डॉ. अहिल्या मिश्र का रचना संसार (प्रकाशित पुस्तकों में से चुनीं कविताएँ, निबंध, लेख, कहानियाँ एवं समीक्षाएँ)



 स्त्री सशक्तिकरण के विविध आयाम (2004) 

वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि


‘पत्थर - पत्थर - पत्थर‘ श्रीमती अहिल्या मिश्र की कविताओं का संकलन है। इस संकलन की प्रायः सभी रचनाएँ आज के समाज का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करती हैं। वैज्ञानिक युग की जितनी भी विशेषताएँ अथवा विकृतियाँ आज हमारे लोक - मानस को आलोड़ित- विलोड़ित कर रही है, उन सबका यथातथ्य अंकन इन रचनाओं में प्रचुर परिमाण में दृष्टिगत होता है।

स्वतंत्रता के उपरांत हमारे देश के प्रायः सभी अंचलों के सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवेश में जो परिवर्तन आया है, उससे साहित्य का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक सिद्धान्तों के समान साहित्यिक मान मूल्य भी आज परिवर्तित होते जा रहे हैं। पहले जहाँ छंदबद्ध कविताएँ रची जाती थीं, वहीं आज छंदविहीन कविताएँ लिखी जा रही हैं। श्रीमती अहिल्या मिश्र भी इस बीमारी से अछूती कैसे रहती ? उन्होंने भी अपनी भावनाओं का अंकन उसी छंदविहीन अतुकांत शैली में किया है।

इन रचनाओं में आज के मानव की विभिन्न मनोदशाओं का चित्रण कवयित्री ने अत्यंत स्पष्ट निव्र्याज भाव से किया है। पाठकों को इनमें जहाँ हमारे समाज में प्रचलित अनेक रूढ़ियों, विकृतियों और भावधाराओं का समूल उन्मूलन करने की चेतना के दर्शन होंगे, वहीं कवयित्री के नवनीत से कोमल तथा स्फटिक से अवदात व्यक्तित्व की झाँकी भी वे प्राप्त कर सकेंगे। इन रचनाओं में साधारण जनों की पीड़ाओं, अभावों और कुंठाओं का चित्रण पढ़कर पाठक का मन अत्यंत उद्विग्न और आतुर हो उठता है। कवयित्री की ये पंक्तियाँ हमारे इस कथन को पूर्णतः चरितार्थ कर रही हैं

कविते ! तू गंगा बन बह मेरे मन में 

नव विहान का वर दे मेरे जीवन में

मैं साधक, तू साधना मेरी 

अर्चना में जीवन अर्पित तेरी 

निष्ठा का बल लेखनी मेरी 

सत्यव्रत मसि है तेरी 

क्रान्तिगीत उद्घोषित कर मेरे आँगन में 

कविते ! तू गंगा बन बह मेरे मन में। 

क्रांतिगीत उद्घोषित करने की कवयित्री की यह भावना इस संकलन की अधिकांश रचनाओं में पूर्णतः मुखरित हुई है। सामाजिक अव्यवस्था और जीवन के प्रत्येक कार्य-व्यापार में परिव्याप्त विकृतियों के प्रति उसके मानस में जो विद्रोह मयी भावनाएँ हैं उनका चित्रण श्रीमती अहिल्या मिश्र ने जिस प्रकार किया है उसे देख-पढ़ कर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कवयित्री समाज की प्रत्येक घटना को एक व्यापार‘ मानती है। यदि ऐसा न होता तो वह यह कैसे उद्घोषित करती-

जीवन के खुरदरे रास्ते पर 

चलते जाना आसान नहीं दोस्त ! 

कहीं साँस बिकती है, कहीं लाश 

व्यापारी हैं जो जग में 

खरीदते हैं वे हर पल पैसों के बल 

जमीर क्या चीज है ?

आत्मा भी बेची-खरीदी जाती है। 

आत्मा को खरीदने-बेचने की यही प्रक्रिया आज समाज में इतनी तेजी से प्रचलित है कि बहुत प्रयास करने पर भी हमें कहीं ‘आदमी‘ ढूँढ़ने से नहीं मिलता। कवयित्री ने अपनी ऐसी भावनाओं को एक रचना में इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-

हमने तो बाँध लिया है सर पे कफन यारो 

अब तो कुछ-न-कुछ कर जाएँगे 

एक उनींदी-सी सुबह को 

मेरे मन ने एक सवाल किया 

अगर कुछ करना चाहते हो तो 

पहले खोज निकालो 

एक अदद आदमी 

फिर क्या था 

चल पड़े इस नए सफर पर

सबसे पहले पड़ोस का दरवाजा खटखटाया 

सामने एक मधुरिम हास लिए 

महाशया, 

मैंने पूछा- यहाँ कोई आदमी होगा 

उससे मेरा परिचय करवा दीजिए 

उन्होंने भंग भृकुटि डाल देखा। 

और, और भड़ाक की आवाज से 

दरवाजा बंद कर लिया 

कोरे बुद्धू की तरह मैं 

टुकुर-टुकुर देखती रह गई 

मन में फाँस-सा चुभा असर हुआ 

(पाँवों से) लंगड़ाती-सी आगे बढ़ी 

(ऊहापोह)...! 

किसके दरवाजे खटखटाऊँ ?

जहाँ से पा जाऊँ केवल आदमी, आसानी से। 

आदमी खोजने की इस जुस्तजू में कवयित्री इतनी उद्विग्न हो गई है कि उसे बहुत खोजने पर भी निराशा ही मिलती है। उसके सामने समाज में होने वाली अनेक घटनाएँ चलचित्र के समान आती-जाती हैं और वह यह लिखने को विवश हो जाती है

आज का मानव 

चुपचाप-सा क्यों हो गया है ? 

अरे जानते नहीं तुम ? 

उसकी मानवता खो गयी है। 

विज्ञान की इस दौड़ में 

वह सूरज को भी डुबो गया है। 

अरे ! क्या कहते हो ? 

चाँद-तारे भी सो गये हैं 

पृथ्वी पर मचा है हाहाकार 

प्रलय के झंझावातों का।

ग्रहों के मोल को 

उपग्रह की नवीनता में पिरो दिया गया है। 

सुख-विलास के ऐश्वर्य में 

आत्म-शान्ति की चेतना सो गयी है। 

अध्यात्म की परिपक्वता कहाँ ढूँढे ?

जब सच ही लुप्त हो गया है। 

वैज्ञानिक प्रगति ने मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों से जैसे किनारा ही कर लिया है। कवयित्री को समाज में कहीं भी ऐसा वातावरण सुलभ नहीं हो पाता, जहाँ वह पल दो पल के लिए ही सही आत्म-शांति का अनुभव कर सके। यहाँ तक कि उसकी भावनाएँ अपनी प्रतिक्रिया इस प्रकार व्यक्त करती हैं-

न तो शृंगार पर लिखा, न अभिसार पर लिखा है 

न तो स्वीकार पर लिखा, न शब्दों के भ्रम जाल पर 

न तो इन्कार पर लिखा, न विरह, व्यापार पर लिखा 

मैंने तो दहकते शोलों के अंगार पर लिखा है 

मैंने तो केवल जलते अंगार पर लिखा है 


दहकती हैं जहाँ अभाव में साँसें 

बहकती हैं जहाँ पैसों की आड़ में साँसें 

बिकती हैं जहाँ दूध के लिए माँ की आसें 

उठती हैं जहाँ पैसे (लक्ष्मी) व्यभिचार की पाशें 

मैंने तो दुनिया के बाजार पर लिखा है

मैंने तो केवल जलते अंगार पर लिखा है। कवयित्री ने नारी-जीवन की इन विकृतियों-विवशताओं पर जो चोट की है वह हमारे समाज को सोचने तथा समझने की ऐसी सामग्री प्रदान करती है, जिससे वह आज के वातावरण में सुधार करने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। दहेज आदि अनेक कुरीतियों के कारण भारतीय नारी कैसी-कैसी विषम तथा नारकीय यंत्रणाओं का शिकार हो रही है, यह हमारे लिये कलंक की बात है। कवयित्री को सब ओर इस प्रकार के वातावरण का कुटिल अनुभव होता है, अन्यथा वह यह लिखने को क्यों विवश होती-

बदलती परिधि, बदलते आयाम 

समझ नहीं पाती क्या , इनको नाम ? 

चक्रव्यूह की नव नूतनता 

लिख रही है अब तो 

भीष्म, द्रोण और दुर्योधन का फिर नाम 

शकुनियों से जग भरा पड़ा है 

मूढ़ युधिष्ठिर खोज रहा है

आज नए कृष्ण बे-नाम। 

कवयित्री अहिल्या की इन रचनाओं में सामाजिक विषमताओं, विडंबनाओं, विकृतियों और कुंठाओं का चित्र जिस दो टूक शैली में उकेरा गया है उससे कवयित्री के साहस की दाद देने की इच्छा होती है। इतनी निर्भीकता और स्पष्टवादिता का साहस वास्तव में यदि हमारे देश की प्रत्येक महिला में आ जाए तो निश्चय ही यह वातावरण परिवर्तित हो सकेगा। यही कारण है कि अपनी ‘शब्दों का सौदागर‘ शीर्षक रचना में कवयित्री ने अत्यंत स्पष्टता से यह घोषणा की है

आजकल औरों की तरह बोलने लगी हूँ मैं 

जुबाँ के बंद ताले खोलने लगी हूँ मैं 

जी हाँ हुजूर अब तो बोलने लगी हूँ मैं 

शब्दों की गुफाओं में अपने को तोलने लगी हूँ मैं 

मेहरबानी करके ध्यान रखिएगा 

मैं कोई ताजे अखबार का पन्ना नहीं 

चाय के कप के साथ ही जिसमें छपे 

खून/डकैती/बलात्कार/दुर्घटना 

आप सब सुड़क जाएँगे 

कोई कोना चाटे बिना हाथ से नहीं छोड़ पाएँगे 

और चटखारे भर-भर कर अपने ऑफिस के दोस्तों को सुनाएँगे, 

और न तो मंत्री या समाज-सेवी के 

उद्घाटन समारोह का ब्यौरा हूँ मैं, 

जिसमें नजरें गड़ाकर आप 

अपने लिये कुछ विशेष ढूँढ पाएँगे।

शब्दों के गढ़ का पहरुवा हूँ मैं ! 

हाँ जी, इसलिए मुँह खोलने लगी हूँ मैं। 

अजी, एक बात और सुन लीजिए 

मैं कोई प्रेम-कविता नहीं

जो सबों के लिए केवल सपने बुने 

और उसमें डूबकर 

आप भी अपने लिए कोई सपना चुने। 

ताजमहल की या मुमताज की खैरख्वाह नहीं हूँ मैं

पत्थरों की सख्ती की बनी मीनार हूँ मैं। 

‘पत्थर-पत्थर-पत्थर‘ की कविताएँ वास्तव में जहाँ समाज की विद्रूपताओं पर करारा व्यंग्य करने में पूर्णतः सक्षम हैं, वहीं उनमें कवयित्री के नारी सुलभ मार्दव का अत्यंत अनुभूतिमय एवं स्नेह-संवलित चित्रण भी दृष्टिगत होता है। काश हमारा समाज कवयित्री की इस मूल भाव-धारा को समझकर अपने दैनिक कार्य व्यापार में कुछ परिवर्तन ला सके। इन रचनाओं की मूल भाव-भूमि यद्यपि ‘वज्रादपि कठोर‘ अवश्य है, किंतु इनमें ‘कुसुम-जैसी मृदुता‘ भी प्रचुर मात्रा में विद्यमान है।

कवयित्री के मानस में अपने समाज के शोषित, दलित, पीड़ित तथा आहत प्राणियों का उद्धार करके उनके प्रति मानवोचित सहज संवेदना एवं अनुभूति जगाने की जो ललक है उसे देखकर उसके उज्ज्वल भविष्य का अनुमान होता है। यद्यपि इन रचनाओं में यत्र-तत्र भाषा का अनगढ़पन, भावों की अपरिपक्वता और शैली की विशृंखलता अवश्य परिलक्षित होती है, किंतु उद्देश्य की सार्थकता और लक्ष्य के प्रति कुछ कर गुजरने की अमिट साध इनमें प्रचुर परिमाण में विद्यमान है। कवयित्री अपने उद्देश्य की पूर्ति में सर्वतः सफल होगी, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है। मैं उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।       

-आचार्य क्षेमचंद ‘सुमन’

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पत्थरों में फूल खिलाने के लिए

डॉ. अहिल्या मिश्र से मैं हैदराबाद की किसी साहित्यिक गोष्ठी में मिला था। कमल जी भी साथ थे। उनकी कोई पुस्तक ‘पत्थर‘ विषय से जुड़ी हुई थी। मैंने तब कहा था- “आप पत्थरों में फूल खिलाने के लिए काव्य-सृजन करती हैं जो अद्भुत कला है। उसके बाद मेरा संपर्क उनकी रचनाओं से तो यदा-कदा जुड़ा, किंतु स्पाइनल कॉर्ड के ऑपरेशन के दौरान दो वर्ष तक भयंकर व्याधियों के कारण स्मृतियाँ क्षीण होती गईं।

अलबत्ता वे श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर सृजन-साधना में संलग्न रहें तथा नए कीर्तिमान स्थापित करें। राम की अहिल्या की अपेक्षा, तीस वर्ष तक इंदौर में शासन करने वाली देवी अहिल्याबाई होलकर का अनुसरण करेंगी तो स्त्री-सशक्तीकरण को बल मिलेगा। 

- डॉ. श्यामसिंह शशि 

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रूढ़ियों की पीठ पर चाबुक

डॉ. अहिल्या मिश्र एक साहित्यिक, सांस्कृतिक उद्दीपन से युक्त हैं। जिसमें समाज के संस्कार परिष्कार और नव-निर्माण की अदम्य ललक और क्षमता है। अहिल्या मिश्र एक अत्यंत प्यारा-सा नाम जो विद्रोह, संघर्ष, साहस और संकल्पधर्मिता की दृष्टि से स्व. सुभद्रा कुमारी चैहान की याद दिलाता है। कवयित्री में विरोधों का अद्भुत समन्वय है। बर्फ की शीतलता, अग्नि की दाहकता, पवन की वेगवत्ता, नभ की विराटता, धरती की विशालहृदयता तथा जल की निर्मलता यदि इन सबको एक स्थान पर इकट्ठा किया जाए तो जो साहित्यिक रूप आकार लेगा वह निश्चित रूप से डॉ. अहिल्या मिश्र का ही होगा।

अहिल्या मिश्र में एक विद्रोहिणी नारी रहती है, जो कबीर की भाँति रूढ़ियों की पीठ पर चाबुक बरसाती है, एक संयमित तूफान बसता है, जो नाश और निर्माण की विवेकपूर्ण आँखों से यथायोग्य व्यवहार करता है। एक शाकाहारी सिंहनी सजग है जो शब्द-संधान की कला में निष्णात हैं। निबंधकार, नाटककार, कहानीकार और प्रबद्ध कवयित्री डॉ. अहिल्या मिश्र को अनेक शुभशंसाएँ, साधुवाद और शुभकामनाएँ।        

-डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

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सहज भाषा में पर्याप्त गहराई

डॉ. अहिल्या मिश्र के गीतों से मैं भली भाँति परिचित हूँ। हिंदी में जब गीति काव्य की विधा लगभग समाप्त हो रही है अथवा उस पर प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं तब जो भी कवि गीति काव्य लिखने का प्रयास करे, स्वागत के योग्य है।

डॉ. अहिल्या मिश्र का संग्रह ‘आखर अंतःदीप के चार खंडों में विभाजित है। पहला समस्या गीत, दूसरा भावगीत, तीसरा देशगीत और अंतिम शृंगार गीत। इस विभाजन रेखा से बहुत सी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। सभी गीतों को पढ़ने के बाद लगता है कि लेखिका के मन में आकुलता और छटपटाहट है और जब और कोई आयाम सामने दिखाई नहीं देते तब वे गीतों के माध्यम से ही स्फुटित हुए हैं। भवानी प्रसाद मिश्र की एक लोकप्रिय कविता है- ‘मैं गीत बेचता हूँ‘। भवानी प्रसाद मिश्र के गीत जैसी गहराई डॉ. अहिल्या के गीत में तो नहीं है, लेकिन मिश्र जी के बहुत पास पहुँचने का अंदाज अवश्य है। एक कविता है न हमने गीत बेचे हैं‘, इसकी कुछ पंक्तियाँ देखिए

न हमने गीत बेचे हैं 

न हमने साज बेचे हैं 

हमने तो बस केवल

गीतों के अंदाज बेचे हैं। 

गीतों का अंदाज वही दे सकता है, जिसमें गीतों की समझ हो और बेचैनी की इतनी गहन तीव्रता हो कि यदि वह अभिव्यक्त न की जाए तो कैंसर भी बन सकती है। लेखिका ने अपने पाठकों को कैंसर ग्रस्त होने से बचाया है, यह मैं उनकी बहुत बड़ी सफलता मानता हूँ।

आगे के गीतों में देश प्रेम की अटूट भावना है, राजनीति जहाँ देश को तोड़ती है वहाँ सृजनशील काव्यकार व्यक्ति, समाज और देश को जोड़ने का काम करता है। द्रष्टव्य है:

मेरे भाई 

विश्वासों के खेत में 

जहर के बीज 

क्यों बोए जाते हैं ?

यह सीधा सवाल सत्ता के सामने है जिसने सांप्रदायिकता, जातिवाद और क्षेत्रीयता को जन्म देकर इस देश में प्रश्न चिह्न लगा दिया है। इस प्रश्न चिह्न का उत्तर कवयित्री ने दिया है- ‘मेरा देश महान कहाँ है ?ध्टुकड़ों में बँटा हिंदुस्तान यहाँ है‘। निश्चय ही यह समय आ गया है कि कवि को बेबाक खड़े होकर अपनी आवाज उसी तरह उठानी होगी जैसे कभी माखन लाल चुतर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चैहान, रामधारी सिंह दिनकर ने उठाई थी। अहिल्या मिश्र के गीतों में अपार विश्वास है और मैं आशा करता हूँ कि यदि यह विश्वास खंडित नहीं हुआ तो वे भविष्य में एक इतिहास अवश्य बनाएँगी।

अहिल्या मिश्र के गीतों की विशेषता यह है कि अत्यंत सहज और सरल भाषा में उन्होंने जो कुछ लिखा है, उसमें पर्याप्त गहराई है। भाव, भाषा और अभिव्यक्ति संपूर्णतः परिपक्वता की ओर पहुंच रहे हैं। यह प्रयास अपने आप में स्तुत्य है और इस बात का संकेत देता है कि लेखिका हिंदी काव्य जगत में अपना अलग स्थान बनाएगी।

डॉ. अहिल्या मिश्र देश, समाज और अनेक समस्याओं को उजागर करते हुए भी शृंगार और प्रेम के चित्रण में भी पीछे नहीं हैं। मैंने हमेशा प्यार को जीवन का श्रेष्ठतम तत्व माना है, प्यार के बिना क्या दिन, क्या रात, क्या साँस और क्या बेसाँस। जीवन रोते हुए आया है और दूसरों को रुलाते हुए जाएगा, इसके बीच की जिंदगी जितनी भरपूर जी जा सके, जीने का प्रयत्न करना चाहिए। लेखिका के शब्दों में:

खुद परेशां हूँ दिल के हाथों सदियों से 
चैन से जीने की जरूरत नजर नहीं आती।

जिसने अपना दिल ही बेच दिया हो वह चैन से कहाँ रहेगा, उसे चैन से जीने की बात सोचनी ही क्यों चाहिए, भरपूर प्यार से जियो उसमें जो तड़प और कसक मिलेगी वह तो सड़कों पर घुमाएगी, आसमानों में उड़ाएगी और समुद्र में लहरों के साथ हिचकोले खाएगी। 

मेरी अनेक शुभकामनाएँ है कि डॉ. अहिल्या मिश्र इस संग्रह के माध्यम से एक नए तेवर के साथ हिंदी काव्य जगत में उभर कर सामने आएँ।       

- डॉ. राजेंद्र अवस्थी 

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ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के कार्यक्रम में डाॅ. शिवशंकर अवस्थी, प्रो. आर.के. मिश्रा के साथ डाॅ. अहिल्या मिश्र