चुम्बकीय सक्रियता का पर्याय: डाॅ. अहिल्या मिश्र

 मंतव्य


डाॅ. सी.जे. प्रसन्न कुमारी, 
-गुरुग्राम

बिहार का जिला मधुबनी का अपना ऐतिहासिक महत्व है। यह जिला प्रख्यात साहित्यकारों एवं स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की जन्मभूमि हैं, कर्मस्थली भी। मधुबनी के सागरपुर गाँव के सकरी के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी स्वर्गीय रामानंद मिश्र की सुपुत्री डाॅ. अहिल्या मिश्र अब हैदराबाद और तेलुंगाना की सीमा पार कर सारे भारत के हिन्दी साहित्य संसार में अपना विजयध्वज फहरा रही हैं। देश विदेश में उनके साहित्यक अवदान एवं सामाजिक सेवा की धूम रच रही हैं।

पिछले पचास सालों से हैदराबाद को अपना आवास और कर्मभूमि बनाकर हिन्दी की अनवरत सेवा में रत अहिल्या जी हर साहित्यक हिन्दी शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकता के लिए एकदम अनुकरणीय हैं। बिहार की मैथिली मातृभाषावाली ये अब तेलुंगाना की सुपुत्री हैं। उन जैसी विदुषी की सेवा पाकर वहाँ के साहित्यकार एवं आम जनता स्वयं अपने को गौरवान्वित मानती हैं। बहुभाषा पारंगत अहिल्या जी मैथ मातृभाषा मैथिली के साथ बज्जिका, हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला और तेलुगू भाषा में विदुषी हैं।

बिहार में जन्मी, मैथिली में खिली अहिल्या ने विश्वभाषा अंग्रेजी को अपने कब्जे में कर लिया, राष्ट्रवाणी हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए साधनारत वे तेलुगु के प्रति मातृवाणी की सी ममता रखती हैं। एम.ए.ए एमफिल, पी.एचडी प्राप्त, उच्च शिक्षित इस महिला रत्न की जिन्दगी साहित्य सेवा एवं समाज सेवा के लिए स्वयं समर्पित हैं।

एक साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षा शास्त्री, हिन्दी प्रचारिका, सफल संपादिका, प्रबल प्रबन्धक, कुशल पत्रकार उनके नाम के साथ न जाने कितने अन्य अनगिनत सकारात्मक विशेषण हैं।

अहिल्या जी का सृजनात्मक व्यक्तित्व बहु-आयामी है। कवयत्री, निबन्धकार, नाटककार, उपन्यासकार संस्मरणकार, समीक्षक, संपादक के तौर पर उनकी साहित्य सेवा अतुलनीय है। सन् 1980 से सन् 2015 के बीच कवयित्री अहिल्या जी के चार संकलन निकले जो क्रमशः ‘‘पत्थर-पत्थर पत्थर’’ (1980) ‘कैकटस पर गुलाब’ (1989) ‘‘आखर अंतः दीप के’’ (2000) है। और ‘‘श्वांस से शब्द तक’’ (2015) हैं। उनका सद्य प्रणीन काव्य-संकलन ‘‘इस शहर के लोगों से’’ अब प्रकाशाधीन है। कवयित्री अहिल्या जी ने आँखें खोल कर समाज को देखा, परखा और कविता में उतारा जिसको प्रमाण हैं उनके सारे काव्य संकलन।

कहानीकार अहिल्या जी समकालीन विषयों पर अपनी कहानियों के जरिए हस्तक्षेप करती रहती हैं, उनके प्रकाशित कहानी संकलनों में ‘‘फांस की काई’’, मेरी इकावन कहानियों (2009) प्रमुख हैं, बहुचर्चित भी, अन्य कहानी संकलन- ‘‘धुंधुलका छाया रहा’’, ‘‘उल्कापान’’, ‘‘दरकती दीवारों से झांकती जिन्दगी’’ अभी प्रकाशित होने वाले हैं। उनकी कहानियों की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ‘फांस की काई’ कहानी संग्रह पर माखाड़ा विश्वविद्यालय औरंगाबाद है। और जयपुर विश्व विद्यालय, जयपुर से एम.फिल उपाधि प्रदत्त है। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा हैदराबाद की उच्च शिक्षा विभाग एवं शोध संस्थान से मेरी इकावन कहानियों में स्त्री विमर्श विषय पर एम.फिल शोध प्रबन्ध निकला है। डिग्री प्रदत्त है। वालटेयर विश्वविद्यालय से मेरी इकावन कहानियाँ के सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर पीएच.डी. शोधकार्य भी संपन्न हुआ है। यही नहीं डाॅ. अहिल्या मिश्र के साहित्यक देन पर भी उस्मानिया विश्वविद्यालय में शोध कार्य चल रहा है।

निबन्धकार अहिल्या जी की सृजन क्षमता निराली है। उनके निबन्ध मुख्यतः तीन कोटियों में रखी जा सकती हैं- स्त्री विमर्श सम्बन्धी, भाषा सम्बन्धी और संस्कृति सम्बन्धी। तीनों प्रकार के निबन्धों में उनकी प्रतिभा की चमक ज्यादा निखर उठनी है।

‘‘नारी दंश, दलन दायित्व’’(1992) इसका उत्तम निदर्शन हैं।’’ आधुनिकता के आइने में स्त्री संघर्ष उनके छः वर्ष के शोध के परिमाण स्वरूप प्राप्त रचना है जो अनेकों बार पुस्कृत भी है। उपयुक्त दोनों निबन्ध उनके स्त्री विमर्श सम्बन्धी निबन्धों का संकलन है। ऐसे निबन्धों के जरिए स्त्री की समस्याओं एवं हाशियेकृत जिन्दगी के शब्दबद्ध करने में वे सफल निकलीं। साँची कहूँ (2018), ‘‘बिहार सांस्कृतिक एवं साहित्यक विरासत’’, ‘‘मील का पत्थर’’ (2019), तेलुंगाना की साहित्यक सांस्कृतिक यात्रा आदि उनके सांस्कृतिक निबन्ध संकलन हैं तो ‘‘हिन्दी की विविध समस्याएँ एवं समाधान की संभावनाएँ’’ (2009) में उनके भाषा सम्बन्धी निबन्ध संकलित हैं। यात्राओं के अनुभवों को निबन्धों द्वारा पाठकों तक पहुँचाने में सिद्दहस्त हैं। लेखिका देश-विदेश की यात्रा को से प्राप्त अनुभव कभी यात्रावृतांत के रूप में पाठकों के सामने प्रकट होता है। ‘पुष्पक साहित्यकी में धारावाहिक रूप से उनकी यूरोप यात्रा’ यूरोप की सैर के बहाने प्रकाशित हो रहा है।

यादों को हमेशा ताजा रखनेवाली अहिल्या जी का प्रसिद्ध संस्मरण है ‘‘जिनको मैंने जाना’’। अपने जाने पहचाने व्यक्तियों पर लिखा यह संकलन एक अनूठा अनुभव है। एक तटस्थ समीक्षक अहिल्या जी ने ‘‘विद्यापति की पदावली को शैली का तात्विक अध्ययन, और ‘‘आलोचन शब्द एवं प्रवाह’’ शीर्षक समीक्षात्मक ग्रंथों में अपने समीक्षक व्यक्तित्व की गरिमा का प्रदर्शन किया है। ‘‘भारतीय नारी तेरी जय हों शीर्षक नाटक संकलन के प्रणेता में अपनी अहं भूमिका निभती रहती हैं। आन्ध्रा प्रदेश की हिन्दी महिला रचनाकारों की कृतियों का संकलन ‘संकल्पों के साये’’, ‘‘कथा सागर भाग’’ एक-दो (1992), तीसरी कक्षा की सामाजिक अध्ययन पुस्तक में पाठ लेखन संपादन (1999) आदि उनके संपादक व्यक्तित्व की बहुमूल्य देन हैं।

अहिल्या जी एक सफल तटस्थ पत्रकार हैं। महिला दर्पण, महिला सुधा का उन्होंने वर्षों तक संपादन किया। ‘‘नवजीवन’ पत्रिका की वे पच्चीस वर्षों तक संपादिका रहीं। जो उनके संपादक व्यक्तित्व की अनमोल देन है। हैदराबाद से निकलने वाली त्रैमासिक साहित्यक पत्रिका ‘पुष्पक साहित्यकी’ के वे संस्थापिका रहीं। अब भी प्रधान संपादिका के पद पर रह कर वे उसे प्रगति के मंजिल की ओर बढ़ा रही है। सहयोगी संपादिका अहिल्याजी का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं। हैदराबाद की मुख पत्रिका ‘‘विवरण पत्रिका में वे छः साल तक यानी 2011 से सन् 2017 तक सह संपादिका का कार्यभार संभाला। संक्षेप में उन्होंने कुल मिलाकर तीस पत्र-पत्रिकाओं एवं संस्मरिकाओं का संपादन करके संपादन-जगत की विजयसिद्ध महिला के उच्चतम शिखर पर आसीन हैं।

एक जनप्रिय वक्ता के रूप में विख्यात अहिल्या जी विभिन्न संगोष्ठियों पर अपनी आवाज बुलन्द करती हैं। वक्ता, अतिथि के रूप में, जो भी मंच हो कई कार्यक्रमों में निरन्तर भाग लेती रहती हैं। बिहार एसोसिएशन हैदराबाद, ब्रह्मर्षि सेवा समाज, संस्कृत अकादमी, पटना आदि ऐसे कुछ मंच हैं। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सैतीसवीं अधिवेशन (2018) के विशिष्ट अतिथि, इसी साल में केन्द्रिय हिन्दी निदेशालय एवं एम.ओ.पी. कालेज चेन्नई के संयुक्त तत्वावधान में, गाँधी जी के 150वीं. जन्म शताब्दी के सिलसिले में आयोजित संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि के रूप में उन्होंने जो भाषण दिया, वह बहुचर्चित रहा।

एक संस्थापिका एवं संयोजिका के रूप में अहिल्या जी की क्षमता बेमिसाल हैं। उन्होंने सन् 1994 में कादंबिनी क्लब हैदराबाद की संस्थापना की। तब से क्लब के अध्यक्ष पद अलंकृत करती रहती हैं। सन् 1994 शायद उनकी जिन्दगी का एक मील पत्थर रहा। उसी साल से वे आथर गिल्ड आफ इंडिया, हैदराबाद चैप्टर की अध्यक्षा बनकर कार्यभार पूरी आत्मीयता के साथ निभाती रहती हैं। हैदराबाद में स्त्रीलेखन निभाती रहती हैं। हैदराबाद में स्त्रीलेखन को प्रोत्साहन देने वाली साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति की सन् 2000 से वे अध्यक्ष पद अलंकृत कर रही हैं। महिला लेखन को प्रोत्साहन देने वाली इस समिति से सन् 2014 में अपने यात्रावृतांत ‘‘भारतीय अभियन्ताओं की स्वप्नभूमिं के लिए मैं भी पुरस्कृत हुई भी। अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, मध्य प्रदेश की महिला इकाई की अध्यक्षा अहिल्या जी कई देशीय, अन्तर्देशीय संस्थाओं की संरक्षिका और परामर्शदाता के तौर पर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहती हैं। बिहार एसोसिएशन हैदराबाद, ब्रह्मर्षि सेवा संगठन, भाग्यनगर कोवड सेवा संघ, देसिल बयना, साहित्य सेवा समिति हैदराबाद, रमादेवी गोयका पुरस्कार समिति बंगलूरु, मिथिला, साहित्य परिषद, हैदराबाद, मिथिला सामाजिक मंच हैदराबाद, आॅथर्स आॅफ इंडिया के हैदराबाद चैप्टर आदि ऐसी कुछ संस्थाएँ समितियाँ हैं।

एक उच्चस्तरीय प्रशासक एंव निदेशक की भूमिका भी वे अपने व्यस्त जीवन के बीच निभती रहती हैं। नवजीवन बालिका विद्यालय की प्राचार्या के तौर पर विद्यालय की प्रगति को अपना परम लक्ष्य घोषित कर उन्होंने संस्था को आगे बढ़ाया। नवजीवन वोकेशनल अकादमी, रामकोट, हैदराबाद की निदेशिका एवं नवजीवन मंडल की मानद महिला प्रशासक के रूप में अपनी प्रशासनिक प्रतिभा का परिचय देकर उन्होंने सबको अचंभित किया। केन्द्र सरकार के विविध मंत्रालयों के हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्या के रूप में उनकी सेवा अतुलनीय रही।

एक हिन्दी प्रचारिका एवं हिन्दी शिक्षिका अहिल्या जी पिछले 45 वर्षों से दस हजार आर्थिक दृष्टि से कमजोर अल्पशिक्षित बालिकाओं और गृहणियों को हिन्दी प्रचार सभा की परीक्षाओं में बिठाती रहती हैं। फिर उन्हें प्रशिक्षण देकर, शिक्षिका बनकर आजीविका के योग्य बनाकर महिला उत्थान का पथ प्रशस्त करती रहती हैं। ‘‘शिक्षा के जरिए महिला का उद्धार, महिला के जएि समाज का उद्धार’’ इस मूलमंत्र को आत्मसात करके आगे बढ़नेवाली अहिल्याजी को भारतीय महिलाओं को कीर्तिस्तंभ कहना कोई अनुचित कार्य नहीं।

अहिल्या जी समय समय पर अनेकों पुरस्कारों से विभूषित हुईं। कभी साहित्य की बहुमूल्य सेवा के लिए तो कभी सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर। सन! 1990 में माॅरीशस के राष्ट्रपति के समक्ष कंठ्यपाठ हेतु वे पहली बार सम्मानित हुई थीं। उनका सौभाग्य रहा कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. शंकरदयाल शर्मा के करकमलों से दो बार काव्य पाठ और संचालन हेतु सम्मान किया गया।

स्वर्गीय सुमन चतुर्वेदी पुरस्कार भारत भाषा भूषण सम्मान तुलसी सम्मान 2010, महादेवी वर्मा सम्मान, रत्नाकर सम्मान, आचार्य सम्मान, हिन्दी-उर्दू संगठन लखनऊ का साहित्य शिरोमणी पुरस्कार, दीर्घ हिन्दी सेवा के लिए 2017 का कश्मीरी सम्मान सन! 2019 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का सौहार्द सम्मान, सन् 2020 जनवरी 30 को नागरी प्रचारिणी सभा आगरा द्वारा दीर्घकालीन हिन्दी सेवा हेतु विशेष सम्मान आदि साहित्य जगत की अमूल्य देन के लिए प्राप्त अनगिनत पुरस्कारों में हैं।

विशिष्ट महिला सम्मान 2005, महिला रत्न सम्मान, सरदार पटेल सम्मान 2012, आदि उनमें कुछ है। 

आन्ध्रा प्रदेश अल्प संख्यक समिति ने वरिष्ठ महिला हिन्दी साहित्यकार सम्मान देकर उनका आदर किया। सरोजिनी देवी कुलश्रेष्ठ अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में वे पुरस्कृत हुईं। संपादन और साहित्य के क्षेत्र में दिये जाने वाला पुरस्कार जो कादम्बरी जबलपुर द्वारा प्रदत्त है, इक्कीस हजार रुपये का सम्मान 2015 को उनके पक्ष में आ गया था। सन् 2016 में तमिलनाडु साहित्य अकादमी के जीवनोपलाधि सम्मान से विभूषित अहिल्या जी सन् 2012 में अपने निबन्ध संग्रह ‘‘स्त्री संघर्ष’’ के लिए भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान द्वारा पुरस्कृत हुई थी। पटना का कथा सागर सम्मान 2013, प्राप्त अहिल्या जी को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करके उनके करकमलों से ‘शब्द-नगरी’’ के पम्पलेट का लोकार्पण कराया गया।

कई संस्थाओं ने पुरस्कार देकर सामाजिक कार्यकर्ता अहिल्या जी का आदर किया। सामाजिक कार्य के लिए, सरदार पटेल सम्मान 2012 से विभूषित अहिल्या जी को ‘पुष्पक साहित्यकी’’ त्रैमासिक के संपादन हेतु सन् 2013 में साहित्य मंडल श्रीनाथ द्वारा राजस्थान से ‘‘सम्पादक शिरोमणी सम्मान’’ से अलंकृत किया गया। 2016 में बिहार ऐसोसिएशन के नागरिक अभिनंदन भी के वे अधिकारिणी बन गयी।

अहिल्या जी की लोकप्रियता जनप्रियता एवं बहुआयामी आत्मीयता संपन्न व्यक्तित्व को सर्वमान्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनके सम्बन्ध में दो प्रशस्ति ग्रंथ स्त्री शालीकरण के विविध आयाम अहिल्या मिश्र के निमित्त’ (2004) और अहिल्या मिश्र कृतित्व से गुजरते हुए (2017) निकल चुके हैं। यही नहीं 2017-18 में भारतीय विद्या मंदिर और भारतीय संसद कलकता के त्रिदिवसीय सम्मेलन में सम्मानित भारत के दस हिन्दी सेवियों के बीच दक्षिण से इनका आदर किया गया। अखिल भारतीय भाषा साहित्य भोपाल का सर्वोच्च सरस्वती सम्मान’ सब उनकी व्यापक दीर्घकालीन सेवा के लिए समाज और साहित्य जगत के प्यार, ममता एवं मान्यता का दस्तावेज हैं।

मैंने कहीं उनका वाक्य पढ़ा था कि ‘‘उम्र कर्म निरन्तरता के लिए एक व्यवधान नहीं है।’’ यह अपनी जिन्दगी से उन्होंने इस तत्व की पुष्टि की है। अब जगदीश्वर से निवेदन है कि उनकी लेखनी हमेशा सक्रिय रहे, उस लेखनी से निकलने वाले बहुमूल्य मोती माँ भारती का कंठहार बन जाए। जनता और साहित्य जगत उससे लांभान्वित हो जाय।