इश्क में शहर होना

 पुस्तक समीक्षा


डाॅ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा


लेखक - रवीश कुमार

सार्थक - राजकमल प्रकाशन, 

मूल्य: रुपये 99/-

जब किसी क्षेत्र में पहले से स्थापित व चर्चित चेहरा, साहित्यिक क्षेत्र में पदापर्ण करें तो उत्सुकता होना स्वाभाविक हैं। वह नवीन रचना एक नवीन विधा को ले कर साहित्य-जगत में प्रवेश करें तो जिज्ञासा बन जाती है। रवीश कुमार एक ऐसा ही हस्ताक्षर हैं, जिस का टी. वी. पत्रकारिता और सोशल मीडिया में अपना एक सुनिश्चित स्थान है। रवीश कुमार ने पुस्तक की भूमिका में बताया है कि बिहार के मोतिहारी जिले से शिक्षा-प्राप्ति के लिये पटना जाना ही जिन्दगी में बदलाव का सूचक था, मगर तब तक ‘स्थायी पता’ गाँव ही रहा। कार्यक्षेत्र में मुकाम हासिल करने के लिये दिल्ली पहुँचने पर पहली बार पता लगा कि ‘शहर’ क्या होता है। वहाँ ‘स्थायी पता’ हासिल करने से पहले उसे जानना-समझना पड़ता है। इस की खोज गली- मुहल्ले, सड़क-दर-सड़क नाप कर की जाये तो उस शहर से नाता और संवाद जल्दी कायम किया जा सकता है। यही सोच कर शहर की ख़ाक छानने निकले रवीश कुमार ने ना सिर्फ़ शहर को परत-दर-परत जाना-समझा अपितु इस शहर ने भी उसे अपनाया और एक नयी पहचान दी। ‘नयना’ के मिल जाने के बाद ‘स्थायी पता’ भी जल्दी मिल गया।

‘इश्क में शहर होना’ नामक पुस्तक युवावस्था के इश्क को ही सिर्फ़ बयान नहीं करती, शहरों के कई रहस्य भी खोलती हैं, विशेषकर दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों के। पाँच  शीर्षकों के अन्र्तगत विभाजित कर इन अत्यन्त छोटी प्रेम कहानियों में पिरोया गया है।

 अपनी प्रेमिका के साथ देर तक घूमने-फिरने केे लिये चहलकदमी की, बस, मेट्रो का सफ़र किया, दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों की सैर की। पुराने फिल्मी गीत सुनते, साथ-साथ गुनगुनाते और इश्क फरमाते हुये, मालूम नहीं कब, दिल्ली जैसे महानगर की जीवन-शैली, रहन-सहन, लोगों की मानसिकता, वर्ग-श्रेणी की पहचान लेखक के भीतर कहीं गहरे बस गयी। तभी इसे लिखते समय उस ने इस शहर को अपने इश्क में रचा-बसा पाया। ये दोनों अलग-अलग यथार्थ एक-दूसरे में इतने घुल-मिल चुके थे कि इस से एक नयी परिकल्पना ने जन्म लिया। इसे एक नया प्रयोग कहा जा सकता है, वर्तमान समय की भागदौड़, प्रतियोगिता, सोशल नेटवर्किंग और एस. एम. एस के युग में कम शब्दों में अधिक संदेश देना, थोड़े में ज़्यादा समझना और समझाना समय की माँग बन चुकी हैं। इसीलिये इसे नाम दिया गया, फेसबुक. फ़िक्शन यानि लप्रेकं। 

आठ-दस पंक्तियों में रचे गये अनुभव प्रेम कहानी का आभास देते हैं। बिना शीर्षक, कथानक, घटना के, नामविहीन पात्रों के संवादों से जो प्रभाव बनता है, उस से बहुत से तथ्यों और सच्चाईयों से पर्दा उठता जाता हैं। जैसेः शहर के किस स्थान की रिहायश रहने वाले हैसियत दर्शाती है और कहाँ की औकात बताती हैं। किसी मार्किंट में खरीदारी करते हुये, यदि पास से कोई विदेशी गुज़रता नज़र आ जाये तो भारतीयों की मानसिकता उन्हें साधरण दुकानदार के साथ अंग्रेज़ी बोलने को उकसा जाती है, जैसे इस तरह उन का प्रभाव अधिक पड़ेगा। गाँव व कस्बों से आये नौजवान जो आरंभ में दही-चूड़ा और भात खा कर गुज़ारा करते हैं, जल्दी ही प्राॅन और चेट्टीनाड चिकेन खाना सीख कर, लेडीज सीट पर बैठ कर झेंपना व शर्माना भूलने लगते हैं। प्रेमी-प्रेमिका की बातचीत में सियासत, साहित्य, विदेशी लेखक, फिल्में, गाने आदि कई विषय टी.वी. के चैनलों के सर्वे की तरह प्रतिशतों में शामिल नज़र आते हैं।

इस पुस्तक की संरचना में काफी बड़ी भूमिका विक्रम नायक के चित्रांकन की भी हैं। उस ने  लेखक की रचना को अपने चित्रों से और भी जीवतंता से साकार कर दिया। कई बार यह समझ में नहीं आता कि रचना को पढ़ कर चित्रांकन किया गया है कि चित्र देख कर रचना की गयी है। ऐसा सामंजस्य बहुत कम देखने में आता है। इसलिये इस परिकल्पना को साकार करने और सफल बनाने में दोनों का सहयोग सराहनीय है। किसी बात को कम शब्दों में समझा पाना कठिन होता है। फेसबुक, टिवट्र, मिस्ड काॅल और एस.एम.एस के ज़माने में लप्रेकं का स्वागत किया जाना स्वाभाविक है। इसे एक नयी साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि साहित्य में संभावनायें सदा बनी रहती है, मगर इसे मान्यता देने में जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिये..।

-डाॅ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा, नई दिल्ली, मो. 9868182835