हिंदी कोकिला के विविध स्वर

मंतव्य

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डाॅ. गोपाल शर्मा, प्रोफेसर (अँग्रेजी), अरबामींच यूनिवर्सिटी, इथियोपिया

डॉ. अहिल्या मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को एक आलेख में समेटना उस व्यक्ति के लिए बहुत कठिन है जो इसके लिए न जाने कब से एक सम्पूर्ण पुस्तक का मसौदा बगल में दबाए बैठा हो। फिर भी इस कोरोना काल में इसे कर्तव्य से अधिक अधिकार समझकर लिखने का उपक्रम कर रहा हूँ। दबंग व्यक्तित्व की धनी (डॉ. विश्रांत वशिष्ठ के शब्द) अहिल्या जी ने कभी ‘अजित’ उपनाम का प्रयोग  भी किया था, यह मैं दावे के साथ नहीं कह सकता किन्तु यह बात सप्रमाण हैदराबाद के ही नहीं समस्त दक्षिण भारत के और अब तो सम्पूर्ण भारत के लोग भी कहते हैं कि अहिल्या जी में ‘कुछ बात’ है। कहते हैं बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने अज्ञेय जी का परिचय सरोजिनी नायडू से करवाया और सरोजिनी ने उन्हें देखकर कहा था, ‘यस, ही लुक्स लाइक ए पोएट- हैल्दी स्ट्रॉंग एंड हैंडसम’ मुझे डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने अहिल्या जी से जब मिलवाया तो मेरे भी शब्द थे, “यस, शी लुक्स लाइक ए पोएटेस- हैल्दी, स्ट्रॉंग एंड ब्यूटीफुल।” इस सरपटी जबान को मैं तब भी काबू में नहीं कर सका था जब मैं अहिल्या जी की पुस्तक ‘नारी दंश दलन दायित्व’ के लोकार्पण में यह कह बैठा- मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं, बल्कि गर्व है कि डॉ. अहिल्या मिश्र उस परंपरा की एक कड़ी हैं जो कभी महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चैहान ने अपने लेखन से शुरू की थी’ (दृष्टव्य-नारी सशक्तीकरण के प्रश्न)। विश्वविद्यालयों के पाठ्यधर्मी प्रोफेसरों को तब मुझसे दो-दो हाथ करने की सूझी, पर साँच को आंच कहाँ? 

संस्मरणों को साझा करने लगूँगा तो यह भूल जाऊंगा कि वो दिन और आज का दिन हिंदी का कोई काम डॉ. अहिल्या मिश्र के बिना हैदराबाद में तो होते मुझसे देखा नहीं गया। कादंबिनी क्लब के माध्यम से छह वर्ष से लेकर छियासी वर्ष तक की महिलाओं को कविता और साहित्य से जोड़ना और अनवरत जोड़े रखना कुछ वर्षों बाद जब इतिहास बन जाएगा तो पाठक दाँतो तले उंगली दबा लेंगे (दृष्टव्य-दक्षिण की हिन्दी पत्रकारिता)। कवि-साहित्यकार तो बहुत हैं और होंगे पर कवि-निर्माता कुछेक बिरले ही हुए हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अहिल्या जी सख्त नारीवादी हैं और पुरुष-वर्ग को परे सरकाती हैं। उनके साहित्यिक परिवार में जुड़ाव की तादाद देखनी हो तो 25 वर्षों से अनवरत चलने वाली कादंबिनी क्लब की मासिक गोष्ठी में आ जाइए। हैदराबाद में किसी अन्य कार्य से आया कोई भी साहित्यकार हो वह अहिल्या जी से मिलना नहीं भूलता। नवोदित से लेकर वरिष्ठ साहित्यकारों तक की कृतियाँ आपके सान्निध्य में लोकार्पित होते देखना अब सामान्य कार्यक्रम लगता है। हिंदी साहित्य के निर्माताओं की जन्म तथा पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम हो या विशिष्ट अवसरों पर भव्य समारोह सबका संयोजन-संचालन करना और अपने सहयोगियों को साथ लेकर प्रशिक्षित करना अहिल्या जी ने संभव करके दिखाया है। ‘ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ के हैदराबाद चैप्टर की कर्ता-धर्ता के रूप में अहिल्या जी ने हैदराबाद के बहुभाषी समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। 

अहिल्या जी ने पिछले 50 वर्षों से यह किया है और ‘अहिल्या- मण्डल’ सा बन गया दीखता है। इस शताब्दी के प्रारम्भ में यह सोचा गया कि अब समय आ गया है कि डॉ. अहिल्या मिश्र की हिंदी-सेवा का समुचित सम्मान व लेखा प्रस्तुत किया जाए तब ‘स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम’ वृहद ग्रंथ का संपादन (प्रधान संपादक- डॉ. ऋषभ देव शर्मा, संपादक-डॉ. गोपाल शर्मा, कविता वाचक्नवी) किया गया। कोलकाता की कथाकार विनोदिनी गोयनका के समग्र लेखन का संपादन (डॉ. गोपाल शर्मा, डाॅ. अहिल्या मिश्र) करते हुए यह समझ में आया कि अहिल्या जी की संपादन-कुशलता ‘पुष्पक’ पत्रिका तक ही सीमित नहीं है, इनके संपादकत्व में अनेक पत्रिकाएँ (महिला दर्पण, महिला सुधा, सम्मेलन, प्रतिबिंब) पहले भी निकल चुकी हैं। इसी दौरान यह जानकर तो अचंभा ही हुआ कि अहिल्या जी मूलतः मैथिली भाषी ही नहीं हैं बल्कि ‘विद्यापति की पदावली का शैलीतात्विक अध्ययन’ विषय पर डॉक्टरेट उपाधिधारी भी हैं। यही नहीं ‘मिथिला, मैथिली, और विद्यापति’ की शब्दावली का विशद वैयाकरणिक विश्लेषण (साहित्य-शैलीवैज्ञानिक नहीं) करने के लिए ध्वनि-विज्ञान के प्रतिमान का प्रयोग करते हुए उनके काव्य की ध्वनि-प्रधानता का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत करने वाली गिने चुने भारतीय भाषाविदों में से एक हैं। ‘लेखिका के पास ऊर्जा भी है, और दृष्टि भी’ कहकर प्रोफेसर दिलीप सिंह ने इस शोध कार्य की प्रशंसा की है। 

कवयित्री अहिल्या मिश्र से परिचय नवजीवन बालिका विद्यालय के प्रांगण में होता रहा है। यह सर्वविदित है कि हैदराबाद भारत कोकिला सरोजिनी नायडू का पीहर और एक तरह से ससुराल रहा है। विद्यालय परिसर में  सरोजिनी नायडू के द्वारा उद्घाटित भव्य और सुसज्जित हॉल में न जाने कितने समारोहों में अहिल्या जी का धीर गंभीर और औजस्वी  काव्य पाठ सुना है। न जाने कितने कविता संग्रहों की चर्चा में ‘गीता प्रकाशन’ के कार्यालय में भेंट होती रही है। इसी प्रकार कथाकार और लेखिका अहिल्या मिश्र के तेवर निराले हैं। निराला जी के सदा फक्कड़ और कदा अक्खड़ स्वभाव के तो हमने चर्चे ही सुने हैं, अहिल्या जी के देखे भी हैं (पत्थरों की सख्ती की बनी मीनार हूँ मैं)। निबंधकार और नाटककार के रूप में अहिल्या जी का लेखन अतिरिक्त है जिसको कई बार अलग से देखने की जरूरत नज़र आती है। निबंधों में गंभीरता और गवेषणात्मकता तथा नाटकों में शिष्ट हास्य और चरपरा व्यंग्य देखते ही बनता है।

संयोजिका के रूप में व्यवस्था एकदम झन्नाट रहती है, क्या मजाल कोई कोताही हो जाए। पुरुष वर्चस्व समाज में अपनी दृढ़ता और कविता की बदौलत अहिल्या जी ने वह स्थान बनाया है कि विद्वान सहमति प्रकट करता है और ढपोरशंख भाग खड़ा होता है। पीठ पीछे अनेक नवोदित और स्थापित कवयित्रियाँ जब जब अहिल्या जी को अपनी सफलता का श्रेय देतीं हैं तो मन आदर भाव से भर जाता है। अपने को स्थापित करने वाले बहुत हैं, दूसरों को राह दिखाने वाले अब कहाँ मिलते हैं ? ‘साहित्य गरिमा’ पुरस्कार इसका एक उदाहरण है। हाँ, अनेक नर-पुंगव और नेहाभिमानी उनसे खासे खफा भी रहते हैं क्योंकि उनके मठ तोड़ने का कार्य अहिल्या जी ने ऐसे ही कर दिखाया है जैसे जानकी ने शिव का धनुष एक स्थान से दूसरे स्थान पर यूं ही रख दिया था। उद्देश्य की सार्थकता और लक्ष्य की आतुरता और दक्षिण में हिन्दी के लिए कुछ कर गुज़रने की अमिट साध की आपको अब उत्तर तक टंकार सुनाई देगी। 

डॉ. अहिल्या मिश्र का लंबा साक्षात्कार इस शताब्दी के आरंभ में कविता जी ने लिया था जो न जाने कितने शोधालेखों, शोधप्रबंधों और पुस्तकों में आधार सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। ‘डॉ. अहिल्या मिश्र के निमित्त’ काम बहुत से हुए हैं और हो रहें हैं।  ‘अहिल्या मिश्र-समग्र’ को संपादित करने की योजना भी है। ‘पुष्पक’ देखते देखते कहाँ से कहाँ जा पहुँचा। पिछले 15 वर्षों से मैं स्वयं प्रवासी हो गया था और कविता जी सचमुच में अमरीका जा बसीं। अहिल्या मण्डल में अनेक प्रवीण लोग शामिल हो गए। देखते देखते वेबिनार तक ‘कादंबिनी’ की गोष्ठी जा पहुंची। कुछ प्रतिभाएं काल-कवलित हो गईं और अनेक नई ज्योतियाँ प्रकाशित होकर प्रशंसा की पात्र बनीं। यह कारवां इस तरह इसलिए बढ़ता जा रहा है क्योंकि ‘अनजान पथिक’ को भी अहिल्या जी की छत्र-छाया में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सभी आयोजनों में सहभागिता करने का समान अवसर मिलता है। यदि महान ग्रीक दार्शनिक प्लेटो एक आध बार अहिल्या जी की कवि गोष्ठी में आ जाता तो कवियों को अपने काल्पनिक आदर्श राज्य से बेदखल करने की कभी अनुशंसा न करता। उसे ‘कविता का लोकतन्त्र’ देखकर स्वयं समझ आ जाती कि कविता तब ही कवि का परम वक्तव्य होती है जब कवि का व्यक्तित्व भी ‘परम और उदात्त’ हो। अहिल्या मिश्र की सृजनात्मक, रचनात्मक और संगठनात्मक ऊर्जा के पीछे उनका महीयसी व्यक्तित्व है, इसमें संदेह नहीं। 

आदरणीया अहिल्या मिश्र के स्वस्थ, सुखद और मंगलमय जीवन की कामना मैं उपनिषद के इस कथन से करता हूँ- एकं रूपं बहुधा यः करोति, तमात्मस्थं ये अनुपश्यंति धीराः तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम’- जो विश्व में अपने को बहुत रूपों में प्रकट करता है उस एक को अपने अंतर में स्थित समझने वाले प्रशांतमना व्यक्तियों को शाश्वत सुख प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। निश्चय ही सब के प्रति संवेदना, सहानुभूति और समत्व की भावना से सबको साथ लेकर हिंदी हित साधन में तन-मन-धन अर्पित करने वाली डॉ. अहिल्या मिश्र पर यह कथन सटीक बैठता है। मेरे इस संक्षिप्त लेखन को अन्य प्रबुद्ध विद्वानों के लेखन का अनुपूरक समझकर पढ़ने वाले इस आलेख के पाठकों का धन्यवाद।