‘‘ काँपता हुआ दरिया’’: किनारे से किनारे तक
मीरा कांत

मोहन राकेश के अधूरे उपन्यास ‘काँपता हुआ दरिया‘ को पढ़ने के बाद मैं इससे उबर नहीं पा रही थी। इसके कथ्य, शैली और ख़ासतौर से बिम्बों ने मिलकर जो दुनिया रची है उसमें एक सम्मोहन-सा है। कश्मीर के हाँजियों के जीवन-संघर्ष पर आधारित इतना रचनात्मक और प्रामाणिक साहित्य मेरी नज़र से नहीं गुज़रा था। मगर आइरनी ये थी कि इसमें डुबकी लगाई तो पाया कि मोहन राकेश तो हमें दरिया के बीचोंबीच छोड़ हमेशा के लिए चले गए। इससे उबरने के लिए इसके साथ-साथ बहते हुए किनारे तक पहुँचना मुझे ज़रूरी लगा ।

डाॅ. जयदेव तनेजा और राजकमल प्रकाशन के श्री अशोक महेश्वरी की ओर से मोहन राकेश के इस अधूरे उपन्यास को आख़िरी मुक़ाम तक पहुँचाने का प्रस्ताव मुझे मिला तो मैंने फौरन मना कर दिया। मेरी कल्पना में भी इतने बड़े काम का बीड़ा उठाना मुमकिन नहीं था। ये सिर्फ़ किसी दिवंगत लेखक की रचना को पूरा करना नहीं था। ये उपन्यास मोहन राकेश जैसे प्रतिष्ठित लेखक का था जो मेरे प्रिय साहित्यकार थे। उनको और उन जैसे साहित्यकारों को पढ़-पढ़ कर ही हम बड़े हुए हैं। 

एक बार को लगभग तीस- पैंतीस साल पहले पढ़ा उपन्यास ‘ बारहखम्भा ‘ भी ज़हन में कौंधा जो एक उपन्यास- प्रयोग था। अज्ञेय जी की पहल पर किया गया यह एक सहकारी अनुष्ठान सरीखा था। इस उपन्यास को अज्ञेय, अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार आदि साहित्यकारों ने लिखा था। अज्ञेय जी के संपादन में प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘प्रतीक‘ में इसकी ग्यारह किस्तें धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुई थीं। अगली हर किस्त अलग लेखक लिखता था। ‘प्रतीक‘ का प्रकाशन स्थगित होने के कारण इसकी बारहवीं किस्त छूट गई थी जिसे बाद में अज्ञेय जी ने लिखकर पुस्तक के रूप में ‘बारहखम्भा‘ नाम से छपवाया था। ये सब याद आने के बावजूद मैं हामी भरने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। 

तभी तनेजा जी की ओर से उन्हीं के संपादन में प्रकाशित मोहन राकेश की अधूरी रचनाओं के संकलन ‘ एकत्र‘ की प्रति  प्राप्त हुई जिसमें अधूरा उपन्यास ‘काँपता हुआ दरिया‘ भी मौजूद था। मैंने वो पढ़ा और यक-ब-यक सारा मंज़र बदल गया। उस अधूरे ‘काँपता हुआ दरिया‘ के सम्मोहन में मैं बंध चुकी थी। इसकी पृष्ठभूमि में मेरा अपना कश्मीर था। वहाँ का जीवन-संघर्ष था, वहाँ की धड़कनें थीं। मोहन राकेश शिद्द्त से इसके एक-एक कथा प्रसंग से जुड़े थे, कश्मीर की भाषा, संस्कृति में गहराई से डूबे हुए थे। वहाँ के भौगोलिक गोशे-गोशे से वाक़िफ़ थे, चप्पे-चप्पे से उनका नाता था। वो महीनों-महीनों वहाँ के हाँजियों के साथ उनके हाउसबोट और डूँगों में रहे थे। कुल मिलाकर कश्मीर की उस मुश्क, उस ख़ुशबू को महसूस करने के बाद ये मान पाना मुश्किल है कि ये किसी ग़ैर कश्मीरी लेखक की रचना है।

मुझे लगा ऐसे कार्य को जीवन के कुछ महीने तो क्या कुछ वर्ष भी दिए जा सकते हैं। ये ज़िम्मेदारी उठाते ही प्रतीत हुआ कि किसी ने राह में एक बड़े अनुष्ठान की मशाल मुझे थमा दी है जिसे अब शिखर तक पहुँचाना है। ये मशाल थी मेरी साहित्यिक धरोहर की, मेरी विरासत की। इसलिए वो भय मिश्रित खुशी भी टिक नहीं पा रही थी। उसके स्थान पर ज़िम्मेदारी का एहसास आ बैठा था। 

एक कहावत का सहारा लूँ तो कह सकती हूँ कि मैंने बड़े और भारी जूतों में पाँव डाले थे। मन के किसी कोने में अभी भी संकोच बाकी था। दिमाग़ में इतना कुछ एक साथ चल रहा था कि अंततः कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। ये एक बहुत भिन्न स्थिति थी। वो अधूरा उपन्यास जिससे मैं बहुत प्रभावित थी, मेरे सामने था। उसी के छूट गए धागों को बुनते हुए आगे बढ़ाना था। मैं उस अधूरे हिस्से से पूरी तरह बंधी हुई थी,मगर बाकी हिस्से के लिए मुक्त थी। ये जो बंधन और मुक्ति का ताना - बाना था इसने मेरे ज़हन को अपनी गिरफ़्त में कर रखा था। दरअसल मैं सृजन के दरिया में नहीं बल्कि  तालाब में थी जिसकी सीमाएँ थीं। सबसे बड़ी सीमा ये थी कि मोहन राकेश वाला हिस्सा 110 पृष्ठों में प्रकाशित था और मुझे अपनी पृष्ठ सीमा इससे कहीं कम रखनी थी। 

मोहन राकेश के उपन्यास में एक सृजनात्मक इत्मीनान है। वो कहीं पहुँचने की जल्दी में नहीं दिखते। यहाँ जीवन्तता के साथ-साथ एकग्रता है, संयम है, एक रमा हुआ मन है। अगर वो इसे पूरा कर पाते तो निश्चित रूप से ये एक विस्तृत और बृहत उपन्यास होता। पर मेरे सामने जो पृष्ठ सीमा थी उसे निभाने में मेरा संपादक रूप बहुत काम आया। संपादकों को कभी-कभी बहुत निर्ममता या कहें कि बेरहमी भी बरतनी पड़ती है। बस उसी बेरहमी की क़ैंची का इस्तेमाल मुझे संभावनाओं से भरे कुछ प्रसंगों पर करना पड़ा। उदाहरण के तौर पर मोहन राकेश ने उपन्यास की ‘पूर्व भूमि‘ में नूरा की एक सहेली जयश्री का ज़िक्र किया है कि नूरा उन्हें जयश्री के ख़त लाकर पढ़वाती थी। इस प्रसंग में बहुत संभावनाएँ थीं। इससे कश्मीर में बसे दो समुदायों के आपसी रिश्ते,मेलजोल जैसे आयाम भी सामने आ पाते और नूरा का चरित्र भी और निखर पाता। परन्तु राकेश के अधूरे उपन्यास में जयश्री का कोई ज़िक्र नहीं किया गया है। मैं शुरू करती तो इसे निभाने में पृष्ठ सीमा को लाँघ जाना तय था। सो नज़रें फेर लेने के अलावा कोई चारा न दिखा। यानी जिस रचनात्मक बंधन या कहें कि सीमा से मैं घिरी हुई थी उसके तहत मुझे दरिया में किश्ती को दूर न ले जाकर किनारे तक वापस लाना था। उपन्यास को उसके तार्किक अंत तक पहुँचाना था। यह एक भिन्न सृजनात्मक संघर्ष था जो अंततः सुखद  अनुभव साबित हुआ। 

मोहन राकेश कथानक को लगभग 1947 से शुरू कर वर्ष 1950 तक लाए हैं। हिन्दुस्तान अगस्त 1947 में आज़ाद हुआ मगर जम्मू और कश्मीर में अभी राजशाही जारी थी। उससे आज़ादी के लिए, जम्हूरियत के नाम पर वहाँ संघर्ष जारी था। देश के विभाजन से पहले लोग रावलपिंडी के रास्ते से कश्मीर जाते थे। विभाजन के बाद ये रास्ता अचानक बन्द हो गया। इसलिए कश्मीर में सैलानियों का आना- जाना भी रुक गया। दरिया के हाउसबोट खाली थे। रोज़गार नहीं थे। हाँजी समुदाय ग़्ाुरबत और मुफ़लिसी से बुरी तरह घिर चुका था। फटेहाली लगातार बढ़ रही थी। चारों तरफ़ असुरक्षा थी, आक्रोश था। कश्मीर को लेकर राकेश की सामाजिक- ऐतिहासिक - राजनीतिक समझ, उनकी दृष्टि काफ़ी परिपक्व और स्पष्ट लगी। मैंने शोध किया और कथानक को वहाँ के तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ाते हुए नवम्बर 1952 तक लाई जब राजशाही क़ानूनी तौर पर पूरी तरह ख़त्म हुई थी। राजनैतिक-सामाजिक स्तर पर यह एक आमूल-चूल परिवर्तन का दौर था जिससे वहाँ का समाज असरअंदाज़ हो रहा था। मेरी कोशिश रही कि ऐसी आइरनी उभरे जो इसे आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक बनाए। 

मोहन राकेश के साहित्य की जो विशेषताएँ हैं, जैसे अकेलापन, अनिश्चितता, बराबर एक नामालूम-सी तलाश, स्त्री-पुरुष संबंधों में तनाव, पुरुषों के मुकाबले स्त्री पात्रों का अधिक सशक्त होना- ये सभी इस रचना- प्रक्रिया के दौरान कहीं न कहीं बराबर मेरे अवचेतन में रहे। इन्हीं के उजाले में मैंने कथानक को देखा, उसके अंधेरे और धुंधलकों से घिरे कोनों में प्रवेश किया। 

उनकी एक ख़ासियत और थी- ‘घर की तलाश‘। ये तो ख़ैर ‘काँपता हुआ दरिया ‘ का मुख्य मुद्दा बनकर ही उभरी। उपन्यास में खालका का मन भटक रहा है। उसे नहीं मालूम कि वो क्या चाहता है। बेगम हाउसबोट की खिड़की से दरिया की लहरों में एकटक देखकर जाने क्या ढूंढती है! और नूरा का बचपन भीतर से असुरक्षित है, अकेला है। वो महफ़ूज़ रहना चाहती है घर में, पर उसके लिए घर का काॅन्सेप्ट मुख़तलिफ़ है। कभी वो अब्बा के फेरन में घुस कर छिप जाती है तो उसे लगता है कि वो अपने घर में है। वो कल्पना करती है कि काश हर शाम वो माँ के पेट में घुस सकती और हर सुबह निकल आती! वो भी उसके लिए घर है।

उपन्यास की मुख्य पात्र बेगम शुरू से ही एक सशक्त चरित्र है। इसलिए मेरी कोशिश रही कि उसके माध्यम से तत्कालीन सामाजिक- राजनीतिक स्थितियों के परिदृश्य में स्त्री का संघर्ष और उभरे। उसका दर्द और रोज़मर्रा की जद्दोजहद  सामने आए। बेगम अपनी ज़िन्दगी और परिवार के फैसले अकेले लेने की हिम्मत रखती है। वो कहती है कि जब ग़रीब घर की ज़्ाून बेगम मुल्क के दुश्मनों के ख़िलाफ़ राइफ़ल उठा सकती है तो मैं अपना हाउसबोट अकेले क्यों नहीं बेच सकती ! उसका नज़रिया अपने समय और समाज की तुलना में कहीं आगे का है। अंत में परम्परागत मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाते हुए वो अपने पति को ‘मर्द के नाम पर गर्द‘ मानती है। साथ ही ख़ुद से कहती है कि उसका बेटा हो भी जाता तो क्या ! वो भी बाप की तरह नाकारा होता। इसी प्रकार नूरा के अंतर्मन की गुफाओं में पसरा विद्रोह उसे बिना बताए सिद्दीक के साथ घर क्या शहर छोड़ देने पर ही मजबूर कर देता है। 

अंत में बेगम अकेली रह गई है,फटेहाल ! उसका हाउसबोट बिक चुका है जो अब टूट रहा है, बेगम की ही तरह। हाउसबोट पर पड़ने वाली मार से वो हाउसबोट भी हिल जाता है जिससे दरिया काँप उठता है। उस काँपते दरिया में बेगम को दिखाई देती है थरथराती घाटी,चारों तरफ़ खड़े ऊँचे- ऊँचे पहाड़ जो हिल रहे हैं  और पास खड़े हाउसबोटों की सहमी-सहमी परछाइयाँ। यानी कुल मिलाकर काँपता हुआ पूरी घाटी का अक्स !   

-नई दिल्ली, मो. 9811335375