निबंध का लालित्य: चाँदखोल पर थाप

 समीक्षा

हरिशंकर राढ़ी, बी- 532 (दूसरा तल), वसंतकुंज एंक्लेव  (बी ब्लॉक), नई दिल्ली 110070, मो. 9654030701

पुस्तक: चाँदखोल पर थाप (ललित निबंध संग्रह)

लेखक: राजमणि मिश्र

प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन, कृष्णा नगर, लखनऊ

पृष्ठ: 173 

मूल्य: 225/- 


संस्कृत में माना गया है कि गद्य कवियों की कसौटी है, अर्थात् गद्यलेखन एक दुष्कर कार्य है। कविता में छंद, गेयता और माधुर्य होता है, जिससे वह कर्णप्रिय एवं स्वतः कंठस्थ योग्य होती है। यह बात अलग है कि कालांतर में कविता भी इन तत्त्वों से वंचित होती गई और एक सीमा तक ऊसर होती गई। गद्य के प्रति एक सामान्य पूर्वाग्रह होता है कि यह सूखा और रसहीन होगा। अब यदि इसमें प्रवाह न हो, विचार-विमर्श न हो, चिंतन न हो और साथ में लालित्य न हो तो उसकी पठनीयता पर संकट खड़ा ही होगा।

हिंदी साहित्य में गद्यलेखन के प्रारंभकाल काल से ही निबंध लेखन की समृद्ध परंपरा रही है, मात्रा भले ही कम रही हो। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुबेर नाथ राय, विवेकी राय और श्याम सुंदर दुबे जैसे लेखकों ने निबंध को बहुत लोकप्रिय एवं आस्वादपूर्ण बनाया। निबंध जैसी ठोस विधा एवं प्रारूप में इन लेखकों ने इतना लालित्य भरा कि ऐसे निबंधों की एक अलग पहचान बन गई और आज ललित निबंध कमोवेश एक दुलारी साहित्यिक विधा है। इसके बाद ललित निबंध लेखन में कई नाम जुड़े और आज भी जुड़ते जा रहे हैं।

इधर राजमणि मिश्र का एक ललित निबंध संग्रह ‘चाँदखोल पर थाप’ हस्तगत हुआ। मैं राजमणि मिश्र के नाम से अभी तक अपरिचित था, किंतु परिचय-अपरिचय साहित्यिक रचनाओं का मानक नहीं हुआ करता। प्रथम दृष्टि में यह संग्रह प्रभावित करने में सक्षम लगा और जब इसमें समाहित ललित निबंधों से गुजरना हुआ तो कई बार बहुत मीठा या नाजुक एहसास हुआ। भाषा की सहजता, विचारों का परत-दर-परत खुलना, अतीत में ले जाना, झूले की भांति एक परिधि में कई आयामों को छूना तथा देशज गंध का आना-जाना संग्रह को पठनीय बनाता है। पचास के लगभग संग्रहीत निबंध विभिन्न विषयों एवं क्षेत्रों से संबंधित हैं।

‘चाँदखोल पर थाप’ शीर्षक एक मधुर संदेश प्रारंभ में ही दे देता है। चाँदखोल एक नाद वादयंत्र होता है जिसे पखावज या मृदंग भी कहा जा सकता है। भारतीय संगीत में इसका प्रयोग प्राचीन है। जहाँ एक ओर इसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत के लिए आदरपूर्वक किया जाता रहा है, वहीं अनेक क्षेत्रों में लोकसंगीत में भी एक अनिवार्य अंग रहा है। इस प्रकार चाँदखोल कई स्तरों से जुड़ा है। एक ओर लोकसंगीत के माध्यम से यह सहजता, सरलता एवं मिठास का प्रतिनिधित्व करता है तो शास्त्रीय संगीत के माध्यम से अनुशासन, चिंतन, तर्कपूर्ण आरोह-अवरोह और सुर (ज्ञान) की बारीकियों की ओर संकेत करता है। शर्त यह जरूर है कि वाद्य सुर और ताल में बजना चाहिए। यह विद्वता से देशज सहजता के बीच एक पुल का काम करता है जो इस संग्रह में मौजूद है। अधिकतर ललित निबंधों का यह चाँदखोल सुर-ताल में चलता है लेकिन कहीं कहीं गतिभंग और सुरभंग भी होता है।

संग्रह की भूमिका ‘लिखि कागद कोरे’ में लेखक अपने स्वभाव एवं निबंधयात्रा की पड़ताल करता हुआ कहना चाहता है कि छात्रजीवन में ही उसमें ललित निबंध के बीज पड़ गए थे। सृष्टि और समाज को मनुष्य प्रेमपगी नजरों से देखेगा, भावनाओं को उनसे जोडे़गा, किंचित विचार करेगा तो सहज भाव से ंजो गद्य निकलेगा वह ललित निबंध ही होगा। हिंदी-अंगरेजी साहित्य के तमाम निबंधों का अध्ययन करने के बाद राजमणि मिश्र को लगता है कि उनके जैसे व्यक्ति के लिए यही विधा सर्वथा उपयुक्त रहेगी।

विद्वता की बारीकियों से लिखा निबंध तब तक ललित नहीं हो सकता जब तक उसमें लोकजीवन तथा भाषा स्वाभाविक रूप से नहीं आ जाती। मिश्र जी ने ललित निबंधो की इस माँग को पकड़ा है और उसे विद्वज्जनों के साथ-साथ सामान्यजन को भी जोड़ने का प्रयास किया है। संग्रह से गुजरने पर लगता है कि लेखक बहुपठित है। हिंदी साहित्य के साथ उसे संस्कृत, शायरी साहित्य एवं लोकसाहित्य का भी अच्छा ज्ञान है। लगभग हर निबंध में वह प्रसंगानुकूल उदाहरण देता चलता है। संग्रह के पहले निबंध ‘वक्रचंद्रमा’ की पहली ही पंक्ति में लिखता है - ”बचपन के दिनों में दूज का चाँद मेरे घर के पश्चिमी बँसवाड़ी के फुनगियों के बीच से काफी प्रयास के बाद दिखाई देता था।“ इस पंक्ति में दूज, बँसवाड़ी और फुनगियों जैसे शब्द पाठक को उसके ग्रामीण अतीत में ले जाते हैं। जैसे ही ग्रामीण वातावरण उपस्थित होता है, पाठक स्वंयमेव प्रकृति, सरलता, निश्छलता और संबंधों के ममत्व से जुड़ जाता है और फिर आगे की यात्रा छाया और गुनगुनी धूप के बीच से होकर चलती है। इस आलेख में शिव के मस्तक पर विराजमान वक्रचंद्र की शोभा, उसके साहित्यिक आध्यात्मिक संबंध और शिव की स्वीकार्यता एक आनंददायक गुंफन में चलते हैं।

दूसरे निबंध ‘इस बार सेमल खूब फलेगा’ में लेखक ने सेमल के वृक्ष, उसके फूलों तथा पतझड़ में खड़े सेमल के ठूँठ का खूब शब्दचित्र खींचा है। दहकते फूलों वाला सेमल उपयोगी न होने पर भी मन को बहुत भाता है। सेमल के फूलों की अल्पजीवितता को लेकर मुहावरे भी बने हैं और कवियों ने भी प्रयोग किया है। शायद ही कोई होगा जो कबीरदास के उस दोहे को न जानता हो जिसमें वे संसार को सेमल के फूल के समान बताते हैं। राजमणि मिश्र उस दोहे का उल्लेख करने में नहीं चूकते।

कुछ निबंधों में लेखक ने अतीत के उद्धरणों को साधते हुए बहुत गंभीर संदेश भी दिया है, चिंतन भी किया है। ‘मौन’, ‘चढ़ो न दूजो रंग’, ‘मुक्ति’, ‘अपने ही रंग दीनी’, ‘चाँदखोल पर थाप’, माँ’ आदि निबंध ऐसे ही हैं। ‘मौन’ में बुद्ध और आइंस्टीन को उद्धरित करते हुए लेखक अच्छा संदेश देता है।

राजमणि मिश्र को संस्कृत की सूक्तियों या सूक्तिपरक श्लोकों, उर्दू शायरों के अशआरों तथा लोकजीवन की कहावतों का विशद ज्ञान है जिसके प्रयोग से वे अपने लेखन को स्पर्शी बना देते हैं। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि लोकजीवन की कहावतें कथ्य को प्रामाणिक सा बना देती हैं, और यह तथ्य इस संग्रह को आकर्षक बनाता है। भोजपुरी भाषी क्षेत्र का निवासी होने का पूरा लाभ वह अपने ललित निबंधों में उठाता है। निबंध ‘माँ’ में एक भोजपुरी कहावत - ‘सबके दुलार न महतारी के हुंकार’ के माध्यम से वे माँ पर लिखी सभी कविताओं का लगभग अतिक्रमण कर जाते हैं। ‘ताहि ऊपर ननदी के भइया’ जैसे प्रयोग के मोहक प्रेमाभिव्यक्ति के प्रतीक हैं जो प्रेम की खुली अभिव्यक्ति में मिल ही नहीं सकता। ‘सब रंग कच्चा, सांवलिया रंग पक्का’ तथा ‘सूरदास की काली कमरिया चढ़े न दूजो रंग’ जैसी कहावतें बहुश्रुत हैं जिनका प्रसंगानुसार प्रयोग करने में लेखक सतर्क है।

‘महुआ और माधवी’ निबंध में में लेखक ने महुआ को लेकर बहुत मीठी गंध प्रसारित की है। इस निबंध में वह एक परिपक्व ललित निबंधकार के रूप में दिखता है। ऐसा लगता है कि महुए की मादकता इस निबंध में पग गई है। बलिया के पं. सीताराम द्विवेदी द्वारा लिखित एवं मो. खलील द्वारा स्वरबद्ध प्रसिद्ध भोजपुरी गीत ‘छलकल गगरिया मोर निरमोहिया’ कौन भोजपुरी भाषी भूल सकता है? उसी गीत का एक अंतरा था - महुआ के कोंचवाँ मदन रस टपके, बहे पुरवइया सजोर निरमोहिया...। इस अंतरे का प्रयोग इस निबंध को अतिरिक्त मिठास देता है।

लेखक चिंतन, मिठास, जीवन से जुड़ाव एवं उपयुक्त भाषा की कड़ियाँ जोड़ने की कोशिश में प्रायः सफल हुआ है जिससे ललित निबंध पठनीय बन पड़े हैं। मगर कई जगहों पर कड़ियाँ छूटी हैं या कमजोर हुई हैं। सशक्त उद्धरणों के साथ कहीं कमजोर या अप्रासंगिक प्रयोग भी हुए हैं जिससे विचलन हुआ है। प्रूफ में गलतियाँ खटकती हैं, विशेषकर संस्कृत के उद्धरणों में वर्तनी का ध्यान रखा जाना चाहिए था।

राजमणि मिश्र का यह ललित निबंध संग्रह आश्वस्ति लेकर आया है। सामाजिक विमर्श, प्रकृति, नारी विमर्श, लोकजीवन, मानव स्वभाव एवं अनुभूतियों को कोमलता से पकड़ा है लेखक ने। चिंतन एवं प्रस्तुतीकरण में एक परिपक्व दृष्टि दिखाई देती है। कुल मिलाकर ‘चाँदखोल पर थाप’ की थाप कर्णप्रिय है, इसे सुनकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता। संभवतः अगली थाप ज्यादा संतुलित होगी।     


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