, अर्थशास्त्र, बैंकिंग, वनस्पति विज्ञान आदि की पुस्तकें हिंदी में काफी मात्रा में लिखी गयी हैं। किन्तु प्रायः बिना जाने समझे ही आम लोगों को इन भ्रमकता से पूरित किया जाता है कि हिंदी में कविता कहानी के अलावा कोई अन्य कार्य होता ही नहीं है। यह पूर्ण रूपेण असत्य है। विज्ञान की तकनीकी शब्दावली पर भी काफी प्रकाशन हुए हैं। प्रवासी भारतीयों ने हिंदी साहित्य में अपार भंडार भरा है। वहाँ से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं, कवि सम्मेलन तथा विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजनों आदि से हिंदी को विश्व भाषा का रूप प्रदान किया गया है।

मॉरीशस के राष्ट्रीय कवि डॉ. बृजेन्द्र भगत ‘मधुकर‘ जिन्होंने वहाँ के स्वाधीनता आन्दोलन को अपनी संघर्षशील हिंदी रचनाओं से गति प्रदान की थी। उनकी कुछ पंक्तियाँ प्रवासी भारतीयों का स्वभाषा प्रेम दर्शाने हेतु प्रस्तुत किया। ‘हिंदी सकल ज्ञानगुण खान, गाता हूँ मैं गीत उसी का सुनलो सकल सुजान, जगह-जगह महफिलों में होता हिंदी का सम्मान, अपनी ही हिंदी बोली पर करना गर्व गुमान।‘ विदेशों में बसे अनेक हिंदी लेखक एवं विदेशी रचनाकार अपने लेखन से हिंदी का भंडार भर रहे हैं। विदेशी हिंदी प्रेमियों की जागरूकता प्रेरणा देने वाली है। तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन नई दिल्ली के अवसर पर इसके प्रणेता मराठी भाषी हिंदीनिष्ठ अनंत गोपाल शेवड़े थे। किसी हिंदी प्रेमी ने कृतज्ञतावश भी इनका नाम उच्चारित नहीं किया। हंगरी से आई एक प्रतिभागी हिंदी विदुषी कु. डॉ. एवा अररि की इन मार्मिक पंक्तियों में उड़ेले गए दर्द को देखें- ‘तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन में, दस हजार लोग बैठे थे, हिंदी विद्वान हिंदी प्रेमी, देश प्रेमी, देशी-विदेशी। मैं जानती हूँ, आपकी आत्मा स्वर्ग से, एक स्वर्ण सड़क पर, वहाँ आकर देखती होगी, कैसी है उन्नति, आपके शुरु किए काम की। आपका नाम किसी ने, भी नहीं लियाः यद्यपि आपने, हिंदी के लिए प्राण उत्सर्ग किया। लेकिन मेरे मन में, मेरे दिल में, आपका स्मरण, और अनुकरण, सदा जीवित है। विश्व में अनेक हिंदी लेखकों, कवियों की बड़ी संख्या है, इनमें रूस के डॉ. इवजेनी चेलीशेव, जर्मनी के लोठार लुत्से, इंगलैंड के कवि लेखक डॉ. रूपर्ट स्नेज, जापान के प्रो. के कोगा एवं पोलैंड के डॉ. मारिया बूस्की।‘

विदेशों में हिन्दी की बात करते हुए कुछ बातों से मुख नहीं मोड़ा जा सकता है। भूमंडलीकरण, उन्नत प्राद्योगिकी एवं सूचना-तकनीकी के बढ़ते कदम से इस युग में सबसे बड़ा खतरा, भाषा, साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में पैदा हुआ है। इतिहास साक्षी है कि जब कभी भी समाज पथभ्रमित हुआ है अथवा अपसंस्कृति हावी हुई है उस समय साहित्य ने ही इसे संभालने का कार्य किया है। साहित्य का संबंध सदैव ही संस्कृति से रहा है तथा हिंदी भारतीय संस्कृति की अस्मिता की पहचान है। संस्कृत वाङ्मय का पूरा सांस्कृतिक वैभव हिंदी के माध्यम से ही आम जनता तक पैठ बना पायी है। हिंदी का विस्तार क्षेत्र बहुत ही विस्तृत रही है। इसमें संस्कृत साहित्य की परंपरा के साथ लोक भाषाओं की वाचिक परंपरा की संस्कृति भी समाविष्ट रही है। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी एवं इसकी लोक भाषाओं ने घर-घर जा स्वाधीनता की लौ जलाए वह केवल राजनैतिक स्वतंत्रता हेतु ही नहीं अपितु सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए भी थी। भारत में साहित्य संस्कृति और हिंदी अन्योन्याश्रित है।

इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि आधुनिक आर्य भाषाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हिंदी भाषा ही रही है। कबीर भी निर्गुण भक्ति एवं भक्तिकाल के सूफी-संतों ने हिंदी को बहुतायत से समृद्ध किया। कालान्तर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत एवं गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की अवधी में रचनाकर हिंदी को और अधिक लोकप्रिय बनाया। पूर्व में ही मैं हिंदी के इतिहास में अमीर खुसरो की बात करते हुए उसके दिए शब्द का उल्लेख की थी कि उन्होंने इसे हिंदवी गाया तो हैदराबाद के मुस्लिम शासक कुली कुतुबशाह ने इसे ‘जवाने हिंदी‘ बनाया। स्वतंत्रता प्राप्ति तक हिंदी ने कई पड़ाव पार किया। साथ ही दिनोंदिन और समृद्ध होती चली गई। आज संसारभर में लगभग 6000 भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। इनमें से लगभग 1652 भाषाएँ और बोलियाँ भारत में सूचीबद्ध की गई है। फलाफल संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को शामिल किया गया है। इन्हें देश की कुल जनसंख्या के 91 प्रतिशत लोग प्रयोग करते हैं। सर्वाधिक 46 प्रतिशत लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि इसे राजभाषा के रूप में वरीयता दी गई।

शोधों एवं खोजों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि स्वयं ब्रिटेन तक में हिंदी की शुरूआत प्रिटिंग प्रेस क्रांति के साथ ही सोलहवीं शताब्दी में ही हो गई जबकि इस समय भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव डाली जा रही थी। सन 1650 में ब्रिटेन में देवनागरी में छपाई कार्य प्रारंभ हो चुका था। उस समय भारत में हस्त लिखित कार्य ही चल रहा था। कालान्तर में जे.विल्किंसन एवं जार्ज फॉस्टर ने क्रमशः श्रीमद भागवत गीता एवं अभिज्ञान शाकुंतलम् से प्रभावित होकर हिंदी सीखी एवं अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया। सन 1800 में स्कॉटलैंड के जान बोथानिक गिलकास्ट ने देवनागरी और इसके व्याकरण पर तमाम पुस्तकें लिखी तो डॉ. एल.एफ. रूनाल्ड ने 1873 से 1877 तक भारत प्रवास के बीच हिंदी व्याकरण पर काफी कार्य किया। लंदन से इस विषय पर पुस्तक भी प्रकाशित हुई। लंदन की रॉयल एशियाटिक सोसायटी द्वारा सन् 1865 में राजज्ञा के अंतर्गत हिंदी सहित भारत में मुद्रित सभी भाषाओं के अखबार, पत्रिकाएँ व पुस्तकें आने लगी। 1935 में बेल्जियम के नागरिक डॉ. कामिल बुल्के ईसाई धर्म प्रचार के लिए भारत आए। किन्तु फ्रेंच, अंग्रेजी, फ्लोमिश, आयरिश भाषाओं पर अधिकार होने के बाद भी इन्होंने हिंदी को भी अभिव्यक्ति के माध्यम हेतु चुना। अपने हिंदी ज्ञान में वृद्धि हेतु उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया तथा तुलसीदास को अपने प्रिय कवि चुनकर रामकथा उद्भव एवं विकास पर डॉक्टर आफ फिलासफी की उपाधि प्राप्त की। उसमें स्पष्ट होता है कि हिंदी पूर्व से ही विदेशियों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है।

देश में वर्तमान पीढी भले ही अंग्रेजी का अन्ध समर्थक बन रहा हो, किन्तु विदेशों में हिंदी की महत्ता पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ रहा है। आज हिंदी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, इराक, इंडोनेशिया, इजरायल, ओमान, फिजी, इक्वाडोर, सउदी अरब, पेरू, रूस, कतर, ग्वाटेमाला, जर्मनी, अमेरिका, फ्राँस, ग्रीस, म्यांमार, त्रिनिदाद, टोबैगो, अमन इत्यादि देशों में जहाँ लाखों प्रवासी भारतीय एवं हिंदी भाषी है, के बीच बोली जाती है। माॅरीशस, त्रिनिदाद, टोबौगो, सूरीनाम, सुयाना, फीजी, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में ‘गिरमिटिया‘ मजदूर के रूप में गए भारतीय अपनी संस्कृति एवं हिंदी को सहेजना चाह रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों में इसे एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में अपनाया गया है। आज 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। अमेरिका के 32 विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में हिंदी की पढ़ाई होती है। अमेरिका के टेक्सास के स्कूलों में पहली बार ‘नमस्तेजी‘ नाटक हिंदी पाठ्य पुस्तक को हाई स्कूल के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस पुस्तक को भारत वशी शिक्षक अरुण प्रकाश ने आठ सालों की मेहनत से तैयार किया है। अरूण प्रकाश 80 के दशक में पढ़ाई एवं व्यापार के लिए अमेरिका गए थे।

1889 ई. में उन्होंने पहली बार टेक्सास के एक स्कूल में हिंदी पढ़ाना शुरु किया तो उनकी कक्षा में केवल आठ छात्र पहुँचे। इनमें से सात भारतीय मूल के थे। उसी समय से आप तत्संबंध में प्रयासरत रहे। ब्रिटेन के लंदन विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज और न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में भी हिंदी का अध्यापन होता है। जर्मनी के 15 शिक्षण संस्थानों ने हिंदी भाषा तथा साहित्य के अध्ययन को अपनाया है। यहाँ कई संगठन हिंदी के प्रचार का कार्य कर रहे हैं। हॉलैंड में 1930 से हिंदी का अध्ययन हो रहा है। यहाँ के चार विश्वविद्यालयों ने इसे प्रमुख विषय के रूप में अपना रखा है। सन् 1942 ई. से चीन में हिंदी का अध्ययन प्रमुख विषय के रूप में आरंभ किया गया। पहली बार हिंदी रचनाओं का अनुवाद कार्य सन् 1957 में आरंभ हुआ। इसे आगे बढ़ाते हुए बीजिंग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विडहान ने तुलसीदास कृत रामचरितमानस का अनुवाद चीनी भाषा में किया। इटली के लोग भी भारतीय संस्कृति को जानने हेतु हिंदी सीखने की इच्छा रखते हैं।

रूस में बड़े पैमाने पर हिंदी रचनाओं एवं हिंदी ग्रंथों का रूसी भाषा में अनुवाद किया जाता है। यहाँ के लोगों में हिंदी सीखने की ललक बहुत अधिक है। रूसी लोग हिंदी फिल्मों और हिंदी गीतों के दीवाने हैं। फ्रांस के पेरिस विश्वविद्यालय में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। बेल्जियम के तीन विश्वविद्यालयों में भी हिंदी का महत्वपूर्ण स्थान है। जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में मेरी प्रिय सहेली डॉ. सुल्ताना नकवी वर्षो तक कार्यरत रही। यहाँ हिंदी का प्रमुख स्थान है। 1950 में जापान रेडियो से हिंदी में सर्वप्रथम कार्यक्रम प्रसारित हुआ था। फीजी में व्यापार, बाजार, कारखाने सभी में हिंदी का दबदबा बना हुआ है। माॅरीशस में हिंदी काफी लोकप्रिय है। कई साहित्यकार मूल रूप से हिंदी में रचना करते हैं। यहाँ 260 प्राथमिक विद्यालयों में नियमित रूप से हिंदी का पठन-पाठन किया जाता है।

भूमंडलीकरण एवं सभ्यता तथा सूचना क्रांति के इस चेतनशील होड़ में सभ्यता का संघर्ष विराटता प्राप्त कर रहा है। दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भी विकसित, विकासशील एवं अविकसित राष्ट्रों की संस्कृतियों पर प्रहार की कोशिश की है। सूचना क्रांति एवं उदारीकरण के माध्यम से सारे विश्व अपने में सिमट कर एक वैश्विक गांव में बदलने की अवधारणा में अवस्थित होता जा रहा है, ऐसे में अपनी संस्कृति, भाषा मान्यताओं विविधताओं तथा संस्कारों को बचा कर रखने की सबसे बड़ी जरूरत अनुभव की जा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जहाँ एक ओर हमारी प्राचीन सम्पदाओं का पेटेंट कराने में जुटी है वहीं इनके ब्रांड-विज्ञापनों ने बच्चों-युवाओं की मनोस्थिति पर भी काफी प्रभाव डाला है। निश्चित ही इन सबसे बचने हेतु हमें अपनी भाषा की तरफ उन्मुख होना होगा।

फिल्मों की ओर देखें तो पाते हैं कि भारतीय फिल्में विदेशों में अच्छा व्यवसाय कर रही हैं। इसमें विदेशों में बसे भारतीयों का योगदान है। यह एक ऐसा वर्ग है जिन्होंने रोटी रोजगार की खोज में भले ही मजबूरन या इच्छित विदेशी आचार एवं जीवन पद्धति अपना लिया है पर इनका अपनी मातृभूमि से लगाव बना हुआ है। इनकी रोजी-रोटी की भाषा भले ही विदेशी है पर मन हिंदी में ही रमा रहता है। हम इस तथ्य को भी सामने रख सकते हैं कि फिल्मों एवं हिंदी के अन्य माध्यमों के प्रचलन से प्रसारित हिंदी ने हाल में ही प्रकाशित आक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश में हिंदी के ढेर सारे प्रचलित शब्दों उदाहरणार्थ आलू, अच्छा, अरे, देसी, फिल्मी, गोरा, चड़ी, यार, जंगली, चारना, गुण्डा, बदमाश, बिंदास, लहंगा, मशाला आदि-आदि को स्थान दिया जा चुका है।

अमेरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने राष्ट्रीय सुरक्षा भाषा कार्यक्रम के अंतर्गत अपने देशवासियों से हिंदी, फारसी, अरबी, चीनी एवं रूसी भाषाएँ सीखने को कहा। अपनी भाषा एवं पहचान को सर्वश्रेष्ठ मानने वाला अमेरीका का हिंदी सीखने में रूचि का प्रदर्शन निश्चित हमारे लिए गौरव की बात है। अमेरीकी राष्ट्रपति ने स्पष्टतया घोषणा की कि हिंदी ऐसी विदेशी भाषा है, जिसे 21वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अमेरिका के नागरिकों को सीखनी चाहिए। इसी क्रम में अमरीकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपनी चुनावी घोषणा पत्र की प्रतियाँ अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी और मलयालम में भी छपवाकर वितरित कीं। ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद सरकार की कार्यकारी शाखा में राजनैतिक पदों को भरने के लिए जो आवेदन पत्र तैयार किया गया उसमें 101 भाषाओं में भारत की 20 क्षेत्रीय भाषाओं को भी स्थान दिया गया। इनमें अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, मागधी एवं मराठी जैसी भाषाएँ भी शामिल हैं। इन्हें अभीतक हमारे भारतीय संविधान की अष्टम-सूची में स्थान तक नहीं मिल पाया है। ओबामा ने रमजान की मुबारकबाद उर्दू के साथ-साथ हिंदी में भी दी।

आज जब दुनियाभर में अंग्रेजी का डंका बज रहा है ऐसे में इसके गढ़ लंदन में बर्किंघम स्थित मिडलैंडस वल्र्ड ट्रेड फोरम के अध्यक्ष पीटर मैथ्यूज ने ब्रिटिश उद्यमियों, कर्मचारियों और छात्रों को हिंदी सहित कई अन्य भाषाएँ सीखने की नसीहत दी है। अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान हिंदी का इकलौता सम्मान है जो किसी दूसरे देश की संसद, ब्रिटेन के हाउस आफ लार्डस् में प्रदान किया जाता है। आज अंग्रेजी के दबदबे वाले ब्रिटेन से हिंदी लेखकों का सबसे बड़ा दल विश्व हिंदी सम्मेलन में अपने व्यय कर पहुंचता है। यह बताता है कि हिंदी आज दूसरे देशों में भी अपनी कीर्ति-पताका फहरा रही है। विदेश मंत्रालय ने इसी रणनीति के अंतर्गत प्रतिवर्ष दस जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस मनाने का निर्णय लिया है। विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में इस दिन ‘हिंदी दिवस समारोह का आयोजन संपन्न होता है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, सर्वाधिक जन संख्या वाले राष्ट्र सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार की भाषा हिंदी को भूमंडलीकरण के इस दौड़ में नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। प्रतिष्ठित अंग्रेजी प्रकाशन समूहों ने हिंदी में अपने प्रकाशन आरंभ किए हैं। बी.बी.सी., स्टार प्लस, सोनी, जी.टी.वी., डिस्कवरी आदि अनेक चैनलों ने हिंदी में अपने प्रसारण प्रारंभ कर दिए हैं। हिंदी फिल्म संगीत की ओर दृष्टिपात करें तो हमें एक नई प्रकार की हिंदी के दर्शन होते हैं। यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों में भाग लेने वाले प्रतिभागी यानी विज्ञापन कत्र्ता अब क्षेत्रीय वेश-भूषा व रंगढंग में नजर आते हैं। निश्चित ही मनोरंजन एवं समाचार उद्योग पर हिंदी की मजबूत पकड़ ने इस भाषा में संप्रेषणीयता की नई शक्ति पैदा की है।

बदलती परिस्थितियों में हिंदी ने अपने को परिवर्तित किया है। विज्ञान-प्राद्योगिकी से तमाम विधाओं पर हिंदी की पुस्तकें अब उपलब्ध है। क्षेत्रीय समाचार पत्रों का चलन बढ़ रहा है। इंटरनेट पर हिंदी की वेबसाइटों में बढ़ोत्तरी हो रही है। सूचना प्राद्योगिकी के क्षेत्र में कई कम्पनियों ने हिंदी भाषा की परियोजनाएँ आरंभ की हैं। कम्प्यूटर पर हिंदी को बढ़ावा देने हेतु सूचना एवं प्राद्योगिकी के प्रतिष्ठिान सी-डैक ने निःशुल्क हिंदी सॉफ्टवेयर जारी किया है। इसमें अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। माइक्रोसाफ्ट ने आफिस हिंदी के द्वारा भारतीयों के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग आसान किया है। आई.बी.एम. द्वारा विकसित साफ्टवेयर में हिंदी भाषा के 650000 शब्दों को पहचानने की क्षमता है। इसके साथ ही हिंदी एवं हिन्दुस्तानी अंग्रेजी के लिए आवाज पहचानने की प्रणाली का भी विकास किया गया है। यह शब्दों को पहचान कर लिपिबद्ध कर देती है। एच.पी. कम्प्यूटर्स एक ऐसी तकनीकी का विकास करने में जुटी है जो हाथ से लिखी हिंदी लिखावट को पहचान कर कम्प्यूटर में आगे की कार्यवाही कर सके। कम्प्यूटर पर अधिकतर कार्य अंग्रेजी में होता है और हमारे देश में अभी भी 12-13 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी पर अपनी पकड़ रखते हैं। इन स्थितियों में गूगल द्वारा कई भाषाओं में अनुवाद की सुविधा प्रदान करने से अंग्रेजी का जानकार न होने पर भी इंटरनेट के माध्यम से अपना कार्य आसानी से कर सकते हैं। पूरी दुनियाँ में ब्लागिंग सोशल वकिंग वेबसाइटस का क्रेज छाया है। ब्लागिंग में तो भाषा की सारी वर्जनाएँ टूट रही हैं। इसलिए तो आज हिंदी देश-विदेश, उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम की सीमारेखा तोड़कर सरपट भाग रही है। अब इस समय 50,000 से अधिक ब्लाग (हिंदी में) कार्यरत हैं। इंटरनेट पर हिंदी का विकास तेजी से हो रहा है। गूगल से हिंदी संबंधी विभिन्न जानकारियों को धड़ल्ले से खोजी जा रही है। पहले कई तरह के फाण्ट के चलते हिंदी का स्वरूप एक जैसा नहीं दिखता था। वर्ष 2003 में यूनीकोट हिंदी में आया। इसके माध्यम से हिंदी को अपने विस्तार में सुविधा हुई। इससे वर्णमाला की जटिलताएँ हल हुई। आज हिंदी जो आरंभ में जनमन की भाषा थी आज राजभाषा, देश भाषा, राष्ट्रभाषा एवं विश्वभाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है। बाकी सभी बातें छोड़ कर हम हिंदी की प्रगति व उन्नति में रत हों। अगर-मगर छोड़ सच्चे मन से हिंदी के शुभाकांक्षी बनें। हिंदी के प्रचार-प्रसार में उन्मुक्त होकर अपना योगदान दें। हिंदी को बढ़ाना हमारा राष्ट्रीय धर्म है।

10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन: पाने खोने का गणित

विश्व हिंदी सम्मेलन की भूमिका एवं उसमें सम्मेलन तक की संक्षिप्त प्रस्तुति के बाद मैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित 10-12 सितंबर 2016 को दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में अपनी सहभागिता एवं इससे उत्पन्न विचारों को आपसे बाँटना चाहती हूँ। 10वां विश्व हिंदी सम्मेलन के शुभारंभ में उद्घाटन सत्र में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज्य, राज्यमंत्री हर्षवर्धन, सूचना प्राद्यौगिकी संचार मंत्री रवि शंकर (तीन राज्यों के गवर्नर) क्रमशः गोवा की राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी एवं मध्य प्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव के साथ दो राज्यों के मुख्य मंत्री क्रमशः झारखंड के रघुवीर दास एवं मेजवान राज्य मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चैहान तथा माॅरीशस की मानव संसाधन मंत्री लीला देवी दुकन के साथ राज्य के सचिव एवं संपूर्ण सम्मेलन प्रावधानों के नीव के पत्थर सांसद एवं उपाध्यक्ष श्री अनिल माधव दवे, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू एवं विदेश सचिव अनिल वाधवा के साथ कई गणमान्य मंच पर उपस्थित थे। सम्मेलन आयोजन समिति के उपाध्यक्ष अनिल माधव दवे ने इस मंच से केंद्रीय डाक टिकट के साथ संस्मारिका गागनांचल एवं प्रवासी साहित्यकार ‘जोहन्सबर्ग से आगे‘ पत्रिका तथा पुस्तक का लोकार्पण संपन्न करवाया। सम्मेलन की परिकल्पना विदेश राज्य मंत्री वी.के.सिंह की देखरेख में तैयार की गई थी। इन्होंने सभा भवन की विराटता में भारतीय दर्शन एवं संस्कृति के साथ साहित्यिक परिवेश का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया था।

सभा भवन के मुख्य द्वार पर दोनों ओर राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर के चित्र उकेरे गए थे। इसके साथ ही दोनों ओर दो चित्रों के नीचे उनकी प्रसिद्ध चार पंक्तियाँ भी उकेरी गई थी। प्रवेश द्वार के पास माखन लाल चतुर्वेदी का स्टेच्यू लगाया गया था। अनिल जी उद्घाटन सत्रों में स्वयं इसका विवरण देते हुए बतला रहे थे कि तुलसीदास की ‘क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंचतत्व यह बना शरीरा।‘ पंक्ति के अनुसार- इन पांच तत्वों का विश्लेषण किया। आगे आपने बताया कि समीरा की परिकल्पना को संपूर्ण सभा स्थल एवं मंडप के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। मुख्य द्वार पर प्रज्वलित अग्नि, क्षिति से जुड़े विभिन्न वृक्ष, रिक्त स्थानों में एवन का वास, जल की विशालता एवं सभागार का ऊपरी हिस्सा आकाश या नभ की परिकल्पना को सत्य सिद्ध करते हुए आपको दिखाई देंगे। आप ध्यान दें तो इसे स्वयं अनुभव करेंगे। सभा भवन में इसकी विशालता के साथ दीवारों पर प्रसिद्ध साहित्यकारों के चित्रों सहित उनकी पंक्तियों को उकेरा गया था। इन परिदृश्यों से संपूर्ण वातावरण सरस होकर सभा भवन हिंदी साहित्यमय बना हुआ रहा। साहित्यिक वातावरण का निर्माण इस अस्थायी भवन के इन खंबों के बीच हो रहा था। इसके साथ ही उद्घाटन में प्रस्तुत हिंदी गीत ने इसमें चार चाँद लगा दिए।

10वें विश्व हिंदी सम्मेलन समिति की अध्यक्षा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पूरे ध्यान लगाकर संपूर्णता के साथ इसके सत्रों एवं विभिन्न कार्यक्रम का सर्वेक्षण करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। सभी कार्यक्रम योजनाबद्ध ढंग से पूरा किया गया। ये सारी बातें इस सम्मेलन की अपूर्व सफलता का माध्यम बनी। सभा में विचार विनिमय हेतु सत्रों में भी विचार मंथन के साथ समसामायिकता पर विशेष निगाह रखी गई थी।

संगोष्ठियों के आयोजन हेतु कई कक्ष (प्रकोष्ठ) बनाए गए थे। कक्षों का नामकरण देश-विदेश के प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकारों एवं हिंदी सेवियों के नाम पर रखा गया था। तोरण द्वार के साथ उद्घाटन सत्र के मंच को विशेष रूप से फूल (पूना एवं अन्य शहरों से) मंगवाकर सजाया गया था। शिवराज सिंह चैहान ने अपने उद्गार प्रकट करते हुए एवं स्वागत भाषण में कहा कि जो सांसद हिंदी क्षेत्र से चुनकर आते हैं, प्रायः वे ही संसद में अपनी बात अंग्रेजी में रखते हैं और इसे प्रभाव डालने की नीति करार देते हैं। अन्य कई बातें जो हिंदी की उत्थान से जुड़ी थी। उसे भी आपने इस सभा पटल पर रखें।

मुख्य सचिव अंटोनी डिस्सूजा ने यह सुनकर सिर झुका लिया। योगा क्लास के लिए 177 देश जब एकजुट होकर साथ आ सकते हैं तो हिंदी के लिए क्यों नहीं? हिंदी के लिए चयनित भाषा इतनी कठिन होती है कि छोटे बच्चों को समझ में नहीं आता। हिंदी शब्दकोश में वैज्ञानिक एवं गणितीय शब्दावली का विकास अत्यावश्यक है। भारत के प्रधान मंत्री मोदी जी के भाषण में भी कई प्रश्न उभरे। उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में मंच से अपनी बात रखने के चरण में निम्न बिंदुओं को विशेष रूप से चिह्नित किया। 

1. भाषा भी एक बाजार है, विशेषज्ञ हिंदी के एप और साफ्टवेयर बनाएँ। 

2. भाषा को सहेजना हर पीढी का दायित्व है। 

3. मैंने चाय बेचते हुए हिंदी सीखी। हम सभी इस विरासत को सहेजें। 

4. हिंदी विश्व की भाषा बने। 

5. उन्होंने इस विश्व हिंदी सम्मेलन को हिंदी का महाकुंभ घोषित किया। 

6. हिंदी भाषा की समृद्धि में मध्यप्रदेश का उल्लेखनीय स्थान है। 

7. भाषा के लुप्त होने पर ही उसकी महत्ता का पता चलता है। लुप्त होने से पहले ही हम चैतन्य हो जाएँ। 

8. हर पीढ़ी का दायित्व है कि अपनी भाषाई विरासत सुरक्षित रखे और आने वाली पीढ़ी को प्रदान करें। 

9. भाषा की ताकत का अंदाजा इसी से लगता है कि हिंदी के संवर्द्धन का आंदोलन गैर हिंदी मातृभाषा वालों ने चलायी। यह बात हमें प्रेरणा देती है। 

10. हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ना होगा तभी हिंदी सशक्त होगी। 

11. जीवन की तरह भाषा में चेतना होती है। बिना भाषा के कुछ भी नहीं हो सकता है। यह हवा का ऐसा झोंका है जो अपने साथ सुगंध समेटती चलती है। हिंदी साहित्य भारत की सामाजिक, आर्थिक स्थितियों, जनजीवन और मूल्यों का दर्पण है। 

12. भाषाओं को जोड़े तो विश्व एक बड़ा बाजार बनेगा। 

13. 21वीं सदी के अंत तक विश्व की 6000 भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाओं के गुम होने की संभावना है। 

14. भाषा के दरवाजे बंद मत करें। भाषा को तकनीक के अनुरुप परिवर्तित करें। 

15. हिंदी को विश्व की भाषा बनाने हेतु इसमें डिजीटल उपयोग बढ़ाया जाए।

हिंदी भाषा हमारी विरासत है। इसे हमें ही सहेजना होगा। हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ना होगा क्योंकि आने वाले दिनों में विश्व में हिंदी, अंग्रेजी और चीनी भाषा ही बचेगी। हिंदी को समृद्ध बनाने क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को आवश्यकतानुसार सूचीबद्ध करना होगा। अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनुवाद कार्य को गति देने की बात भी उन्होंने रखी। प्रधान मंत्री ने अपने भाषण में चार महान हिंदी रचनाकारों को याद किया।प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद। इसके साथ ही महादेवी वर्मा के योगदान को भी उनके वक्तव्य में चिन्हित किया गया।

विदेश मंत्रालय द्वारा प्रवासी भारतीय लेखकों के पुस्तकों की एक बृहद प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें अकेले माॅरीशस से करीब 1500 लेखकों की पुस्तकें रखी गई थीं। अन्य देश के हिंदी लेखकों की पुस्तकें भी देखने को मिलीं। इसमें मध्यप्रदेश शब्द वैभव के नाम से एक अन्य प्रदर्शनी की मध्य प्रदेश प्रशासन द्वारा सोमदत्त बखौरी प्रदर्शनी कक्ष में लगाया गया। राज्य के परिदृश्य में इसके गौरवशाली हिंदी साहित्य को प्रदर्शित करता हुआ यह प्रर्दशनी आकर्षक रहा। मुख्य विषय से संबंद्ध ‘हिंदी जगत विस्तार एवं संभावनाएँ‘ पर आधृत एक भव्य प्रदर्शनी डॉ. मोटूरि सत्यनारायण कक्ष में लगाई गई थी। इसमें डिजिटल माध्यम से हिंदी को उन्नत बनाने का विषय वस्तु रखा गया था।

10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में 12 विषयों पर विभिन्न सत्रों का आयोजन किया गया। ‘विदेशों में हिंदी शिक्षण‘, ‘विदेशनीति में हिंदी‘ और ‘विदेशियों के लिए भारत में हिंदी अध्ययन की सुविधा‘ पर कुल सात सत्र संपन्न हुए। इनमें विदेशों में हिंदी शिक्षण एवं प्रचार-प्रसार के क्षेत्रों में प्रयत्नरत 12 वक्ताओं ने अपने-अपने देश में हिंदी भाषा के प्रति भारत देश का सहयोग तथा इस दिशा में उनकी परेशानियाँ एवं समस्याओं का उल्लेख किया। इनका सुझाव था कि भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत हाई कमीश्नर, राजदूत एवं वरिष्ठ अधिकारी हिंदी में बात करेंगे तो हिंदी का आदर बढ़ेगा। विदेश मंत्रालय के वेबसाइट पर विदेशियों के हिंदी साहित्य उपलब्ध करवाया जाए तो उन लेखकों को प्रोत्साहन मिलेगा इससे हिंदी भाषा एवं साहित्य की अभिवृद्धि होगी। भारत सरकार हिंदी शिक्षण के लिए योग्य अध्यापकों को उनके देशों में तथा पाठ्यपुस्तकों को पर्याप्त मात्रा में एवं यथोचित समय पर भेजने की व्यवस्था करें। साथ ही कहा गया कि अधिकारिक विदेशियों को भारत में हिंदी पढ़ने की सुविधा प्रदान की जाए।

‘प्रशासन में हिंदी‘ हेतु आयोजित 3 सत्रों में 6 वक्ताओं ने भाग लिया। इसमें जोर दिया कि प्रशासनिक कार्य पूरी तरह हिंदी में ही संपन्न हो। सरकार इस दिशा में दृढ़ता का व्यवहार करे। तीनों सत्रों की अध्यक्षता मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने की। ‘‘सरकार के सभी कार्य हिंदी में संपन्न हो तो प्रजा के लिए सुविधाजनक रहेगा।‘‘ यह अध्यक्षीय टिप्पणी में कही गई। साथ ही और भी कई महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिए गए।

‘गिरमिटिया देशों में हिंदी‘ विषय पर दो सत्र आयोजित हुए। दोनों सत्रों की अध्यक्षता गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने की। उत्तरप्रदेश के सांसद डॉ. रामनरेश मिश्र ने वक्ता के रूप में सुझाया कि भारत सरकार गिरमिटिया देशों के छात्रों को भारत के विद्यालयों में आरक्षण का प्रबंध करें। प्रो. कैलाश देवी कहती हैं कि हिंदी भाषा के साथ-साथ लिपि के संरक्षण की ओर भी दृष्टि डाली जाए। डॉ. कमल कुमार ने मांग की कि हिंदी भाषा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखने हेतु रामायण तथा अन्य ग्रंथ गिरमिटिया देशों में भेजे जाने चाहिए। राकेश पांडे ने सुझाया कि भारत सरकार गिरमिटिया देश की भाषा जाननेवालों को ही वहाँ अधिकारी बनाकर भेजें। सांसद आर.के. सिन्हा ने भी अपने विचार रखे। सत्र संयोजक श्री मनोहर पुरी ने कई प्रतिनिधियों को चर्चा में सहभागिता के अवसर प्रदान किए। .

‘संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी‘ पर आयोजित तीन सत्रों की अध्यक्षता प्रसिद्ध हास्य कवि अशोक चक्रधर ने की। कुल 6 वक्ताओं ने अपने विचार रखे। निष्कर्षतः संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी का प्रयोग बढ़ाने हेतु वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए। आदित्य कुमार चैधरी ने कहा कि भारतवासियों के उपयोग में आनेवाले ढंग से कम्प्यूटर का निर्माण किया जाए। बालेन्दु शर्मा दधीचि ने कहा कि इंटरनेट टेकनोलाॅजी के कारण नौकरियों की संख्या बढी है। कम्प्यूटर के जरिए हिंदी का प्रयोग बढ़ाया जाए तो सरकारी एवं गैर सरकारी क्षेत्रों में नए सॉफ्टवेयर, नई टेकनोलाॅजी  उपलब्ध करने की दिशा में प्रयत्नशील होंगे एवं नौकरी की संख्या में वृद्धि बनी रहेगी। डॉ. विजय कुमार मलहोत्रा ने हिंदी प्रयोग के साथ इसके उच्चारण पर ध्यान देने की आवश्यकता को रेखांकित किया। विदेश राज्य मंत्री जनरल बी.के.सिंह ने भी इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज करायी तथा सत्र संयोजन डॉ. रचना विमल ने किया।

‘देश और विदेश में प्रकाशन समस्या एवं समाधान‘ विषय पर दो सत्र रखे गए। इसकी अध्यक्षता श्री बलदेव भाई शर्मा ने करते हुए टिप्पणी की कि भारत प्रकाशन के क्षेत्र में दुनिया में तीसरे स्थान पर है। हर वर्ष यहाँ लगभग एक लाख पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। श्री राजनारायण गेति ने कहा कि विदेशी हिंदी लेखकों को अपनी पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए भारत सरकार सुविधा एवं सहायता प्रदान करें। डॉ. ऋतु शुक्ल ने कहा कि गाँव-गाँव में पुराने जमाने की चैपाल सभा की तरह हिंदी के प्रचारार्थ कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँ। सत्र संयोजक श्री प्रभात कुमार थे।

विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी‘ विषय पर आयोजित तीन सत्रों की अध्यक्षता भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिक मंत्री श्री हर्षवर्धन ने की। इन्होंने टिप्पणी दी कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिक के क्षेत्र में हिंदी का सफल प्रयोग करने हेतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। श्री सुभाषचंद्र लखेडा ने कहा कि देश की प्रगति के लिए वैज्ञानिक आविष्कार एवं इसका प्रचार-प्रसार आवश्यक है। उसे सरकारी विभाग एवं संचार माध्यम द्वारा हिंदी भाषा से जोड़कर जनता तक पहुंचा सकते हैं। डॉ. बालकृष्ण सिन्हा ने वैज्ञानिक भाषा में प्रयोग करने वाले पारिभाषिक शब्दों की सरलता, सहजता एवं बोलचाल की भाषा पर जोर दिया। सत्र संयोजक श्रीमती किंकिणीदास गुप्ता थीं।

‘विधि एवं न्याय क्षेत्र में हिंदी और भारतीय भाषाएँ‘ पर आयोजित दो सत्रों की अध्यक्षता पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी ने की। इन्होंने कहा कि विधि एवं न्याय संबंधी विषयों में हिंदी का प्रयोग बढ़ना शुभ परिणाम है। वैसे दोनों क्षेत्रों में हिंदी एवं भारतीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ाना आवश्यक है। न्यायाधीश शंभुनाथ श्रीवास्तव ने कहा कि इंग्लैंड जैसे देशों की तरह हमारे देश में भी अदालतों के फैसले देशभाषा हिंदी में देना मुमकिन हो सकता है। सत्र संयोजक श्री प्रदीप कुमार ने कहा कि मध्य प्रदेश की अदालतों में हिंदी में अर्जियाँ स्वीकृत होती हैं और हिंदी में फैसला देने में काफी वृद्धि हुई है।

‘हिंदी पत्रकारिता और संचार माध्यों में भाषा की शुद्धता‘ पर दो सत्रों की अध्यक्षता प्रमुख लेखिका एवं पत्रकार मृणाल पांडे ने की। इन्होंने टिप्पणी में कहा कि पत्र-पत्रिकाएँ और मीडिया बेरोक-टोक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करके हिंदी का संकट भाषा के रूप में प्रचार कर रही है। यह हिंदी के अस्तित्व के लिए खतरनाक है, इससे हिंदी को बचाना चाहिए। श्री नरेन्द्र कोहली ने अंग्रेजी के प्रति मोह का वर्णन किया। वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुलदेव वर्मन ने कहा कि हिंदी भाषा को स्वच्छ एवं शुद्ध बना कर हिंदी जनता एवं पाठकों के समक्ष लाई जाए। पत्रकार श्री ओमथानवी ने कहा कि यों हिंदी भाषा का स्वभाव परिभाषा से शब्दों को अपना लेने वाला है। किन्तु उन्हीं शब्दों को हिंदी में स्वीकार करना चाहिए जिनका हिंदी में अभाव है। सत्र संयोजक श्री राजेन्द्र शर्मा थे।

‘बाल साहित्य में हिंदी‘ पर 2 सत्र आयोजित हुए इसकी अध्यक्षता डॉ. बालशौरि रेड्डी ने की। श्री श्यामसिंह नेगी, डॉ. वीणा गौतम, सत्र संयोजक उषा पुरी, श्री नन्दलाल कल्ला आदि ने स्वस्थ्य एवं विचार पोषक बाल साहित्य की प्रतिपूर्ति की वकालत की।

‘अन्य भाषा-भाषी राज्यों में हिंदी‘‘ पर दो सत्र के आयोजन की अध्यक्षता प्रो. शेषारत्नम ने की। एक सत्र की अध्यक्षता यार्गड्डा लक्ष्मीप्रसाद करते हुए इन्होंने सत्र संयोजन भी किया। प्रो. सानम, डॉ. रामचंद्र राय एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. आर. एस. सर्राजू ने हिंदीतर राज्यों में हिंदी के विस्तार के लिए कई सुझाव दिए।

प्रस्तावों का अनुमोदन: उपरोक्त वक्तव्यों एवं सुझावों के प्रमुख अंश पर प्रतिनिधियों, छात्रों, शोधार्थियों एवं अध्यापकों आदि ने गहन चर्चा की। इन्हें अनुमोदित कर निम्न बिंदुओं में समेटा गया। 

  1. हिंदी के प्रति प्रेम और आदर बढ़ाने हेतु प्रतिवर्ष 14 सितंबर में सभी स्कूलों एवं कालेजों तथा शिक्षण संस्थानों में ‘हिंदी दिवस‘ मनाना चाहिए। 
  2. अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में हिंदी के प्रसार हेतु आनलाइन पाठ्यक्रमों के विकास की ओर कदम उठाना चाहिए। 
  3. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) के द्वारा हॉल में लागू किए गए विकल्प आधारित पाठ्यक्रम के कारण हिंदी का ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं का भी भारी अहित होगा। स्नातक स्तर पर इन भाषाओं के अध्ययन को लुप्त कर देने वाली इस प्रणाली की पुनः समीक्षा होनी चाहिए। 
  4. हिंदी भाषा के विकास एवं प्रचार-प्रसार हेतु स्थापित केंद्रीय हिंदी संस्थान, वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, महात्मा 
  5. गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय अनुवाद मिशन आदि संस्थाओं के कार्य एवं योजनाओं में समन्वय होना चाहिए। इनके लक्ष्यों को वर्तमान की आवश्यकतानुसार पुनः परिभाषित करना चाहिए। 
  6. हिंदी प्रचार प्रसार सभा हेतु स्थापित सरकारी और साहित्य संस्थाओं का नेतृत्व करने वाले पदों पर हिंदीतर क्षेत्रों के पदाधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए। आवश्यकताओं पर अतिरिक्त निदेशक या संयुक्त निदेशक उपकुलपति जैसे पदों का सृजन कर अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों के हिंदी विद्वानों एवं विशेषज्ञों को इन संस्थाओं से जोड़ना चाहिए। 
  7. हिंदी में अनुवाद कार्य निरंतर, योजनाबद्ध रूप से करने तथा हिंदी में स्नातक एवं स्नाकोत्तर की पाठ्यपुस्तकें निर्माण करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। 
  8. अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में हिंदी प्रचार के लिए स्थापित और सरकारी संगठनों को संपर्क भाषा के प्रयोग सेवा क्षेत्र और शिक्षा क्षेत्र की वर्तमान आवश्यकताओं के कार्य करने के लिए दिशा निर्देश किया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर भारत की लिपि विहीन कई भाषाएँ रोमन लिपि अपना रही है। रोमन के स्थान पर देवनागरी को विकल्प के रूप में अपनाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।

10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में एक बात जो खुलकर सामने आई, वह है, ‘हिंदी को यथार्थ की धरती पर उतारा जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की मान्यता का प्रश्न अनेक कारणों से अभी तक उलझा हुआ है, वैसे हिंदी प्रेमियों के अथक प्रयास एवं दबाव के चलते निकट भविष्य में यह प्रकरण सुलझ जाएगा। वर्धा (महाराष्ट्र) में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय की स्थापना हो चुकी है। यह अपनी गतिविधि द्वारा हिंदी को निरंतर विकसित कर रही है। माॅरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय का निर्माण हो चुका है। वह पूर्ण रूप से कार्य करने लगी है। निकट भविष्य में मॉरीशस तीसरी बार यानी 11 वीं विश्व हिंदी सम्मेलन का अधिष्ठाता बननेे जा रहा है। यह कार्यक्रम 12-13 अगस्त 2016 में संपन्न किया जाएगा।

40 वर्ष पूर्व 1975 ई. में नागपुर में संपन्न पहला विश्व हिंदी सम्मेलन का कार्यक्रम था। भारत के महाराष्ट्र में इसकी परिकल्पना प्रस्तावना एवं प्राकल्प रखा गया। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन तात्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के प्रयास के साथ आरंभ हुआ। साथ ही पुनः सात वर्ष बाद तीसरा विश्व हिंदी सम्मेलन राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी के उद्घाटन के साथ सन् 1993 में आयोजित किया गया। दूसरा एवं चैथा विश्व हिंदी सम्मेलन क्रमशः 1976 में 1993 में मारीशस में, पाँचवा विश्व हिंदी सम्मेलन सन् 1996 में त्रिनिदाद तथा टोबैको की राजधानी पोर्ट स्पेन में सम्पन्न हुआ। छठवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन सन् 1999 में यू.के. में हुआ। सातवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन सन् 2003 ई. में सूरीनाम की राजधानी पारामारिबों में हुआ एवं आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन सन् 2007 में संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी न्यूयार्क में संपन्न हुआ। नवम् विश्व हिंदी सम्मेलन 2012 में अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में संपन्न हुआ। दशम विश्व हिंदी सम्मेलन 32 वर्ष बाद भारत के मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सन् 2016 ई. में अपनी पूर्ण गरिमा एवं सांस्कृतिक परिवेश के साथ सम्पन्न हुआ। ऊपर इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। हिंदी हेतु आकांक्षाएँ एवं आवश्यकताएँ अभी भी बाँकी हैं। वैसे देशवासी एवं प्रवासी के बीच आपसी सूत्र बंधे है एवं दोनों के द्वारा एक भाषा हिंदी के प्रति मुखर ध्वनि ध्वनित होने लगी है। यह एक व्यापकता से भरी पग ध्वनि भी है।

उद्घाटन सत्र से वह बात निकलकर सामने आई कि विश्व की लगभग 6000 भाषाएँ है। 90 प्रतिशत भाषाओं के लुप्त होने की संभावना है। इनमें से अधिकतम भाषा हमारे लिए पुरातत्व का विषय बन जाएगा। उज्वेकिस्तान में उज्बेक से हिंदी एवं हिंदी से उज्वेक में शब्दकोष तैयार किया गया है। अगर हिंदी को भूल जाते हैं और रामचरितमानस को भी भूल जाते हैं तो हमारी हालत बिना जड़ के पेड़ जैसी होगी जो दिखने के लिए मात्र खड़े रहते हैं। इसलिए भाषा के प्रति लगाव भाषा को समृद्ध बनाने के लिए होना चाहिए। बंद दायरे में भाषा सिमट कर न रहे। ऐसा नहीं होनी चाहिए।

सुषमा स्वराज विदेश मंत्री भारत सरकार ने कहा कि भाषा को सहेजना हर पीढ़ी का दायित्व होगा। पहले के सभी विश्व हिंदी सम्मेलन साहित्य केंद्रित थे। अबकी बार यह भाषा की उन्नति पर केंद्रित है। इसमें भाषा के रूपों पर बृहद् विचार किए गए। इससे कई निष्कर्ष सामने आए। विदेश नीति में हिंदी प्रशासन, तकनीक, विज्ञान आई.टी. कानून, आदि में हिंदी प्रयोग पर बल दिए जाएँ, विभिन्न सत्रों में लिए गए प्रस्तावों एवं सुझावों का अंतिम सत्र में अनुमोदन किया गया। यह भविष्यवाणी की गई कि इस सम्मेलन से हिंदी को आपेक्षित स्थान और सम्मान मिलेगा।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने स्वीकारा कि हिंदी में बोलने से उनका मान बढ़ा है। सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि इसकी अनुशंसाएँ लागू करने विशेष समिति बनायी जाएगी। गिरमिटिया देशों में तकनीक की भाषा के रूप में हिंदी और इसके अधिक प्रयोक्ता बढ़ाने नई पीढ़ी के बीच की सेतु बनी। हिंदी पाठ्यक्रम को सरल बनाने पर जोर देने की बात की गई। विदेशी सेवा में हिंदी अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। एक बात और उभर कर सामने आई कि नेताओं का रिपोर्टकार्ड बने कि उन्होंने किस भाषा के अधिक शब्द इस्तेमाल किए। भाषा के रूप में प्रयुक्त की जाने वाली विदेशों में विशेष कर खाड़ी देशों में कामगरों से लोग हिंदी सीख रहे हैं। हमारे शिक्षा व्यवस्था में विदेशी भाषाओं को शामिल किया जाए। एक बात यह भी की गई कि अफसरों की वाणी में आदेश एवं कार्य अप्रत्यक्ष या समक्ष रूप से होते रहे हैं कि अंग्रेजी में लिखो तो अब अगर ऐसा होगा फौरन कार्यवाही होगी। सम्मेलन में अपने देश एवं दुनिया के अन्य देशों के उपस्थित लोगों सहित करीब पाँच हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनके रुकने एवं मेहमानबाजी संबंधी सुविधाओं की पूर्ण सुचारू व्यवस्था की गई थी। आने-जाने हेतु वाहन, खान-पान की समुचित व्यवस्था की प्रशंसा गई। इस मोर्चे पर प्रादेशिक सरकार को सराहा गया।

इस सम्मेलन में जुटे देश एवं दुनियाभर के भाषा के विद्वानों में से कोई अपने देश में हिंदी की गौरव गाथा बताते नहीं थकता था तो कोई अपने चमकदार भविष्य हेतु हिंदी सीखना चाहता था। किसी को हिंदी में व्यापारिक हित नजर आ रहे थे, तो कोई इस बहाने भाषा से जुड़ना चाहता था एवं कोई अपना दर्द साझा कर रहा था। आइए देश-विदेश में सक्रिय हिंदी के हितैषियों की ओर भी ताकें एवं झाँकें- जर्मनी निवासी प्रोहाईस बरनर: हिंदी की स्वीडन में प्रोफेसर मिस्टर इंडिया के उपनाम से प्रसिद्ध हैं। फिजी की डॉ. इन्दुचंद्रा एवं अन्य 17 महिलाएँ बोली, हिंदी की पहली से आठवीं तक पढ़ाई जरूरी है। रूस की कैमिला और टेटिना भारत में व्यापार के लिए हिंदी सीख रही है। हालैंड की पैत्रा केक्कर ने कहा उन्होंने सास से बात करने के लिए हिंदी संस्थान में दाखिला ली है। कनाडा की स्नेहा ठाकुर ने कहा कि उससे कहा जाता है ‘‘भारत में परवाह नहीं तो तुम क्यों सर खपा रही हो।‘‘ हिंदी के हक में फैसला हेतु इसमें वे प्रयासरत हैं। त्रिनिवाद की कमला रामपाल ने हिंदी की सराहना की। फिल्म मेकर रमा पांडे ने हिंदी को सरलीकृत करने की वकालत की।

चीन देश की निवासी लीयान ने कहा कि हिंदी दुनिया की बड़ी भाषा है। हालैंड देश की चंद्रा ने कहा कि हमें हिन्दुस्तानियों को समझने का मौका मिलेगा। कजातिस्तान की उरविवि ने कहा कि हमारे पहचान का दायरा बढ़ जाएगा।

व्यापारिक संबंध बढ़ाने हेतु अमेरिका में हिंदी में होता है एम.बी.ए.। विश्व की कोई अन्य भाषा हिंदी के इतना वैश्वश्विक नहीं है। हिंदी का अगला महाकुंभ माॅरीशस में मनाए जाने की घोषणा की गई। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को अधिकारिक दर्जा दिलाने की खुलकर वकालत भी की गई।

उदघाटन के पश्चात दिन भर संगोष्ठियों का दौर एवं दोपहर के भोजन तथा चाय की व्यवस्था के साथ सायंकाल मिलने बातचीत करने का एकाध घंटा भी मिला। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत अनन्य हिंदी कथा, असम का बीहू, बंगाल का प्रसिद्ध नृत्य, सूर के कान्हा एवं तुलसी के राम के साथ कश्मीर के रुक तथा गुजरात के सूरत की जनजातियों का नृत्य हिंदी एवं अन्य चार नृत्य नाटिका के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया गया। ये सारे कार्यक्रम हमारे गौरव गरिमा के समकक्ष थे। 

10 सितंबर की रात्रि एवं सायंकाल में खुले मंच पर प्रदर्शित अथ हिंदीकथा ने दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। हिंदी के इतिहास के साथ हिंदी की बोलियों के गीतों की मिठास वाली तुलसी एवं सूर पर आधृत इस अद्भुत नृत्य नाटिका का निर्देशन एवं संयोजन मैत्रेय पहाड़ी ने किया। सौ के लगभग कलाकारों ने इसकी प्रस्तुति दी। 

अपने देश में शिक्षा का माध्यम तो मातृभाषा हिंदी ही होनी चाहिए। हिंदी का अतीत समृद्ध था, वर्तमान सुख से भरा है और भविष्य सुनहरा है। दिमाग के लिए सबसे बेहतर भाषा है हिंदी। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए विदेशी छात्रों पर ध्यान दिया जाए। हिंदी की अभिवृद्धि को भविष्य में कई चुनौतियों का सामना करना होगा। अगर हिंदी को नुकसान पहुंचेगा तो हमारी संस्कृति भी हम से दूर हो जाएगी। भाषा के मनीषियों ने कहा कि अपनी भाषा का विकास तभी संभव होगा जब सबके लिए हम इसका खोल दें तभी बढ़ेगा हिंदी का दायरा। एक बड़ा ही नमकीन वक्तव्य आया कि गरम समोसे की तरह क्षणिक अतिक्रमण है। हिंदी में इसकी भाषाएँ। किसी भी भाषा में विरोध नहीं होता क्या? होड़ तो लगभग सभी स्थान पर होती है। हाँ विरोध तो राजनीतिक परिणाम मात्र है। 

प्रदेश के सरकारी दफ्तरों में सरल हिंदी चलाने की बात स्वीकारी गई। भाषागत व्यवहार में कहा गया कि जो शब्द हमारी भाषा में नहीं है उन्हें वैसे ही अपनाया जाए। एक न्यायधीश ने कहा कि उन्हें हिंदी में फैसला सुनाना अच्छा लगता है। हिंदी में भी मध्यप्रदेश के हाईकोर्ट के फैसले प्राप्त होने की स्वीकृति मिली। सरलता और एकरूपता से ही विदेशों में भी हिंदी भाषा स्वीकार्य होगी।

समापन सत्र में केंद्रीय गृह मंत्री भारत सरकार राजनाथ जी ने हिंदी के राजभाषा नहीं बनने का कारण कमजोर नेतृत्व को कहा। वहीं मुख्यमंत्री ने कहा कि हिंदी में बोलने से मेरा मान बढ़ा है। इस अवसर पर देश एवं विदेश के विद्वानों को विश्व हिंदी सम्मान से सम्मानित किया गया। इनमें कुछ प्रमुख नाम - अनूप भार्गव (अमेरिका), स्नेहा ठाकुर (कनाडा), हैंस वगेर जैसलर (जर्मनी), प्रो. अकिशता हासी (जापान), प्रो. उषा शुक्ला (दक्षिण अफ्रीका), कमला रामलखन (मिनिडाड एवं टोबैगो), नीलम कुमार (फीजी), डॉ. वेइमाल्ल वालास्यूनस (लिथुआनिया), 

मार्तणे पेरलक (बेल्जियम), अजामिल मतावादल (माॅरीशस), गुलशन सुखलाल (गोरीशस), कैलाश बुधवार (यू.के.), डॉ. इंदिरा गाएना (रूस), डॉ. दशा नायके गुड़िया मेलागइंदिरा (श्रीलंका), सुरजन पनाही (सूरीनाम), प्रो. इस्माइल (सउदी अरब), उषा राजे (यू.के.) है।

भारतीय सम्मान प्राप्तकर्ता हैं- प्रभात कुमार भट्टाचार्या, डॉ. एस.चंद्रशेखरन, डॉ. हरे राम मीणा, प्रो. साबुरी जगदीश, के.के. अग्रवाल, अन्नू कपूर, डॉ. परमानन्द पांचाल, आनन्द मिश्रा, डॉ. मधु धवन, अनंत राम त्रिपाठी, डॉ. प्रभाकर श्रेत्रिय, व्यासमणि त्रिपाठी, आदित्य चैधरी।

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने गिरीश उपाध्याय की पुस्तक संचार अवधारणा एवं प्रक्रिया तथा स्वामी विवेकानन्द पर लिखित पुस्तक का विमोचन किया। अनुशंसाओं की प्रस्तुति - इस सम्मेलन का महत्वपूर्ण कार्यक्रम सभी सत्र संचालकों के द्वारा अनुशंसाओं की प्रस्तुति समापन समारोह में किया जाना रहा। सभी सत्रों की अनुशंसा तैयार कर प्रबंधन समिति को सौंपी गई। 12 सितंबर को राष्ट्रकवि 

रामधारी सिंह दिनकर सभागह में आयोजित समापन सत्र में 10 विषयों पर चलाए गए सत्रों के संयोजकों ने 139 देशों से पधारे 5000 प्रतिनिधियों की उपस्थित में इसे पढ़कर सुनाया। इसे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ध्यान से सुना।

अगर आँखों देखा हाल लिखूं तो इस सम्मेलन में मुझे कुछ खामियाँ भी नजर आयीं। 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन से कर्मठ हिंदी सेवी दूर रहे या इन्हें रहना पड़ा। तीन दिनों के मंथन चिंतन में भाषा पर तो बात की गई किन्तु देवनागरी लिपि पर चर्चा के लिए कोई सत्र आयोजित नहीं किया गया। साथ ही राजनायिकों एवं अफसरों की भरमार रहीं। इसमें बीजेपी पार्टी के अधिकारी भरे रहे। हिंदी सेवी कार्यकर्ताओं का सर्वथा अभाव रहा। आरंभ से ही आनलाइन में फार्म भरने में अंग्रेजियत का बोलबाला रहा। हिंदी सेवी को पाँच हजार शुल्क भरकर इसमें तीन दिनों की भोजन एवं अन्य व्यवस्था का सुख मिला। हिंदी सेवी एवं विद्वान अपने आप को उपेक्षित महसूस किए। कुछ ने अखबार में बयान देकर तो कुछ ने फेसबुक एवं वाट्सएप पर अपने विचार व्यक्त कर इस सम्मेलन के प्रति अपने असंतोष व्यक्त किए। इनमें पलकें द्वारा स्थानीय साहित्यकारों ने निमंत्रण अप्राप्त होने के कारण अपनी सहभागिता नहीं दे पाना बताया। इनमें उज्जैन निवासी माया मालवेंद्र, जोधपुर के अनिल अनवर, देहरादून के बुद्धिनाथ मिश्र, इंदौर के प्रकाश हिंदुस्तानी, दिल्ली के विनोद बब्बर, गाजियाबाद के अरविंद पथिक, कोटा के रघुनाथ मिश्र, मुंगेर की मृदुला झा जैसे साहित्यकारों एवं पत्रकारों के नाम उल्लेखनीय है। वैसे हिंदी जगत से इस पर गहरा असंतोष व्यक्त किया गया। मेरे अनुसार असंतोष तो अप्राप्ति का दूसरा भाग है। दूसरी ओर बहुत सारे शोधार्थियों से मात्र एक हजार का शुल्क लेकर उन्हें इस सम्मेलन में प्रतिभागी बनाया गया। वे बहुत खुश थे और गदगद होकर सम्मेलन की उपलब्धि का वीणा बजा रहे थे।

वर्ष 2016 के इस सम्मेलन के पश्चात मंथन से उत्पन्न चिंतन का सार निकलता है कि हिंदी के सामने कई संकट हैं। विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी छात्रों की भारी कमी मुख्य मुद्दा है। इस संदर्भ में एक सूचना प्राप्त हुई है कि लंदन के कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय में संस्कृत एवं हिंदी विभाग शिक्षार्थियों के अभाव में बंद कर दिया गया है। केंद्रीय हिंदी संस्थान से जो छात्र हिंदी सीख कर अपने-अपने देश जाते हैं उनके देशों में उनसे हिंदी शिक्षण और इसके प्रसार-प्रचार में उनकी मदद लेना विचाराधीन है। अभी तक भारतीय संसद या लोकसभा में अफरशाही की बाधाओं के कारण राजभाषा समितियों का गठन ही नहीं हो पाया है। फिर भला कार्य निष्पादन की सोच कैसे पनपे ?

‘हिंदी जगत: विस्तार एवं संभावनाएँ‘ विषय को मुख्य रूप में रखते हुए आयोजित 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन ने विशेषरूप से विज्ञान, तकनीकी, सूचना-प्रौद्योगिकी, प्रशासन, विदेशनीति, पत्रकारिता, मीडिया, विधि-न्याय के क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग से जुड़ी हुई समकालीन समस्याओं पर गहरी चर्चा करते हुए संसार के अन्य देशों में हिंदी को फैलाने की दिशा में हिंदी प्रचारकों, लेखकों एवं शिक्षकों में नया उत्साह भर दिया।

क्या मात्र 139 देशों के समर्थन से यह बात बन पाएगी? इन सम्मेलनों के बाद मीडिया में हिंदी के प्रति राजनेताओं का सम्मान नहीं दिखाई देता। इन्हें अपनी कथनी करनी के अंतर को मिटाना होगा। शायद वह दिन सच में आएगा जब हिंदी देश में राष्ट्रभाषा बन कर विदेशों में भी सही अर्थों में मान सम्मान प्राप्त करेगी। हिंदी को केवल बोलने समझने का विषय न बनाकर सम्मेलन के निर्णयों का सम्मान करते हुए इसे कार्यान्वित किया जाए। इसी कामना के साथ मैंने भोपाल में आयोजित 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेकर अपने तेलंगाना प्रदेश हेतु प्रस्थान किया।

श्री विधाधर गुरूजी एम एल सी के साथ डॉ. अहिल्या मिश्र सन् 2004 में


सन् 2005 में शक्ति मलिक ट्रेजरर तथा IRRO की अध्यक्ष के साथ नई दिल्ली में डॉ. अहिल्या मिश्र


शब्द-मंथन की दीर्घा से

संपादकीय-1

मनुष्य अपनी धारित्री के संस्कृति का धारक और इसके अणुकण का ऋणी होता है। स्वजीविता के लिए वह ग्लोब के किसी हिस्से में चला जाए किन्तु माटी का गुण गर्भस्थ शिशु सा उसके अन्तस को आत्म आलोड़ित करता है। एकाकीपन दूर होने पर जहाँ दो से चार की संख्या बनी कि भाषा के साथ संस्कृति अपनी प्रसव पीड़ा बिखेरकर मनुष्य को आसन्न प्रसवा बनाती है। अपने नवीन भूखंड पर वह अपना व्योम छाँट लेता है। भाषा की मिट्टी से बने घर में संस्कृति का छत होता है। यही नवनिर्मित सांस्कृतिक परिवेश परिचित और परिवर्धित माटी तथा नवीन कर्म क्षेत्र के बीच सेतु, समभाव एवं विशेव बंधुत्व का प्रथम सोपान होती है।

संसार का आदि तो हुआ, किन्तु इसका अंत कोई नहीं जानता। इसी प्रकार जो कालजयी है जिसका आलोक देश काल की सीमाओं में कैद नहीं है तथा जो चिरकाल तक संपूर्ण मानव जाति के पथ प्रदर्शन का दायित्व सफलतापूर्वक निर्वहन करने में सक्षम है वही होगा अभिजात्य साहित्य। इसके साथ ही यहाँ यही सत्य संस्कृति एवं साहित्य पर भी लागू होता है कि इसका आदि तो है पर अंत नहीं। इसका साहित्य भी आदि के इतना ही प्राचीन होगा तथा उतना ही आभिजात्य भी होगा। साथ ही जो साहित्य मानव अंतरमन की सूक्ष्म संवेदनाओं, बारीकियों और मानव-मानव के अंतःसंबंधों को जितनी गहराईयों से नापेगा, तोलेगा वह साहित्य उतना ही आभिजात्य होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ी जानेवाली साहित्य द्वारा प्रदर्शित मानव मूल्यों को उत्तराधिकार के रूप में अगली पीढ़ी स्वीकारती है। यहीं से साहित्य अपने उस समाज के सांस्कृतिक धरोहर का अक्षुण्ण अंश बन जाता है या यों कहें कि साहित्य केवल अक्षरबद्ध आलेख मात्र न होकर अखिल समाज के उन्नयन का अंश बन पाता है या हम यों भी कह सकते हैं कि हथियार बन जाते हैं। समय चक्र पर घूमती काल की धुरी के अनुरुप पाठक उस साहित्य को अपने वर्तमान से जोड़ते हैं और आगे बढ़ने का विषय विकास पाता है।

संस्कृति के माध्यम से साहित्य सृजन होता है। सृजित साहित्य से संस्कृति निरंतर सत्य, शिव एवं सुंदर की ओर बढ़ती रहती है। यदि किसी संस्कृति को हम नष्ट करना चाहते हैं तो उसकी भाषा एवं उसके साहित्य को नष्ट भ्रष्ट कर दें। शनैः शनैः संस्कृति स्वमेव समाप्त हो जाएगी। भाषा को भ्रष्ट करना है तो शिक्षा प्रणाली को विकृत कर दो। विकृत साहित्य पथभ्रष्ट समाज की रचना करेगा। विदेशों की भोगवादी संस्कृति शिक्षा प्रणाली में अभिजात्य संस्कृति की लगातार अवहेलना का परिणाम है।

शरीर के लिए जैसे संतुलित भोजन की आवश्यकता होती है वैसे ही मस्तिष्क के सुपोषण के लिए विचार, विश्लेषण, चिंतन, मनन तथा ज्ञान का आदान प्रदान आवश्यक है। किन्तु भोगवाद का विषाणु आभिजात्य साहित्य को स्वार्थ का धुन लगा रहा है। इसके भयंकर दुष्परिणाम देखकर भी कुछ दिग्भ्रमित व्यक्ति इसके पोषक बन गए हैं। अपनी भोग लिप्सा की पूर्ति के लिए हेतु-कुहेतु भूलने लगे हैं। इसी सोच का परिणाम आज की कुंठित होती युवा पीढ़ी है। उनकी शिक्षा में ज्ञानवत्ता तो है किन्तु मूल्यहीनता पनप रही है। जिसके परिणाम स्वरूप साहित्य भी इस गिरावट का शिकार होगा। सांस्कृतिक क्षरण तो आरंभ हो ही चुका है। इस गिरावट को रोकना और अपनी सुरक्षा, संरक्षण के मार्ग को विस्तृत करना हम चिंतकों, विचारकों का दायित्व बनता है। हमें गहन सोचों के माध्यम से इस क्षरण को रोकने का कोई कारगर उपाय ढूँढ़ना चाहिए या ढूँढ़ना ही होगा।

हम अपने पाठकों को हैदराबाद के हिन्दी लेखन से पिछले कई अंकों से परिचित कराते आए हैं। अब अपने फलक का विस्तार करते हुए इसे अखिल भारतीय रूप देने की एक कोशिश करने जा रहे हैं। इसमें पाठको, लेखकों का आक्षरिक सहयोग वरेण्य है। हम अपनी पत्रिका में विषय वैविध्य का समावेश करते आए हैं। इसका निर्वाह आगे भी करते रहेंगे।

अंत में मैं अपने सभी लेखकों, आलोचकों, दान दाताओं, संरक्षकों एवं विज्ञापनदाताओं को तन मन धन से सहयोग के लिए धन्यवाद देती हूँ। जिनके मनसा-वाचा-कर्मणा का योगदान हमारी यात्रा को कायम रख पाता है। साथ ही अपने सभी साथियों का भी अभार प्रदान करती हूँ जो हमारे साथ सहमति जताते हुए पग में पग मिलाकर चलते हैं और किसी भी नए कार्य आरंभ करने के लिए हमें सदा उत्साहित करते हैं। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सभी सहयोगियों को कोटिशः धन्यवाद। एक बात यहाँ उल्लेखित हो कि पत्रिका का संपादन एवं संचालन मात्र ललकभर से संभव नहीं होता है। इसके लिए ठोस जमीन एवं आर्थिक आधार की भी आवश्यकता होती है। हमने किसी से कोई सहयोग नहीं चाहा है। मात्र हमारी कामना ससाहित्य प्रकाशन एवं प्रेषण के माध्यम से लोगों तक शुद्ध विचारधारा का प्रचार प्रसार है। मस्तिष्क की उर्वरा शक्ति का पोषण है। हमारा लक्ष्य एवं काम्य लोकहित है।

संपादकीय-2

बात उन दिनों की है जब मैं बहुत छोटी थी। बचपन से अपने दादा की चहेती होने के कारण सुबह की दिनचर्या नित्य क्रिया के पश्चात् उनके अपने खेतों के चक्कर लगाते समय उनके साथ रहने के कारण मुझे आरंभिक ज्ञान प्राप्त हुए। जहाँ मुझे गणित के प्रारंभिक रूप पहाड़े के रूप में सभी कान पढाए गए वहीं पौना, सवैया, ड्योढा, हुदा दईया आदि के पहाडे़ मुँह जबानी याद कराने के पश्चात् श्लोक याद करके उनके अर्थ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। इसके बाद कई शास्त्र पुराणों की बातें भी उनसे मैं सीख पाई। दादाजी जाने माने वैद्य तो थे ही, शास्त्रज्ञ भी थे। उनके साथ रहते हुए कई शतक को कंठाग्र करने की सीख मिली या स्नेह वश दिए गए ज्ञान प्राप्त करना पड़ा। उस समय तो इनसे उबन सी हुआ करती थी। भागने हेतु कोने एवं बहाने तलाशती रहती। किन्तु चुप बैठने पर पड़नेवाली डॉट के डर से सीखती भी रही। एक दिन हमारे पड़ोस के गांव वाले पंडित जी पधारे उस समय दादाजी मुझे भाषा की जानकारी दे रहे थे और महर्षि पतंजलि द्वारा रचित पतंजलि महाभाष्य एवं व्याकरण ग्रंथ- अष्टाध्यायी आदि की जानकारी देते हुए महर्षि पाणिनीय पढ़ने की राय दे रहे थे। पंडित जी यह सुनकर बाबा से बोले- क्या इसे अभी से विदुषी बना रहे हैं। अभी तो आप इसे इस बड़प्पन से बक्श दीजिए या फिर यह सोंचें कि यह उम्र के अनुसार जानकारी प्राप्त करने वाले विषय में पारंगत हो गई और इसे छोड़ भी दीजिए। बाबा बोले- आप टोन्ट मार रहे हैं। मैं इसे भर्तृहरि नीतिशतक भी कंठाग्र करवाऊँगा और उसमें निष्णांत होकर यह आपसे शास्त्रार्थ करेगी। बात आयी गयी हो गई। मैं इसलिए प्रसन्न थी क्योंकि अपनी उत्सुकता शान्त करने हेतु भाषा के संबंध में पंडित जी के आने से तत्काल मेरी छुट्टी हो गई थी।

बाद में मैं उनसे यह सब पूछने लगी। उन्होंने मुझे कहा मनुष्य की सर्वोत्तम उपलब्धि भाषा है। भाषा का मूल है वाक्। इस वाक् के अभाव में मनुष्य के सर्वोत्तम गुणों का लोप हो जाएगा, उसमें तथा पशु में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। संसार में लगभग 6141 भाषाएँ और चार सौ लिपियाँ प्रयोग की जा रही हैं। किन्तु कम ही लोगों की भाषा या वाक् में वाग-वैदग्ध्य उत्पन्न हो पाता है। वाग-विदग्ध और वाक् वैदग्धय वाङ्मय के उत्कृष्ट और शिखर शब्द हैं। साहित्य के मूल्यांकन शास्त्र एवं लक्षण ग्रंथों में ही इन्हें प्रयुक्त किया गया है। इनका पारिभाषिक स्वरूप साहित्य के समालोचना शास्त्र में पाया जाता है।

उस समय महर्षि पाणिनीय का अष्टाध्यायी पढ़ते हुए मुझे एक शब्द की समझ नहीं हो पायी थीं। यह शब्द पतंजलि एवं भर्तृहरि के शतक तक मुझे बेचैन करते रहे। बाबा तो पूर्व में ही चल बसे थे। पिताजी को इन सबसे कुछ लेना देना था ही नहीं। यह शब्द मेरे अंदर जब तब उथल पुथल मचाता रहता था। फिर शैली विज्ञान में पी.एच.डी. करते समय अपने गुरु डॉ. विष्णु स्वरूप से मैंने इसका समाधान पूछा। उन्होंने मुझसे कई बार इस शब्द को उच्चारित करवाया। मैंने कहा ‘दुर्विदग्ध‘ का अर्थ मुझे बताएँ। उन्होंने एक श्लोक पढ़ा

अज्ञःसुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।

ज्ञान-लव-दुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरंअयति। 

समझाते हुए बताया, जो मुर्ख हैं, उन्हें आसानी से समझाया जा सकता है। जो विशेषज्ञ हैं उन्हें और आसानी से समझाया जा सकता है, किन्तु जो ज्ञान-लक्-दुर्विदग्ध है यानी आधे-अधूरे ज्ञान वाले हैं, उन्हें ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते। ‘विद्यापति की पदावली का शैली तात्विक अध्ययन‘ पर समीक्षात्मक कार्य करते हेतु विदग्ध वैदग्ध्य और वाग-विदग्ध, वाग- और वागविदग्ध, वाग-वैदग्ध्य जैसे शब्दों का परिचय मिला। बिहारी सतसई में भी वागवैदग्ध का प्रयोग देखने को मिला। इसके प्रति उत्सुकता ने अर्थ एवं परिभाषा की ओर चिंतन को मोड़ा। आधा या अध कचरा जैसे शब्द समझ में आए। जब हम इसका उल्लेख करते हैं तो अर्थायित होता है- वाक् का प्राण बन जाना।

वाणी का केवल वैखरी-रूप अनुभूति शून्य और प्रभावहीन होता है। जब हम वैखरी को अपने भीतर ले जाकर परा, पश्यंती और मध्यमा में दग्धविदग्ध करने लग जाते हैं तो वही वाणी विदग्ध वाक्य बन जाती है। शब्द प्रयोक्ता के भीतर तपश्चरम् एवं पुनःश्चरण में दग्ध-विदग्ध होकर वाग्वैदग्ध्य बनती हैं। वाणी की दग्धता एवं विदग्धता एक प्रतीक है। इसके माध्यम से हम शब्द के अंदर प्रवेश करते हैं। इस प्रकार शब्द में मंत्र शक्ति प्रवाहित होती है। वाग्वेदग्ध्य का यही विधान स्वरूप है। वाक् का अग्नि माना गया है इसलिए वागाग्नि का उल्लेख हम शास्त्रों में पाते हैं। वाक् से जिस वाङ्मय की रचना होती है वे नौ स्थायी भावों को समेटते है। ये नौ भाव जब परिपक्वता की स्थिति में आते हैं तो रस दशा में रूपांतरित हो जाते हैं। कर्मेंद्रिय वाक् का रस और ज्ञानेन्द्रिय जिह्वा का आस्वादनीय रस के मिलकर एक होने पर अग्नि उत्पन्न होती है। शास्त्रों में आख्यान है कि:- ऋषि मुनि मुख से बोलकर शाप या वरदान देते थे, वे फलित होते थे इसका कारण मुखाग्नि ही है।

अतः हम कह सकते हैं कि वाणी विदग्धता जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है। सभी उत्कृष्ट रचनाकार, सामाजिक चिंतक, दार्शनिक आदि इसी के यथा योग्य प्रयोग से उत्कृष्ट बन सके हैं। वाक् वैदग्ध्य के अनेक शब्द और उदाहरण हम चाणक्य के चिंतन में अवलोकं - यथा चतुर्भिः कनकः परीक्ष्यते एक उत्कृष्ट वाग्व्यंजन है। इसमें भाषा-शैली, शिल्प, भणिति भंगिमा, शब्द साधना सब कुछ सम्मिलित है। इसी कारण साहित्य-दर्पण-कार कहते हैं वाग्वैदग्ध्य...। रस एवात्र जीवितम्। आज के साहित्यकार शास्त्रीय विवेचना को ध्यान में रखकर साहित्य की रचना में लीन हो और उत्तमोत्तम साहित्य लिखें। यही लक्ष्य मेरे सामने है।

बचपन में की गई टोन की बात या टोन मारने की बात और आज के लिखने वाले अधकचरे लेखकों की आधी-अधूरी, अपूर्ण और अनमेल भाषा और शब्दावली ने मुझे यह संपादकीय लिखने के लिए प्रेरित किया है। साहित्य लेखन सुपाच्य एवं सापेक्ष हो। मनुष्य को मनुष्यत्व की भाषा सिखाने के लिए मानसिक भोजन तैयार करें, यह अत्यावश्यक हो गया है। इसी विचार अथवा मत ने बार-बार उद्वेलित किया है। समाज सापेक्षता आज के साहित्य की प्रथमावश्यकता हो। अपने से संबद्ध लेखकों, पाठकों को इसके लिए प्रेरित करूँ। यही मेरा साध्य मात्र है।

संपादकीय-3

व्यवहार एवं मनुष्यता के बीच एक गहरा बंधन है। इसे भाव एवं शब्दों का स्पर्श देकर कविता दृढ़ करती है यानी व्यवहार की परिपक्वता हेतु मनुष्यता को हृदय में दृढ़ता से किला बनाना आवश्यक है। कविता मानवीयता का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। अतः मनुष्यता को विकसित करने हेतु निरंतर कविता का विकास आवश्यक है। कविता साहित्य एवं संस्कृति की आदि विधा है। इसके माध्यम से वेद-पुराण की रचना हुई। हमारे प्राचीनतम सभ्यता संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान का खान संरक्षित रखा गया है। मानव जीवन को संपूर्णता के मार्ग पर चलाने वाली मार्ग की खोज कविता के माध्यम से ही संभाव्य है। मानव जाति को सभ्यता के मार्गारोहण हेतु अग्रसर करने वाली कविता ही है। सच में देखा जाए तो मनुष्य के व्यवहार एवं परस्पर आश्रित भाव से टूटन-छूटन और विचलन की सीमा रेखा बनाने वाली भी कविता ही

वास्तव में कविता संवाद की कलात्मक विधा है। संवेदना के उत्खनन एवं भावोद्रेग की धरातल तक पहुँचाने का कार्य शब्द बन कर कविता ही पूर्ण करती है। संक्षेप में कहूँ तो कविता संवाद की ऐसी विधा है जो कवि के अन्तर्मन को पाठक के अन्तर्मन से संबद्ध करती है। काव्य सौंदर्य बोध का एक अप्रतिम माध्यम तो है ही, यह सांस्कृतिक विरासत का आईना भी है। यह सांस्कृतिक जीवन की प्राणवायु है। जीवन के प्रति बदलते दृष्टिकोण के कारण वर्तमान समय में कविता के प्रति हमारी अभिरुचि बेहद कम होती जा रही है। इसमें सबसे अहम बात हमारी प्राथमिकताओं का बदलना है। हमारे परोपकारी भाव जो जीवन के प्रति आध्यात्मवाद से प्रेरित थे। अब वे बदलकर भौतिकवाद के समर्थक हो गए हैं। अतः आज सारी कला एवं साहित्य के साथ कविता भी अप्रासंगिक होती जा रही है। इसमें केवल वर्तमान सामाजिक परिदृश्य ही सक्रिय नहीं है बल्कि काव्येतर प्रतिमानों से प्रभावित कविता का गुणस्तर भी दोषी है। कविता में काव्यात्मक भाषा से परहेज, रूपवादी मानसिकता पर संदेह प्रतीक-विमुखता एवं बिंबों का परित्याग, प्रयोगों की जगह सपाट बयानी और कल्पना की जगह उलझनें ये सभी आधुनिकता के फल है। विस्थापन एवं स्थापन के आधुनिक विचारों की झंझावात में सौंदर्यबोध के स्थान पर यथार्थबाध की प्रतिस्थापना भी अपना स्थान बना चुके हैं। इस प्रकार कविता संस्कारगत स्वरूप त्यागते हुए प्रगति एवं प्रयोग की संरक्षिका बन गई है।

संस्कृति में लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान है। वास्तव में लोक संस्कृति सामाजिक जीवन का पर्याय है। लोक जीवन के विभिन्न कथ्यों की इसी संस्कृति पर मनुष्य संस्कारों का भवन निर्माण करता है। इसके अंतर्गत लोग अपनी उन्नत जीवन शैली को साकार बनाते हैं। इसमें कई मानवीय गुणों का अर्जन भी किया जाता है। आज लोक संस्कृति सत्ता की लोलुपता भौतिक विलासिता के परिवेश से होकर जन आकांक्षाओं की प्रबल पक्षधर बन रही है। इस परंपरा में पुरातन उच्च आदर्शों की रक्षा एवं जीवन के विविध रंगों की संरक्षण की अद्भुत कला तो होती है। यह असमानता और भेदभाव से दूर भी होती है। इसमें ग्रहणशीलता एवं मिश्रणशीलता का सैद्धान्तिक गुण निहित होता है। छल-छदम् से रहित ईष्र्या द्वेष से दूर सुख-शान्ति एवं अमन-चैन के साथ जीवनयापन इसकी पहचान होती है। लोक संस्कृति से ही लोक भाषा, लोक साहित्य, लोक संगीत, लोकगीत एवं लोक कलाओं के साथ लोक कविता का सृजन हुआ है। ये ही तत्व सामाजिक अन्तर्वेदना एवं मानवीय मनोवृत्तियों के जीवन दर्शन की समाज के समक्ष प्रस्तोता होते हैं। इसके माध्यम से लोक संस्कृति का ज्ञान एवं भान होता है। लोक संस्कृति संस्कारों की जन्मदात्री यानी शुद्धि की क्रिया अर्थात् संशोधन करना, उत्तम बनाना, परिष्कृत करने की प्रक्रिया को सम्पन्न करती है। इसके माध्यम से इतिहास फलता फूलता है एवं उपरोक्ति को प्राप्त कर स्वर्णाक्षरों में चित्रित होता है।

भारतवर्ष विभिन्न जातियों, धर्मों एवं परंपराओं का देश रहा है। यहाँ पूरब से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण तक विभिन्न भाषा एवं बोलियाँ, खान-पान, रीति-रिवाज सभी एक छोर से दूसरे तक अपनी भिन्नता संभाले खड़े है। यहाँ यह सांस्कृतिक विकास यात्रा में अपनी विभिन्नता के साथ दृढ़ता से खड़ा है। हर भाषा में उनकी बोली एवं भाषा के साथ साहित्य निर्माण गद्य एवं पद्य में होते आए हैं। 

अधिकतर भाषा के प्रयोक्ताओं को उनकी भाषा एवं साहित्य के साथ उनके सांस्कृतिक परिवेश की पुरातनता पर उन्हें गर्व है। उनके काव्य की भावात्मकता, सौंदर्य, लयबद्धता, छांदस वृत्ति का निर्वाह एवं अन्य सभी काव्योचित गुण प्रमुखता से इनमें भरे हैं। इसके साथ ही लोक संस्कृति का खुला चेहरा भी इसमें झलकता है। स्वाभाविक रूप से यह तथ्य कविता के सभी स्वरूपों को परिभाषित करने में अपने सामायिक सच के साथ उपस्थित होता है।

वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, बाजारवाद, भूमंडलीकरण और व्यवसायिक उपभोक्तावाद की गिरफ्त ने भारतीय भाषा, साहित्य, लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य का क्षरण एवं विकृतिकरण करने का दुर्घट कार्य किया है। लोक कला, गीत, नृत्य, बोली, भाषा, साहित्य की स्थितिबद्ध से बदत्तर बनने या समाप्त होने के कगार तक पहुंच गयी है। स्वार्थ, लोलुपता एवं आधुनिकीकरण के दुष्प्रभाव ने लोक व्यवसाय की तरह इसे शैक्षिक बाजार में एवं साहित्यिक हाट में परिवर्तित कर दिया है। फलाफल हमारे साहित्य एवं कविता का क्षेत्र भी सिमटा है एवं यह भी दूषित होता जा रहा है। आज कविता का स्वरूप बदलना या इसका छान्दस आवरण हटाना परिस्थितिजन्य विषय है। कविता अपने में एक यात्रा होती है। एक खोज, एक जीवन के विशेष अंश की परिक्रमा होती है। जो साहित्य के शब्दों में ढलकर अपने समय विशेष का प्रतिनिधि बनती है या कालजयी बनकर सदा हेतु अमर होती है।

कविता न चाहते हुए भी कभी-कभी मोह-माया में घिरने लगती है। किन्तु उसे वास्तवाभिमुख होना आवश्यक है। कविता जीवन में सुख-दुख के फेरे से रास्ता ढूंढते हुए उज्जवल भविष्य का निर्धारित लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में कदम बढ़ाने की प्रेरणा भी है। यह मनुष्य एवं मिट्टी के रिश्ते की डोर में दृढ़ता प्रदान करती है। ऐसे में आज जब कविता अपने अभिप्राय से संदर्भित नहीं है। दिल का दर्द और मन के बोझ को हल्का करने हेतु दिमाग को सुकून देने लायक नहीं बची है। अतः इसको सिमटना ही है। कविता मनुष्य को जीवित होने का आभास देना बंद कर दे तो यह स्वयं मृत्यु को वरण करने हेतु आगे बढ़ेगी। कविता के सांस्कृतिक संस्कार लोकायित करनेवाले होते हैं। यह प्रकृत्यानुसार लोकसंस्कृति में पूजक एवं प्रेरक है। अगर आदमी का बोलना-सोचना रुकने लगे एवं भावशून्य होने लगे और कविता संजीवनी नहीं बने तो क्या करना होगा? कवि शब्दों एवं भावों का गुलदस्ता सजाकर इसमें जीवन के विभिन्न रंग मानवीय गुणों की चासनी के साथ भरे। सामयिक प्रभाव से उत्पन्न विचारों को अपनी चिंतन एवं मनन की प्रक्रिया से रोककर कविता को लय-बद्धता एवं प्रखरता की पूँजी देकर सर्वग्राही बनाने का कवि कर्म पूरा करे। यही समय की मांग है। सभी चेतनशील कवि कविता के नए स्वरूप की दुनियाँ सँवारने एवं अपनी चिंतन प्रक्रिया से भाव की धरती में मानवता बोने आगे बढ़े। कविता को नई या समकालीनता के साथ ग्राह्यता की ओर पुनर्मुख करें। तो आइए भविष्य में अपने साहित्यिक दायित्व को जानकर इसमें हर प्रकार से हमें सक्षम बनें।

जबलपुर कादम्बरी साहित्य पत्रिकारिता सम्मान नवंबर 2011

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