साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित भारत भूषण अग्रवाल जन्मशतवार्षिकी संगोष्ठी संपन्न

प्रेस विज्ञप्ति

भारत भूषण अग्रवाल नागर जीवन के पहले सजग कवि थे - अरुण कमल


नई दिल्ली, 21 दिसंबर 2020, साहित्य अकादेमी द्वारा आज आभासी मंच पर ‘भारत भूषण अग्रवालः व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। भारत भूषण अग्रवाल की जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर आयोजित इस संगोष्ठी का उद्घाटन प्रख्यात कवि अरुण कमल ने किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में भारत भूषण अग्रवाल की सुपुत्री अन्विता अब्बी उपस्थित थीं तथा उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक चित्तरंजन मिश्र ने की। स्वागत भाषण साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव द्वारा प्रस्तुत किया गया। विचार सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात लेखिका ममता कालिया ने की और सविता सिंह, ओम निश्चल, पंकज चतुर्वेदी एवं शैलेंद्र कुमार शर्मा ने अपने आलेख प्रस्तुत किए।

संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए अरुण कमल ने कहा कि भारत भूषण अग्रवाल नागर जीवन के पहले सजग कवि थे। उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं, जटिलताओं को एक नई जीवंत भाषा के साथ प्रस्तुत किया। आगे उन्होंने कहा कि वे उन कवियों में थे, जिन्होंने कवियों के कठिन जीवन को भी अपनी कविताओं में प्रस्तुत किया। भारत जी ने कविता की सृजन प्रक्रिया पर गहराई से विचार किया था। उन्होंने मिथकों की पुनव्र्याखा भी बिलकुल निराले ढंग से की। अन्विता अब्बी ने उन्हें अपने संपूर्ण परिवार के रचनाकार के रूप में याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन को ही नहीं अपने परिवार के सभी सदस्यों की भी समर्थ रचना की। उन्होंने हमेशा धन से ज्यादा साहित्य सृजन को आगे रखा और इसी सर्जना की तलाश में उन्होंने 16 नौकरियाँ बदलीं। उन्होंने भारत भूषण अग्रवाल के दो अधूरे कार्यों का भी उल्लेख किया।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए चित्तरंजन मिश्र ने कहा कि वे एक सच्चे रचनाकार थे। उन्होंने अपनी कविता में जितने सवाल उठाए हैं वे सभी अपने आप में क्रांतिकारी और साहसिक सवाल हंै। उनकी पूरी कविता कवि के मन की रूढ़ियों से ही नहीं बल्कि समाज की सभी रूढ़ियों से लड़ती है। अपने को निष्कवच करते हुए वे हमेशा एक नैतिक आक्रोश प्रस्तुत करते हैं। इससे पहले साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा कि कोरोना महामारी के कारण इस आयोजन में देर हुई है और अब हम इसे आभासी मंच पर कर रहे हंै। उन्होंने कहा कि भारत भूषण अग्रवाल ने तमाम तरह के तनावों और संघर्ष के बावजूद कविता के साथ-साथ नाटक, निबंध, आलोचना, कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य एवं अनुवादों में अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा को सामने रखा। भारत जी बहुआयामी व्यक्तित्व के रचनाकार थे।

विचार सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात लेखिका ममता कालिया ने की जो उनकी भतीजी भी हैं। सर्वप्रथम आलोचक शैलेंद्र कुमार शर्मा ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत जी ने परंपरा से खुद को जोड़ा और भारतीय परंपरा का संवर्धन किया। प्रख्यात कवयित्री सविता सिंह ने उनके एब्सर्ड दार्शनिक पक्ष को उजागर करते हुए कहा कि उन्होंने इसी पक्ष को अपनी कविता की गहराई बनाया। उन्होंने अपने कथ्य को प्रस्तुत करने के लिए अलग शैली और शिल्प तैयार किया। वे समाज के विभिन्न पक्षों/पात्रों के अलग-अलग व्यक्तित्वों को बेहद सूक्ष्मता से पकड़कर प्रस्तुत करते रहे। कवि एवं आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने उनके व्यंग्य की क्षमता का आकलन करते हुए कहा कि भारत भूषण अग्रवाल परंपरा का आदर करते हुए भी परंपरा के खिलाफ हमेशा व्यंग्य की नजर से देखते हैं। वे ऐसी पैनी नजर इसलिए रख पाए, क्योंकि वे खुद एक बड़े आत्मालोचक थे। उन्होंने उनके तुक्तकों का उल्लेख करते हुए कहा कि विनोद के साथ विरोध करना उनकी पहचान थी। उनकी कविताओं में जो संशय है वही उन्हें श्रेष्ठ बनाता है। आलोचक ओम निश्चल ने उनकी प्रतिभा का सही विशलेषण न होने की बात करते हुए कहा कि वे छंद के साथ-साथ नई कविता के बड़े कवि थे। उन्होंने मिथकों को नए तरीके से चुनौतियाँ दीं। कथाकार ममता कालिया ने उन्हें अपने चाचा और एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि भारत भूषण जी ने स्वयं को ही निर्मित नहीं किया बल्कि अपने परिवार का भी निर्माण किया। भारत जी हास्य कवि नहीं बल्कि व्यंग्य के कवि थे। यह उनकी प्रतिभा ही थी कि उन्होंने अपने सभी समकालीन रचनाकारों और उनकी रचनाओं पर व्यंग्य से भरे तुक्तक लिखे। भारत जी अपने समकालीनों में बिलकुल अलग दिखाई देते हैं। आगे उन्होंने कहा कि लेखक का जीवन उसकी मृत्यु के बाद ही शुरु होता है। उन्होंने भारत भूषण अग्रवाल का सही मूल्यांकन न होने पर भी चिंता प्रकट की। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी का संचालन कर रहे अकादेमी के संपादक (हिंदी) अनुपम तिवारी ने किया। 

-अजय कुमार शर्मा, सहसंपादक, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, मो. 9868228620


शोक संदेश

हम प्रख्यात विद्वान तथा आधुनिक भारतीय साहित्य की उत्कृष्ट कवयित्री श्रीमती सुगाताकुमारी के निधन पर अत्यंत शोकाकुल हैं। वह एक महान कवयित्री, एक श्रेष्ठ दार्शनिक तथा पर्यावरणविद् थीं, जिनका हृदय सदैव आमजन के लिए 

धड़कता था। उनकी आमजन तथा प्रकृति के प्रति समझ, लोगों के अव्यक्त विचारों को शब्दों में पिरोने की क्षमता, उन्हें कई वरिष्ठ रचनाकारों के बीच उत्कृष्ट रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करती थी। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कविता-संग्रह राथरिमाष़, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित पाथिराप्पूकळ तथा उनकी अन्य कृतियाँ अम्बालमणि एवं मनोलेष़हुथु जैसी रचनाओं ने उन्हें आधुनिक भारत की महानतम कवयित्रियों में से एक बना दिया था।

उन्होंने बाल साहित्य को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास किए, जिसके फलस्वरूप उन्हें केरल साहित्य अकादेमी द्वारा बाल साहित्य के लिए आजीवन योगदान हेतु सम्मानित किया गया। उनके राष्ट्रव्यापी आंदोलनों में साइलेंट वैली के संरक्षण का समग्र प्रयास एवं अभय नामक संस्था चलाना है, जो मानसिक रूप से प्रभावित महिलाओं को आश्रय देती है इसके अतिरिक्त उनके पास निरंतर मदद माँगने वालों की सहायता करना, यह कुछ ऐसी खासियतें हैं जिनसे सभी को सीखना एवं उनका अनुकरण करना चाहिए। उनका निधन एक गहरे शून्य के साथ-साथ एक समृद्ध विरासत भी छोड़ गया है।

साहित्य अकादेमी श्रीमती सुगाताकुमारी के परिवार के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करती है।         

 -के. श्रीनिवासराव

-अजय कुमार शर्मा, सहसंपादक, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, मो. 9868228620


श्रद्धांजलि

साहित्य अकादेमी द्वारा मंगलेश डबराल की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित सभी ने उन्हें एक वैश्विक भारतीय कवि, सजग संपादक और संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में किया याद  नई दिल्ली, 16 दिसंबर 2020, साहित्य अकादेमी द्वारा आज प्रख्यात कवि एवं साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त मंगलेश डबराल जी की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। आभासी मंच पर आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा के आरंभ में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव एवं अन्य अधिकारियों ने मंगलेश जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि व्यक्त की। सचिव के. श्रीनिवासराव ने श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि मंगलेश डबराल की अपनी एक स्पष्ट आवाज और विनम्र काव्यभाषा थी, जिसकी वजह से उनकी वैश्विक स्तर पर पहचान थी। उन्होंने अपनी रचनाओं में जनपक्षधरता को प्राथमिकता दी।

प्रख्यात लेखिका चित्रा मुद्गल ने कहा कि वे केवल हिंदी के नहीं बल्कि भारतीय भाषाओं के कवि थे और उन्होंने एक नई पीढ़ी को प्रेरणा देते हुए तैयार किया। उनकी कविताओं में पहाड़ का ही दर्द नहीं बल्कि वहाँ के पत्थर का दर्द व्यक्त हुआ था। उनकी कविता भाषा अतुलनीय थी और उनकी असहमति में एक ताकत थी। आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि डबराल जी ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य के साथ-साथ विदेशी साहित्य के साथ भी संपर्क का एक बड़ा सेतु तैयार किया। प्रख्यात नाटकार एवं लेखक असगत वजाहत ने युवा अवस्था में उनके साथ बिताए गए समय को याद करते हुए कहा कि वे अपनी जवानी के दिनों में भी अपने आस-पास के लोगों की चिंता उसी तरह करते थे जैसे कोई बुजुर्ग आस-पास के लोगों का ध्यान रखता है इसलिए कई बार हम उन्हें जवान बूढ़ा कहकर बुलाते थे। वे इंसानियत पर अटूट विश्वास करने वाले कवि थे। प्रख्यात अनुवादक प्रभाती नौटियाल ने मंगलेश जी को याद करते हुए कहा कि मैं उनकी किशोर अवस्था से उनके साथ रहा और उन्होंने कविता में जो भी कुछ व्यक्त किया है वह इतना अलौकिक और असाधारण था कि उसका आकलन करने के लिए अभी हमें बहुत समय लगेगा। उन्होंने उनके विदेशी साहित्य में गहरी रुचि होने की भी चर्चा की।

प्रख्यात कवि अरुण कमल जी ने कहा कि वे ऐसे कवि थे जिन्होंने पहाड़ का ही नहीं बल्कि जो भी कहीं हाशिए पर था उसे अपनी कविता में लाकर गरिमा प्रदान की। संुदर चंद ठाकुर ने कहा कि उनके जीवन के हर हिस्से से कविता फूटती थी। वे केवल राजनीतिक रूप से सजग ही नहीं बल्कि प्रेम को बहुत सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत करने वाले कवि भी थे। प्रियदर्शन ने कहा कि उनमें साधारण की असाधारणता थी। वे कविता से ही अत्याचारियों को हराने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनकी कविता में सबसे बड़ा वैश्विक तत्व उसमें मानवीय ऊष्मा को होना था। प्रख्यात मराठी कवि चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि वे मराठी साहित्य के बारे में बहुत सजग थे और हमेशा उसमें रुचि लेते थे। उन्होंने भोपाल में उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए कहा कि उनकी रचनात्मक ऊर्जा हम सब के लिए प्रेरणादायक होती थी। प्रख्यात मलयाळम कवि के. सच्चिदानंदन ने उन्हें सामाजिक रूप से जागरूक कवियों की परंपरा का अंतिम प्रतिनिधि मानते हुए कहा कि वे साधारण होते हुए भी अपने आप में असाधारण थे। उन्होंने अपनी कविता, अपना मान हमेशा कायम रखा। वे सच्चे मायनों में हिंदी कवि नहीं बल्कि भारतीय कवि थे। पंजाबी की प्रख्यात लेखिका वनीता ने उनको याद करते हुए पंजाबी में अनूदित मंगलेश जी की एक कविता जो शहर में रहने को लेकर थी, का पाठ किया। फिल्मकार प्रवीण अरोड़ा ने उन्हें युवा पीढ़ी के लिए सच्चे मार्गदर्शक के रूप में याद करते हुए कहा कि वे युवाओं को हमेशा श्रेष्ठ और नई दृष्टि से काम करने की प्रेरणा देते थे। प्रख्यात कवि मदन कश्यप ने कहा कि मंगलेश जी ने पहाड़ को केवल ऊपर से ही नहीं देखा बल्कि उसमें समाई गतिशीलता और करुणा को भी देखा। समय की क्रूरता को उन्होंने बेहद करुणा के साथ वैश्विक बनाया। उन्होंने संपादन में उनकी कठोरत सजगता को भी याद किया। प्रख्यात पत्रकार रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि मंगलेश जी संगीत को जिस तरह से कविता में लाए वैसा शायद ही कोई कर पाया। उनकी कविता में क्राफ्ट का गहरा अनुशासन था। उन्होंने वर्तमान कविता को वैश्विकता से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। प्रसिद्ध कवि लीलाधर मंडलोई ने उन्हें ऐसे कवि के रूप में याद किया जिसके अंदर एक संवेदनशील मनुष्य था, जो लगातार संवाद के लिए आतुर रहता था। उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता को भी बेहद ऊँचाई प्रदान की। उनके कवि रूप के अलावा भी कई रूप थे जिन्हंे पहचानने की जरूरत है। कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने आकाशवाणी के कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी को याद करते हुए कहा कि उनका जाना कविता में जनपक्षधरता के एक मजबूत स्वर का जाना है। कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि उन्होंने हिंदी कविता को लयात्मकता प्रदान की। मंजुला राणा ने उनको याद करते हुए कहा कि उनके जाने से पहाड़ का एक संस्कृतिकर्मी और कर्मयोद्धा हमारे बीच से चला गया है। उनके डिक्शन में हाशिए के लोगो को जगह मिली हुई थी। हमने भारतीय साहित्य के एक दृष्टा को खो दिया है। मराठी के युवा साहित्यकार बलवंत जेऊरकर ने कहा कि मंगलेश जी जितने हिंदी के कवि थे उतने ही मराठी के भी। उन्होंने उनके संग्रह ‘हम जो देखते हैं’ के मराठी अनुवाद के समय को साझा करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा सहयोग दिया और उनके जाने से मराठी की युवा पीढ़ी काफी दुखी है। मंगलेश जी के परिवार से श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुई उनकी बेटी अल्मा और प्रमोद कौंसवाल ने साहित्य अकादेमी और श्रद्धांजलि सभा में शामिल सभी के प्रति आभार  प्रकट करते हुए कहा कि सभी के सहयोग से मंगलेश जी के अधूरे रहे कार्य को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा। अंत में साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि उन्होंने पहाड़ के लालित्य को नहीं बल्कि वहाँ की बदहाली को गहरे तक महसूस किया और इसको अपनी आवाज दी। उन्होंने मंगलेश जी द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता को श्रेष्ठतम रूप में प्रस्तुत करने के लिए भी उनको याद किया। सभा का संचालन अकादेमी के संपादक (हिंदी) अनुपम तिवारी ने किया।                                

 -के. श्रीनिवासराव

अजय कुमार शर्मा, सहसंपादक, साहित्य अकदमी, नई दिल्ली, मो. 9868228620