डॉ. अहिल्या मिश्र का रचना संसार (प्रकाशित पुस्तकों में से चुनीं कविताएँ, निबंध, लेख, कहानियाँ एवं समीक्षाएँ)



 विद्यापति की पदावली का शैलीतात्विक अध्ययन (2000)
मिथिला, मैथिली और विद्यापति: प्रो. दिलीप सिंह

परंपरा से कटी आधुनिकता के पीछे भागने की और जीवन-तथ्यों को पाश्चात्य अथवा आभिजात्य निगाहों से परखने की अधकचरी मानसिकता ने हमारी लोकजनित, लोक-पोषित एवं लोक-सिद्ध अस्मिता और संवेदना को सर्वाधिक चोट पहुँचाई है। हिंदी भाषा क्षेत्र को गँवारू और उसकी बोलियों को ‘अपभ्रष्ट‘ कहने-मानने की ‘मानक भाषा‘ की आदर्शात्मकता पर टिकी दृष्टि ने एक ओर जहाँ हिंदी भाषा को उसकी लोक-चेतना से दूर किया है, वहीं दूसरी ओर बोली-समूहों के मिश्रित भाषा-प्रयोग के आधार पर बोली-क्षेत्र को ‘पिछड़ा‘ घोषित करके अपने छद्म आभिजात्य अहम् की तुष्टि की है। संतोष की बात है कि डॉ. अहिल्या मिश्र की पुस्तक ‘विद्यापति की पदावली का शैली-तात्विक अध्ययन‘ इस दिशा में बहुत कुछ सोचने-गुनने का मौका हमें देती है।

जॉर्ज ए. ग्रियर्सन की यह टिप्पणी काबिले-गौर है कि ‘^Mithila with its own tradition, its own poets and its own pride in everything belonging to itself. (Mithila Grammar P-2). अपनी धरोहर पर गौरव करने वाले तिरहुत या मिथिला के नाम से जाने जानेवाले इस क्षेत्र को ‘शतपथ ब्राह्मण‘ (1000-600 ई. पू.) में ‘विदेह‘ कहा गया है। इस क्षेत्र का इतिहास युद्ध और तलवार से नहीं, साहित्य, ज्ञान और भाषा की साधना से लिखा गया है। इस क्षेत्र के शासक भी परम विद्वान रहे हैं। ‘खाडवा‘ दरभंगा राजा के पूर्वज अपने ज्ञान के बल पर शासक बने थे, पूजे जाते थे ये शासक इस क्षेत्र में। ‘दार्शनिक राजा‘ थे यहाँ के। पूरे भारत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिलेगा जहाँ साहित्य, चिंतन, दर्शन आदि बौद्धिक क्रियाकलाप में शासकों की इतनी अहम भूमिका रही हो। ये मात्र ‘आश्रयदाता‘ नहीं थे। मिथिला क्षेत्र में विदेह जनक और महेश ठाकुर आज भी जन-जन के हृदय में विराजमान है, प्रातःस्मरणीय है।

इस क्षेत्र के शासकों की शास्त्रप्रियता ने ही मिथिला को बरसो-बरस तक वैदिक और औपनिषदिक अध्ययन का केंद्र बनाया, बनाये रखा। सांख्य (कपिल), न्याय (गौतम), वैशेषिक (कणाद) और मीमांसा (जैमिनी) की यह चिंतन-भूमि रही है। इस क्षेत्र की परंपरागत शिक्षण-व्यवस्था ने भी यहाँ के लोगों में स्व-अस्मिता‘ को सुरक्षित रखने का भाव पैदा किया। उपाध्याय, महोपाध्याय, महामहोपाध्याय जैसी उपाधियाँ मात्र उपाधियाँ नहीं, संस्कृति और भाषा को सुरक्षित रखने का माध्यम थीं। पुस्तक के खंड-3 मिथिला का शैली भूगोल और इतिहास‘ में इस तरह की प्रेरक पृष्ठभूमि पर लेखिका ने प्रकाश डाला है।

मैथिली का साहित्य अनूठा है, इस बात को अनेक विद्वान. नए-पुराने, एकमत से स्वीकार करते हैं। हिंदी की किसी भी बोली का ऐसा साहित्य नहीं है, जिसके रचनाकार संस्कृत साहित्य की परंपरा को इतनी दक्षता से निकट लाते हों, बोली में ढालते हों। न केवल कथानक या विषय बल्कि बिंब, प्रतीक और सौंदर्य प्रतिमान भी मैथिली के लोकगायकों ने संस्कृत और प्राकृत से लिए। पुस्तक के दूसरे खंड ‘भारतीय शैली भूगोल‘ में मैथिली साहित्य की इस ख़ासियत पर विचार किया गया है, पर अत्यंत संक्षेप में। इसे शैलीय विश्लेषण का आधार बनाया जा सकता था। संस्कृत से छन कर काव्य-संवेदना लोकभाषा में कैसे अंतरित होती है, यह अपने में विचारणीय अंश बन सकता था। यह पक्ष भी इस शैलीतात्विक विश्लेषण में अछूता रह गया कि मैथिली साहित्य ‘भारतीय बहुभाषिकता‘ की सैद्धांतिकता को समक्ष घटते हुए उजागर करता है- संस्कृत, प्राकृत, मैथिली तीनों का सहयोजित प्रारूप इस साहित्य में अंतर्भुक्त है जिसकी पड़ताल अभी होनी है।

मैथिली में लिखनेवालों ने संस्कृत को भरपूर आदर दिया, जबकि संस्कृत के विद्वानों ने मैथिली को हमेशा ‘अपभ्रंश‘ (गिरी हुई, अपभ्रष्ट) कहा और हल्के-फुल्के साहित्य-लेखन का माध्यम माना। पर मिथिला का लोक-जीवन और मैथिली का लोक-साहित्य आभिजात्य जनों की इस भ्रामक धारणा को स्वयमेव चुनौती देता हमारे सामने है। मिथिला का अंचल शिवमय है। मिट्टी के शिवलिंग की पूजा के बिना इस क्षेत्र का शायद ही कोई शुभ कार्य संपन्न होता हो। ‘महेशवाणी‘ और ‘नचारी‘ मैथिली में रचे शिवभक्ति के गीत हैं। मैथिली में खंडकाव्य अधिक प्रचलित रहे हैं। ‘नारद विवाह‘ (अनूप मिश्र), वाताह्वाण-काव्य‘ (सिद्धिनाथ झा) आदि की चर्चा मैथिली साहित्य के अध्येताओं ने की है। पर लोकजीवन पर सर्वाधिक प्रभाव रहा है लोक-काव्य रूपों का। शिल्प और शैली दोनों ही दृष्टियों से इन काव्य-रूपों में अध्ययन की अकूत संभावनाएँ छिपी हैं। ‘कोहबर गीत‘, ‘संभर‘ की चर्चा पुस्तक के पाँचवें खंड ‘पदावली संबंधी विवाद और स्थापनाएँ‘ के पहले अभीष्ट थी, विशेषकर उन काव्य-रूपों के संदर्भ में जिन्हें विद्यापति ने भी अपनाया, लोकप्रिय बनाया, जैसे- ‘बटगमनी‘ (अभिसार के लिए जाने वाली नायिका के चित्र जिसमें ‘सूर‘ की प्रधानता होती है, विद्यापति इसमें अत्यंत सशक्त हैं), ‘गोआलरी‘ (कृष्ण-गोपी लीलाओं के गीत जिनमें सौंदर्य और केलि के अद्भुत चित्र होते हैं), ‘राग‘ और ‘मान‘ (जिनमें स्त्री-पुरुष के बीच के रागात्मक संबंधों, मान-मनोबल की मनोहारी छटा बिखरती है) और साथ ही लगनी‘, ‘चैती‘, ‘फागू और सोहर‘ जो क्रमशः रे की, हो रामा, हे हरी और देवी माई से शुरू होते हैं। पदावली‘ वास्तव में इन लोक-काव्य रूपों का समन्वित संकलन है। अध्ययन में इन शैलीय भेदा रूपा को ‘पार‘ कर जाने से कड़ियाँ टूटती-सी लगती है, समग्रता नहीं आ पाती, सो अलग।

मिथिला में ‘अपभ्रंश‘ का अर्थ है- ‘देस भाषा‘ या देसिल बयना‘, जिस पर पुस्तक के चैथे अध्याय ‘काव्य भाषा: काव्य शैली‘ में विचार किया गया है। ‘तिरहुतिया‘ मिथिला के लोगों को भी कहा जाता है और तिरहुता‘ मैथिली की लिपि का नाम भी है, जैसी भाषायी चिंता पर लेखिका ने छठे अध्याय में कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए हैं। पर कुछ संदर्भ छूट गए हैं, जिनके जुड़ने से मैथिली भाषा के शैलीय गठन की विशिष्टता को बल मिलता। जैसे सर एरस्किन पेरी ने मैथिली को ‘तिरहुती‘ कहा (1835) और इसे बंगला भाषा के अंतर्गत माना। जॉन बीम्स ने इसे ‘मैथिली‘ कहा और ‘हिंदी‘ के अंतर्गत रखा ! जॉर्ज कैंपबेल (1874) ने इसे स्वतंत्र रूप से बिहार की भाषा माना, जिस पर बाद में जॉर्ज ग्रियर्सन (1880) ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। मैथिली की अनेक उपबोलियाँ है। विश्लेषण से मैथिली-भोजपुरी के मेलजोल या कम-ज्यादा प्रभाव से उपजी शैली को भी इस विश्लेषण में उतारना चाहिए था। तभी भाषा-संपर्क के परिणाम से उत्पन्न मैथिली में निहित शैलीय घटकों पर प्रकाश पड़ सकता था।

भाषा के यथार्थ को अपने काव्य में उतारने के कारण तो विद्यापति मैथिली के ‘शेक्सपियर‘ माने ही जाते हैं। इस अर्थ में भी वे अद्भुत रचनाकार हैं कि उन्होंने मिथिला की पूरी विशेषता, सौंदर्य, लोक और जीवन को तलस्पर्शी ढंग से अपने काव्य में उतारा, लोकप्रिय बनाया। संगीत में वे दक्ष थे। पुस्तक के खंड सात ‘पदावली की भाषा संरचना‘ के पहले अंश ‘ध्वनि‘ में लेखिका ने इसका संकेत दिया है, पर विश्लेषण काव्य-ध्वनि पर केंद्रित न रह कर ध्वनि वैज्ञानिक विश्लेषण की ओर चला गया है। कीर्तिलता‘ और ‘कीर्तिपताका‘ की चर्चा महत्वपूर्ण है और ‘पदावली‘ पर विचार करते समय प्रासंगिक भी। कीर्तिलता‘ में भिन्न काव्य-रूप इस्तेमाल हुए है- दोहा, चैपाई, अपभ्रंश और प्राकृत के छंद, कुछ गद्य अनुच्छेद और भृग-भृगी के संवाद भी। इन पर लेखिका ने पुस्तक के चैथे खंड में विद्यापति की काव्य-शैली पर प्रकाश डालते हुए संकेत किया है। 'कीर्तिपताका' विद्यापति का मेधावी ग्रंथ है- भाषा और काव्य दोनों का आश्चर्यजनक घालमेल, फिर भी अतुलनीय। 

अर्धनारीश्वर की स्तुति मैथिली में, सरस्वती, गणेश की संस्कृत में, फिर शासकों की स्तुति, तुरंत बाद कृष्ण का प्रेम-वर्णन और अंत में शिवसिंह की वीरता का वर्णन है। विद्यापति की इन दोनों कृतियों में शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के कई बिंदु विद्यमान है।

गीत तो पद/पदावली से ही मान्य है जिन पर यह पुस्तक केंद्रित है। पदों के लिए रंग और रंगों की कितनी छटाएँ-राधा-कृष्ण के नित नवीन प्रेम के अनेकानेक रूपों में बंधे। राधा के प्रेम और उनके सौंदर्य का वर्णन तो चमत्कारी है। मिलना, मान-मनौवल, केलि, बिछोह, पुनः मिलन के चित्र अति शृंगारिक होने के साथ अति आध्यात्मिक भी हैं। पुस्तक के आठवें खंड ‘पदावली का शैलीतात्विक अध्ययन‘ में गुणतत्वविवेचन के बहाने इन पर टिप्पणी मात्र है पर शृंगारिकता को आध्यात्मिक ऊँचाई तक पहुँचाने में शैलीय गठन की कौन-कौन-सी प्रक्रियाएँ विद्यापति ने अपनाईं, यह मूल बात छूट गई है। प्रेम आदि भाव-छटाओं को व्यक्त करने वाले विशिष्ट शैलीय भेदोपभेद भी इस विश्लेषण में सिमटने चाहिए थे। दैनंदिन जीवन, लोक जीवन से पदावली की संबद्धता, प्रकृति के उपादानों के व्यंजक प्रयोग (चकोरा, मक्खी, कमल, शेर, सोना, अमृत, तीर, राहु, चंद्र, खंजन, श्रीफल, मलय आदि), शब्द-व्युत्पत्ति, शब्द-विकास, शब्द-परिवर्तन, ध्वनि लोप, विपर्यय, स्वराघात आदि के विवेचन का सराहनीय प्रयास पुस्तक के सातवें-आठव खंड में हुआ है- पर इसका प्रारूप भी भाषावैज्ञानिक अधिक बन गया है, शैलीवैज्ञानिक कम। इस विवेचन को पाठ-केंद्रित प्रारूप के सहारे शब्दार्थ-संदर्भ से जोड़ कर ज्यादा सार्थक बनाया जा सकता था। पाठ-विश्लेषण के अनेक धरातल इस बीच साहित्यिक शैली-विज्ञान में उभर चुके है, यदि पुस्तक छपवाने से पहले विश्लेषण अंशों में इनकी मदद ली जाती तो सोने में सुहागा हो जाता।

पुस्तक गंभीर शोध का नतीजा है इसमें कोई संदेह नहीं। मिथिला क्षेत्र, मैथिली भाषा के इतिहास और मिथिला संस्कृति पर पुस्तक में ऐसा भरपूर है, जो पठनीय भी है और विचारणीय भी। पदावली का ‘भाषा शैलीवैज्ञानिक‘ (साहित्य-शैलीवैज्ञानिक नहीं) विश्लेषण भी अत्यंत सूक्ष्मता से किया गया है जो निश्चित ही साहित्यिक पाठों के बाह्य धरातलों पर केंद्रित और खीझ पैदा करने वाली किताबों के बीच एक आशा जगाता है। लेखिका के पास ऊर्जा भी है और दृष्टि भी। आशा है, आगे वे सही दिशाएँ भी टटोलेंगी और इससे भी सुडौल और वैज्ञानिक रचना पेश करेंगी।

(‘विद्यापति की पदावली का शैलीतात्विक अध्ययन’: समीक्षा)