अहिल्या मिश्र जी: एक दस हाथ वाली दुर्गा

मंतव्य


नीलम कुलश्रेष्ठ, स्वतंत्र पत्रकार व लेखिका,
संस्थापक- ‘‘अस्मिता’’, महिला साहित्यिक मंच, बड़ौदा व अहमदाबाद

अहिल्या जी से सिर्फ दो मुलाकातें- सिर्फ दो मुलाकात में कोई किसी के विषय में क्या जान सकता है ? लेकिन दस भुजाओं वाले अहिल्या जी के व्यक्तित्व को जाना उनकी पुस्तकों से। दरअसल मेरी शादी से पहले की मित्र पवित्रा अग्रवाल शादी के बाद हैदराबाद बस गई थी। वह उनके साहित्यिक अभिरुचि के पति लक्ष्मी नारायण अग्रवाल दोनों ही अहिल्या जी द्वारा स्थापित, कादम्बिनी क्लब के कर्मठ सदस्य थे। हम लोगों को सन् 2002 फरवरी में मृदुल जी के भतीजे नितिन व नेहा की शादी में हैदराबाद जाना था। पवित्रा का फोन मिला कि तुम अब तक काफी काम कर चुकी हो कादम्बिनी क्लब की गोष्ठी में तुम्हारा साहित्यिक सम्मान किया जायेगा। तारीख तय हुई थी सोलह फरवरी। पवित्रा को चिंता हुई, ‘‘तुम्हें कुछ बोलना पड़ेगा, बोल पाओगी ?‘’ दरससल उसे आगरा वाली नीलम याद थी। 

मैंने आत्मविश्वास से कहा, ‘‘क्यों नहीं ? अस्मिता की स्थापना जबसे हुई है, स्टेज फोबिया निकल गया है।’‘ मैंने कोई अधिक ध्यान नहीं दिया। न कोई अपने वक्तव्य की तैयारी की थी।    

मैं ठहरी अहिन्दी प्रदेश गुजरात में रहने वाली जिसने कभी गोष्ठियों में दस पंद्रह या कभी विशेष अवसर पर बीस पच्चीस से अधिक लोग साहित्य के नाम पर जुटते हुये नहीं देखे थे। खैर, पवित्रा व जीजाजी बहुत स्नेह से मुझे लेने शादी के घर पर आये। अभी उनकी कार गोष्ठी स्थल पर रुकी ही थी कि पास में एक और कार रुकी। इसमें से उतरती महिला से पवित्रा ने परिचय करवाया, ‘‘ये हैं अहिल्या जी जिन्होंने इस क्लब को स्थापित किया।‘’ वे बहुत उत्साह से मुझसे मिलीं। उन्हें देखकर मैं तुरंत समझ गई थी कि ये बहुत उत्साही व कर्मठ महिला हैं। 

गोष्ठी के हॉल में पहुंचकर मेरा दिमाग चकरा गया। देखा साथ सत्तर लोग विराजमान हैं व बाकायदा माइक भी लगा हुआ है। अरे, ऐसा तो हमारे यहाँ किसी विशेष कार्यक्रम में होता है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि किस तरह इन्होंने एक अहिन्दीभाषी प्रदेश में इतने साहित्यकार खोज लिये हैं। जीजाजी ने जब बताया कि इसकी सदस्य संख्या तो डेढ़ सौ है तो मैं और आश्चर्य में पड़ गई लेकिन गोष्ठियों में सत्तर अस्सी लोग तो आतें हैं। हैदराबाद शहर छोटा तो नहीं है- लोग दूर दूर से चले आतें हैं, वो जब ही आयेंगे जब उन्हें विशेष साहित्यिक माहौल प्राप्त होगा।

ये हम सभी जानते हैं किसी संस्था के संस्थापक व उसकी टीम में लोगों को इज़्ज़त देने के साथ उन्हें उचित मंच देने का दम खम होता है तभी लोग उस मंच से जुड़ पाते हैं। ये क्लब तो इनके वर्षों के परिश्रम की साधना थी। इस दिन तो उनसे अधिक बात होना सम्भव नहीं था। अहिल्या जी के व अग्रवाल दाम्पत्ति के कारण मैं हैदराबाद के बुद्धिजीवियों के समक्ष पहली बार गुजरात से निकलकर यहाँ की विशेष एन.जी.ओ. व अपने इन पर लेखन की बात कर सकी थी। 

कुछ बरस बाद बतौर पत्रकार मुझे एक पत्रिका के लिये जानकारी चाहिये थी कि किस तरह आंध्र की महिलायों ने शराब की भठ्ठियाँ तोड़कर वहाँ के पुरुषों को शराब से मुक्त किया। अहिल्या जी ने जिस तरह सहर्ष जानकारी जुटाकर सहयोग दिया, वह न भूलने वाली बात है। उनका वह इंटव्यू ‘‘गृहशोभा’’ में प्रकशित हुआ था। अहिल्या जी से जुड़े लोगों के उनसे स्नेह से मैं चमत्कृत हो गई थी क्योंकि उनको समर्पित करते हुये डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी ने एक ग्रन्थ सम्पादित किया था ‘‘स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम’’ जिसके लिए मेरा भी लेख आमंत्रित किया था।        

मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब अहिन्दीभाषी प्रदेशों में सर्वश्रेष्ठ कहानी संग्रह का कादिम्बनी क्लब का गरिमा साहित्य पुरस्कार- सन् 2012 मेरी कहानी संग्रह ‘‘शेर के पिंजरे में’’ के लिये घोषित हुआ, जिसके एक निर्णायक वर्धा की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी थे। मैंने ऋषभ जी को फोन पर कहा भी था कि मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अपने परिवार से मिलने आ रहीं हूँ। मैं व मेरे पति सन- 2013 में इस समारोह के लिये हैदराबाद गये थे व कंट्री क्लब के अमृता कैसेल में ठहरे थे। हम सुबह वहाँ पहुंचे थे और अहिल्या जी ग्यारह बजे के आस पास वहाँ मिलने चलीं आईं थीं। उसी पुराने उत्साह से भरी। उनकी बहू वहाँ ड्रॉप कर गईं थीं। हम लोग साहित्य, दुनियां की और अपने परिवार की बातों में गुम हो गये थे। कितने घंटे निकल गये, पता ही नहीं चला। मुझे उनकी एक बात आज भी याद है, उन्होंने बताया था, ‘‘हम लोग बिहार से हैं। मेरे पति ससुर बहुत उदार विचारों के मिले। मैंने जब ससुर से कहा कि मैं एक साहित्य संस्था की स्थापना करना चाहतीं हूँ तो उन्होंने कहा कि तुम जो भी काम करो खूब प्रगति करो लेकिन बस घर की मर्यादा को कभी ठेस न पहुंचे।‘’  

और अब उनके शुभचिंतक जिनमें से बेंगलौर की एक विदुषी उषारानी राव भी हैं। उन्होंने मुझसे अहिल्या जी पर कुछ लिखने का आग्रह किया है। उन पर एक विशेषांक प्रकाशित हो रहा है। यह जानकर मुझे खुशी हुई। हम समझ ही सकते हैं कि किस समर्पण से अहिल्या जी ने परिवार संभालते हुये व साहित्य, शिक्षा व साहत्यिक संगठन के लिये काम किया है। बीच में भी किन्हीं बनारस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साहब का फोन आया था कि उनके कहानी लेखन पर कुछ लिखूं लेकिन मैं अपनी एक पुस्तक को लेकर बहुत व्यस्त थी। उनसे कहा  कि कुछ मोहलत दें। मैं गलती से उनका फोन नंबर सेव नहीं कर पाई थी, कुछ गलतफहमियों के कारण ये कार्य पूरा नहीं हो पाया लेकिन अहिल्या जी की लोकप्रियता के लिए मैं नतमस्तक हो गई थी कि उनका व्यक्तित्व कहाँ-कहाँ तक प्रभाव डाल रहा है? 

तो मैं जिस सन् 2013 में पुरस्कार समारोह की बात कर रही थी, वह दूसरे दिन था। शाम को होटल में समारोह में हो जब वे मिलीं तो बोलीं मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है, हालाँकि उनकी सिल्क की साड़ी व उनके उत्साही व्यक्तित्व के कारण ये विश्वास  करना मुश्किल लग रहा था। कल्पना कीजिये कि एक बिहार की महिला ने आंध्र प्रदेश की साहित्यिक परम्परा को किस तरह आत्मसात किया हुआ था। इस पुरस्कार को देने से पहले डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी व कुछ अन्य वक्ता मेरे लेखन पर एक डेढ़ घंटे बोलते रहे (सोचिये किसी लेखक के लिये पुरस्कार से बढ़कर कितना सुखद अनुभव होता है) ऋषभ जी मंच से घोषणा कर रहे थे, ‘ये हैदराबाद के जन जन की तरफ से दिया जाने वाला पुरस्कार है।‘ 

इसके बाद मुझे मंच से उतारा गया और मंच के सामने रक्खी बड़ी कुर्सी पर मुझे बिठाया गया और आरम्भ हुआ मेरे सम्मानित होने का सिलसिला कोई सदस्य शॉल उढ़ा रहा है, कोई माला, कोई बुके दे रहा है, कोई चैक। हाँ, अतिरिक्त बुके व शॉल पवित्रा व जीजा जी ने दिया वह उनका अतिरिक्त स्नेह था, फोटो तो ली ही जा रहीं थीं। चैनल वाले अलग शूट कर रहे थे। बिहार के चैनल से भी कोई आये थे इसलिये ये प्रक्रिया भी दोबारा दोहराई गई।

सच मानिये हैदराबाद की उस शानदार कुर्सी पर बैठे मेरी आँखों में आंसू छलछला आये थे कि मैं जो बड़ौदा के अपने घर के कमरे के कोने में एकांत में जो लेखन करती थी। उसके लिए हैदराबाद में इतना सम्मान मिल रहा है ? मैं विषय से बिलकुल नहीं भटक रही हूँ, बल्कि ये बताने की कोशिश कर रहीं हूँ कि जब अहिल्या जी ने इस क्लब की संस्थापना के लिए सोचा होगा तो उन्हें भी शायद अनुमान न हो कि दूर दराज के लेखक भी यहाँ सम्मान पाकर और भी उत्साह से लेखन में जुट जाएंगे।

इस समारोह के बाद हमको वापिस अहमदाबाद लौटना था। बहुत मना करने के बाद भी अहिल्या जी ड्राइवर के साथ गाड़ी लेकर अमृता कैसल आ गईं थीं। मृदुल जी को कंट्री क्लब के मुख्यालय में कुछ काम था। उसके बाहर बैठे हुये कार में फिर मेरा उनसे चर्चाओं का दौर चला। ‘‘स्त्री संघर्ष’’ व ‘‘भारतीय नारी तेरी जय हो’’ जैसी स्त्री के पक्ष में पुस्तकें लिखने वाली अहिल्या जी सच में ही भारतीय नारी की दृढ़ता, अनुशासन, नेतृत्व करने की क्षमता, पारिवारिक घरेलुपन (जो भारतीय स्त्रियों की पहचान है) का मुझे उस दिन कार में बैठे बैठे पता लगा था। उन्होंने झांसी में मिलने वाले पुरस्कर के विषय में बताया व कुछ भावुक होकर कहा था कि ‘अब इस उम्र में लगता है कि हमारे लेखन में कुछ परिपक्वता आ गई है।‘ उसी दिन उन्होंने अपनी पुस्तकें भेंट की थीं। तब से अब तक उनकी कर्मठता कम नहीं हो रही। अब तो उनसे जुड़ने का, उनसे प्रेरणा पाने का माध्यम फेस बुक हो ही गया है। 

धीरे-धीरे ये क्लब मुझे अपना परिवार लगने लगा क्योंकि आरम्भ में सबसे अधिक मेरी पुस्तकों की समीक्षायें यहीं से डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी ने, डॉ. बाला जी ने व लक्ष्मी नारायण अग्रवाल जी ने लिखीं थीं। पुरस्कृत कहानी संग्रह पर एम. फिल. भी यहीं से हुआ। कृपया ध्यान दें अहिल्या जी ने एक साहित्यिक संस्था स्थापित की तो दूर बैठी मेरे जैसी लेखिका को भी साहित्य में आगे बढ़ने की सहायता मिली। ये होती है साहित्यिक संस्थाओं की अहम् भूमिका, जिससे बहुत से साहित्यकार लाभान्वित होते हैं। जिसके मूल में थीं अहिल्या जी।     

सन 2013 में मेरी उनसे रुबरू यही मेरी आखिरी मुलाकात थी। कभी फोन पर बात होती तो वे स्नेह से कहतीं ‘‘ऑथर्स गिल्ड’’ ज्वाइन कर लो कम से कम इसके सम्मेलन में मुलाकात हो जाया करेगी लेकिन मेरी अपनी व्यस्ततायें थीं। ऐसा हो न पाया। मैं कामना करतीं हूँ इसी तरह दूर रहकर वे हमारा रास्ता प्रशस्त करतीं रहें, प्रेरणा देतीं रहें। 

Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

एक बनिया-पंजाबी लड़की की जैन स्कॉलर बनने की यात्रा

अभिनव इमरोज़ सितंबर अंक 2021