चरैवति चरैवति....

 मंतव्य


अवधेश कुमार सिन्हा, ग्रेटर नोएडा (पश्चिम), उत्तर प्रदेश, 9849072673

एक लड़की मैट्रिक की परीक्षा के बाद तत्कालीन सामाजिक परिवेश के अनुरूप किशोरावस्था में ही शादी के बन्धन में बंध तो जाती है लेकिन वह अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता से स्त्रियों को समाज में समान अधिकार और वैचारिक स्वतंत्रता के विरासत में मिले संस्कारों को भी साथ लिए ससुराल आती है। उत्तर बिहार के तत्कालीन रूढ़िवादी ग्रामीण समाज में वह लड़की अपनी अस्मिता और संस्कारों की विरासत को बचाए रखने के लिए अकेले संघर्ष करती है। हार न मानने वाली वह लड़की खुले आकाश में उन्मुक्त उड़ने के लिए शादी के चार वर्षों में ही अपनी सारी संपदा त्यागकर व ग्रामीण परिवेश में जन्मी परिवारिक रूढ़ियों की जंजीर को तोड़कर सुदूर दक्षिण में हैदराबाद की धरती पर अपने पति और नन्हे बेटे के साथ नया आशियाना बनाती है और यहाँ से वह शुरू करती है अपने पति के सहयोग से एक नई जिंदगी आरंभ करती है। पति ने कभी अपनी सोच को पत्नी पर थोपा नहीं, कभी पत्नी के बढ़ते कदम को रोकने की कोशिश नहीं की लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया कि घर की दहलीज से पांव बाहर निकालने की उन्हें पूरी आजादी तो है पर बाहर की चुनौतियां भी उन्हें ही झेलनी होंगी और इसके अच्छे या बुरे परिणामों के लिए भी वह स्वयं जिम्मेवार होंगी। वयस्कता की दहलीज पर हाल ही कदम रखने वाली वह नई औरत इन चुनौतियों को स्वीकार करती है और अपनी आगे की यात्रा में अपने कदमों को मजबुती देने के लिए आगे की पढ़ाई आरम्भ करती है। वह एम. ए., एम. एड., एम. फिल. करने के बाद हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. भी करती है। विभिन्न विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में अध्यापन का कार्य करती है। हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं- कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, यात्रा संस्मरण- में दर्जनों किताबें लिखकर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का लोहा मनवाती है। कई पत्रिकाओं का संपादन कर पत्रिकारिता के क्षेत्र में भी एक ऊँचा मकाम हासिल करती है। कई साहित्यिक संस्थाएं स्थापित करती है तो कइयों के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाती है। वर्ष 2009 में पति के असामयिक निधन से बड़ा आघात पहुँचता है। फिर स्वयं कैंसर जैसी बीमारी की चपेट में आ जाती है। लेकिन इन आघातों व जान लेवा बीमारी की अँधेरी सुरंग को वह अपनी जिजीविषा एवं अपने जुझारूपन से पार कर लेती है और अपने अदम्य साहस एवं दृढ़ आत्मविश्वास के साथ अपनी मंजिल की ओर पूर्व की सक्रियता के साथ पुनः चल पड़ती है। पाँच दशकों से भी अधिक की यह यात्रा आज भी उसी उर्जा के साथ जारी है। जी हाँ, अपनी यात्रा के रास्ते में कई मील के पत्थर गाड़ने वाली, दक्षिण भारत में सबसे बुलन्द आवाज में हिन्दी का परचम लहराने वाली, हिन्दी साहित्य के जरिए विचार क्रांति लाने वाली तथा समाज सेवा द्वारा मानवता, विशेषकर नारियों के उत्थान के लिए समर्पित यह डाॅ. अहिल्या मिश्र की यात्रा कथा है ।  

डाॅ. अहिल्या मिश्र हिन्दी साहित्य लेखन के क्षेत्र में अपनी शर्तों पर रहती हैं, खेलती हैं, लड़ती-झगड़ती हैं, बोलती हैं, चीखती हैं, कभी-कभी गाती और गुनगुनाती भी हैं। कुल मिलाकर हिन्दी साहित्य के विविध आयामों में जीती हैं। अहिल्या जी अपने जीवन के तमाम मधुर और कोमल तथा कटु और तिक्त अनुभवों को बेलौस अभिव्यक्त करती हैं। वे स्त्री सशक्तिकरण की प्रबल पक्षधर हैं लेकिन उन्हें यह स्वीकार नहीं है कि स्त्रीवाद के नाम पर स्त्री से उसका स्त्रीत्व छीन लिया जाए। दूसरी ओर, वे इस पुरूषवादी घोषवाक्य का भी विरोध करती हैं कि स्त्री को स्त्री ही रहने दो। दरअसल, वे चाहती हैं कि स्त्री का स्त्रीत्व तो न खोए लेकिन उसे मनुष्य होने के पूर्ण अधिकार प्राप्त हों। वास्तव में, इसी मनुष्यत्व की चिन्ता अहिल्या मिश्र जी के लेखन की अंतर्वत्र्ती धारा है।

वे मानती हैं कि दुनिया में केवल स्त्री से ही मानव होने का अधिकार नहीं छीना गया है बल्कि स्वयं मनुष्यत्व खतरे में है। खूबसूरत सृष्टि के चेहरे पर स्वयं मनुष्य द्वारा उगाए गए बदसूरत दागों की ओर इशारा करने में उनकी आवाज में खीझ और आक्रोश नज़र आता है । 

अहिल्या जी एक बोलने वाली औरत हैं जिनकी एक आँख में कोमल सपने और दूसरी आँख में क्रान्ति का आह्वान है। अपनी एक कविता में वे कहती हैं-

आजकल औरों की तरह

बोलने लगी हूँ मैं

जुबाँ के बंद ताले

खोलने लगी हूँ मैं

पत्थरों की सख्ती से

बनी ऊँची मीनार हूँ मैं

जहाँ पहुँच कर आप

अपनी बुलन्दी तो माप सकते हैं,

किन्तु मुझको / इसको / उसको

किसी को गड्डेे में नहीं डाल सकते

इसलिए तो अंगार में भी

लावे-सा खौलने लगी हूँ मैं

जी हाँ हुजूर, अब तो बोलने लगी हूँ मैं । 

(”श्वास से शब्द तक“ कविता संग्रह की ‘शब्दों का सौदागर’ कविता का अंश)

जिंदगी के हादसों ने ऐसी मुखर नारी को यदि अवसाद और तिक्तता दी है तो लड़ने और जीतने का सलीका और हौसला भी दिया है।

इनमें विद्रोह, संघर्ष, साहस और संकल्पधर्मिता का अद्भुत समन्वय है। बर्फ की शीतलता, अग्नि की दाहकता, पवन की वेगवत्ता, नभ की विराटता, धरती की विशाल हृदयता तथा जल की निर्मलता यदि इन सबको एक स्थान पर इकट्ठा किया जाए तो जो रूप निकलेगा, वह डाॅ. अहिल्या मिश्र हैं। इनमें एक विद्रोहिनी नारी रहती है जो कबीर की भांति रूढ़ियों की पीठ पर चाबुक बरसाती है, जिसमें एक संयमित तूफान बसता है, जो नाश एवं निर्माण की विवेकपूर्ण आँखों से यथायोग्य व्यवहार करता है। अहिल्या जी एक सजग शाकाहारी सिंहनी हैं जो शब्दसाधना की कला में निष्णात हैं।

चाहे वह मॉरीशस में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में भारत सरकार की ओर से भारतीय दल के प्रतिनिधि के रूप में या फिर भोपाल के विश्व हिन्दी सम्मेलन में विशेष आमंत्रित साहित्यकार के रूप में हो, हिन्दी के सतत प्रचार-प्रसार में हठी प्रतिबद्धता के साथ अहिल्या जी का योगदान अमूल्य रहा है। इसी प्रतिबद्धता को स्वीकारते हुए भारत सरकार ने अपने कई मंत्रालयों में उन्हें हिन्दी सलाहकार समितियों का सम्मानित सदस्य मनोनित किया। जब कोई पुरस्कार या सम्मान स्वयंग्रहीता को पाकर सम्मानित होने लगे तो वह किसी व्यक्ति के शिखर पर पहुँचने का द्योतक होता है। लेकिन जब व्योम का विस्तार अनन्त हो तो ये शिखर छोटे पड़ने लगते हैं। अहिल्या जी को प्रदान किए गए अनेकों प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार व सम्मान उनकी हिन्दी, हिन्दी साहित्य एवं रचनात्मक लेखन के जरिए नारी सशक्तिकरण की त्रयी के विस्तार के समक्ष मात्र रिकॉगनीशन भर हैं, उनके उद्देश्यों के परिणाम नहीं।

संघर्षों की कटीली राहों में तमाम अवरोधों को पार कर अपने मजबूत इरादों के कदमों से अपने लिए रास्ता बनाते हुए पाँच दशकों से अधिक की अनवरत साहित्यिक यात्रा कर जीवन के अस्सीवें दशक की ओर बढ़ती हुई  डाॅ. अहिल्या मिश्र अभी थकी नहीं हैं। साहित्य और जीवन मूल्यों के लिए वे जीती हैं उनके लिए वे बिना समझौता किए अविराम चल रही हैं, कभी अकेले तो कभी साथ मिल गए काफिले के साथ, क्योंकि अहिल्या जी के जीवन का घोष वाक्य है चरैवति चरैवति (ऐतरेय ब्राह्मण का अंश जिसका अर्थ है चलते रहो, चलते रहो)। 

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