समय से मुठभेड़ करती कविताएँ: ‘सलीब पर सच’

समीक्षा

समीक्षक : हरिशंकर राढ़ी


पुस्तक: सलीब पर सच (कविता संग्रह)

कवि: सुभाष राय, 

प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर।

पृष्ठ:  112

मूल्य:  120/-(पेपर बैक)

पिछले पाँच दशकों में हिंदी ही नहीं, विश्व साहित्य में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह है साहित्य का जनोन्मुखी और जनसंवेदी होना। वह शब्द-लालित्य, भाव-चमत्कार, वैयक्तिकता और भोग-विलास से निकलकर आम आदमी की बात ही नहीं करने लगा है, उसे बहुत हद तक सजग और सक्रिय भी बनाया है। सदियों के विदेशी उपनिवेशवाद से उबरे पिछड़े देशों में साहित्य के इस बदलाव ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। यद्यपि यह परिवर्तन साहित्य की हर विधा में परिलक्षित होता है, किंतु काव्य ने अपना विशेष प्रभाव छोड़ा है। आज के तमाम काव्य-संग्रह जनसाधारण के सरोकारों के साथ मजबूती से खड़े दिखते हैं, सत्ता-व्यवस्था को चुनौती देते हैं और समतामूलम समाज का खाका खींचते हैं। ऐसे कविता संग्रहों में सुभाष राय के संग्रह ‘सलीब पर सच’ को विश्वासपूर्वक रेखांकित किया जा सकता है।

बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित इस संग्रह में पचास से अधिक कविताएँ हैं जो अपने समय से मुठभेड़ करती दिखती हैं। किसी लोकतंत्र में तंत्र का लोक से विमुख होना सबसे बड़ी त्रासदी है। जिन सपनों को लेकर जनक्रांति होती है, उनका एक के बाद एक करके राजनीतिक दलों द्वारा विछिन्न किया जाना किसी भी संवेदनशील मनुष्य को व्यथित कर सकता है, कवि तो संवेदनशीलता का मूर्तरूप ही होता है। उसका मन बेचैन होता है, आलोड़ित होता है। फिर जो शब्द निकलते हैं, वे केवल आम आदमी को सहलाते ही नहीं, सत्ता और व्यवस्था के लिए चुनौती बनकर खड़े हो जाते हैं। सुभाष राय के इस संग्रह में बहुत सी कविताएँ इसी दोहरी भूमिका में सशक्त ढंग से खड़ी नज़र आती हैं।

मोटे तौर पर कथ्य या विषयवस्तु की दृष्टि से इस संग्रह की कविताओं को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है - पहली श्रेणी में एक समतावादी संवेदनशील समाज की तलाश तो दूसरी मंे स्वयं की तलाश। कविता में इन दोनों तत्त्वों की उपस्थिति आवश्यक होती है। अपनी संक्षिप्त भूमिका में सुभाष राय कविता को समझने तथा परिभाषित करने की कोशिश करते हैं। अंततः निष्कर्ष रूप में वे लिखते हैं - ”मेरी नज़र में कविता मनुष्यता के पक्ष में एक ऐसी सशक्त आवाज है जो निरंतर विद्रूप को तोड़कर उस ज्यादा मानवीय और सुंदर बनाने का काम करती है या इस दिशा में लोगों को प्रेरित करती है।“

ऐसा लगता है कि पूरे संग्रह में कवि अपनी इस परिभाषा पर चलने की कोशिश कर रहा है। संग्रह की पहली कविता ‘मेरा परिचय’ में यह स्पष्ट दिखता है कि वह किसी मुर्दा भीड़ का हिस्सा नहीं है और न मानसिक रूप से मरे जनसमूह से उसे कोई प्रत्याशा है। उसे पता है कि जनसैलाब में कुछ ही चेहरे जिंदा होते हैं। वह कह उठता है - ”उनसे मुझे कुछ नहीं कहना/जो दीवारों में चुने जाने से खुश हैं/जो मुर्दों की मानिंद घर से निकलते हैं/बाजारों में खरीदारी करते हैं/और खुद खरीदे हुए सामान में बदल जाते हैं/घर लौटकर सजी हुई काफिन में/कैद हो जाते हैं चुपचाप......।“ 

सुभाष राय की सामाजिक सरोकार की कविताओं में एक विशिष्टता यह महसूस की जा सकती है कि वे विद्रूपताओं पर इस प्रकार से प्रहार करते हैं कि उनमें व्यंग्य की जगह दर्द उभरता है जो धीरे-धीरे विस्तार पाता जाता है। वहाँ प्रकारांतर से प्रश्न उभरता है कि हमने ऐसी ही राजनीतिक स्वतंत्रता, समानता और स्थिति के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी थी? क्या हम ऐसा ही भारत बनाना चाहते थे? इस संदर्भ में कविता ‘मुल्क का चेहरा’ का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है। वे लिखते हैं - ”मैंने एक संत की तस्वीर बनायी/मैं नहीं जानता कैसे वह पूरा होते होते/शैतान जैसी दिखने लगी/उसके चेहरे पर लालच है, क्रूरता है/मैं उसे देख बुरी तरह डर गया हूूँ।“ कहना न होगा कि जब संत की तस्वीर ऐसी हो सकती है तो बाकी हुक्मरानों की तस्वीर कैसी होगी। इसी कविता के अंत में मुल्क के चेहरे को लेकर जद्दोजहद बड़ी गंभीरता से उभरती है- ”मैं बनाना चाहता हूँ एक ऐसा चेहरा/जिसे मैं मुल्क कह सकूँ/जिसमें सब खुद को निहार सकें/पर बनता ही नहीं/कभी कैनवस छोटा पड़ जाता है/कभी पूरा काला हो जाता है/मुझे शक है कि मुल्क का चेहरा है भी या नहीं।“

इस क्रम में तमाम दर्दनाक विडंबनाएँ उतरती हैं। शहर तो शहर, अपनी सरलता, नैसर्गिकता और देशीपन के प्रतीक गाँव भी कम नहीं बदले हैं। ‘गाँव की तलाश’ में कवि गाँव के पुराने चित्र उभारता है, वहाँ की सामाजिक हवा को महसूस करता है किंतु उसे लगता है कि बिखराव बहुत आया है, टूटन बहुत हुई है और गाँव अपनी मौलिकता खोते जा रहे हैं। इस कविता की कुछ पंक्तियाँ ही बहुत कुछ कह जाती हैं - ”बच्चे खेलते नहीं, न ही शैतानी करते हैं/वे बोलने से पहले पढ़ना सीखने लगे हैं .....शहर बढ़ आया है गाँव तक/अपने छद्म, फरेब के साथ/मैं परेशान हूँ उस मिट्टी के लिए/जिससे मैं बना हूँ, जिससे मैं जिंदा हूँ।

क्रांति को लेकर यह कवि किसी भ्रम में नहीं दिखता। उसके लिए जिस ज़ज़्बे और हिम्मत की जरूरत होती है, वह सुविधाभोगी लोगों में कतई नहीं हैं। न जाने कितने छद्म बुद्धिजीवी क्रांति की बातें तो करते हैं किंतु मौसम प्रतिकूल होते ही गुफाओं-कंदराओं की तलाश में लग जाते हैं। इस पाखंड पर प्रहार करते हुए सुभाष राय ‘तलाश’ में कहते हैं - ”जब हवा शीतल हो, धूप मीठी हो/कोई भी क्रांति की कहानियाँ सुना सकता है/घर में लेनिन और माओ की तस्वीरें टाँग सकता है.....लेकिन जब मौसम बिगड़ता है/गिने-चुने लोग ही घर से बाहर निकलते हैं।“

संग्रह की अनेक कविताओं में वे संकेतों में कई तरह के लोगों को चपेट जाते हैं। संकेतों का सही चुनाव और शब्दों के उचित वजन से कविता स्मरणीय बन सकती है। इस कला में सुभाष राय परिपक्व दिखते हैं। ‘शिनाख्त’ से एक बानगी देखी जा सकती है- ”तुम्हें पहचान लिया गया है/तुम्हारी कटी उँगलियों से, तुम्हारे जहरीले रक्त से/तुम्हारी विदीर्ण आँतों से, तुम्हारे चीथड़े हो गए दिमागों से.....।“ जाहिर है कि कवि आतंकवाद के दंश से बहुत व्यथित है। वह आगे कहता है- ”हमने मनुष्यता के शब्द फेंके तुम्हारी ओर/ लेकिन तुमने उन पर दागी मिसाइलें.....“

कुछ कविताएँ तो ऐसी हैं जिनमें विद्रूपताएँ चहुँओर दिखाई देती हैं। इस संबंध में ‘अखबार’ कविता के माध्यम से दर्शायी गई विद्रूपताएँ किसी भी सामान्य जन को विचलित कर सकने में समर्थ हैं। वे लिखते हैं- ”जिस्मफरोशों के चंगुल से/छूटी लड़की थानेदार के हाथों में फँसी/लुट-लुटाकर भी चार हजार में बिकी..... लो साधु की कुटिया से/बरामद बच्चों की खोपड़ियाँ/एक साथ पुल से छलांग लगाने वाले प्रेमी युगल के क्षत-विक्षत शव...“

विडंबनाओं के प्रति कवि का असंतोष सीमित क्षेत्र में नहीं है। वह दायित्वहीन सत्ता और सांप्रदायिकता के विरुद्ध भी जमकर बोलता है किंतु इससे अधिक छटपटाहट इस बात को लेकर है कि हम अपने दायरे में इतने सिमट गए हैं कि विरोध और विद्रोह की भाषा ही भूल गए हैं। शब्दों का हमने ऐसा बेजा प्रयोग किया कि शब्द अपनी वास्तविक सत्ता एवं अर्थ खो चुके हैं। जब किसी समाज में शब्द अपनी अस्मिता खो दें तो इसे एक भयावहता के अतिरिक्त कुछ नहीं समझना चाहिए।

दूसरी श्रेणी, अर्थात स्व की तलाश करती कविताएँ हमें रुकने और सोचने पर मजबूर करती हैं। आत्मालोड़न, आत्मचिंतन के माध्यम से कवि क्षीण होती संभावनाओं, बिखरते रिश्तों और मूल्यहीनता की ओर अग्रसर मानसिकता का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। ऐसा लगता है कि कवि आत्मीयता से एक ऐसे प्रेममय संसार को देखना चाहता है जिसमें लोग सहज भाव से संबंधों को जी रहे हों। जहाँ वह ‘बुलावा’ से एकात्म संबंधों का प्रारंभ करता है, वहीं ‘तुम्हारा नचिकेता’ के बहाने पिता को इसलिए आभार ज्ञापित करता है कि आज वह जब भी संशय की स्थिति में होता है तो पिता ही उसे उबारते हैं- ”जब कभी आत्मीय प्रवंचनाएँ घेरती हैं मुझे/तुम्हीं मृत्यु से संवाद करने की शक्ति सौंपते हो/और मैं नचिकेता हो जाता हूँ।“

अनेक कविताओं में ऐसा महसूस होता है कि कवि बहुत गहराई तक उतरकर जीवन को समझना चाहता है। जीवन को समझने की उत्कंठा होगी तो प्रेम को समझना आवश्यक होगा, क्योंकि प्रेम के बिना जीवन हो ही नहीं सकता। संभवतः इसी तारतम्य में वह ‘प्रेम’, ‘मुझमें तुम नया रचो’, ‘अब सुनो तुम’ और ‘मेरा परिवार’ जैसी कविताएँ लिख जाता है। जीवन जीना है तो मृत्यु से संवाद करना, उससे लड़ना जरूरी है। उसका कहना है- ”मृत्यु के बगैर जीना संभव नहीं/जीने के लिए मरने की तैयारी बहुत जरूरी है।“

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो संग्रह की तमाम कविताएँ सच से संवाद़ करती हैं। सच के अपने आयाम होते हैं, और अपनी परिभाषाएँ। वैसे सच की परिभाषाएँ अलग-अलग होनी नहीं चाहिए, लेकिन यह विडंबना आज के समाज में कुछ ज्यादा ही दृष्टिगत हो रही है। सच को बार-बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है, कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। सदियों से सच को सलीब पर चढ़ता रहा है। सच पर झूठ और फरेब के बादलों का घेरा भी पड़ा है किंतु अधिकतर स्थिति में सच विजयी हुआ है। संभवतः यही कारण रहा है कि सच को सलीब पर देखकर भी निराशा नहीं होती। संग्रह का शीर्षक भी कुछ ऐसी ही मानसिकता की कविता ‘मरजीवा’ से उठाया गया है। मरजीवा उस उत्कट इच्छाशक्ति का प्रतीक है जो बारंबार प्रताड़ित होने पर भी, मरणासन्न स्थिति में जाने पर भी सच के लिए जीवित हो उठता है। इस उम्मीद को जिलाए रखते हुए सुभाष राय कहते हैं- ”कल फिर कोई निकलेगा/आदमी होने का एलान करते हुए/सच उजागर होने तक/बार-बार मरकर भी/ उठ खड़ा होगा मरजीवा।“

कवि सुभाष राय गाँव की मिट्टी से पैदा हुए हैं। उस मिट्टी की ताज़गी, सरलता, खुशबू और विचार संग्रह की तमाम कविताओं में देखे जा सकते हैं। भाषा और शिल्प के नाम पर कोई बनावट नहीं है। सहज मन से निकली हुई इस संग्रह की कविताएँ लालित्यपूर्ण दखल भले न रखती हों, चेतना को झकझोरने में समर्थ अवश्य हैं। संग्रह पढ़े जाने की माँग करता है।

Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

एक बनिया-पंजाबी लड़की की जैन स्कॉलर बनने की यात्रा

अभिनव इमरोज़ सितंबर अंक 2021