अहिल्या मिश्रा को जैसा मैंने देखा

 मंतव्य


सन्त समीर

वह 1 जून, 2019 का दिन था, जब हैदराबाद की धरती पर मैंने पहली बार कदम रखा। हवाई अड्डे से लेखिका उषारानी राव जब अपने साथ लेकर मुझे चलीं तो इस अचीन्हे शहर की गलियों से गुजरते हुए किताब के पन्नों से निकल मन के तल पर मोतियों, इमारतों, नवाबशाही से लेकर क्रान्तिधर्मा मख़दूम साहब की शायरी तक उभरने लगी। 

मिश्रित संस्कृतियों की रंग-बिरंगी विरासत सँभाले इस नायाब शहर में जब गन्तव्य पर पहुँचा तो सामने थीं कुछ-कुछ ऐसी ही मिश्रित संस्कृतियों की समृद्धि की परचम थामें डॉ. अहिल्या मिश्र। 

फोन पर वर्षों के आभासी परिचय का साक्षात् में बदलना आह्लादकारी था। अहिल्या जी के काम के प्रति सम्मान तो मेरे मन में बहुत पहले से था, पर दिलचस्पी इस बात में थी कि कैसे सुदूर उत्तर से दक्षिण में आकर हिन्दीप्रेमी एक स्त्री कई जरूरी गतिविधियों का केन्द्रबिन्दु बनी। अहिल्या जी से पहली मुलाक़ात ही प्रभावित कर गई। उनके नेतृत्व में कादम्बिनी क्लब की रजत जयन्ती का महत्त्वाकांक्षी आयोजन विविधताओं का एक ऐसा कोलाज था, जिसे देखकर मैं तय नहीं कर पा रहा था कि यहाँ साहित्य में सामाजिकता है या सामाजिकता में साहित्य। साहित्यिक आयोजनों में आम समाज आमतौर पर गायब मिलता है, पर यहाँ समाज और साहित्य, दोनों की मौजूदगी एक-दूसरे से बढ़कर थी। कई चुनौतियों के बीच उन्होंने एक शानदार कार्यक्रम आयोजित किया था। अहिल्या जी की ममतामयी दबंगई का यहाँ एक ऐसा चेहरा मैंने देखा, जो अन्यत्र दुर्लभ है। उनका हर आदेश उनके सहयोगियों के लिए सिर-माथे लगाने वाली बात थी। मैंने महसूस किया कि वे जरूरत पड़ने पर कैसे कभी भी किसी को डाँट पिला सकती हैं और उनकी डाँट को लोग भी प्रसाद की तरह ग्रहण कर सकते हैं। 

हर वय के साहित्यकारों और समाजकर्मियों को अहिल्या जी ने बड़े जतन से अपने साथ जोड़ा है। अहिन्दीभाषी दक्षिण में हिन्दी साहित्य को महज खानापूर्ति नहीं, बल्कि एक आन्दोलन की शक्ल उन्होंने दी है। प्रवासियों की एक बड़ी सङ्ख्या इस शहर में है, जो उनकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखता है। विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों से लेकर उनके हक की बाबत चर्चाएँ वे चलाती रहती हैं। दक्षिण और उत्तर, दोनों को जोड़े रखने के तमाम उपक्रम वे करती हैं। हर महीने साहित्य पर समयोचित जरूरी गम्भीर विमर्श और साहित्य के जरिये देश-समाज की चर्चा का उनका यह आयोजन दिलचस्प है। 2 जून, 2019 की उनकी हैदराबादी साहित्यिक गोष्ठी में जब मैं शामिल हुआ तो कुछ देर बाद ही अपनापे के उस माहौल ने मेरे मन में इलाहाबाद के दिनों की साहित्यिक गोष्ठियों की यादें जैसे ताजा कर दीं।

अहिल्या जी के लिए साहित्य शगल नहीं, बल्कि जीवनचर्या का जरूरी हिस्सा है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए एक बड़े दायरे में उन्होंने काम किया है। उनकी लेखनी की सीमा विधाओं की बाड़ को पार करती दिखाई देती है। उन्होंने कविताएँ लिखी हैंय कहानियाँ लिखी हैं, नाटक, समीक्षाएँ, लेख और संस्मरण लिखे हैं। और भी बहुत कुछ लिखा है। लगातार लिखती रही हैं। बड़ी बात कि उनके कहन में वैचारिक स्पष्टता है। वे गोलगोल घुमाने के बजाय साफगोई में विश्वास रखती हैं। उनके जवाब भी तीखे और साफ सवाल करते हुए एक स्पष्ट कार्यरूप का संकेत देते हैं। मसलन, दक्षिण भारतीयों के बीच हिन्दी प्रचार-प्रसार के अन्तर्विरोधों के सवाल पर वे उल्टा सवाल करती हैं कि क्या उत्तर भारत के लोग दक्षिण की कोई एक भाषा सीखने को तैयार हैं? इस जवाबी सवाल में वह जवाब मौजूद है, जो उत्तर और दक्षिण के बीच की गहरी खाई को पाट सकता है। हिन्दी बनाम अँग्रेजी के सवाल पर उनका मानना है कि मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू जैसी अन्यान्य भारतीय भाषाओं की समृद्ध शब्दावली ही हिन्दी की समृद्धि का असली आधार हो सकती है। वे आम बोलचाल की भाषा की हामी हैं। कठिन और अनावश्यक संस्कृत या अरबी-फारसी शब्दावली के बजाय गान्धी की हिन्दुस्तानी जैसी भाषा उन्हें हिन्दी के प्रसार के लिए ज्यादा सही लगती है।  

मैं कादम्बिनी में काम करता था तो कादम्बिनी क्लब के समाचारों के सिलसिले में फोन पर अक्सर उनसे बात होती थी। उनके जज्बे को महसूस करते हुए मुझे अजीब लगता था कि कादम्बिनी कार्यालय ही उनके काम को यथोचित सम्मान नहीं दे पा रहा है। डेढ़ दशक से वे लगातार क्लब का संचालन करती आ रही हैं। कादम्बिनी के बन्द होने की सूचना पर भी उनकी चिन्ता यही थी कि क्लब को कैसे जिन्दा रखा जाय। उनकी लगन ही है कि ‘पुष्पक’ नाम से हर साल वे एक विशिष्ट तरह की साहित्यिक प्रस्तुति जारी रखे हुए हैं। सही कहा जाय तो साहित्यकारों की एक भरी-पूरी पौध उन्होंने लगाई और उसे लगातार खाद-पानी दिया। 

मुझे लगता है कि एक स्त्री होकर हिन्दी के हक में जो जज्बा अहिल्या जी ने दिखाया है, उसे उस कद का सम्मान दिया जाना अभी बाक़ी है। हमारी सत्ता व्यवस्थाएँ छल-छद्म से दूर ऐसी शख़्सियतों को किस हिसाब से मान देती हैं, यह एक अलग सवाल है, पर अहिल्या जी को उनके चाहने वालों ने जरूर वह मान दिया है जो तमाम लोगों को तमाम कोशिशों के बाद भी मयस्सर नहीं होता। वे व्यक्तित्व की एक ऐसी वटवृक्ष हैं, जिसके तले सम्भावनाएँ कुम्हलाती नहीं, बल्कि एक नया आसमान छूने को आतुर होती हैं।

सन् 19ं96 में श्री प्रभाशंकर मिश्र मुख्य न्यायधीश आ. प्र. के साथ डॉ. अहिल्या मिश्र एवं अन्य 


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