डॉ. अहिल्या मिश्र का रचना संसार (प्रकाशित पुस्तकों में से चुनीं कविताएँ, निबंध, लेख, कहानियाँ एवं समीक्षाएँ)

 

मील का पत्थर (2020)

लेखक के समक्ष लेखन की चुनौतियाँ

समाज की लघुतम् इकाई मानव है। मानव के अस्तित्व पर ही सवाल टिका है। साहित्य मानव निर्मित समाज का एक अभिन्न अंग है। साहित्य का निर्माण मानवहित के लिए है। दोनों का लक्ष्य मानव विकास एवं उन्नत समाज के निर्माण है। उत्तम समाज के मूलभूत सिद्धांत में मनुष्य एवं साहित्य का संबंध गंभीर एवं गहरा होता है। यह प्रमाणित सत्य एवं तथ्य है कि साहित्य समाज का दर्पण होता हैं। साहित्यकार या लेखक जब साहित्य लेखन करता है तो उसे अधिकतर भोगे हुए यथार्थ का सृजक कहा जाता है। यह यथार्थ समाज के खट्टे-मीठे अनुभव होते हैं। आगे चलकर यही आम लोगों का विषय एवं पसंद बन जाता है। किसी भी परिवर्तन को शाश्वत बनाने में साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान होता है। कल्पनाशील लोचन अधिकतर अप्रभावी होते हैं। भारतीय परिदृश्य में साहित्य प्राचीन काल में ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, भौतिक, भौगोलिक, खगौलिक, रासायनिक, ज्योतिषिक, अंकगणितीय, पराभौतिकीय, नव या नव्य शास्त्र, औषधि शास्त्र आदि के गुणों एवं विषयों को समाविष्ट करती आई है।

आज विश्व का संपूर्ण परिवेश तेजी से बदल रहा है। इस खुले बाजारवाद के पंजे में मानवता आक्रांत हो रही है। ऐसे में लेखक अपना स्वानुभूत अनुभव लिखे यह एक अति चुनौतीपूर्ण कार्य है। वैसे भी हर जगह पाठकीयता की कमी का शोर है। मीडिया का बाजार गर्म है। आम् धारणा है कि पढ़ने में बहुत समय व्यय होता है। आज इतना समय किसी के पास कहाँ बचता है कि वह बैंठकर पढ़े और गुने। आज संताप, संघर्ष, आशा-निराशा एवं भौतिकवादिता के बीच दौड़ता भागता मानव साहित्य की संवेदनाओं, भावनाओं को कैसे जिए। उसे तो बस सुविधाओं का अंबार लगाना है। इस चक्रव्यूह में फँसा आदमी धीरे-धीरे रिश्तों के मायाजाल को भी तोड़ता जा रहा है। स्वाभाविक है कि वर्तमान स्थितियों की भयावहता से समाज को बचाना एवं भारतीय सामाजिक संरचना तथा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना एवं भारत का मूल स्वभाव जो कवित्व एवं संगीतमय है तथा बुनियादी तौर पर यहाँ के स्वभाव की भावात्मक उत्तेजना की विद्यमानता की रक्षा करना लेखकीय दायित्व बनता है। यही दायित्व एक बड़ी चुनौती बनकर स्थिर खड़ा है। स्वांतः सुखाय व सब जन हिताय की नींव पर लेखन करने वालों को इन सभी समस्याओं से दो चार होना पड़ रहा है या पड़ेगा।

एक कवि कविता लिखता है तो क्या लिखता है? यह सनातन अनसुलझा प्रश्न है, किन्तु सोचें तो इससे कई सहयोगी प्रश्न पैदा होते है। कौन सी मूल चिंताएं अथवा चुनौतियाँ हैं? जो आपकी चिंताओं एवं चेतना को निरंतर उद्दीप्त बनाए रखती हैं एवं आपको गद्य या पद्य की रचना हेतु प्रेरित करती है? अब जब हमारे जीवन का यथार्थ बहुआयामी हो गया है, जो स्वतंत्रता पूर्व तक एकायामी यथार्थ था। आजादी के थोड़े दिनों बाद की साहित्य और कविता के उद्देश्य में अधिक अन्तर नहीं रहा। आज हम सामाजिक जीवन में झाँके तो पाते हैं कि सामाजिक संबंध हो, या सांस्कृतिक संवाद हो इनमें एक संशय या सिनिसिज्म यानी संशयग्रस्तता झाँकने लगी है। तुलसीदास ने कहा कि भाषा निबद्धमति मंजुलमात मोती। रीतिकालीन कवियों ने कहा कि आगे के सुकवि रीझीहें तो कविताई न तो राधिका कन्हाई के सुमिरन को बहानो है। तत्पश्चात् सामाजिक यथार्थ की बातें सामने आई। फिर स्त्रियों का लेखन स्त्रियों हेतु, दलितों का लेखन दलितों हेतु तथा अल्पसंख्यकों का लेखन अल्पसंख्यकों हेतु की बात की जाने लगी। आज लेखकों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समाज के समक्ष वह लेखन का उद्देश्य किस प्रकार, किस संदर्भ में और किस आधार पर निर्धारित करे। विकास की इस परंपरा में विषय बहुल उपस्थित है। लेखन के विभिन्न आयाम है। धरती से आकाश तक खुला है। इस विषय वैविध्य में कुछ लोग सर्वग्राही सोच लेकर आगे बढ़ते हैं तो कुछ लोग एकांगिता को अंगीकृत करते हैं। सूचना या जानकारी का वृहद् व्योम अंतर्जालीय व्यवस्था में पूर्ण रूपेण उपलब्ध है। अंगुलियों से टीपते ही मायावी सा स्वरूप समक्ष में प्रस्तुत हो जाता है। लेखक को इससे प्रतियोगिता करते हुए कुछ नए चिंतन प्रस्तुत करने की कोशिश करनी है। यह नयी सोच या नया चिंतन क्या हो? कैसे हो? सर्वग्राह्य हो या वैयक्तिक हो। इन सभी प्रश्नों से लेखक को दो चार होना आवश्यक सा दिखाई पड़ता है।

लेखकीय स्थिति की ओर देखें तो पाते हैं कि किसी भी रचना में भरी हुई सुर्खियाँ एवं तल्खियों का अनुमान रचनाकार के वैयक्तिक जीवन एवं उसके परिवेश के परिचय से भी लगाया जा सकता है। ऐसे में लेखक द्वारा लिखी गई वैयक्तिक अभिव्यक्तियाँ प्राप्त हो जाएँ तो रचना के विभिन्न कोणों को निकट से देखा-परखा जा सकता है। इस संबंध में एक पत्र में अभिव्यक्त उदाहरण प्रस्तुत है- एक पत्रिका ‘अक्सर‘ के २४वें अंक (अप्रैल-जून 2013) में राही मासूम रजा द्वारा डॉ. प्रभात त्यागी और डॉ. अनिला त्यागी के पत्रों के कुछ अंश पढ़ने को मिले। इसमें लेखकीय दायित्व की चेतना कूट-कूट कर भरी हुई है, यथा-

  1. बहन अनिला देश के भविष्य के बारे में किस तरह सोच रही हो? यह तो चुनाव के दिन है। बहुत से भेड़िए, बकरी की खाल ओढ़े, होठों पर मुस्कान चिपकाए निकले हुए हैं। डेमोक्रेसी के नाम पर पत्थरबाजी हो रही है। कई लोग जान से मारे जा चुके हैं। लेख लिखे जा रहे हैं। आत्माओं के चारों ओर गहरा सन्नाटा है। चीन में तो केवल लाल गार्ड है। परन्तु यहाँ तो सफेद, लाल, नीले, केसरिया, तिरंगे... भाँति-भाँति के गार्ड निकल आए हैं।... तुम्हें दिल की बात बताऊँ? आजकल डिस्गस्टेड हूँ कि कविता या कुछ भी लिखने को जी नहीं चाहता है। तुम्हारे भाई की आत्मा बीमार हुई जा रही है। हर तरफ अंधकार है। रोशनी किसी तरह दिखाई नहीं देती। यह यकीनन् मेरे आँखों का कसूर है। आँखों का इलाज करवाने कहाँ जाऊँ। तुम्हारी भाभी साथ नहीं होती तो शायद मैं अबतक बिलट गया होता। मैंने अंधकार से हार नहीं मानी है। अभी भी लड़ रहा हूँ, तुम्हारा भाई राही- यह एक लेखक की आत्मस्वीकृति है। दूसरे पत्र का उदाहरण प्रस्तुत है-
  2. इस दुनिया में... मुझे अफसोस है कि जितना बड़ा मूर्ख बनने के लिए साहित्य को अपना माध्यम बनाया था उतना बड़ा मूर्ख बन न सका। ऐसा कोई काम कर न सका जो मुझे जाने के बाद भी जिंदा रख सके। उसी कोशिश में हूँ। ... राही। 

दूसरे पत्र का यह अंश प्रस्तुत है - हिंदुस्तानी बैल और लेखक की किस्मत एक ही है- भूख। अपने और तुम्हारे बच्चों को मैं लेखक नहीं बनने दूंगा। ... मासूम - (रजा मासूम राही)

उपरोक्त उदाहरणों के माध्यम से मैंने लेखकीय स्थिति की एक झलक प्रस्तुत करने की कोशिश की है। यह लेखकीय दायित्व और सामाजिक स्वीकृति का मिला-जुला स्वरूप है। 

समाज में साहित्य पठन-पाठन की रूचि घटने लगी है, कई लोगों द्वारा यह बात कही जाने लगी है। किन्तु साहित्य लेखक की उत्तमता बनी रहे। उसकी रोचकता बनाए रखें तो पाठक खींचा हुआ स्वयं आगे आ जाएगा। मीडिया से साहित्य की क्षति होने लगी है। वैसे साहित्य की क्षति के कई ऐसे कारक भी हैं जिन्हें हम जान समझकर भी नजर अंदाज करते हैं। मीडिया पर यह दोष मढ़ा जाता है। लेखकीय दायित्व से मुकरने के लिए कई तत्व का सहयोग हम लेते हैं। हमारा लेखक समुदाय आज दायित्व वहन करने के बदले जुगाडू बनने की प्रक्रिया में अधिक संलग्न रहता है। अच्छे और उन्नत साहित्यिक चिंतन मनन के स्थान पर दीनदुनियां से बेखबर होकर इसमें संलग्न रहता है कि कौन सा पुरस्कार या सम्मान कहाँ से मिल रहा है। किस प्रकार किसी संस्था पर अपना आधिपत्य जमाकर इसका उपयोग अपने और अपनों के लिए करना संभव हो पाएगा। कैसे झपट्टा मारकर कौन सा सम्मान हथियाया जा सकता है। आश्चर्य तो तब होता है कि अधिकांश लेखक कबीर का लबादा ओढ़े फिरने का भ्रम पैदा करते हैं किन्तु वास्तव में बिहारी का जीवन जीने लगे हैं।

मीडिया को साहित्य का महत्व घटाने का तत्व कहा जाता है, किन्तु देखे तो पाते हैं कि आज का लेखक अपना मेल फेसबुक पर भी कई बातें फिक्स करने लगा है। वहाँ लेखक एक दूसरे से हिसाब चुकता कर रहे होते हैं। दूसरे लेखक पर अपने एहसान गिना रहे हैं कि अमुक पुरस्कार अमुक कवि या लेखक को उन्होंने दिलाया था। कविता के नाम पर टी.वी. पर फूहड़ता एवं हल्कापन भी परोसने का कार्य पूरा किया जा रहा है। कुछ बड़े लेखक आशीर्वाद देने का कार्य हथिया कर बैठ गए हैं। आज का लेखक इतना आत्ममुग्ध है कि वह न तो जिंदगी को देखना चाहता है, न दूसरों की बात सुनना चाहता है। सबने अपने स्वार्थपूर्ति हेतु मर्यादाएँ तय कर रखी हैं। उन्हें ही वे पूर्ण मानते हैं। कलम का सिपाही अब जादूगरी का उद्घोष कर रहा है। कभी स्त्री विमर्श के बहाने बलात्कार को भी सही ठहराने से नहीं चुकता तो कभी आदिवासी, दलित विमर्श के नाम पर कोरा जातिवाद करने से नहीं बाज आता है। समाज को विभाजित करने की यह प्रक्रिया भी लेखकों की असंवेदना को ही प्रकट करती है। भला वह असंवेदना क्यों न हो। आज का लेखक दुःखों और अभावों को जीते हुए, लिखता हुआ, एड़ियाँ रगड़ कर मरने के बजाय पूर्ण भौतिक सामग्री प्राप्त कर चैन एवं आराम का जीवन चाहता है। इसी के  लिए वह सारे जोड़-तोड़ में लगा रहता है।

सामाजिक परिवर्तन एवं सरकारी विकास का गाना लेखक की चिंतन शैली को प्रभावित करती है। वैसे समयानुसार परिवर्तनों से हम पूर्व में भी दो-चार होते आए हैं। हमारे विदेशीपन के पोषक तत्वों को अगर हम इतिहास में झाँके तो पाते हैं कि क्रांति एवं सोचने की उनकी दिशा बदली है। बीते हुए कल में हमने ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। उस समय भी लेखन और लेखक के समक्ष चुनौतियाँ तेजी से उभरी थी। कथा कहानी में भटकाव की दिशा दशा को भी हम इन्हीं आधारभूत कारणों से पाते रहे हैं। हमारा साहित्य जिसे इस अति आधुनिकता की दौड़ में आगे होना चाहिए। सहयोगी बनकर दौड़ के कारणों एवं परिणामों को अवलोकित एवं उल्लेखित करना चाहिए, वह पीछे खड़ा हॉफता सा दिख रहा है। साहित्यकार आगे भागते धावकों को कोसने में लगा हुआ है। देश में उत्पन्न विरोधी परिस्थितियों पर कलम चलाना, चिंतन करना एवं रोकने हेतु प्रयास करने की चेष्टा नाम मात्र की है। जबकि आज साहित्य में हो रहे उठापटक एवं सांस्कृतिक क्षरण तथा नैतिक अवमूल्यन को रोकने का प्रयास सर्वोपरि लेखकीय दायित्व है। स्वार्थ जब भी हावी होता है, वह सामाजिक क्षति का कारण बनता है। आज के लेखक को भौतिक विलासिता पूर्ण जीवन के त्याग की वृत्ति अपनानी होगी। सत्साहित्य के लेखन में लीन होकर समाज में व्याप्त होते रूढ़ियों, अति आधुनिकता एवं पाश्चात्य भोगवादी चिंतन को सत्-विचारों एवं अपने दर्शन के आधार पर नवीनीकृत कर साहित्य में इसका रोपण एवं पोषण करना होगा। हमारा अपना मूल्य बोध जगाना होगा। इस दायित्व बोध को लेखक अपने लिए चुनौती माने और इसे पूरा करें तभी उत्तम साहित्य की संरचना होगी। पाठकीयता बढ़ेगी एवं समाज में स्वच्छ परिवर्तन अवलोकित होगा।

उपरोक्त तथ्यों का विश्लेषण एक सच्चा लेखक स्वयं करे एवं अपेक्षित निष्कर्ष निकालकर जीवन मूल्यों की रक्षा हेतु उठे तो साहित्य का कल्याण होगा एवं चुनौतियों को सही संदर्भो में समझकर भविष्य में लेखक के लेखकीय दायित्व की पूर्ति संभाव्य होगी।

डॉ. अहिल्या मिश्र के द्वारा ‘पुष्पक’ लोकार्पण का दृश्य डॉ. राधे श्याम शुक्ल, राम जी सिंह, प्रो. मनिकम्बा, प्रो. शुभदा बांजपे, लक्ष्मी नारायण अगवाल, मीणा मुठा सन् 2009 में

मैं और मेरा लेखन

मेरे हृदय में संवेदनाओं का ज्वार एवं भावनाओं का उफान मेरे होश संभालने के समय से ही मेरे मन को फेनाता रहा है और ऊँचाई छूने के लोभ में सिर पटकता रहा है। यानी चिंतन एवं विचार अपने उम्र की सीमा रेखा को देहरी सा लांघ कर मनन के यथार्थ क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाता है। खैर बालमन कुछ अटपटा सा टूटी-फूटी भाषा में उजले पृष्ठ काले कर लेता तब जा कर थोड़ी शान्ति मिलती। खेतों के झूमते फसलों के साथ अपनी उछल कूद एवं नाच गाना अच्छा लगता। तानसेन सा राग अलापती जो भी शब्द लहरी बनकर उठते उस तुतले रागों में समा जाते। गाँव के स्वच्छंद वातावरण के बीच आजाद परिंदे सा उड़ती-फिरती अपने मन की करती या मानती और पोखर के भीर (किनारे) मंच होते एवं प्रकृति मेरे ध्वनिवाहक तंत्र तथा श्रोता दोनों होते। कभी तोता-मैना, गोरैया को कहानी सुनाती, कभी गिलहरी और कटफोड़वा को आवाज लगा कर साथी बनाती। हाँ इस प्रकार एक रचना प्रक्रिया धीरे-धीरे मेरे अंदर ही अंदर श्वास लेने लगी।

सोल्जेनित्शन ने 1967 में सोवियत लेखकों के नाम लिखे गए एक पत्र में कहा था- वह साहित्य जो अपने समकालीन समाज की श्वास न हो, जो समाज के दर्द और डर को एक-दूसरे में उतार न सके, जो नैतिकता के खतरों के खिलाफ समय पर चेतावनी न दे सकें, ऐसा साहित्य मात्र ऊपरी दिखावा है। वह साहित्य होने का दावा नहीं कर सकता। प्रेमचंद ने भी अपने निबंध साहित्य के उद्देश्य में साहित्य सृजन के मकसद और भूमिका को लेकर इसी प्रकार के विचारों को व्यक्त किया है। गहराई में जाकर देखें या परखें तो पाते हैं कि कुछ ऐसे विषय होते हैं जिनका सृजन नहीं किया जा सकता यानी जिन्हें लिखा ही नहीं जा सकता है। जान किट्स फाल आफ हाइपीरियन में जो लिखना चाहते थे, नहीं लिख सकें। फलतः वह अधूरा ही रहा। मेरे विचार से लेखक को इससे हताशा नहीं होना चाहिए। लेखक या सर्जक जो कहता है उसमें उसका वह अनकहा भी निहित होता है जिसे कहा नहीं जा सकता। इसके लिए आवश्यकता उस निविड़ता को यानी अलिझिन को पकड़ पाने हेतु शाब्दिक आस्था का होना जरूरी है। किसी भी सर्जन के लिए यह महत्वपूर्ण चुनौती है।

गौरतलब है कि सर्जक लेखक या कलाकार मात्र एक व्यक्ति नहीं होता है। उसके भीतर हजारों मनुष्य के अनुभव एवं उनकी परिवेशगत स्थितियाँ गुंजित-अनुगुंजित होती रहती है। अपने सर्जनात्मक क्षणों में भी वह घटनाओं, तथ्यों उनके अर्थों एवं संवेदनाओं को जीता है। फिर साहित्य सृजन भी मात्र अभिव्यक्ति नहीं है, वह संप्रेषण है। अर्थात कथ्य का सामाजिक हो जाना है। यह कोई पक्षधरता या समर्थनधर्मिता नहीं है कि सर्जक अद्वितीय व्यक्तित्व का मालिक है। किन्तु उसकी अद्वितीयता की अपनी सीमा होती है जिसका निर्णय प्रकृति एवं उसका सामाजिक परिवेश करता है।

अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले कुछ स्वयंसिद्ध बातें बताती चलूँ। किसी दो साहित्यकार के चेहरे एक से नहीं होते। किन्तु उन सब चेहरों में एक समानता होती है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। टॉल्सटॉय, मैग्जिमम् गोर्गी, दोस्तोस्वकीमान, टॉमस, ऐटन, चेखव, शिवशंकर पिल्ले, जैनेन्द्र, प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन या शरतचंद के चेहरे समान न होते हुए भी इनके सृजन में उकेरे गए सुख-दुख, हर्ष-विषाद, घृणा-प्रेम, दया, सहानुभूति, करूणा और मानव मूल्य की अपील एक समान ही है। वास्तव में भूगोल साहित्यिक रचनाओं में निहित साहित्यिक अपील को विभाजित नहीं कर सकता। यहाँ तक यह भी सत्य है कि आँसुओं और मुस्कुराहटों का स्पंदन भी सर्वभौतिक होता है।

मूलतः सर्जक का या साहित्यकार का जीवन एक घटना है। भले ही साहित्यकार या कलाकार अकेला मरता है किन्तु वह जन्म तो अकेला नहीं ले पाता है। जन्म समाज में माँ-बाप ही देते हैं। सर्जक वाल्मीकि, तुलसी, टैगोर, होमर, अरस्तु, शेक्सपीयर या टी.एस. इलियट ने समाज में अलग-अलग समयों में जन्म लिया। उनकी कृतियाँ रामायण, रामचरितमानस, गीतांजलि, ओडेसी, श्पोयटिक्स, हैमलेट एवं बेस्टलैंड तथा अन्य कालजयी रचनाएँ आदि सृजन काल से सामाजिक ही रहीं। हर सृजक के अंदर एक पाठक भी बैठा रहता है जो पर्यवेक्षण करता रहता है कि सर्जक अपने सृजन को कारखाने में बदल रहा है या परिणत कर रहा है अथवा दुनिया में सुसंस्कृत मानव समाज की सृष्टि में शाश्वत मूल्योन्मुखी सृजन में रत है। पाठक की बौद्धिक रेडार इस तथ्य की भी जाँच करता है कि कहीं सर्जक विवादास्पद सृजन करके चर्चित होने के मोहजाल में फंसने की स्थिति तो नहीं बना रहा है। सर्जक का बोल्ड होना उसका लेखकीय गुण है। अगर कोई व्यक्ति सिंह या सँप पर लिखेगा तो उसे उसकी संगत करनी पड़ेगी। रेगिस्तान की रेत या बालू मुठ्ठी में भरकर समुद्र की लहरों की गिनती लिखना मात्र कपोल कल्पना होगी। स्वीडन अकादमी द्वारा अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी पर नोबेल पुरस्कार देते समय निर्णायक मंडल के सामने सर्जक का यही सार्वभौमिक सत्य था।

सर्जक या साहित्यकार समाज का एक चेतनाशील एवं चिंतनशील अंश होता है। समाज ने उसे अर्थ दिया है और वह अपनी क्रियाशील विकासमान गति में अपने सृजन द्वारा समाज को बड़े स्वरूप में अर्थायित करते हुए अपनी सक्रिय भूमिका निभाता है। यह सृजन की भीतरी दुनिया होती है। आद्यबिंबो के अवशेषों की, आशा-आकांक्षा की, सुख-दुख के अहसास की कतिपय सीमाओं के बावजूद एक-दूसरे के भीतर उसकी अपनी दुनियां है। फिर भी उसका सृजन इन तमाम छंदों से गुजरते हुए बेहतर दुनियां खोजते-बनाते उसके मूल्यवान अनुभव की सशक्त आवाज बन जाता है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जहाँ ज्ञान-विज्ञान की अन्य शाखाएँ जीवन के किसी एक द्वार पर खड़े होकर सत्य को देखती है वही सर्जक के सृजन जीवन के भीतर चली जाती है एवं जीवन के प्रत्येक रंग, रोध, फूल, शूल सभी महत्वपूर्ण संपर्क को वाणी देती हैं। विक्टर ह्यूगो के लेसमिजरेबल, जानक्रिस्टोफर के द बर्निंग ब्रश, टामस हार्डी के टेस ऑफ डि उखर विले, शिवशंकर पिल्ले के चेमीन, शरतचंद की चरित्रहीन, प्रेमचंद के गोदान, अज्ञेय का शेखर एक जीवनी आदि उपन्यास मनुष्य के अंतर्जगत का एक्स-रे है।

साहित्य सदैव शिवेतरक्षतए अर्थात शिवेतर के विनाश के लिए कृत संकल्पित रहा है। सर्जक सृजन के मोर्चों पर प्रत्यक्ष रूप से मूल्यों की लड़ाई लड़ता आया है। इसमें वह लहू-लुहान भी हुआ है। तभी जाकर उसका सृजन मूल्यवान मानव अनुभूति का दस्तावेज बन पाया है। साथ ही मूल्यों के कारण चलने वाले संघर्ष का साथी भी बना है। इस प्रकार यह निष्कर्षित होता है कि सर्जक एक आलेखक, मनीषी, आलोचक एवं एक सतर्क प्रहरी की भूमिका में संलग्न रहता है। 

साहित्य विश्व के किसी कोने में क्यों न लिखी जाए उसकी रचना प्रक्रिया एवं भूमिका सर्वत्र समान होती है। सर्जकों के परिवारिक परिवेश, प्रेरणास्त्रोत एवं जीवनानुभव भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। एकतथ्य और रेखांकित कर दूँ कि सृजन सदैव आधुनिक होता है। आधुनिकता वास्तव में बदलते हुए युग की गतिशील शक्तियों के साथ प्रासंगिक होना है। जर्मन भाषा में आधुनिक आदमी का अर्थ है- बदलते युग के साथ बदलता हुआ आदमी। साहित्य युग के साथ स्वयं नहीं बदलता अपने युग को भी बदलता है। इसके साथ ही होने वाले बदलाव को सही दृष्टि भी प्रदान करता है। अंग्रेजी साहित्य को देखें तो एलिजाबेथ एवं विक्टोरिया युग तथा भारतीय साहित्य के वीरगाथा काल, रीतिकाल, भक्तिकाल में सृजित रचनाओं में आधुनिकता के तत्व उपस्थित हैं। क्या कबीर की दृष्टि आधुनिक नहीं है? क्यो थोमस हार्डी की नायिका टेस आज के नारी की बलात्कार एवं उत्पीड़न का प्रतिनिधित्व नहीं करती है?

प्रत्येक सर्जक या रचनाकार के कतिपय प्रेरणास्रोत भी होते हैं जो उसके सृजन की बीजभूमि को उर्वर बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं। एडमंडमूर और डब्ल्यू बीयीट्स से रविन्द्रनाथ टैगोर ने प्रेरणा ग्रहण की। लुई आरांगी, पाब्लो नेरूदा, पालएलु आ, जार्ज आमद की कृतियों ने निर्मल वर्मा को बहुत प्रभावित किया। वैसे निर्मल वर्मा ने अन्तोन पाब्ला विच चेखव, टॉल्सटॉय और रोमा रोलॉ को भी पढ़ा था किन्तु उनमें लिखने की प्रेरणा रवीन्द्र नाथ टैगोर एवं प्रेमचंद को पढ़कर ही जगी थी। स्पष्ट है कि सर्जकों के लिए पढ़ने का परिवेश एक महत्वपूर्ण घटक होता है।

कोई भी सर्जक या साहित्यकार जीवन के कार्यक्षेत्र में विचरते हुए अपने चारों ओर घटित होती घटनाओं, जीवन अनुभवों, परिवेशगत प्रभावों सामाजिक भाईचारों, शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति बदलावों के प्रभाव से बच नहीं सकता। ये तमाम प्रभाव उसे एक जीवन दृष्टि प्रदान करते हैं। सर्जक को आवेश में लाने में भी मददगार होता है। सृजन अनुभव जब सृजन संवेदन बन कर कृति का रूप धारण करता है तो सर्जक के मन में उसका समूचा ज्ञान क्रियाशील होता है।

सर्जक का तात्कालिक रिश्ता प्रकट रूप से समाज से होता ही है और उसकी झलक उसके लेखन में प्रतिफलित होता है। किन्तु सर्जक के इस सृजित समाज में पूरा विश्व समाहित होता है। प्रकृति से लेकर सभी आलौकिक वस्तुएँ होती है। इसके साथ ही ईश्वर का होना या ना होना भी एक सोच के रूप में उपस्थित रहता है। सर्जक को इन सभी प्रश्नों एवं संशयों से निपटना होता है। उसे पूरे विश्व समाज के साथ एक आत्मिक रिश्ता कायम करना होता है। एक प्रतिबद्ध सर्जक जीवन के समस्त रहस्यों की पूँजी खोजना चाहता है।

आज का समय साहित्य सृजन के लिए चुनौतियों से भरा हुआ समय है। यद्यपि साहित्य के सम्मुख हर युग में अपने भिन्न-भिन्न रूपों में चुनौतियाँ रही हैं। पूर्व में आम आदमी तथा रचनाकार प्रतिबद्धता को लेकर उतने खंडित नहीं थे जितने आज हैं। सृजन के मानवीय रिश्तों और मानवीय संवेदना पर प्रश्न चिह्न लग रहे हैं, जबकि संवेदना साहित्यिक सरोकारधर्मिता को गहरे में प्रभावित किया है। आदमी एक बाजारू वस्तु बनकर रह गया है। गत तीन दशकों में रचित कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक के केन्द्र में यही आदमी था। आज सब कुछ अर्थ केंद्रित हो गया है एवं वैश्वीकरण, उदारीकरण, बाजारीकरण एवं उपभोक्ता संस्कृति जैसे ब्रांडों ने इस अर्थ केन्द्र को अधिक मजबूत बना दिया है। मानवीय संबंध, नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्य अपाहिज स्थिति में हैं। मनुष्य के अस्तित्व की बुनियाद हिल गई है। संवेदनशून्यता, दायित्व हीनता और मूल्यक्षरण को देखने के लिए किसी दूरबीन की आवश्यकता नहीं है। एक जागरूक सर्जक को इन्हीं परिवेशगत और व्यवस्थागत परिस्थितियों में कुछ समाधान नई दिशा एवं आलोक देना है। इसके माध्यम से मनुष्य और समाज भ्रमों, मोहों, भौतिक आकर्षणों एवं संशयों से ऊपर उठ कर अपनी मौलिक पहचान में उपस्थित हो सके। मानव कल्याण और सामाजिक उत्थान के लिए सर्जक या साहित्यकार निर्भीक अभिव्यक्ति के नए द्वार खोलने, जड़ता को चेतनता में बदलने एवं मनुष्य को मनुष्यांतर स्तरों के प्रति जागरूक करने में मददगार सिद्ध हो।

मेरे समक्ष जब यह बात आई कि ‘मैं और मेरा लेखन‘ विषय पर कुछ लिखंू। मैं अपनी ही सोच से परेशान हो उठी। यह एक साधारण सी दीखने वाली बात मेरे अंतर में प्रश्नों की खलबली मचाने लगी। कई प्रश्न उबल पड़े। आड़े-तिरछे, उल्टे-सीधे, कामयाबी नाकामयाबी सभी दृश्य तीर ताने खड़े हो गए। खैर, इनसे हटते-बचते सहज होती हुई मैं इन प्रश्नों के ताने-बाने में उलझी रही। हाँ मन में शब्दों के प्रति कही गई अपनी ही पंक्ति गूंजने लगी- शब्द ब्रह्म बिन लूँ कोई श्वास नहीं। शब्द शक्ति है। शब्द शिव है। शब्द ब्रह्म है। शब्द सृष्टि है। शब्द ही विश्व है। यह सब सत्य है।

जब हम कहते हैं, शब्द की सक्ति संधान से मानव बड़े से बड़े कार्य संपन्न कर लेता है। इसकी शक्ति से ही आदमी हँसता एवं रोता है। शब्द के प्रभाव से ओज और उन्माद दोनों पैदा होते हैं। शब्द ही तो सभी क्रान्तियों की जन्मदाता है। इतिहास एवं सभ्यता की अक्षरित परिभाषा है। शब्द के उपयोग के अभाव में मनुष्य नहीं पशु एवं पशुता ही सत्य है क्योंकि संस्कृति और संस्कार की प्राप्ति शब्दों एवं भाव के बिना संभव नहीं हो पाती है।

इस शब्द शक्ति की अराधना करते हुए मैं सब कुछ भूल जाती हूँ। केवल चिंतन एवं विचार की उमड़-घुमड़ मेरे अंतर में होने लगती है। शब्द और संसार एक-दूसरे के पर्याय हैं। दुनियाँ में सभी कुछ शब्दों से होता है। मेरे अंतर में शब्द निर्मित होते हैं और में सफेद कागज को काली करती चली जाती हैं। वैसे बचपन में पढ़ी गई कविताएँ कहानियाँ मेरे अंतर में उतर जाती थी। वे मुझे कंठस्थ हो जाती थी। पढ़ने का चाव ऐसा बढ़ा कि गाँव में अपने पिता एवं कुछ अन्य युवकों द्वारा स्थापित पुस्तकालय की सभी पुस्तकें पढ़ गई। यहाँ तक कि मैग्जिम गोर्गी लिखित उपन्यास मदर की अनुदित प्रति माँ भी पढ़ गयी। समझ में कुछ खास नहीं आया। लेकिन कुछ थोड़े से अंश याद रहे। इस प्रकार मेरे अंतर में शब्द विकसित हुए। रुचि-सुरूचि के साथ एक रचना प्रक्रिया श्वांस लेने लगी। धीरे-धीरे अभिव्यक्ति का ब्रश हाथ में ले शब्दों के इन्द्रधनुषी रंगों में डूबाते हुए अर्थायित करने लगी। मुझे पता तो नहीं चल पाता था कि क्या लिख रही हूँ। हाँ कुछ लिखे हुए पृष्ठों को अकेले में बैठकर दुहराती, अपनी बुद्धि के अनुसार सही गलत करती थी। एक दिन पिता जी ने देख लिया और उसे मुझे सरिता का पता देकर उसमें छापने हेतु भेजने को कहा। मैंने भी एक सादे पृष्ठ पर लिखकर ममता के नाम से भेज दिया। वहाँ उसे सरिता में प्रकाशित किया गया। प्रति पिताजी लेकर आए तो अजीब सी खुशी हुई। यकीन नहीं कर पा रही थी कि इन्होंने मेरी टूटी-फूटी शब्दों की कड़ी को चित्रित किया है।

आरंभ में मैंने लेखन या सृजन के विश्लेषण की बातें रखी है। इसी क्रम में अब अपनी बात को विस्तार देने की कोशिश रहेगी।

खैर ज्यों-ज्यों बड़ी हुई पुस्तकों से लगाव बढ़ता गया। पढ़ने के साथ लिखना भी चलता रहा। कविताएँ लिखीं। कहानियाँ लिखी, मेरी लिखी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी। इससे एक ओर जहाँ हिम्मत बढ़ी, वहीं दूसरी ओर लेखन के प्रति स्नेह एवं समर्पण तथा जुड़ाव में अभिवृद्धि हुई। संवेदनशील मन की बेचैनी एवं बेकरारी जीवन का हंसना-मुस्कुराना कभी रुठना-रूदन, जिंदगी की लकीरों के बीच कभी अर्धविराम, कभी पूर्णविराम, कहीं प्रश्नसूचक चिह्न सब के सब कलम की नोक से भावनाओं की स्याही में बहने लगे। यह सिलसिला ही बन गया। कभी अनिच्छित बगावत, तो कभी तूफान एवं धूल के अंधड़ से भरे सड़कों पर सरफट भागती मुझ अकिंचन को सीधे-सीधे साहित्य के विशाल प्रांगण में ला खड़ा किया।

कॉलेज के समय में सह संपादक के रूप में किया गया कार्य सामाजिक क्षेत्र में संपादन की जिम्मेदारी उठाने योग्य बनने में सहयोगी रहा। पुनः रूचि ने इस कूची में रंग भरे और महिला-दर्पण, महिला सुधा मासिक, रेल यात्री मासिक से होते हुए विवरण पत्रिका एवं पुष्पक, पुष्पक साहित्यिकी तथा अन्य साहित्यिक सामाजिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन का दायित्व निभाती आगे बढ़ती चल रही हूँ। संपादक बनने में मेरी इच्छा अनिच्छा से अधिक मेरा जोश एवं दायित्व निर्वाह के भाव ने काम किया तो पत्रिका चलाने और प्रकाशन के शौक ने प्रधान संपादक बना दिया। इसके लिए पुरस्कृत होने का सौभाग्य ने मुझे इसके प्रति एकनिष्ठ बनाया। गृहस्थी एवं सेवा कार्य से तारतम्य बैठाते हुए मैंने इन सभी स्थितियों पर विजय प्राप्त किया।

शब्द मूल रूप में रहे तो शब्द होते हैं। जबान की लड़खड़ाहट से अपभ्रंश की पैदाइश होती है। यही अपभ्रंश धीरे-धीरे नई बोली अथवा भाषा के द्वार खोलता है। फलतः लेखक अपने लेखन में पाठक से पूर्व गहरे पानी पैठकर गोता लगाता है और शब्द रूपी मोती को विचार रूपी माला में गूंथता है। शब्द की शक्ति एवं व्यापकता समझना आवश्यक है। प्रत्येक लेखक शब्द ब्रह्म की पूजा करता है। शब्दों की शक्ति से मानव हँसता एवं रोता है। शब्द की शक्ति हेतु खतरे भी उठाता है। शब्द की शक्ति मनुष्य को बिना छुए बिना देखे भी अपना प्रभाव उत्पन्न करता है। शब्द के रूप में शिव यानी कल्याण तथा शिवत्व की प्राप्ति होती है। शब्द के अनुशासन में सृष्टि की तीव्रता का समाहार होता है। शब्द से परमार्थ, स्वार्थ, क्रोध, करुणा आदि का संबंध होता है। व्यवहारिक दृष्टि से शब्द ने ही दुनिया का निर्माण एवं विकास किया है। शब्द नहीं तो लिखना या बोलना नहीं होता और यह क्रिया नहीं घटती तो मानव के लिए सभ्य समाज ही नहीं होता। शब्द की मुख्यतः दो स्थितियाँ हमारे अंदर पायी जाती हैं- पहली प्रकट एवं दूसरी गुप्त, अंतस्थ, गहनद्य पहले बोली या अक्षर है। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त शब्द सीख कर इसके प्रयोग, उपयोग तथा अनुशासन में बंधा होता है। जो बोला जाता है उसे लिपि में बदलने पर ग्रंथ लिखे जाते हैं। साहित्य बनता है। यानी बोली उच्चारण से अक्षर की यात्रा करता है। लिखने की भाषा हेतु ध्वनि यानी शब्द के अमूर्त रूप एवं उच्चारण की प्रक्रिया पहले मानस में होती है तभी हाथ से लेखन के आकार में लिपि रूपी अक्षर बनता है। यही होती है अमूर्त से मूर्त रूप में शब्द की यात्रा। यहीं दोनों शब्द के रूप हर लेखक अपने लिए प्रयुक्त करता है।

शब्द निर्माणकर्ता यानी सृजनकार अथवा लेखक किसी पुरस्कार अथवा सम्मान को सामने रख कर लेखन नहीं करता। इसका यानी सर्जनात्मक मेधा के विकास का पुरस्कार या सम्मान से कोई संबंध नहीं होता है। सर्जनात्मक मेधा का विकास यथार्थ की समझ में और उसके सबसे बड़े पहलू को पकड़ने पर निर्भर करता है। अपने जीवन के साथ लेखक के लेखन का संबंध मुख्यतः जीवन के अनुभवों पर निर्भर करता है। लेखन और जीवन का तालमेल जीवन के व्यक्तित्व और लेखन के स्वरूप पर आधृृत होता है। सभी लेखक एक समान जीवन मूल्य नहीं प्रेषित कर सकते हैं। हाँ, विभिन्न देशों में समाज की विचारधारा के जीवन मूल्य बनाने वाले लेखक हो सकते हैं।

साहित्य समाज में समस्या एवं संघर्ष बढ़ जाने का एक कारण मूल्यों का टूटना भी है। ईमानदारी, प्रेम, सत्य, अहिंसा, करूणा, मैत्री, शांति, परोपकार जैसे मूल्यों को कभी भी चुनौती नहीं दी जा सकती है। आज साहित्य लेखन में पुराने मूल्यों को बदलने की बात भी की जा रही है। जीवन के मूल्य विघटनकारी, स्वार्थपूर्ण, पूँजीवादी व्यवस्था के कारण टूट रहे हैं। यदि लेखक मूल्यों के टूटने बिखरने की प्रक्रिया का चित्रण करता है तो वह महत्वपूर्ण साहित्य का निर्माण कर पाएगा। समाज के बदलने के साथ यथार्थ में आए परिवर्तन के साथ भी बदलते हैं। जीवन में समाज एवं राजनीति का दखल हो रहा है। मानव मूल्य के स्थान पर पूँजी बाजार, उपभोक्तावाद आदि जीवन और समाज के मूल्य बन गए हैं। आज के साहित्य के संबंध में समाज अधिक जान पाता है। सामाजिक अनुशासन समाप्त होने के कारण स्वार्थ फल-फूल रहा है। व्यक्तिगत स्वार्थ मजबूत हो गया है। साहित्य समाज में और समाज में प्रसिद्ध होने की लालसा उच्च साहित्य सृजन में बाधक है। 

एक ओर लेखन निर्बाध चलता रहा। छोटी एवं संक्षिप्त गृहस्थी के साथ पति का साथ एवं पुत्र का सहयोग तथा सेवा कार्य से बचे सारा समय कलम की बाढ़ में बहता ही रहता था आगे भी बहता गया। अब बारी प्रकाशन की आई तो सौभाग्य से एक प्रकाशक ने सहयोग किया। इस लंबे अंतराल में करीब 6 कविता-संग्रह, 3 निबंध संग्रह, 3 कहानी संग्रह, 1 नाट्य संग्रह, 1 जीवनी, 1 समालोचना ग्रंथ, 1 प्रदेश विशेष की गाथा एवं 2 उपन्यास का लेखन संपन्न हो चुका है। उपन्यास अप्रकाशित है यानी प्रकाशनाधीन है। करीब पाँच निबंध संग्रह एक कविता संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। इनमें से अधिकतर पुस्तकें पुरस्कृत हैं। एक सोच हमेशा बनी रहती है कि समाज कल्याण काम एवं सद्साहित्य के निर्माण मेरे लक्ष्यार्थ बने रहे। बुराइयों को चिह्नित करते हुए सचेतक बनें। पढ़ना आज भी जारी है। मेरी मान्यता है जो पढ़ेगा नहीं वह लिखेगा क्या? हर लेखक को स्वयं को परिपक्व बनाने हेतु स्वाध्याय आवश्यक है। रचनाकार अपने पाठकों की माँग पर ही लंबे समय तक रचना संसार में बना रहता है। यानी लेखक की निरंतरता का श्रेय पाठकों को जाता है। मनुष्य कभी भी अपने प्राप्ति से संतुष्ट नहीं होता है। और- और-और की प्यास उसके अंतर में हमेशा बनी रहती है। यहीं उसके अंतर में चलने वाली जीवन प्रक्रिया है। यह यत्र-तत्र-सर्वत्र होता है। प्राप्ति से बढ़ कर और अधिक की प्राप्ति। जीवन का लक्ष्य, अधिकतम शब्द-सृजन, शब्द उत्खनन, शब्द नियोजन। मुझे तो सतरंगी जीवन चाहिए। इन्द्रधनुष सा शब्दों की आभा बिखरनी है, मुझे ढलते दिन नहीं शब्दों का उगता सूर्य स्पर्शित करना है। स्वाभाविक है लेखन जो निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है इससे झरते शब्दों के फूल कभी कविता बनते हैं, कभी कहानी तो कभी उपन्यास, कहीं सामाजिक समस्याओं के चितेरे बन जाते हैं तो कहीं गूढ़-गहन दर्शन एवं चिंतन का निक्षेप। मन के अथाह समुद्र में उठती-तूफानी लहरें अलग-अलग शब्दों की रूप-रेखा बनाकर गद्य-पद्य का जामा पहन लेती है फिर आपके समक्ष पूजा के फूल सा उपस्थित कर देती हूँ। यही पाठक हमारे मार्गदर्शक, गुरू एवं सही दिशा-निर्देश देने वाले होते हैं इनके द्वारा जब हमारा लेखन सराहना मिलती है तो हमें अतीव प्रसन्नता होती है। लगता है कि हमारा लेखन सार्थक हो गया है। हाँ, यह अलग बात है कि मुझे अपने पाठकों द्वारा की गई आलोचनात्मक टिप्पणियाँ अधिक सटीक लगती है। इनसे मुझे अपनी रचनाओं को छीलने, तरासने, चमकाने में अत्याधिक सहयोग प्राप्त होता है। वैसे लेखक अपने अहं एवं निजत्व को अलग रखकर अपनी रचना का पुनः पाठ करे, स्वयं के गुण-दोषों की विवेचना करे और अपनी कसौटी पर रचनाओं को कसे तभी रचना में निखार आ पाता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कई-कई दिन एक ही रचना में हम अटके पड़े रह जाते हैं। आगे बढ़ने का मार्ग ही नहीं सूझता। मैं भी अपने लेखन के क्षणों में इन सभी मनःस्थितियों से जूझती रहती हूँ। कई बार मानसिक रूप से रचना से गहरे जुड़ जाती हूँ। मस्तिष्क पूरी रचना का खाँका तैयार कर लेता है किन्तु कागज पर उतरते हुए इसके स्वरूप में कई-कई परिवर्तन होते हैं। हाँ, मनोभाव में एक लक्ष्यार्थ अवश्य रहता है कि बुराई को सामने रखते हुए अच्छाई को प्राप्त किया जाए। भाषात्मक स्वरूप में भी अपनी शैली के साथ लक्ष्य भाषा को वश में करना होता है। कितना भी कहूँ किन्तु अपने लेखन पर शायद पूरी तरह से सब कुछ नहीं कह पाऊँगी। अतः बात यहीं समाप्त करती हूँ। हाँ एक बात अवश्य है कि मैं शब्द तो रच दूं। आओ अपने अंतिम श्वांस तक बस शब्द रचती जाऊँ, रचती जाऊँ, बस यही कर्म हो। यही मेरा जीवन हो।

हैदराबाद लीटट्ररी फेस्टिवल जनवरी 2012 में पवन कुमार वर्मा के साथ डॉ. अहिल्या मिश्र