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साक्षात्कार


डाॅ. अहिल्या मिश्र से डाॅ. उषारानी राव का संवाद...

निष्ठा रस से सिंचित, अतुलनीय संकल्प शक्ति से ओतप्रोत, विशिष्ट प्रतिभा की धनी, सामाजिक सरोकारों से जुड़ी वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं भाषा और साहित्य की प्रखर लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र से आइए  उनकी शक्ति और उपलब्धियों के बारे में बात करें...

प्रश्न: सर्वप्रथम अपने बचपन एवं हैदराबाद आगमन के बारे में बताएं।

उत्तर: मिथिला प्रदेश में जन्म से लेकर किशोरावस्था तक का समय बीता। ग्यारहवीं की परीक्षा के बाद विवाह हो गया। आगे पढ़ाई के प्रति अदम्य इच्छा और दृढ़ निश्चय ने उच्च शिक्षा के लक्ष्य को पूरा किया। विवाह के बाद भी पढ़ाई जारी रखी। मिथिला विश्वविद्यालय की छात्रा रही हूँ। स्नातक स्तर की परीक्षा के बाद वर्ष 1969 में परिवार के साथ में हैदराबाद आ गई। उस समय 4 साल का बेटा गोद में था। उसके परवरिश के साथ-साथ बीच में पढ़ाई भी चलती रही। पति की नौकरी के कारण हैदराबाद आना हुआ। बाद में वे व्यापार में संलग्न हो गये। हिंदी से एम. ए. करने के बाद बी.एड तथा एम.फिल केंद्रीय वि.वि. हैदराबाद से किया। इसी बीच नवजीवन मंडल में शिक्षिका के रुप में नियुक्ति हो गई। यहाँ लड़कियों को शिक्षित करने का मेरा सपना साकार हुआ। इसी संस्था में इंटरमीडिएट की कक्षाओं को पढ़ाने से यात्रा शुरू कर प्रिंसिपल के रूप में पद मुक्त हुई। नवजीवन मंडल में आने के पीछे जी. पद्मावती ही  प्रेरणा स्त्रोत रहीं। यहाँ की नियुक्ति से पहले रेडियो एनाउंसर के रूप में भी कार्य मिला और अरुणाचल प्रदेश के एक महाविद्यालय में भी प्रिंसीपल के रूप में भी काम किया। वहाँ से लौटकर हैदराबाद में वर्ष 1974-75 में अंबेडकर कॉलेज में पद्मावती जी और मैं शिक्षण का कार्य साथ करते थे और अच्छे मित्र थे। वे जब नवजीवन में प्रिंसिपल बनीं तो लड़कियों के लिए कार्य करने के मेरे लक्ष्य से परिचित होने के कारण मुझे यहाँ आने के लिए प्रेरित किया और सहायता भी की। इस तरह शिक्षण की यात्रा आगे जारी रखी। फिर एम.एड. भी किया। पी.एच.डी उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद से किया और ट्रांसलेशन का कोर्स भी किया। अध्ययन और शिक्षण दोनों निर्बाध गति से चलता रहा।

प्रश्न: हिंदीतर भाषी  प्रदेश हैदराबाद में रहते हुए हिंदी शिक्षण के कार्य को चुनने के पीछे क्या कारण थे ?

उत्तर: हैदराबाद आने के बाद ऐसा लगा जैसे विदेश में आ गई हूँं। खान-पान बोली, व्यवहार, रीतिरिवाज कुछ भी मेल नहीं खाता था। संयोग से कुछ उत्तर भारतीय पड़ोसी थे। मैं ठेठ मैथिल थी। गढ़ तेलंगाना में आ गयी थी। नवजीवन मंडल में हिंदी माध्यम का शिक्षण होने के कारण बहुत राहत मिली। मैंने शिक्षा के हर अवसर का उपयोग किया। श्रीमती कांता सक्सेना एडवोकेट की पत्नी विद्यालय मंत्री के रूप में भी मनोनीत थीं। नवजीवन मंडल में उन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया। वे मुझे हिंदी प्रचार सभा हैदराबाद ले गयीं। मुझे हैदराबाद बहुत पसंद आया। यहां स्त्रियों पर कोई पाबंदी दिखाई नहीं दी जैसा मैंने अपने गृह नगर में देखा था। यहाँ स्त्रियों के लिए देर रात भी कोई असुरक्षा दिखाई नहीं दीं। हाँलाकि संप्रेषण की स्थिति दयनीय थी। मुझे संप्रेषण करने में बहुत संघर्ष करना पड़ा, परंतु यहां का खुलापन और समान भाव अच्छा लगता था। हिंदी प्रचार सभा में काम करते-करते अनेक विद्यार्थियों को परीक्षाएं दिलवाई, हिन्दी बोलना सिखाया, गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों को हिंदी शिक्षण देकर आर्थिक अर्जन का अवसर दिया। हिंदी प्रचार सभा के साथ राष्ट्रभाषा के संबंध में भावनाएं एकमेक हुईं। मैंने 44 वर्ष तक शिक्षण संस्थान में सेवायें अर्पित कीं। इससे राष्ट्रीयता का एक विचार पनपा, उसको विस्तार मिला।

प्रश्न: आप लेखन के प्रति कैसे उन्मुख हुईं, प्रेरणा स्त्रोत कौन हैं?

उत्तर: छोटी उम्र में पुस्तकों को पढ़ने का शौक था। कक्षा 10वीं में थी, तो मैक्सिम गोर्की की मांँ पढ़ लिया था। उस समय तो कुछ समझ नही आया। बाद में कई बार पढ़ी। प्रेमचंद को भी पढ़ा था। उनकी मानसरोवर के सभी भागों को पढ़ गयी थी। स्कूल में भी कई साहित्यकारों को पढ़ने का अवसर मिला था, परंतु कहानी के प्रति बहुत झुकाव था। जब मैं आठवीं क्लास में थी तो एक घटना घटित हुई, जिसने झकझोर दिया। ऐसा हुआ कि चचेरी बहन के पति ने रंग सांवला होने के कारण उसे छोड़ दिया था, इस घटना ने मेरे मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला। स्त्री के प्रति होने वाले अन्याय ने रचनात्मक अभिव्यक्ति का द्वार खोल दिया। दसवीं कक्षा से ही लेखन के प्रति झुकाव हो गया था।

प्रश्न: पहली प्रकाशित रचना कौन-सी है?

उत्तर: दसवीं कक्षा में विनिमय प्रणाली पर एक निबंध लिखा था। इसमें वस्तु का आदान-प्रदान पर एक विश्लेषण था कि प्राणी पालन करने वाले कैसे वस्तु विनिमय करेंगे यह प्रश्न पूछा था। मुझे लगता था ऐसी व्यवस्था हो, जिसमें प्राणी पालन वालों को वस्तु खरीदने में सहायक हो सकें। इन्हीं सब विचारों को मैंने उस निबंध में व्यक्त किया था।

निबंध लोगों को बहुत पसंद आयी। यह निबंध भोला उच्चागंल हाईस्कूल, देवड़, पूर्णिया में 10 साल तक नोटिस बोर्ड में लगा रहा। पहली कहानी मैंने ममता के नाम से लिखा था। मुझे घर में ममता के नाम से पुकारते थे। यह कहानी वर्ष 1963 में सरिता में प्रकाशित हुई थी। मन में डर था कि लोग क्या कहेंगे, सोच कर मैंने छिपा दिया।किसी से नहीं कहा। इस कहानी के लिए मुझे उस समय रुपये 50 मिले थे। हैदराबाद आने के बाद विद्यालय की पत्रिकाओं में कहानियाँ एवं कविताएँ छपने लगी। कादंबिनी में भी कई कविताएँ एवं कहानियां छपीं और देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएं छपतीं रहीं। विभिन्न साहित्यिक विषयों से संबंधित संकलनों में 50 से भी अधिक रचनाओं को संकलित किया गया।

प्रश्न: न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्...गीता के विचारतत्व के अनुसार मनुष्य एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। इस जीवन दर्शन को आपने चरितार्थ किया है। सामाजिक कार्य करते हुए शिक्षा एवं शिक्षण के लक्ष्य को प्राप्त किया। अपने संघर्ष के दिनों के बारे में बताएं।

उत्तर: नवजीवन में कार्य प्रारम्भ करने के साथ-साथ अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन, हैदराबाद, सिकन्दराबाद मारवाड़ी महिला संगठन और अग्रसेन समीति से जुड़ गयी। बहुत परिश्रम करना पड़ा। नवजीवन में शिक्षण के बाद जो भी समय बचता था, उस समय में सामाजिक संस्थाओं के कार्य में लग जाती थी। कई पत्र-पत्रिकाओं में जगह बनाने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। कवि सम्मेलन कराया। मारवाड़ी संघों में हिंदी में भाषण देती थी। अपनी शक्ति, बुद्धि और साहस के साथ कई स्तरों पर काम कर रही थी।

पुरुष वर्चस्व के बीच यह आसान काम नहीं था। इन संगठनों के पत्र-पत्रिकाओं में संपादन का कार्य भी श्रम साध्य था। इसी तरह शिक्षण में भी हिंदी प्रचार सभा में कक्षाएं चलाने के लिए काफी संघर्ष रहा। इसमें तो मैंने निशुल्क सहयोग किया। महिलाओं को हिंदी सिखाने का कार्य एवं उनके लिए परीक्षाओं का आयोजन आदि मैंने तीन दशकों तक यह काम किया। इस क्षेत्र में लंबी चैड़ी संघर्ष से गुजरी हूँं। यहाँ के उत्तर भारतीय महिला समाज से भी मुझे काटा गया क्योंकि मैं उनकी मान्यताओं और वर्जनाओं  से अलग थी। फिर भी मैंने धैर्य नहीं छोड़ा।

सामाजिक कार्य के क्षेत्र में उतरने पर पुरुषों से बातचीत करना होता था। उसके लिए भी मुझे कई तरह की बातें सुननीं पड़ी। जिन लोगों के बीच में काम कर रही थी,वहां ग्रामीण वातावरण जैसी रूढ़िवादी सोच थी। यहाँ तक कि जहाँ हम उत्तर भारतीय मोहल्ले में रहते थे, वहाँ भी मुझे संघर्ष करना पड़ा और पति को उलाहने तक सुनने पड़े।

प्रश्न: आपने हिंदी भाषा शिक्षण के माध्यम से बालिकाओं और गृहणियों को हिंदी की परीक्षाएं दिलवाकर एवं उन्हें शिक्षण में प्रशिक्षण दिलवा कर स्त्री सशक्तिकरण का उदाहरण प्रस्तुत किया है। विस्तार से बताएं।

उत्तर: बचपन से लड़कियों के साथ दूसरी श्रेणी का व्यवहार, उनके त्रासद अनुभव तथा उनका शोषण होते देखती आई थी। इससे अंर्तमन में यह प्रश्न उठता कि आखिर इन लड़कियों के अंदर शक्ति क्यों नहीं है। तभी से उन्हें आत्म निर्भर बनाने की इच्छा जागृत हो गई कि उन्हें भी स्वतंत्रता मिले, वे भी मनुष्य हैं। मेरे अंदर यह विचार घुमड़ते रहते कि स्त्रियाँ घर के लिए हैं, परिवार के लिए हैं, सब ठीक है पर, उनकी भी अपनी स्वतंत्र पहचान होनी चाहिए। मैंने सोचा था कि कभी जीवन में अवसर मिला तो उनके लिए कुछ न कुछ अवश्य करूंगी। विशेष रूप से गरीबी एवं निम्न मध्यम वर्ग में जीने वाले परिवारों में औरतों की स्थिति बहुत खराब थी।

ऐसी स्त्रियाँ पति के द्वारा त्याग दी जाती हैं, आश्रित हो जाती हैं। अपमान, मार सहकर और शोषण सह कर जीवन जीती रहती हैं। मैंने नवजीवन मंडल में ही हिन्दी कक्षाएँ शुरू कर दी। ऐसी स्त्रियों को उनके घर से पकड़ कर पढ़ाना शुरू किया। परीक्षाएं दिलवाई, नौकरी दिलवाई और उन्हें आर्थिक मदद देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया। मैं आज यह संतोष के साथ कह सकती हूँ कि स्त्री के लिए थोड़ा बहुत काम करने की जो मैंने ठानी थी। वह मैं कर पाई।

नवजीवन में तात्कालिक कार्यकारिणी के साथ मिलकर वोकेशनल अकादमी की स्थापना की। कंप्यूटर शिक्षण की व्यवस्था की। आज मेरी छात्राएं डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकों में और अनुवाद विभागों में कार्यरत हैं। यह सब कार्य करते हुए समझ में आया कि जीवन में कुछ करने का अर्थ है हमें आगे बढ़ते और बढ़ाते रहना चाहिए। अब तक स्त्री सम्मान के प्रति अपना कर्तव्य समझकर यह काम किया।

प्रश्न: आपकी कहानियों पर पाठकों की क्या प्रतिक्रिया थी ? आपका पहला कथा संग्रह कब आया? आप दो बार राष्ट्रपति से सम्मानित हुयीं हैं और आपने करीब 20  पुस्तकों का लेखन एवं उतनी ही पुस्तकों का संपादन किया है? इस विषय में बताएँ।

उत्तर: कहानियां कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। शिक्षक पत्रिका और कादम्बिनी से लेकर संदेश पत्रिका में भी प्रकाशित हुई। पहली कहानी ‘उल्टी लटकती छिपकली, 80 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में छपी थी। इसके अलावा प्रचार सभा की पत्रिका ‘विवरण’ में तथा ‘बरोह’ और ‘श्रावंती’ आदि में छपी। उन्होंने हमारी कहानी को अपनी कहानी की तरह स्वीकार कर कथ्य को बहुत पसंद किया।

1995 और 1996 मैं राष्ट्रपति के द्वारा काव्य पाठ एवं संचालन के लिए सम्मानित हुई। संपादन के प्रति लोगों का विश्वास रहा जिसके कारण मैं यह कार्य बिना लोभ एवं लाभ के करती रही। मेरी  लिखने पढ़ने में बहुत रुचि होने के कारण अध्ययन, शिक्षण के साथ-साथ संपादन का कार्य भी करती रही। उन दिनों दक्षिण भारत में हिंदी संपादन का कार्य लोकप्रिय नहीं था अधिक लोग उस में रुचि नहीं दिखाते थे। कई संस्थाओं से जुड़ी होने के संदर्भ में संपादन के कार्य को करना पड़ा।

प्रश्न: आपने अपने निबंधों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक भाव धारा के अंतर्गत स्त्री के समानाधिकार को प्रमुखता दी है। ‘भारतीय नारी तेरी जय हो’ नाटक इसी का विस्तार है। इसकी रचना प्रक्रिया बताएं।

उत्तर: आरंभिक दिनों की ओर लौटना पड़ेगा। शिक्षा के दिनों में उठाई गई अनेक कठिनाइयाँ और जटिलताओं ने मुझे गहरे संकल्प से भर दिया कि स्त्रियों के लिए कुछ करना चाहिए। इस उद्वेलन के बीच स्त्री समस्या संबंधी लेखन की ओर उन्मुख हुई और आगे बढ़ती चली गई। उनकी सामाजिक स्थिति, उनके गहरे दर्द, उनकी कठिनाइयाँ और उनके साथ घटने वाली विकृतियां उथल-पुथल मचाती रहीं। जिसके कारण इस नाटक ने मूर्त रूप लिया।

नवजीवन मंडल में जुड़े होने के कारण स्त्री विषयक विचार मथ रहे थे। ऐसे में मुझे लगा कि सोच का सबसे प्रभावी माध्यम नाटक है, तो इस विषय पर लिखा जाना चाहिए। उन दिनों स्वर्ण जयंती उत्सव हेतू सांस्कृतिक कार्यक्रम की परिकल्पना चल रही थी मुझसे कव्वाली और नाटक लिखने की माँग रखी गई। संस्था की प्रमुख ने प्रेरणा दी। नाटक लिखा गया और मंचन भी हुआ और लोगों को पसंद आए। उस समय लिखी हुई कव्वाली ‘हम नारी हैं।’ तात्कालिक आंध्र प्रदेश के शिक्षा मंत्री के समक्ष प्रस्तुत हुआ। नेहरू बाल भवन हैदराबाद में  नाटक ‘भारतीय नारी तेरी जय हो’ से चयनित नाटक के की प्रस्तुति के लिए निर्देशन संवाद लेखन और मंचन तीनों के लिए प्रथम पुरस्कार मिला। यह मनोबल बढ़ाने वाला था। यही प्रसिद्धि का कारण भी बना। इस संग्रह के सभी नाटक चर्चित रहे। इसके अलावा ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया हैदराबाद की ओर से महामहिम गवर्नर बलराम जाखड़ और पद्मविभूषण बिंदेश्वर पाठक के द्वारा जयशंकर प्रसाद नाट्य पुरस्कार दिया गया।

प्रश्न: स्त्री विमर्श के संदर्भ को देह से और यौन मुक्ति की अभिव्यक्ति से मुखर किया जा रहा है आप क्या कहना चाहेंगी ?

उत्तर: नारी मुक्ति आंदोलन तो सही है पर इसकी अभिव्यक्ति में नारी मुक्ति के मुखरता के साधन या उसके आंदोलन भ्रामक बन गए हैं। जब हम भारतीय संदर्भ में नारीवादी सत्य को परखते हैं तो गार्गी भारती, सीता आदि का त्याग और तपस्या का उदाहरण चरित्र की विशेषता के साथ दिखाई देता है। हाँ इसमें राजनीतिक एवं सामाजिक समझौते की गंध है। और भी देखें तो पंच कन्याओं ने भारतीय अवधारणा  के अंतर्गत ही अपना व्यक्तित्व बनाया है। अपने त्याग, तपस्या और वैचारिकता से इन्होंने अपनी जगह बनाई है। आज का नारीवादी आंदोलन मुझे ऐसा लगता है कि इसने स्वच्छंदता की ओर धकेल दी है, जो हमें उच्छृंखल बनाता है। हमारी संस्कृति कभी हमें उच्छृखंल होने की शिक्षा नहीं देता।  

स्वतंत्रता का अर्थ कदापि नही होता है कि उच्छृंखलता को परिभाषित करें। आज की नारीवादी उध्र्वगामी सोच पूर्णतः नारी उत्थान की ओर इशारा नहीं करती। जिस कारण शिक्षित नारी के चरण आत्मविश्वास से अपने आवरण को हटाकर नग्नता से विकृति को प्रदर्शित करतीं हैं। यही विरोधाभास है। यह हमारे सांस्कृतिक परिवेश को दूषित करती है। 

प्रश्न: लंबी  बीमारी के बाद लेखन में एक अंतराल आया, कैंसर का सामना कर आप एक योद्धा की तरह बाहर निकलीं, इससे आपके लेखन में क्या बदलाव आया?

उत्तर: स्वाभाविक है दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ रही थी। एक ओर अपनी कैंसर दूसरी ओर पति की असाध्य बीमारी थी। मैं वर्ष 2006 में सेवानिवृत्त हुई, उसके तुरंत बाद पति गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गये। तीन वर्ष पति बीमारी के साथ, दो वर्ष मैं कैंसर से जूझती रही। इन दोनों ताप को झेलते हुए ऐसा लगा कि शब्दों के बीच खुद अंधेरे में हूँ। अत्यधिक मानसिक शारीरिक पीड़ा से गुजरती रही। पति की मृत्यु के बाद दो साल संभलने में समय लगा। लेखन ने संबल दिया। जिसके कारण मानसिक और वैचारिक रूप से गतिशील हुई। वर्ष 2010 में पठन-पाठन और मनन और पारिवारिक सौहार्द के कारण मैं अपने को संभाल पाई। पुनर्जीवन की ओर स्वंय मोड़ा, फिर खुद को। खड़ा किया। लेखन की गतिशीलता से मानसिक, शारीरिक, वैचारिक संबल मिला। कई अधूरी पड़ी पुस्तकों को समेटने में समय लगाया।

प्रश्न: आपने अपने निजी जीवन, साहित्यिक एवं सामाजिक जीवन में संतुलन कैसे बनाएं?

उत्तर: प्रश्न तो निजी है, स्त्रियों को लेखन के लिए समय चुराना पड़ता है। मैं तीनों मोर्चों पर काम कर रही थी। अपने लिए, समाज के लिए, साहित्य के लिए। यही अपने मस्तिष्क की खुराक रही। तीनों के प्रति जुनून होने के कारण सब कुछ करती चली गई। मैं कभी बाहरी जीवन को घर के अंदर नहीं लाई। शैक्षणिक पक्ष सामाजिक पक्ष में जो समय बचता, उसे लेखन में लगाती थी। तीनों मोर्चों पर अलग ही रहती थी। आगे बढ़ने की ललक ने सामंजस्य बैठाने की कोशिश में सफल रही। कई बार बाधाएं आयीं। कई बार परिवार खड़ा मिला। तब अंदर के बहाव को रोककर पारिवारिक दायित्व पूरे किये। सामाजिक कार्य में भी उसी तरह जिम्मेदारी निभायी। इन सब कार्यों में सफलता परिवार के संपूर्ण सहयोग से ही संभव हुआ। परिवार के प्रति मेरे लगाव की तरह परिवार का भी मेरे प्रति लगाव में पति ढाल की तरह खड़े रहे। वे मेरे आगे बढ़ने के रास्ते में मेरे कामयाबी के पथ प्रदर्शक बनें। पूरे परिवार का सामान सहयोग रहा।

प्रश्न: दक्षिण के हिंदी लेखकों को साहित्य में जगह बनाने के लिए दुगनी मेहनत करनी पड़ती है। आप इस विषय में क्या सोचती हैं ?

उत्तर: मैंने यह अनुभव किया है कि दक्षिण भारतीय हिंदी लेखन करने वाले कहीं से भी कमतर नहीं हैं। चाहे वह विषय वैविध्य में, विचार या भाव पक्ष हो अथवा चिन्तन का विषय हो, सभी क्षेत्र में उच्चस्थ स्थान रखते हैं। मेरे विचार से ऐसी बातों को बल नहीं मिलता है या नहीं मिलना चाहिए। लेखक, लेखक होता है। कम या ज्यादा नहीं होता है। दक्षिण के लेखक के मानसिक उत्पीड़न से कि वह कमतर है, को दूर करने के लिए पुरजोर प्रयास करना चाहिए और उसे इस अभाव से बाहर निकाला जाना चाहिए। क्योंकि वह भी हिंदी का लेखक है, इसलिए इस स्तर पर मान्यता मिलनी चाहिए। वास्तव में दक्षिण के हिंदी लेखक कुछ अन्य वाद निर्मित मानकों के खाँचे में फिट नहीं बैठते हैं। स्वाभाविक है दक्षिण के लेखकों में दक्षिण की भाषाओं का उच्चारण, लेखन में कहीं न कहीं किसी तौर पर प्रभाव में आ जाता है। जिसे दूसरी मानसिकता के लोग यहाँ के लेखन को खारिज करते हैं कि उनके निर्धारित मानदंड पर यह ठीक नहीं बैठता है। मेरा मानना है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं का हिंदी में समिश्रण उनकी शैलीगत या प्रयुक्त भाषा की विशेषता बन जाती है।

इस संदर्भ में एक और बात हमारे समक्ष आती है कि यदि उत्तर भारत के लोग भी यहांँ बस कर यहां साहित्य का कार्य कर रहे हैं, उन्हें भी इसी उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे कुछ पूर्वाग्रह है, कुछ उच्चता के भाव है। लेकिन मैंने देखा और अनुभव किया है कि दक्षिण भारतीय मित्रों में हिंदी लेखन करने वाले कहीं से भी कमतर नहीं होते। इसलिए यह भेदभाव मिट जाना चाहिए। आज के तकनीकी युग में तो यह समानता और भी सहज और सरल हो गया है।

प्रश्न: आपने अपना शोध ‘विद्यापति की पदावली की शैली का तात्विक अध्ययन’ पर किया है, यह आपने किस विचार के अंतर्गत किया? सुदूर दक्षिण में रहते हुए उन पर काम करने का संकल्प लेना चुनौतीपूर्ण रहा होगा।

उत्तर:  मैंने  एम. फिल में विद्यापति की काव्य भाषा पर लघु प्रबंध कर प्रस्तुत किया था। मैं मैथिल हूँ। मेरा जन्म मधुबनी के सागरपुर ग्राम में हुआ है। वहाँ की मिट्टी मेरे अंदर रची बसी होने के कारण बचपन से विद्यापति के स्वर आनंदित करते थे। मैथिल ललनाओं के माधुर्यपूर्ण गीत मेरे अंदर गूंजते रहते थे। उन स्वरों ने हमेशा मुझे उद्वेलित किया। जब थीसिस लिखने की बात आई, तब मैंने विद्यापति के काव्य भाषा पर काम करने का निश्चय किया। उस समय शैली विज्ञान का प्रादुर्भाव हो चुका था। डॉ. नगेंद्र की शैली विज्ञान पर पुस्तक आ गई थी। और भी कुछ लोगों की पुस्तकें उपलब्ध होने लगी है। परंतु उस्मानिया वि.वि. में मैथिली भाषा के साहित्यकार की उपलब्धता न होने के कारण कोई भी निदेशक नहीं मिल रहे थे। परंतु मन में ठान लिया था, इसलिए इस विषय की स्वीकृति के लिए प्रयास करती रही। बाद में मुझे एक निदेशक मिले। बी.एच.यू से शिक्षित डॉ. विष्णु स्वरूप तैयार हो गए। उनसे पदावली पर अनेक चर्चाएं होती रहती थी। मैं इस कार्य में पूरी निष्ठा से लग गई। एक और विद्वान डॉ. चंद्रभान रावत एक भाषा वैज्ञानिक थे, जो हैदराबाद विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में अध्यक्ष थे। जिन्होंने मुझे बहुत उत्साहित किया। प्रो. दिलीप सिंह ने भी आगे बढ़ने में वैचारिक साथ दिया। इस तरह हमारी शोध की यह यात्रा रही। इसमें विद्यापति की पदावली के शब्दों को हिंदी रूपांतर के साथ-साथ वृहद विश्लेषण भी किया गया है।

प्रश्न: एक साहित्यिक पत्रिका को प्रकाशित करना चुनौतीपूर्ण होता है। आपने पुष्पक साहित्यिकी त्रैमासिक पत्रिका की शुरुआत कैसे की? इसके पीछे क्या सोच थी?

उत्तर: साहित्य क्षेत्र को पूरी तरह जानने के बाद पाया कि स्त्री लेखन पर पुरुष का वर्चस्व कायम है। मेरे मन में आया कि मैं स्त्री लेखन के लिए अभिव्यक्ति का ऐसा साधन विकसित करुँ, जिसमें स्त्री अनुभूत विचारों पर कोई पाबंदी न हो। महिला पत्रिकाओं में संपादन का कार्य कर चुकी थी। सबसे पहले पुष्पक नाम से पत्रिका निकाली, जो लगातार 20 वर्षों तक प्रकाशित हुई। इसमें विशुद्ध साहित्यिक लेखन को प्रश्रय दिया। स्थानीय साहित्यकारों एवं महिला रचनाकारों को विशेष रुप से स्थान दिया गया। वर्ष 2018 पुष्पक से नाम विस्तारित होकर पुष्पक साहित्यिकी बना। देश विदेश की सभी रचनाकार इसमें अपनी रचनाएं देते हैं। मुझे खुशी है कि पुष्पक साहित्यिकी एक साहित्यिक पत्रिका के रूप में लोकप्रिय हो रही है।

प्रश्न: आज के आधुनिक युग में विकास की गति तीव्र है तो साहित्य पर इसका कितना प्रभाव आप देखती हैं? विशेष रूप से करोना महामारी के काल में साहित्य की स्थिति बताएँ।

उत्तर: सबसे बड़ा यह प्रभाव है कि आज साहित्य पुस्तकालयों से निकलता जा रहा है। पुस्तक पठन पाठन की प्रक्रिया बदल गई है। इससे लेखन की प्रक्रिया भी स्वयमेव बदल गई। आज भागती दौड़ती जिंदगी में समय के अभाव के कारण आधुनिक तकनीकों के साथ सामंजस्य बैठाना ही एक विकल्प रह गया है। ऐसे में साहित्य लेखन आधुनिक रूप में बदल गया है। कलम की जगह सीधे तौर पर तकनीकी यंत्रों पर उंगलियां चलती हैं। विभिन्न पुस्तकालय में पुस्तकों की खरीद समाप्त होती जा रही है। ऐसे में गंभीर विचारक और लेखक जब आधुनिक संसाधनों से जुड़ेंगे, तो एक नए प्रकार के साहित्यिक लेखन का विकास होगा। लेकिन एक ओर नजर डालें, देखें तो लेखकों की संख्या बढ़ गई है, प्रकाशन भी बढ़ रहा है और साहित्य अपनी दिशा बदल रही है। पुस्तकें आजकल ऑनलाइन उपलब्ध है। लोग अपनी मनपसंद विषय से संबंधित पुस्तक पढ़ना चाहते हैं। यह आधुनिकीकरण का उपहार है। विकास की गतिशीलता को देखें तो पारंपरिक लेखन पठन को तो धक्का पहुंचा है। जहाँ तक करोना काल का संबंध है। इस महामारी ने घर परिवार का अर्थ समझाया और उसके साथ-साथ मानव को जीवन और मृत्यु के बीच भय की रेखा के उस पार खड़ा किया है। जिससे एक अदृश्य तनाव का शिकार होना पड़ा। बौद्धिकों को मनन चिंतन करने का भी समय मिला। इस काल में चिंतन की दिशा बदली। साहित्य और वैयक्तिक दोनों ही रूपों में स्वयं विमर्श के लिए समय मिला है। लोगों की डायरी में बंद रचनाएं भी खुले रुप में पटल पर प्रस्तुत होने लगीं हैं। साहित्यकारों की नई पीढ़ी भी विकसित होती दिखाई देने लगी है।

प्रश्न: आप दो महत्वपूर्ण संस्थाओं ए.जी.आई और कादंबिनी क्लब की संस्थापक रहीं हैं। अभी हाल में ही आपने दोनों ही संस्थाओं की रजत जयंती के कार्यक्रम को सम्पन्न किया। इनके शुरुआती दौर के बारे में बताएं।

उत्तर: वर्ष 1993 और 1994 की शुरुआत में राजेंद्र अवस्थी जी से दिल्ली में भेंट होने पर उन्होंने आग्रह किया कि कादंबिनी क्लब को हैदराबाद में प्रारंभ किया जाए। उन दिनों कादंबिनी क्लब कादंबिनी पत्रिका का ही एक अंग था। देश विदेश में करीब इस संस्था के तीन सौ अस्सी क्लब खुल चुके थे। इस क्लब का मुख्य उद्देश्य मंच के माध्यम से वरिष्ठ लेखकों एवं नवोदित लेखको को सम्मानित करना उनको प्रोत्साहन और बढ़ावा देना था। उनको मंच प्रदान करना उनकी रचनाओं को परिपक्वता की ओर उन्मुख करना था। उनका प्रस्ताव अच्छा लगा।

मैंने हैदराबाद लौट कर तीन महीने में ही निर्धारित सदस्य बना लिए और उनके लिए कादंबिनी पत्रिका भी उपलब्ध कराई। इसी दौरान ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का बाइसवाँ अधिवेशन हैदराबाद में हो रहा था और उस अधिवेशन में मैं भी थी। राजेंद्र अवस्थी, सरोजिनी प्रीतम जी आदि देश के कई बड़े लेखक साहित्यकार लोग थे। ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के बाद के कार्यक्रम के बाद  हिंदी प्रचार सभा के प्रांगण में कादंबिनी क्लब की स्थापना का राजेन्द्र अवस्थी के द्वारा उद्घाटन हुआ। इस क्लब के माध्यम से हम कविता पाठ, रचनाओं पर चर्चा आदि करते थे और चर्चित कविता को कादंबिनी में प्रकाशन के लिए भेजा जाता था। कादंबिनी की यात्रा अच्छी साहित्यिक यात्रा के रूप में चली। इसमें स्थानीय रचनाकारों को स्थान मिला। यह संपूर्ण साहित्यिक संस्था के रूप में आकार ले सकी और आज भी हर महीने यह गोष्ठी जारी है। पच्चीस वर्ष के पूरे होने पर हमने कई जाने-माने साहित्यकारों को इसमें आमंत्रित किया और उनका सम्मानित भी किया।

इसी तरह ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया हैदराबाद चैप्टर वर्ष 1994 में शुरुआत हुई। इसमें बहुभाषी कवि सम्मेलन में विचार गोष्ठी आदि कार्यक्रम निरंतर होते रहते हैं। वर्ष में एक बार केंद्रीय सभा की ओर से होने वाले वार्षिक अधिवेशन में हमारे चैप्टर से सदस्य निरंतर भाग लेते रहे हैं। ए.जी.आई हैदराबाद चैप्टर में करीब 120 सदस्य हैं। कादंबिनी क्लब और ए.जी.आई. हैदराबाद चैप्टर के कार्यक्रमों में देशभर के लेखकों को हमने आमंत्रित किया है। उनको सुना है, उनको सम्मानित भी किया है।
इसके अंतर्गत हमने देश के लेखकों का साक्षात्कार का एक कार्यक्रम भी किया। जिसमें कुमार अंबुज, राजेंद्र अवस्थी और प्रोफेसर हरजीत सिंह (लाल्टू जी) आदि अनेक साहित्यकार आ चुके हैं।

प्रश्न: कविता मनुष्य के लिए संघर्ष करने वाली अभिव्यक्ति है। आज के दौर में आप कविता का क्या भविष्य देखती हैं?

उत्तर: कविता संघर्षमयी अभिव्यक्ति है। चिन्तन की प्रखर अनुभूति है। आदिग्रंथ वेद में भी हम देखते हैं कि उसमें संपूर्ण विश्व समाहित है। इसमें मानव के निर्माण और उत्थान तथा पतन दर्ज है। मंत्रों के माध्यम से वैज्ञानिक एवं भौतिक प्रक्रियाएं उद्धृत की गई हैं। यहाँ से कविता अपनी यात्रा आरंभ करती है। समय के प्रस्थान बिंदू में कविता बदलती रही है। कभी दुष्कर, कभी सरल, कभी वेदना की पीड़ा, कभी संवेदना से भरी, कभी कंटकाकीर्ण आदि भाव और शब्द की यह यात्रा अनवरत चल रही है। कविता भूत और वर्तमान है तो भविष्योन्मुखी भी है।

कविता की यात्रा कभी बंद नहीं होगी, जब तक मनुष्य की यात्रा है। कविता की यात्रा भी चलती रहेगी। कविता सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति है। अन्य विधाओं की तुलना में कविता में कम शब्दों में अधिक अभिव्यक्ति होती हैं। यह यात्रा चरैवति चरैवति की राह पर चलती चली जाती है। यह मानव के जीवन और मृत्यु तक और उससे भी आगे अनंत तक कविता का अस्तित्व बना रहेगा।

प्रश्न: आपके द्वारा स्थापित साहित्यकार गरिमा पुरस्कार के बारे में भी बताएं।

उत्तर: साहित्य गरिमा पुरस्कार हमने वर्ष 2000 में प्रारम्भ किया। यह विशेष रूप से दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों में महिला लेखिकाओं के द्वारा हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करनेवाले रचनाकारों के लिए है। महिला लेखन करने वाले रचनाकारों के लिए एक विशेष सोच के अंतर्गत किया। देशभर के पुरस्कारों का जब हमने आकलन किया है तो ऐसा लगा कि अन्य स्तरों पर महिलाएं तो कमतर ही आंकी जातीं है। लेखन के स्तर पर भी उनको वह पहचान नहीं मिलती है, जो मिलनी चाहिए। इस विचार-धारा को लेकर हमने यह निर्णय लिया कि महिला लेखन के लिए पुरस्कार योजना बनाई जाए, जिससे महिला लेखन को चिन्हित कराई जा सके। एक स्थानीय स्तर पर कमेटी गठित की गई, जिसके अंतर्गत महिला लेखन को साहित्य की विभिन्न विधाओं के अंर्तगत चिन्हित किया जा रहा है। प्रारंभ में ग्यारह हज़ार की धनराशि थी। अब दसवें पुरस्कार तक आते-आते पुरस्कार की राशि ग्यारह हज़ार से इक्कीस हज़ार कर दी गई है। साहित्य गरिमा पुरस्कार की यह यात्रा हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के स्त्री लेखकों को पहचान दिलाने का काम कर रहा है।

प्रश्न: पांच दशकों से आप शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में काम कर रही हैं। दक्षिण में हिंदी की स्थिति गति पर बताएं।

उत्तर: संपूर्ण दक्षिण की बात तो मैं नहीं कह सकती, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्थितियाँ हैं। खास तौर पर आंध्र की या तेलंगाना की जो स्थिति है, उसके संबंध में मैं बता सकती हूँ। दक्षिण भारत में विशेष तौर पर हिंदी भाषा को साहित्य के स्तर पर अर्जित करने में परिश्रम की आवश्यकता होती हैं। क्योंकि उनकी मातृभाषा और प्रादेशिक भाषा अलग अलग होती है। ऐसे में हिंदी लेखन हेतु हिंदी शिक्षकों और हिंदी लेखकों ने श्रमसाध्य कार्य करते हुए हिंदी में अनुवादक एवं रचनाकार के रूप में अपनी जगह बनाई है। उदाहरण के लिए विजय राघव रेड्डी और बालशौरी रेड्डी जैसे अनेक लेखकों और अनुवादकों ने योगदान दिया है। केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार तक अर्जित किया है। यहाँ लोगों को हिंदी के प्रति रुचि है। लोग समझते हैं कि देश में कहीं भी जाने पर हिंदी ही सबसे ज्यादा भाषा बोली जाती है। संपर्क भाषा के रूप में भी हिंदी के प्रति जागरूकता है। हिंदी प्रचार सभा हैदराबाद ने इस विषय पर बहुत अच्छा कार्य किया। पहले की सरकारों के द्वारा भी हिन्दी की प्रारंभिक परीक्षा को पास करना कार्यकर्ताओं के लिए जरूरी किया था। हिंदी के पठन-पाठन में रुचि जगाने के लिए भी हिंदी प्रचार सभा जैसी संस्थाओं का बड़ा योगदान है। नए लोग तो हिंदी से अपने को जुड़ा महसूस करते रहें इससे जुड़ते रहे। हैदराबाद कॉस्मापॉलिटियन शहर होने के साथ साथ दक्खिनी हिंदी प्रयुक्त करने के लिए मशहूर है।

महाराष्ट्र में भी हिंदी अपना विस्तार लेती रही है। कर्नाटक में भी हिंदी में काम होता रहा है। केरल अति शिक्षित राज्य होने के कारण वहाँ भी हिंदी में कार्य हुआ है। चेन्नई में भी ऐसा नहीं है कि लोग हिंदी नहीं जानते हैं मैंने वहाँ देखा है कि अड़तालिस सेंट्रल स्कूलों में वहाँ हिंदी पढ़ाई जाती है। मैंने अपने एम.एड करने के दौरान यह सब देखा है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के द्वारा हिंदी में उच्चतम उपाधियां दी जाती हैं। दक्षिण में हिंदी की स्थिति अच्छी है। यहाँ के साहित्यकार जो हिंदी में लेखन करते हैं, अनुवाद करते हैं, पता नहीं क्यों उत्तरपट्टी से उनको समर्थन नहीं मिल पाता है, जिसके कारण यहाँ पर उनमें आक्रोश मैंने पाया है। शायद हिंदी से विमुख होने में यह भी एक कारण है। फिर भी मैं यहाँ कहना चाहूंगी कि मैं आशावादी स्वर रखती हूँ कि आज जब विश्व गांव की परिकल्पना में सांसे ले रहा है, तो यहाँ पर हिंदी को पढ़ने और बढ़ने में कोई भी बाधा कारण नहीं बन सकती। यहां हिंदी अवश्य जीवित रहेगी।

प्रश्न: आप अपनी आने वाली पुस्तकों के बारे में बताएं।

उत्तर: चार पुस्तकें तैयार हैं। मील का पत्थर, निबंध का संग्रह है। ‘दरकती दीवारों से झाँकती जिंदगी’ (आत्मकथात्मक उपन्यास) और ‘तेलंगाना की सांस्कृतिक विरासत और साहित्य में हिंदी के महत्व’ पर इसमें शहर की शिक्षा, सांस्कृतिक मूल्यों और उसमें हिंदी लेखकों का योगदान आदि विषय को लेकर लिखा है। चौथी पुस्तक ‘इस शहर के लोगों से’ (कविता संग्रह) है। ये कुछ पुस्तकें हैं। शीघ्र ही ये पुस्तकें प्रकाशित होकर सामने आएंगी।

प्रश्न: नए लेखकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगी।

उत्तर: लेखन कर्म निस्वार्थ और श्रमसाध्य कर्म होता है। भले ही तुलसीदास ने ‘स्वातः सुखाय’ कहकर लिखा है परंतु वह ‘पर हिताय’ ही अधिकाधिक है। आज जितनी आपाधापी  लेखन के क्षेत्र में है, वह बहुत अच्छा संकेत नहीं है। बहुत जल्दीबाजी में जो रचनाएं रची जाती हैं, उतनी फलदायी नहीं होती हैं। वर्तमान में कई अच्छी सृजनात्मक रचनाएं भी नए लेखकों के द्वारा रची जा रही हैं। मुझे लगता है कि अधिकाधिक विमर्श के लिए नये लेखकों को चाहिए कि जल्दीबाजी में न पड़कर अध्ययन, चिंतन मनन के द्वारा लिखें। लेखन को अपनी सोच के साथ जोड़कर चलें और इसे मात्र  प्रस्तुति का साधन न समझें। आगे बढ़ने की तीव्र उत्कंठा से बचें। लेखन समय सापेक्ष होना चाहिए। अति आकांक्षी और निराशा से बचना चाहिए। इन सब की तैयारी के साथ सृजित साहित्य बहुत सार्थक और उत्तम होगा। साहित्य का भविष्य उज्जवल है।  

सभी को ढेरों शुभकामनाएं।

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