मात शारदे का चरण स्पर्श कर बनी अहिल्या

 मंतव्य


हर्ष कुमार हर्ष, 781 एस.एस.टी. नगर, पटियाला (पंजाब)
मो. 09316227766, 09464470217

जीवन के प्रथम सोपान पर अल्हड़, उत्साही एवं कर्तव्य-पथ पर आँखें भींच लेने वाली सहज-सरल किशोरी, जो कभी समाज में व्यवहारिक ज्ञान से अनभिज्ञ, अनजान और अनाड़ी-सी लगती थी। जल्दी ही सामाजिक संगठनों, महिला मंचों की स्थापना कर नारी उत्थान, नारी शिक्षण एवं उसे आत्मनिर्भरता प्रदान करने वाली देवी तुल्य निश्चय की दीवार बनकर समाज के सामने खड़ी हो गई। साहित्य की अतल गहराइयों में उतर कर विश्लेषण करना तो उसे जन्म-घुट्टी में ही पिला दिया गया था। शब्द-शिल्पी, बातों की धनी, भाषाओं की जादूगर, वक्तव्यों में प्रवीण, बुद्धि-स्तर को पहचानने वाली बुद्धिजीवी, लेखन की रसिया, अध्यापन में गुरु जानी जाने वाली डॉ. अहिल्या भले ही हैदराबाद में स्थापित हो गई। तथापि इसका व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व हिंदी भाषा के क्षेत्र में समय की पहचान बन गया। 

इनका कर्मठ व्यक्तित्व आज भी अपनी मातृ-भूमि की अगरु-गंधें नहीं भूल पाया। अपनी जन्म-भूमि बिहार से 2000 किलोमीटर की दूरी पर हैदराबाद में बैठी हुई अहिल्या अपने बाल्यकाल की सुखद-स्मृतियों को दोहराते गर्व अनुभव करने लगती है। वह अतीत की यादों को अमरत्व प्रदान करती हुई सी भासती है। राम करे प्रत्येक भारतीय की आत्मा ऐसा अनुभव करे।

आदिकाल की मिथिला, अंगदेश, मगध, वैशाली, लिच्छनी, कुरू, कोश, पुण्डू इत्यादि प्रादेशिक नामों को ही आज बिहार के नाम से जाना जाता है। बिहार शब्द विहार से आगे बढ़ा है, अर्थात् वह स्थान जहाँ बौद्ध-विहारों का बाहुल्य पाया जाता है। अहिल्या जी के जीवन में बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की सांस्कृतिक धरोहर, संस्कार, परंपराएँ, धार्मिक एवं राजनीतिक विरासत एक कुशल सैनिक का कवच बनकर लिपटी पड़ी हैं। संभवतः यही भेद है इसकी चाणक्य बुद्धि का।

एम.ए. एम.फिल. पी.एच.डी. एम.एड. की डिग्रियाँ लेकर एक प्रतिष्ठित बालिका विद्यालय में प्राचार्य, मानद प्रशासक और निदेशक के पद पर आसीन रहे व्यक्तित्व के कर्तृत्व पर लिखना, एक चिराग द्वारा रवि किरणों का विज्ञापन देने के समान है। अथवा यूँ कहें कि मेरे भाग्य-किवाड़ खुल गए जो मुझे इस लेखन के योग्य समझा गया। क्योंकि स्वयं अहिल्या जी के ढेरों निबंध-संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं। कितने ही समीक्षात्मक सम्पादन कर डाले, कितने ग्रंथों, अलग-अलग विचार धाराओं वाली कितनी पुस्तकों को अनूदित कर दिया। करती भी क्यों नहीं? प्रकाश स्तंभ है तो मार्ग-प्रशस्त तो करेगा ही। बंद कोने में जलते चिराग को दीपशिखा कौन कहेगा? उसका अस्तित्व ही क्या है? दीपक खुले में जलता है, जन-मन को ज्योति प्रदान करता है। हवा ही तो दीपक को जिंदा रखती है। फिर डॉ. अहिल्या तो एक चैमुखिया दीपक है, जो चैराहे में जलते हुए चारों दिशाओं को आलोकित करता है। अर्थात् अहिल्या जी अपने ज्ञान, अनुभव, अध्ययन और आश्वस्त मार्ग-दर्शन से अपने सम्पर्क में आने वाले कर्मठ छात्रों, विद्वजन को सत साहित्य के माध्यम से सच्चिदानंद बना देने की योग्यता रखती हैं। पारस की तरह लोहे को स्वर्ण बना देने में सक्षम। एक बात बड़ी स्पष्ट है कि पौधा वही पनपता है जिसके नसीब में 

धूप रहती है छाया में पलने वाला पौधा अधिक नहीं पनपता। आप मेरा आशय समझ गए होंगे, सोना कुठाली में तपकर ही कुंदन बनाता है। सच्चाई यह भी कि एक विस्तृत पेड़ ही समाज की धूप ग्रहण कर बदले में शीतल छाया बाँटा करता है।

आप सत्य के कर्मक्षेत्र से जुड़ी रहीं। आपको खाली बैठना नहीं भाता। उदाहरण सामने है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम स्वयं को सेवा मुक्त हुआ कब मानते थे? सच्चे कर्मनिष्ठ व्यक्तित्व को आयु की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। वह तो मार्ग दर्शक होता है, जो समाज के जीवन की कच्ची पगडण्डियों को राजपथ में बदलने का दम रखता है। आप की दम्भ-रहित छवि किसी भी जिज्ञासु को अपनत्व के रक्षा-सूत्र से बाँध लेने में सक्षम रही है। आपके मन में भारत को सदा एक विकसित देश और राष्ट्र-भाषा को पूर्ण रूप से समृद्ध और घर घर की भाषा-बोली के रूप में देखने की ललक बनी रही है।  

आपका माखन जैसे तन, मिस्री का सा मन और नयनों में विवेक इसलिए बना रहा कि आप सदा सात्विक भोजन ग्रहण करती रही हैं। गरिष्ठ भोजन अथवा खट्टे-मीठे व्यंजन आपको कभी लुभा नहीं पाए। आपने सहज भाषा-भूषा में रहकर जो बड़े-बड़े सपने पाले थे, वे सभी सोपान सिद्ध हुए। सच्च भी है ऐसे निद्र्वंद्व व्यक्तित्व की मनोकामना सदा पूर्ण होती रही है। क्योंकि आपके सपनों का कोई ध्येय होता है, उनमें कोई उद्देश्य रहता है, जो अंततः आपका आदर्श बन जाता रहा। सम्भवतः आपने अपने बाल्यकाल से ही सदा उदाहरण बनना सीखा था, अनुकरण करना तो सीखा ही नहीं। आपने झूठी तारीफों का चश्मा न तो कभी स्वयं पहना और न कभी किसी को भेंट ही किया। आप अपना स्वाभिमान बनाए रखने में सदा सक्रिय रही हैं। 

डॉ. अहिल्या ने कभी अपने स्वछंद चिंतन को किसी स्वर्ण पिंजरे में पराधीन नहीं होने दिया। आपके मुख मण्डल पर एक अलौकिक चमक है, आपका व्यक्तित्व प्रातःकालीन पक्षियों का कलरव गान सुनकर मोहित हो जाने वाला बना रहा है। जीवन में कभी बाल्यकाल को स्मरण करके कुहासा छाने लगे, तो माता-पिता, गुरुजनों व अन्य संबंधियों की शिक्षाओं-नसीहतों को दुहाराते ही किसी दिव्य प्रकाश की किरणें आपका मार्ग-दर्शन करने हेतु उपस्थित हो जातीं। आपको मधुमास बनकर जीने के आनंद की अनुभूति से भर देतीं।

साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करके इस समाज सेविका ने मात शारदे के पाट-रेशमी आँचल को कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, समीक्षा, सम्पादन, पत्रकारिता एवं प्रशस्ति-ग्रंथों रूपी जरी-जड़ाऊ फूल-लताएँ काढ़ कर सजाया है। जिसके बदले माँ सरस्वती ने इसके पल्लू में अमूल्य एवं भरपूर उपहारों, पुरस्कारों और सम्मानों को बाँधकर संतुष्ट कर दिया। आपको भारतरत्न अटलबिहारी वाजपेयी, पद्म विभूषण गोपालदास नीरज, बाल कवि बैरागी, राजकिशोर पाण्डे, डॉ. इंदु वशिष्ठ. डॉ. विष्णु स्वरूप, महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री, इत्यादि विशद विभूतियों का सान्निध्य उनकी शुभ इच्छाओं के पुष्प-गुच्छ के रूप में प्राप्त रहा।

डॉ. अहिल्या मिश्र के कर्मठ जीवन में श्रीगीता-उपदेश का मर्म, रामायण का पर्याय और सकर्मक यश हिलोरें लेता रहा है। यही आपके मन-मस्तक में युगद्रष्टा बनकर जीने का अर्थपूर्ण आधार बना रहा। आपने अपने सात्विक विचारों के प्रतिपादन (लेखन) से समाज एवं नवोदित लेखकों को पल-पल युक्ति-कौशल की सीख दी है। स्पष्ट है कि आप कभी बहानाबाजी नहीं सीख पाई। क्यों कि आप तो- 

"बिल्ली की चैकीदारी में दूध

जमाना सीखी थी।

लालटेन ले चलना सीखी, सूरज की

किरणें बन आई।"

अहिल्या जी जिन निति-नियमों, धार्मिक मर्यादाओं एवं आदर्शों में बँधकर, जिस प्रकार का सहज-साधारण एवं श्रमपूर्ण जीवन-यापन कर रही हैं, वे व्यक्ति को हजारों वर्षों तक जीवंत रखने में सहायक होते हैं। आप तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के आदेशों, उपदेशों एवं आदर्शों से प्रभावित रहे हैं। आप की दम्भ-रहित छवि किसी भी जिज्ञासु को अपनत्व के रक्षा-सूत्र से बाँध लेने में सक्षम रही है। आपके मन में भारत को एक विकसित देश और राष्ट्र-भाषा को पूर्ण रूप से समृद्ध और घर घर की भाषा-बोली के रूप में देखने की ललक बनी रही है। 

जीवन के 70-72 वसंत देख चुकने पर भी अभी इतने और देखने की लालसा लिए अपने निर्धारित जीवन-पथ पर चलने वाली कर्मठ, अनथक, कर्मनिष्ठ, कत्र्तव्यों का पालन करने वाली महिला को मैं कर्मप्रधान व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्था कहना चाहूँगा।

क्योंकि-

‘‘हर मंजिल सर पटक-पटकते तेरे कदमों बिछ आई। 

तूने नंगे पाँवों चलकर, मील के पत्थर

कुचल दिए।।’’